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विकल्पहीन नहीं हैं विनायक

बहस

 

विकल्पहीन नहीं हैं विनायक

सुदीप ठाकुर


डॉ. विनायक सेन की पत्नी इलिना सेन की उनकी और अपनी दोनों बेटियों को लेकर चिंता भावनात्मक होने के बावजूद वाजिब है. मगर क्या उनके पास सिर्फ देश छोड़ने का ही विकल्प रह गया है? क्या डॉ. विनायक सेन के लिए सारे लोकतांत्रिक दरवाजे बंद हो गए हैं? छत्तीसगढ़ की जिस निचली अदालत ने सेन, नारायण सान्याल और पीयूष गुहा के लिए फैसला सुनाया है, क्या वह भारतीय न्यायिक प्रणाली का आखिरी निर्णय है?

binayak-sen


दरअसल छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में संघर्ष और सेवा करते रहे डॉ. विनायक सेन को भी पता है कि वहां तक तो न्याय और लोकतंत्र अभी ठीक से पहुंचा भी नहीं है. लेकिन देश छोड़ना ही वहां के लोगों के लिए विकल्प रह जाए, तो अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाएगा कि इन सबको आखिर किस देश में और कैसे शरण मिलेगी? छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट में आज भी 70 हजार मामले लंबित हैं. इनमें आईपीसी की उस 124 (ए) धारा के तहत भी मामले हैं, जिसके आधार पर सेन को देशद्रोही करार दिया गया है. क्या उन सबके परिजनों को देश छोड़ देना चाहिए?

यही नहीं, छत्तीसगढ़ की विभिन्न जेलों में ऐसे हजारों लोग जमानत मिलने के बाद भी वर्षों से केवल इसीलिए जेल में सड़ रहे हैं, क्योंकि उनकी 200-500 रुपये की जमानत लेने वाला भी कोई नहीं है. उनके लिए इंडिया गेट तो छोड़िए, रायपुर के जयस्तंभ चौक में धरना देने वाला कोई नहीं है.

जहां तक विनायक सेन को सुनाई गई सजा का सवाल है, तो उस फैसले में उन्हें माओवादियों का समर्थक और संदेशवाहक बताया गया है, माओवादी नहीं. देश ही नहीं, दुनिया भर में इस फैसले की खामियों की ओर उंगलियां उठ रही हैं. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि विनायक सेन ने छत्तीसगढ़ के उन इलाकों में जाकर गरीबों का इलाज किया, जहां कोई सरकारी डॉक्टर भी जाना नहीं चाहता था.

पर क्या निचली अदालत के एक फैसले से इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए? क्या दुनिया में भारत से भी कहीं अधिक उदार लोकतंत्र है? इस देश की लोकतांत्रिक ताकत इसी से साबित होती है कि 1975 के बाद किसी और सरकार ने इस देश में आपातकाल लगाने के बारे में सोचा तक नहीं.

भारत 1960 के दशक का दक्षिण अफ्रीका नहीं है, जहां की नस्लवादी सरकार ने लोकतंत्रवादी नेता नेलसन मंडेला को 26 वर्ष तक जेल में ठूंसकर रखा था. यहां म्यांमार जैसी फौजी हूकुमत भी नहीं है, जिसने एक और लोकतंत्रवादी नेता आंग सान सू की को दो दशकों तक नजरबंद कर रखा. बेशक भारत चीन से होड़ कर रहा है, मगर यहां के लोकतांत्रिक शासन की तुलना चीन के कम्युनिस्ट शासन से भी नहीं की जा सकती, जिसने नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लोकतंत्र समर्थक लिउ जियाओबो को यह सम्मान तक लेने नहीं दिया.


यह वह लोकतंत्र है, जहां श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी गई थी, मगर उनकी पत्नी आशा और उनके बच्चे क्रांति, मुक्ति और जीत ने देश तो क्या, छत्तीसगढ़ से बाहर जाने के बारे में भी नहीं सोचा. दिवंगत नियोगी के साथ ही विनायक सेन ने छत्तीसगढ़ में गरीबों के बीच काम शुरू किया था.

