इंकलाब के ढहते अर्थ
बहस
इंकलाब के ढहते अर्थ
कनक
तिवारी
‘इंकलाब ज़िंदाबाद‘ बीसवीं सदी के भारत में शायद सबसे प्रखर लोकप्रिय नारा रहा है.
कई नारे हैं जिन्होंने देश के जीवन को बेहद प्रभावित किया है. ‘भारत माता की जय‘,
‘दुनिया के मज़दूरों एक हो‘, ‘हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है‘,
‘गूंजे धरती और आकाश देश का नेता जयप्रकाश‘, ‘जयश्रीराम‘, हम सुधरेंगे, युग
बदलेगा‘, ‘गरीबी हटाओ‘, ‘जय जवान जय किसान‘ ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार
है‘, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा‘, वगैरह नारे आज भी देश की
गूंज-अनुगूंज बने हुए हैं.
‘इंकलाब ज़िंदाबाद‘ मूलतः कम्युनिस्टों का नारा है. लेकिन भारत में वह हमारे महान
क्रांतिकारियों भगत सिंह और उनके साथियों की ज़ुबान पर इस तरह चढ़ा कि देश आज भी उसकी
पुनरावृत्ति कर रहा है. ‘इंकलाब ज़िंदाबाद‘ आज भी जनविद्रोह का पर्याय है. वह भारतीय
जनमानस में बगावत के स्फुर्लिंग भरता है.
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को यह मालूम था कि उन्हें फांसी होगी. फिर भी इस नारे
का उद्घोष करने के लिए उन्होंने असेम्बली बमकांड रचा और उसके पहले सान्डर्स को गोली
मारी. देश के लाखों मज़दूर अपने हक तथा मांगों के लिए इस नारे के सहारे लड़ते रहे.
जॉर्ज फर्नांडीस, दत्ता सामंत, दत्तोपंत ठेंगड़ी, वी.वी. गिरि जैसे जाने कितने ट्रेड
यूनियन नेता रहे हैं जिनके लिए ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद‘ भारतीय जीवन की धड़कन रहा है.
आज़ादी के तीस बरस बाद देश को आपातकाल से गुजरना पड़ा. संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक
अधिकारों की उपेक्षा और अवनति हुई. मज़दूर आंदोलन कुंठित होना शुरू हुआ. देश पर
हुकूमत कर रही पार्टी में पहले से ही चोर दरवाजे़ बन गए थे. राजे रजवाड़े, ज़मींदार,
सेवानिवृत्त नौकरशाह, नवधनाड्य वर्ग के शोहदे, दलितों और आदिवासियों के स्वयंभू,
पांच सिताराई मसीहा, अपराधियों और संदिग्ध चरित्र के व्यक्तियों ने सभी राजनीतिक
पार्टियों में धीरे धीरे घुसपैठ करते हुए अपनी जगहें पुख्ता तौर पर सुरक्षित कर
लीं. देश के अवाम की ज़िन्दगी बने नारे सुबकने लगे. इन्कलाब का अर्थ सत्ताधारी
पार्टी के समर्थक श्रमिक नेताओं द्वारा राजनीतिक आकाओं की खुशामदखोरी में सिमट गया.
यह बीमारी उन कम्युनिस्ट पार्टियों में भी आ गई जिन्होंने देश को यह आयातित नारा
दिया था.
क्रांति का यह वैश्विक नारा वैश्विक उदारवाद के दिनों में अपनी चमक लगभग खो चुका
है. इस देश का सुप्रीम कोर्ट भी जयललिता जैसी मगरूर मुख्यमंत्री द्वारा हज़ारों
शासकीय कर्मियों को बर्खास्त करने तक के आदेश पर यह सहमति देता है कि उन्हें हड़ताल
करने का कानूनी अधिकार नहीं है. उच्चतम न्यायालय से उच्च और कोई नहीं हो सकता.
इसलिए धीरे धीरे जनविरोधी शक्तियां विधायिकाओं का भी दुरुपयोग कर ऐसे अधिनियम रचने
लगी हैं जिससे कानूनी और नैसर्गिक अधिकारों में कटौती होती जा रही है.
एक इंकलाब देश के नक्सलवादी भी कर रहे हैं. उनके मुंह में यही नारा है और हाथों में
गोला बारूद, बंदूक और बम. वे इस नारे का शाब्दिक अर्थ तो समझते हैं लेकिन इससे आगे
बढ़कर वे कत्लेआम करने को भी इसी नारे की पहुंच और पहचान बनाने का जतन भी करते हैं.
देश में इस वक्त किसी भी श्रमिक या किसान आंदोलन के मुकाबले नक्सलवाद ज़्यादा
इंकलाबी संगठन दिखाई पड़ रहा है. उसके पास ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद‘ के मुकाबले ‘लाल सलाम‘
जैसा नारा ज़्यादा लोकप्रिय है. पूरी दुनिया के कम्युनिस्ट आंदोलन को खारिज करता
हुआ नक्सलवाद केवल चीन के माओ तक सिमटकर ‘लाल सलाम‘ के किसी संभावित जश्न की
खुशफहमी में रहकर जंगलों में जी रहा है. वह चीन की तर्ज़ पर कोई सांस्कृतिक मूल्य
युद्ध लड़ने के पचड़े में भी नहीं है. वह क्रांति को लेकिन ज़िन्दाबाद कहने की उमंग
में जी रहा है.
