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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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जम्हूरियत के मुगलिया ताजमहल

बहस

 

जम्हूरियत के मुगलिया ताजमहल

कनक तिवारी

यह हमारी खुशफहमी और इतिहास का सच दोनों है कि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक सौ पंद्रह करोड़ से ज़्यादा नागरिकों के लिए जीवंत है. महान यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने लोकतंत्र को जनता के लिए जनता द्वारा और जनता का शासनतंत्र बताया था. भारत में भी लोकतांत्रिक अवधारणाओं का प्रचलन रहा है.

chhattisgarh high court

यह आश्चर्यजनक है कि भारत में लोकतंत्र की सबसे बेहतर समझ और अवधारणा राजतंत्र में रही है. यह प्रतिपादन इतिहास ने नहीं मिथक ने किया है. यह सिद्ध करना मुश्किल है कि राम इतिहास पुरुष हैं. भले ही उनके असिद्ध जन्मस्थान अयोध्या में मंदिर बनाने का धार्मिक शगल पूरा कर लिया जाए. राम से बेहतर लोकतांत्रिक अवधारणा यूनानी राजनयिकों की भी नहीं रही है. सर्वहारा के प्रतिनिधि एक धोबी को भी यदि अपनी पत्नी के आचरण पर संदेह हुआ हो और उसने राम जैसे उदार राजा को अपनी पत्नी सीता को अग्निपरीक्षा के कारण निर्दोष समझ लेने पर संदेह भी प्रकट किया हो तो राम ने लोकतंत्र की मर्यादा रचने में सीता के निर्वासन का विवादग्रस्त निर्णय ले लिया.

भारत में ‘हम भारत के लोगों‘ ने जो लोकतंत्र रचा है वह पूरी तौर पर पश्चिमी मॉडल का है. प्लेटो ने दार्शनिक को राजा और सत्ताधीश को दार्शनिक कहा था. डॉ. मनमोहन सिंह पढ़े लिखे प्रधानमंत्री हैं लेकिन प्लेटो की अवधारणा के नहीं. राम के लोकतंत्र का तो उनमें शतांश भी नहीं है. वे ऐसे राजा हैं जहां उनके सहयोगी ए. राजा से लेकर कलमाड़ी और थॉमस जैसे लोग फल फूल रहे हैं.

आज़ादी के बाद गांधी ने कहा था कि भारत के वॉइसरॉय और सेनापति वगैरह की कोठियां जनता की ज़रूरतों के लिए स्कूल, अस्पताल, विश्वविद्यालय आदि के लिए उपयोग में लाई जानी चाहिए. वॉइसरॉय की शायद पूरी दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी जनतांत्रिक कोठी में राष्ट्रपति का दाखिला हुआ. सेनापति के घर में प्रधानमंत्री ने पनाह ली. राज्यों में भी कई राजमहलों को विधानसभाओं, राजभवनों और उच्च न्यायालयों वगैरह में परिवर्तित किया गया. तब से अब तक कई नए महल अट्टालिकाओं और भव्य राजप्रासादों का निर्माण हो चुका है, बल्कि होता जा रहा है. यह हविश है या ज़रूरत-इतिहास निर्धारण नहीं कर पा रहा है.

हाल ही में छत्तीसगढ़ में उच्च न्यायालय के विशाल भवन और आहाते का निर्माण हुआ है. यह भवन सौ-पचास वर्ष बाद यदि सुरक्षित रह गया तो बड़े काम का होगा. अभी तो हालत यह है कि भारत के लगभग सबसे छोटे न्यायालय को देश का सबसे बड़ा न्यायालय परिसर मिला है. इसके मुकाबले कलकत्ता और बंबई जैसे उच्च न्यायालय जिन भवनों में कार्यरत हैं और उनके न्यायाधीश जिस तरह के आवासों में रह रहे हैं उसके मुकाबले छत्तीसगढ़ के इजलास में भव्यता ही भव्यता है. मुअक्किलों, रिक्शों-खोमचों वालों, टाइपिस्टों और फोटो कॉपी वगैरह के छोटे दूकानदारों को जो तकलीफ हो रही है वह न्यायालय की दूरी और भव्यता की प्रतिष्ठा का उदाहरण है.

ए. राजा ने घोटाला किया. ज़ाहिर है, साजिश मंत्रालय के कमरे में बैठकर करने में मामले के खुल जाने का अंदेशा रहा होगा. मंत्री के सरकारी आवास में क्या हो रहा है, इसे कौन देख पाता है. सुरेश कलमाड़ी ने जो कुछ भी रचा होगा उसमें उनका आवास ही तो सबसे बड़ा गवाह होगा. यही काम तत्कालीन संचार सचिव थॉमस, ट्राई के अध्यक्ष प्रदीप बैजल वगैरह ने भी किया होगा. अशोक चव्हाण ने मुख्यमंत्री के रूप में मंत्रालय में बैठकर दस्तखत किए होंगे लेकिन बातचीत अर्थात् डील वगैरह तो सरकारी आवास के किसी एक कक्ष में बैठकर करना ज़्यादा मुनासिब होता है.