इलिना सेन और उनके समर्थक जिस तरह से इस पूरे मामले को प्रचारित कर रहे हैं, उससे ऐसा लगता है, मानो विनायक सेन के लिए इस देश में न्याय के सारे दरवाजे बंद हो गए हैं. मगर सुप्रीम कोर्ट की हाल की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि करोड़ों लोगों की आस्था आज भी क्यों देश की न्यायिक व्यवस्था पर कायम है.

इत्तेफाक से ये दोनों टिप्पणियां न्यायमूर्ति मार्केंडेय काटजू और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्र की बेंच ने की हैं. इनमें से एक केरल से संबंधित थी, जिसमें बेंच ने कहा है कि ‘पीएफई को यदि गैर कानूनी संगठन मान भी लिया जाए, तब हमें यह सोचना पड़ेगा कि क्या इससे संगठन के सारे सदस्य स्वतः ही दोषी हो सकते हैं.’

दूसरी टिप्पणी महाराष्ट्र में एक आदिवासी महिला को निर्वस्त्र करने से संबंधित मामले में की गई. बेंच ने स्वीकार किया है कि ‘इस देश में आदिवासियों के साथ सदियों से अन्याय होता रहा है और अब इस अन्याय को खत्म करने का वक्त आ गया है.’ देश में अच्छे वकीलों और कानूनविदों की कमी नहीं है. इलिना सेन को देश छोड़ने के बजाय इस देश के न्याय पर भरोसा करना चाहिए और ढंग के वकील पैरवी के लिए रखने चाहिए.

amarujala.com

 

07.01.2011, 06.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

HARRY [DARBAR.HARRY@GMAIL.COM] SHANKAR PUR MAXI ROAD UJJAIN - 2011-07-06 14:50:04

 
  मुझे ये पढ़ कर काफी अच्छा लगा. 
   
 

girdhari mahajan [glmahajan@gmail.com] new delhi -

 
  i feel that law should be allowed to function. when dr sen is applying for bail in supreme court , then why so much hue and cry . why a single man like binayak sen should get bail while all others are in jail . is he above law? 
   
 

Avinash [janhitnews@yahoo.co.in] Mumbai -

 
  आपने मुद्दे को बहुत अच्छे से उठाया है. इलिना सेन के पास पैसे हैं तो वो विदेश जा सकती हैं, देश के उन लाखों लोगों का क्या होगा, जिनके मामले निचली अदालत में हैं और वो जेलों में सड़ रहे हैं ? इलिना ऐसे लोगों की ही मददगार बनने का ढ़ोंग करती रही हैं न? तो फिर जब अपना मामला आया तो उन लोगों की लड़ाई छोड़ कर क्यों भाग रही हैं इलिना सेन को भारत के संविधान पर भरोसा नहीं है? ‍आप यदि पाक हैं तो घबरा क्‍यों रही हैं, अपना पक्ष रखिए। 
   
 

अतुल श्रीवास्‍तव [aattuullss@gmail.com] राजनांदगांव -

 
  विनायक सेन यदि बेकसूर हैं तो उन्‍हें जमानत भी मिल जाएगी और वे बाईज्‍जत बरी भी हो जाएंगे, लेकिन यदि नक्‍सलियों से संबंध रखने का अपराध उन्‍होंने किया है तो उन्‍हें इसकी सजा भी मिलेगी। यदि विनायक सेन को भारत के संविधान पर भरोसा नहीं है तो फिर उन्‍होंने इस देश में गरीबों को मदद करने का बीडा क्‍यों ? जहां तक विनायक सेन की पत्‍नी के भारत छोडने का सवाल है मैं आपके विचार से सहमत हूं कि देश में लाखों मुकदमे लंबित हैं, बेगुनाह लोग जमानत नहीं ले पा रहे हैं, ऐसे में उनके परिवार के लोग देश छोडने का सोचने लगें तो। विनायक सेन के लिए देश के बडे वकील खडे हो गए, राम जेठमलानी जी आ गए। अरे उनकी सोचिए जिनके पास वकील करने के लिए पैसे नहीं होते। इलिना जी, ये हिंदुस्‍तान है, इस देश का कानून इतना रहमदिल है कि यह देश पर हमले करने वाले विदेशी और आतंकी अजमल कसाब को भी सफाई का मौका देता है, आप यदि पाक हैं तो घबरा क्‍यों रही हैं, अपना पक्ष रखिए। 
   