जंगलों के बाहर इंकलाब की हालत खस्ता है. श्रमिकों के अधिकारों में लगातार कटौती हो
रही है. असंगठित मज़दूरों के जमावड़े सरकार की दृष्टि में शायद हैं ही नहीं. तरह तरह
के कल्याणकारी अधिनियम रचे भी जा रहे हैं लेकिन उनका मूल स्वर जनता के कमज़ोर वर्गों
पर अहसान करने का ज़्यादा है. किसी ने खासतौर पर नए तरह के जन अधिकारों का अन्वेषण
नहीं किया.
तरुण भगतसिंह देश के पहले विचारक थे जिन्होंने युवकों, किसानों और मज़दूरों के
त्रिगुट का समर्थन किया था. वह आज तक नहीं हो सका. किसान आत्महत्या कर रहे हैं.
श्रमिक आंदोलन नेस्तनाबूद हो गए हैं. युवकों की यह हालत है कि वे देश की विधायिकाओं
के मतदाता तो हैं लेकिन विश्वविद्यालयों के छात्र होने पर उन्हें अपनी यूनियन तक
गठित करने का अधिकार नहीं है.
वर्ग संघर्ष के चलते किसान और मज़दूर जैसी संस्थाओं के कमज़ोर हो जाने के कारण सिविल
सोसायटी, स्वैच्छिक संगठन, गैर सरकारी समितियां, आध्यात्मिक आंदोलन, समाजसेवा संगठन
जैसी बहुत सी अभिव्यक्तियां प्रयुक्त हो रही हैं. मानव अधिकार जैसा करुणामय दीखता
लेकिन एक अतिरिक्त शब्द संवैधानिक अधिकारों के रहने के बावजूद बहस के बाज़ार में
अपनी पहचान मांगता रहता है. कुछ नकली आयोग बन गए हैं जो केवल समझाइश देने के काम
आते हैं. चाहे मामला मानव अधिकारों का हो या महिला या बाल अधिकारों का या दलितों और
आदिवासियों के अधिकारों का. ये आयोग फुफकारते हैं लेकिन काट नहीं सकते. यदि
अत्याचारी या शासक वर्ग उनकी बात नहीं मानता तो वे पैगंबरी मुखौटा लगाकर शास्त्रीय
भाषा में उपदेश देने का स्वांग भी करते हैं. इन सब सभ्य हरकतों के कारण भी ‘इंकलाब
ज़िन्दाबाद‘ धरती की सतह के नीचे समाता जा रहा है.
आगे पढ़ें
सरकारें भी मनोरंजक लेकिन प्रश्नवाचक आचरण करती हैं. नक्सलियों से लड़ने में तो उनकी
सांस फूलने लगती है. लेकिन निर्दोष आदिवासियों को नक्सली कहकर झूठे पुलिसिया
एनकाउंटर को चिकना चुपड़ा शब्द ‘ग्रीन हंट‘ कहने लगती है. क्या सरकार और पुलिस की यह
समझ है कि हरे भरे जंगलों में प्राचीन कालीन राजाओं की तरह मनुष्य के शिकार को
‘ग्रीन हंट‘ कहा जाए?
नक्सलियों के कथित हमदर्द, पैरोकार या एजेंट वगैरह भी सरकार की तिरछी निगाह में तो
हैं. इसके साथ साथ सरकार अपने पारंपरिक बोध के तहत उन पर भी संदेह करती चलती है जो
सीधे वैश्विक निजी आर्थिक हितों के खिलाफ संघर्ष करने की बात करते हैं. यदि आज
गांधी होते तो वे सरकार के सबसे बड़े विरोधी होते. उनके साथ भी वही होता जो बाकी
विद्रोहियों के साथ हो रहा है.
छत्तीसगढ़ में विनायक सेन की सजा एक ताजा उदाहरण है जिसने इंकलाब की पृष्ठभूमि के कई
कथानकों को पढ़ने का अवसर दिया है. विनायक सेन को जिस अपराध के लिए सजा दी गई है वह
किसी भी समझदार व्याख्या के तहत राजद्रोह नहीं कहा जा सकता. पता नहीं किस तरह की
साक्ष्य की व्याख्या की गई होगी या आगे अपीलीय अदालत में स्थिर की जाएगी.
यक्ष प्रश्न यह है कि यदि कोई जनक्रांति होनी है तो मनुष्य की आज़ादी और नागरिक की
संवैधानिक अभिव्यक्ति के रास्तों पर गुजरकर उसे सहसा अपराध नहीं कहा जाना चाहिए.
