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ईश निंदा और सलमान की हत्या

बहस

 

ईश निंदा और सलमान की हत्या

हामिद मीर इसलामाबाद से


सलमान तासीर के बारे में लिखना मेरे लिए बेहद मुश्किल है. पहले वह मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे, लेकिन बाद में कट्टर दुश्मन बन गए. गवर्नर के रूप में उन्होंने मेरे विरुद्ध कई बार टेलीविजन पर बोला और पिछले कुछ वर्षों में मैंने भी उनके विरुद्ध काफी लिखा, क्योंकि आपातकाल लागू होने के बाद उन्होंने तानाशाह परवेज मुशर्रफ से हाथ मिला लिया था.

सलमान तासीर


मैं पाकिस्तान के बर्खास्त मुख्य न्यायाधीश की दोबारा बहाली के पक्ष में था, जबकि सलमान तासीर ने उनकी बहाली रुकवाने में पहले मुशर्रफ, फिर जरदारी की मदद की. मुशर्रफ ने सलमान को इस उम्मीद में पंजाब का गवर्नर बनाया था कि वह जरदारी को उन्हें पांच वर्षों के लिए राष्ट्रपति स्वीकार करने के लिए राजी कर लेंगे. लेकिन मुशर्रफ गलत थे. अंततः जरदारी ने मुशर्रफ पर इस्तीफा देने के लिए दबाव डाला और तासीर की मदद से राष्ट्रपति का पद हथिया लिया.

राष्ट्रपति बनने के बाद जरदारी ने तासीर से मेरी मुलाकात कराई और मतभेदों को खत्म करने के लिए दबाव डाला, जिसमें वह असफल रहे. हालांकि पिछले वर्ष बाढ़ के दौरान सलमान ने दिलेरी दिखाई और मेरे साथ मतभेद खत्म किया.

उनकी हत्या के ठीक एक दिन पहले मैं लाहौर में था और उनसे संपर्क करने की मैंने कोशिश की थी. लेकिन मुझे बताया गया कि वह इसलामाबाद में हैं. अगले दिन मैं इसलामाबाद लौटा और दोपहर बाद मेरे सहकर्मी ने तासीर को गोली मारे जाने की सूचना दी. पता चला कि एक पुलिस कमांडो ने तासीर को 27 से ज्यादा गोलियां मारी. वह तासीर से नाराज था, क्योंकि तासीर ईशनिंदा कानून के खिलाफ खड़े हुए थे.

उसी शाम हत्यारे के समर्थन में जब मुझे ढेरों एसएमएस मिलने शुरू हुए, तो मैं परेशान हो गया. कई धार्मिक नेताओं ने तासीर की हत्या की निंदा करने से इनकार कर दिया. मैंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और देश के सबसे बड़े धार्मिक दल के मुखिया से इसकी निंदा करवाने का निर्णय लिया.

जमियत उलेमा इसलाम के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान उस दिन सऊदी अरब में थे. मैंने अपने शो में उनसे फोन पर संपर्क कर सीधा सवाल पूछा, क्या आप सलमान तासीर की हत्या की निंदा करेंगे? वह हत्या की निंदा के पक्ष में नहीं थे, लेकिन मैंने अपना सवाल बार-बार दोहराया. आखिरकार उन्होंने सलमान तासीर की हत्या की निंदा की. यह उन सबकी जीत थी, जो पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की सीख पर यकीन करते हैं.

जब मैंने अपना शो खत्म किया, तो कई अतिवादियों ने मुझे धमकाना शुरू कर दिया. लेकिन सहकर्मियों की बड़ी संख्या मेरा हौसला बढ़ा रही थी. लिहाजा अगले दिन मैंने तासीर की हत्या का समर्थन कर रहे लोगों के खिलाफ एक दूसरा बड़ा शो किया. 500 से ज्यादा धार्मिक नेताओं ने हत्यारे के पक्ष में एक बयान जारी कर घोषणा की कि कोई भी मुसलमान सलमान तासीर की अंत्येष्टि में हिस्सा नहीं लेगा.