 

Amit singh Munda [amit.munda@yahoo.com] Khunti, Ranchi, Jharkhand -

 
  इलिना जी को पहले ये बताना चाहिये कि वो लोकतंत्र में विश्वास रखती हैं या नहीं ? तमाम कमजोरियों के बाद भी लोकतंत्र में आस्था रखना उचित है या नहीं? अगर उनका जवाब नहीं में है तो फिर तो वो जहां चाहें वहां चली जायें. सरकारी औऱ विदेशी पैसे लेकर लोकतंत्र की पूंगी बजाने वाली इलिना जी, जब आपकी गड़बड़ियों को लेकर लोकतंत्र नकेल कस रहा है तो तकलीफ हो रही है. आप कल तक इसी सिस्टम का हिस्सा थीं और सरकार के साथ बैठ कर दावतें उड़ा रही थीं. आज रातों-रात वही सिस्टम खराब हो गया. आपको अपने बयानों पर विचार करना चाहिये. 
   
 

Mamta Singh Chandel [] Gorakhpur -

 
  आपने मुद्दे को अच्छे से उठाया है. इलिना सेन के पास पैसे हैं तो वो विदेश जा सकती हैं, देश के उन लाखों लोगों का क्या होगा, जिनके मामले निचली अदालत में हैं और वो जेलों में सड़ रहे हैं ? इलिना ऐसे लोगों की ही मददगार बनने का ढ़ोंग करती रही हैं न? तो फिर जब अपना मामला आया तो उन लोगों की लड़ाई छोड़ कर क्यों भाग रही हैं ? 
   
 

Sanjay Singhal [sanjay.singhal@gmai.com] Kota, Rajasthan -

 
  इलिना सेन का मामला सुरक्षा या न्याय से जुड़ा हुआ है, ऐसा नहीं लगता. मुझे तो ऐसा लगता है कि वे यह सारा प्रपंच अमरीकी देशों के इशारे पर कर रही हैं, जिससे अमरीका जैसे देश मानवाधिकार-मानवाधिकार कर के अपनी टांग घुसेड़ सकें, विनायक सेन को कुछ पुरस्कार मिल जायें और इलिने सेन समेत दूसरे एनजीओ को फंड. 
   
 

mahesh sharma [maheshsharma.ujn@gmail.com] UJJAIN -

 
  सुदीप जी,प्रासंगिक और सारगर्भित लेख के लिए बधाई.ये सही है कि देश के करोरों लोगों की आस्था न्याय व्यवस्था पर कायम है लेकिन भुक्तभोगी ही न्यायिक व्यवस्था की पेचीदगियों और लूप होल्स को शिद्दत से समझ सकता है.ऐसे हाई प्रोफाइल मामलों पर जिन पर मीडिया की नज़र हो,ध्यानाकर्षित करने वाली टिप्पणी से इमेज बिल्डिंग होती है लेकिन न्याय...? प्रशांत और शांति भूषण यदि भ्रष्ठ जजों की संख्या बता रहे हैं तो न्यायिक व्यवस्था पर विचार करने की जरुरत है. 
   