यदि उसमें कानूनी अपराध के तत्व हैं तब भी उसमें यह कशिश बाकी होती है कि वह
‘इंकलाब ज़िन्दाबाद‘ तो कहती रहे. मकसद कानूनी पचड़ों में नहीं पड़ना है. इंकलाब की उन
दार्शनिक और समाज वैज्ञानिक अवधारणाओं से जूझना है जो सरकारें तो करना ही नहीं
चाहतीं. विनायक सेन के हमदर्द भी वही गलती कर रहे हैं.
इलीना सेन का वक्तव्य पढ़कर दुःख हुआ कि उन्हें भारत में अपने जीवन और अधिकारों की
सुरक्षा महसूस नहीं हो रही है. वे किसी बेहतर प्रजातांत्रिक देश में शायद जाने की
बात भी कह रही हैं. लोकतंत्र में जनआंदोलनों की ओखली में सिर देने के बाद मूसलों की
मार से नहीं डरना चाहिए. इसी तरह की बात तो मकबूल फिदा हुसैन ने भी की है. भारत
सरकार उन्हें सुरक्षा देने का आश्वासन दे तब भी हुसैन हिन्दुस्तान में नहीं रहना
चाहेंगे. सरकार की सुरक्षा का आखिर अर्थ भी क्या है. खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
के साथ क्या हुआ? क्या विदेशों में रहकर विनायक सेन की लड़ाई अपीलीय अदालत में लड़ी
जा सकती है. या उसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर लड़ने से कुछ हासिल होगा.
उच्च न्यायालय में पुलिसिया एनकाउंटर में मारे गए 19 आदिवासियों का मुकदमा भी तो
लंबित है जिन्हें नक्सली करार दिया गया. देश छोड़कर जाने की बात वे ही सोच सकते हैं
जो आर्थिक दृष्टि से बेहद मजबूत हों या जिनके इतर देशों में संबंध हों. भारतीय
लोकतंत्र में लाखों लोग जुल्म और अन्याय का शिकार हैं. उनके लिए इन्कलाब का अर्थ
लड़ते लड़ते मर जाने से है लेकिन पुलिसिया सुरक्षा ढूंढ़ने में नहीं. इससे आंदोलन की
प्रखरता कम होती है.
इंकलाब उस देश में कैसे आएगा जहां वैश्विक पूंजीवाद प्रधानमंत्री के जेहन में अतिथि
भाव से घर किए बैठा है. नक्सली आंदोलन वैश्विक बाजारवाद का उत्तर हो सकता था यदि वह
अति हिंसा छोड़कर भारत में ही अपने वैचारिक और वैयक्तिक रोल मॉडल ढूंढ़ता. गांधी की
हत्या तो कांग्रेस ने भी की है लेकिन उनके बदले माओ को अपना आदर्श मानने से वह भी
एक तरह की वैश्विकता का आमंत्रण है. नक्सलियों को समर्थन देने के आरोप और देश की
समस्याओं को लेकर विवादग्रस्त बयान देने के नाम पर अरुंधति रॉय सुर्खियों में हैं.
नकली राष्ट्रवाद की तुरही बजाकर अरुंधति पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की बेर सिर
पैर की मांगें की जाती हैं.
लोकतंत्र जिबह नहीं जिरह का नाम है. वैश्विक पूंजीवाद विरोध नहीं मांगता या मांगता
है? यह कौन नहीं कहेगा कि देश इस वक्त उस संकट से घिरा है जो आज़ादी के पहले भी नहीं
था. उस वक्त हमारे इतिहास में इस देश की परंपराओं, समझ और इतिहास की संपृक्तता के
नेता थे. केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी का शीर्ष संवैधानिक नेतृत्व किसी जननेता के
हाथ में नहीं है. अपनी सारी राजनीतिक विवादग्रस्तता के बावजूद इंदिरा गांधी ने
‘गरीबी हटाओ‘ का नारा दिया था ‘अमीरी बढ़ाओ का नहीं.‘ यह सब देखते हुए इंकलाब के
देशज तेवर ही गढने की ज़रूरत होगी.
नक्सली भी अपने साहित्य में मादरे वतन की बात करते हैं लेकिन प्रेरणा पुरुष चीन में
ढूंढ़ते हैं. नक्सलियों के भी संवैधानिक हक हैं. उनके समर्थक होने के जिन पर आरोप
हैं उनके सामने इतिहास से जूझने का समय है. वे केवल यह नहीं कह सकते कि नक्सली जो
कर रहे हैं वह ठीक या गलत है. या सरकारें ठीक या गलत कर रही हैं. क्रांति किसी आज़ाद
मुल्क में सरकार की योजनाओं के जरिए भी होती है. उसकी तरफ कौन देखेगा.
स्वैच्छिक संगठन संवैधानिक संस्थाओं का विकल्प नहीं हैं. सिविल सोसायटी जैसी
अभिव्यक्ति एक ज़रूरी पैरोकारी की अतिरिक्तता है. क्योंकि संवैधानिक संस्थाओं के
आचरण में शून्य आता जा रहा है. इंकलाब या तो होता है या नहीं होता. वह लिजलिजा नहीं
हो सकता.
07.01.2011, 00.36 (GMT+05:30) पर प्रकाशित