मुझे लगता है कि सलमान तासीर को गलत समझा गया. उनके बेटे आतिश तासीर ने उन पर हिंदू और यहूदी-विरोधी होने का गलत आरोप लगाया है. सलमान तासीर का हत्यारा भी उसे गलत समझता था, उसने इसलाम का दुश्मन समझकर उसकी हत्या कर दी.

आतिश तासीर और मलिक मुमताज कादरी, दोनों दो भिन्न अतिवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं. एक उदार अतिवादी है, जो अपने पिता पर बेबुनियाद आरोप लगाता है, तो दूसरा धार्मिक अतिवादी है. ये दोनों अतिवाद हमारे मूल्यों के लिए घातक हैं.

सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी भी सलमान तासीर की मौत के लिए जिम्मेदार है. जब तासीर ने ईशनिंदा कानून की आलोचना की, तो उनकी अपनी पार्टी के लोग और राष्ट्रपति जरदारी उनके पक्ष में खड़े नहीं हुए. कानून मंत्री का कहना था कि ईशनिंदा कानून में बदलाव की अनुमति किसी को नहीं है.

तासीर के विचारों को इसलिए भी गलत समझा गया, क्योंकि अमरीका ने भी पाकिस्तान से ईशनिंदा कानून रद्द करने की मांग की थी. चूंकि आम पाकिस्तानी अमेरीकी हस्तक्षेप पसंद नहीं करता, इसलिए कई दक्षिणपंथियों ने सलमान तासीर को अमरीकी एजेंट घोषित कर दिया था. इस मामले की तुलना भारत में बिनायक सेन और अरुंधति राय के मामले से की जा सकती है. तासीर की तरह स्पष्टवादी होने के कारण ही उन पर राजद्रोह के आरोप लगे हैं.

व्यक्तिगत रूप से मैं मानता हूं कि ईशनिंदा कानून में इस समय बदलाव की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारी संसद ने यह कानून 1992 में पारित किया था और हम अभी कोई नया विवाद झेलने की स्थिति में नहीं हैं. लेकिन कानून की आलोचना करने का यह मतलब नहीं है कि हत्या कर दी जाए. मुझे लगता है कि मानवाधिकारवादियों को ईशनिंदा के आरोप में सजायाफ्ता महिला की लड़ाई जरूर लड़नी चाहिए. लेकिन उन्हें राष्ट्रपति पर क्षमा के लिए दबाव नहीं डालना चाहिए, क्योंकि इससे समाज में फूट पड़ेगी. हमें कानून के दायरे में हल ढूंढना होगा.

सत्तारूढ़ पीपीपी के कुछ नेता इस विवाद से लाभ उठाकर सलमान तासीर को गवर्नर हाउस से हटाकर उनकी कुरसी हथियाना चाहते थे. उन्होंने तासीर पर माफी मांगने के लिए दबाव भी डाला, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. अब वही नेता हत्या का दोष नवाज शरीफ पर डाल रहे हैं. यह गंदी राजनीति है. हमें हर तरह के अतिवाद को हराने के लिए सलमान तासीर की तरह हिम्मत और साहस की जरूरत है. उनकी मौत पाकिस्तान की उदारवादी ताकतों को नई जिंदगी देगी. मैं आश्वस्त हूं कि हम ऐसी अतिवादी शक्तियों को अमेरिकी मदद से नहीं, बल्कि अपनी सहनशीलता से हरा देंगे.

*लेखक पाकिस्तान में जिओ टीवी के संपादक हैं.
15.01.2011, 00.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Mukta [] http://snowaborno.blogspot.com

 
  धन्यवाद, जनाब. साथ में यह भी : मुर्दा कौमों का हर खुदा मुर्दा होता है, चाहे वो कट्टर हिन्दुओं का नकली राम हो, चाहे कट्टर मुसलामानों का खुदा. ऐसी कौमें नष्ट हो जाती हैं. होनी ही चाहिए. ईश्वर इन लोगों के बगैर सदा से सलामत है. 
   
 

keshav sharma [kaish.142@rediffmail.com] Raipur(c.g) INDIA

 
  घटना निंदनीय है. इससे भी ज्यादा गंभीर बात है इसके तरफ से लोगो का खड़ा होना. ऐसे में हामीद मीर जैसे उम्मीद बन कर अंधेरे में रोशनी की तरह जगमगाते है. 
   
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