 

NK Thakur [nkthakur@webdunia.com] RAJNANDGAON C.G. -

 
  मित्र,आपने सद्भावनापूर्ण विचार प्रगट किया है, आपको साधुवाद मिलना ही चाहिये/किंतु नीतिगत मै ऐसा मानता हूँ कि साँप को दूध पिलाने से उसका जहर कम नहीं होता, इसलिये लोग साँप को मार देते है या भगा देते हैं/ डा. विनायक सेन की पत्नी इलिना जिन लोगो के साथ है, या उनके साथ जो दिखाई पड़ते है वो कौन है? मानवाधिकार का \\\"मुखौटा\\\" पहिने ये लोग किसका भला कर रहे हैं पूरा छत्तीसगढ़ जानता है/ इन्ही लोगो की करतूत से पूरे छत्तीसगढ़ के लाखो लोगो के मानवाधिकार समाप्त हो गए हैं,हर पल उनकी जान खतरे में हैं/
हम देख और समझ रहे है कि विनायकसेन को सजा होने पर आम जनता में कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है, केवल उनके संगठन के लोग जो विदेशी ताकतों के संपर्क में हैं,हल्ला कर रहे हैं/ नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लाखो लोगो के जान खतरे में है क्या उनमें से किसी ने देश छोड़ने की बात की ? वे तो तथाकथित रूप से पिछड़े ,अनपढ़ माने जाते हैं? इलिना तो तथाकथित पढ़ी लिखी भारत के लोकतंत्र की विरोधी सुसभ्य और उन्नत महिला है?
वह विदेश में शरण चाहती हैं,( बहुत जल्दी मिल भी जायेगा) वह किसको ताव दिखा रही है ? सरकार को चाहिये कि उसे ससम्मान बिदा कर दे और निवेदन करे कि वह अपने साथ अपने संगठन को भी ले जाए , इससे लाखो लोगो का भला होगा/
और अंत में एक जानकारी ,यह कहना ग़लत है कि ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सक नहीं हैं/हजारों डॉक्टर अपनी निजी सेवाएँ दे रहे हैं/एम.बी.बी.एस. डॉक्टर जो सरकारी नौकरी करते हैं,जिनका उद्देश्य पैसा कमाना है ,(और वे जहाँ रहते है वहां जंन स्वास्थ्य ठीक कम, बिगड़ता ज्यादा है, लोग बीमार ज्यादा होते हैं) केवल वही लोग जाना नहीं चाहते.
 
   
 

Tathagat [verma.tathagat@gmail.com] Delhi -

 
  सुदीप जी, बहुत प्रांसगिक सवाल को आपने सटीक ढंग से पेश किया है. बिनायक सेन के मामले को थोड़े नज़दीक जाकर देखकर लगता है कि बिनायक सेन अब सिर्फ़ समाजसेवी नहीं रह गए हैं बल्कि एक विचारधारा के कैदी हो गए हैं. उन्होंने तीस बरस तक समाज की जो सेवा की है, उसका श्रेय उनसे कोई वापस नहीं छीन सकता, लेकिन वे बरबस ही अपने इस योगदान को लेकर भी बेबस नज़र आ रहे हैं. एक ओर देश और दुनिया के बुद्धिजीवी उनके साथ खड़े दिख रहे हैं और दूसरी ओर उनका परिवार एकाएक पलायनवादी सा दिख रहा है. अच्छा होता यदि बिनायक सेन भारतीय मीडिया के सामने खड़े होकर दमदारी के साथ कहते कि हाँ उन्होंने आदिवासियों की सेवा की, उन्होंने उनकी पीड़ा को सार्वजनिक किया और वे आगे भी ऐसा करते रहेंगे लेकिन जो कुछ उन्होंने किया वह इस देश के लिए किया. इस देश के हाशिए पर पड़े लोगों के लिए किया.
लेकिन एक बात और है. हो सकता है कि बिनायक सेन के लिए आल्हा-ऊदल गाना सहज हो इसलिए हम जैसे लोग उनको और उनके परिजनों को नसीहतें दे रहे हैं. लेकिन जो सलाखों के पीछे खड़ा है वह सच को ज़्यादा क़रीब से जानता है. अगर सचमुच बिनायक सेन इस तरह पलायन कर गए तो उन सैकड़ों लोगों का मनोबल टूट जाएगा जो नक्सलवादी न होते हुए भी आदिवासियों के हितचिंतक हैं.
 
   
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