पहले के ज़माने में तोंद फुलाए नगर सेठ तांगे या बग्घी पर बैठकर साहब के बंगले डलिया लेकर पहुंचते थे. उसमें ऊपर फल फूल, मिठाइयां और मेवे वगैरह बिछे होते थे. नीचे नोट और कलदार खिलखिलाते रहते थे. अब यह पिछड़ा कार्य व्यवहार अतीत की खोह में है. अब तो डील सरकारी बंगले में बैठकर होती है. जमा खर्च स्विटजरलैंड और जर्मनी वगैरह में होता है. वहां साहब बहादुर तफरीह को जाते हैं. उनके शोहदों का हनीमून होता है. वे वहां ऊंची शिक्षा के लिए कहीं पढ़ रहे होते हैं. कुल मिलाकर हालत यह है कि राजभवन में हरम खुले और सिद्ध भी हो गया कि अस्सी के आसपास के राज्यपाल पौरुष ग्रंथि के झंडाबरदार हैं.

इधर यही काम आश्रम के मुख्यालय भी कर रहे हैं. वहां इच्छुक-अनिच्छुक युवतियों और प्रौढ़ाओं के लिए अय्याश घर बनाए गए हैं. वहीं तय होता होगा कि आश्रम की बढ़ोतरी के लिए बच्चों की बलि चढ़ा दी जाए. वहीं स्वामी-सन्यासी बड़े व्यापारियों द्वारा की गई लूट का माल इन्कम टैक्स अधिकारियों से बचाने के लिए सुरक्षित भी रखते हैं. वहीं निठल्लों की फौज बनाई जाती है ताकि वह धर्मान्ध धनिकों के परिवारों में घुसकर दलालों की नई संस्था का विकास करें.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Mukta [] http://snehlove.blogspot.com

 
  क्या इस देश में ऐसा एक छोटा सा भवन बनाना संभव है, जहां लालकृष्ण अडवाणी सरीखों को बताया जा सके कि जनाब! आप जिन लोगों को देशभक्त साबित कर रहे हैं, उन्हें लोग अपनी सीधी-साफ़ नज़रों से पहचान चुके हैं कि वे हत्यारे हैं? 
   
 

NK Thakur [shiv.nkthakur@gmail.com] RAJNANDGAON C.G.

 
  कनक जी नमस्कार,आपकी फैटासी अच्छी लगी. आपको सब जगह सिर्फ़ बुराई नजर आई ? ऐसा क्यों ?आपने सच ही लिखा है इसमें कोई शक़ नहीं. जनता की सोच, के खिलाफ, विदेशी अवधारणा को इस देश में संविधान के द्वारा थोपने के बाद आप सच्चाई ईमानदारी, नैतिकता , देश भक्ति, की तलाश क्यों कर रहे हैं? आप तो कानून जानते है. हमारे संविधान में नैतिकता ,ईमानदारी सच्चाई शब्द भी नहीं है न उसकी कोई महत्ता है. संविधान के विपरीत, ये तो हमारे हमारी सामाजिक मान्यताये हैं, आपने जिन उदाहरणों को लिया है वो सब संवैधानिक व्यवस्था है. नेता न्यायाधीश, संवैधानिक हैं तो फिर कही कहीं भ्रष्ट साधुओं को आप क्यों दोष देते हो ? आपसे सवाल .. हमारे संविधान में कहाँ लिखा है राजनेता ईमानदार हो? कहाँ लिखा है कि वो नैतिक हो ? जैसा संविधान वैसे नेता और वैसी जनता. अब तो प्रगट हो चुका है कि समाज की सोच और संविधान की सोच मेल ही नहीं खाती. समाज कुछ चाहता है और संविधान की सोच कुछ अलग है. अब तो सुप्रीम कोर्ट तक ने कह दिया कि बीबी का कहना मानो ( भाड में जाए माँ बाप ). माँ बाप से ज्यादा महत्ता बीबी की हो गई है. देशी से ज्यादा महत्ता विदेशी की है. जो आपने लिखा मैंने पढ़ा वही सच है. अब अच्छाई की अपेक्षा करना मूर्खता है. लेख लिखिये मै तारीफ करता रहूँगा. 
   
 

bhagat singh [] raipur c.g.

 
  जिस उत्तर प्रदेश में 70 में से 35 जज भ्रष्ट हों या उच्चतम न्यायालय के कम से कम 6 जजों के भ्रष्ट होने की बात है, वहां ऐसे भवन न्याय के लिये नहीं, ऐसे जजों के अहं की तुष्टि के लिये बनाये जाते हैं. 
   
 

हेमलता महिश्वर [hemlatamahishwar@gmail.com] नई दिल्ली

 
  लोकतंत्र का ऐसा विश्लेषण तो पहली बार न केवल पढ़ा बल्कि जाना भी कि इतनी अतार्किक और गैर संदर्भित बात कैसे कही जनि चाहिए. अब न्यायलय से किसी भी तरह की असहमति क्यां होना चाहिए यदि किसी को है तो? धोबी की बात मानना लोकतंत्र है तो शम्बूक वध किस वर्ग में रखा जायेगा?.  
   
 

surendra ku katiyar [skatiyar_sai@yahoo.co.in] kanpur

 
  बिलकुल सत्य है पर समझेगा कौन?? ऐसे लोकतंत्र से तो अच्छा राजतन्त्र था जिसमें भ्रष्ट,अय्याश,निरंकुश,बेईमान एक ही होता था. यंहा तो फ़ौज की फ़ौज है और इसके बाद उनकी नई अंकुरित ......... 
   
 

सतीश कुमार चौहान, [bloodcarehilai@gmail.com] भिलाई

 
  कनक जी सौ बातो की एक बात सत्‍ता सुख पर अंकुश लग जाएंगे , नौकरशाहो के दायित्‍वो की सुनिश्चितता कर दीजीऐ ,सब सुधर जाऐगा. दरससल कौऐ के पीछे सब भाग रहे हैं कान पर कोई हाथ नही लगाना चाहता,आपकी बाते सटीक हैं. 
   
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