राभा-गारो दंगे की राजनीति
मुद्दा
राभा-गारो दंगे की राजनीति
दिनकर
कुमार
गुवाहाटी से
देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस बात के सूत्र तलाश रहा है कि आखिर पूर्वोत्तर में
राभा और गारो के बीच के दंगे के कारण क्या थे. नए साल के शुरुवात में ही असम और
मेघालय के सीमा क्षेत्र में राभा और गारो जनजातियों के बीच जातीय दंगा शुरु हो गया.
सदियों से भाईचारे और सद्भाव के साथ रहने वाली दोनों जनजातियां अचानक एक-दूसरे के
खून की प्यासी बन गईं.
असल में अखिल राभा छात्र संघ पिछले तीन सालों से अपनी मांगों के समर्थन में बंद का
आह्वान करता रहा है. इस तरह के बंद के चलते ईसाई धर्मावलंबी गारो समुदाय के लोगों
को क्रिसमस और नव वर्ष का उत्सव मनाने में लगातार परेशानी होती रही थी और उनके भीतर
राभा समुदाय के खिलाफ गुस्सा बढ़ता गया था.
असम के कामरूप और ग्वालपाड़ा जिले में राभा बहुल इलाकों को मिलाकर जब असम सरकार ने
राभा हासंग स्वशासित परिषद का गठन किया तो दोनों जिलों में रहने वाले गारो समुदाय व
अन्य समुदाय के लोगों में असंतोष बढता गया. गारो समुदाय परिषद का नाम बदलने या गारो
बहुल गावों को परिषद से बाहर रखने की मांग कर रहा था. वर्ष 2008 में पंचायत चुनाव
के दौरान भी राभा और गैर-राभा समुदाय के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं. उस समय पुलिस की
गोलीबारी की वजह से 9 व्यक्तियों की मौत हुई थी.
22 दिसंबर 2010 को अखिल राभा छात्रसंघ ने बंद आहूत किया था. उसी दिन अपने परिवार के
साथ यात्रा कर रहे एक गारो पास्टर की पिटाई राभा छात्र संगठन के सदस्यों ने कर दी
थी. माना जाता है कि इसी घटना का बदला लेने के लिए 2 जनवरी 2011 को गारो समुदाय के
हमलावरों ने एक राभा बहुल गांव को जला दिया. फिर दोनों समुदायों के बीच हिंसक झड़प
शुरु हो गई.
गारो हिल्स जिले के वाजेंगडोबा के गोकुलगिरी बाजार में कोयले की खान में श्रमिक के
रूप में काम करने वाले राभा समुदाय के चार मजदूरों की हत्या कर दी गई. इस घटना से
पहले उत्तेजित भीड़ ने राभा समुदाय के एक गांव में आग लगा दी. उत्तेजित भीड़ को
नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने गोली चलाई. जिससे एक व्यक्ति की मौत हो गई. एक और
घटना में एक पचास वर्षीय गारो महिला की गला रेतकर हत्या कर दी गई.
हिंसा लगातार
असम और मेघालय की सीमा में गारो और राभा बहुत गावों को जलाने का सिलसिला हफ्ते भर
चलता रहा. अनियंत्रित हिंसा से त्रस्त होकर हजारों लोग राहत शिविरों में छिपने के
लिए मजबूर हो गए. मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार 18 से 24 हजार लोग बेघर होकर या
असुरक्षा के डर से राहत शिविरों में रहने लगे.
मीडिया रिपोर्टों से यह भी स्पष्ट होता है कि मेघालय का एक अतिवादी संगठन इस जातीय
दंगे की आग में घी डालने का काम करता रहा. सरकार के साथ संघर्ष विराम करने वाला यह
अतिवादी संगठन चाहता है कि पूर्वी पर्वतीय इलाके से राभा समुदाय के लोगों को खदेड़
दिया जाए. मेघालय के मेंदीपवारी के विधायक और मेघालय के जनजातीय विकास मंत्री पर भी
हिंसा को भड़काने का आरोप लगाया गया है.
असम और मेघालय सरकार ने जातीय दंगों को नियंत्रित करने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए.
यही वजह है कि हजारों लोगों को इस दंगे की वजह से नुकसान उठाना पड़ा है. एक पखवाड़े
तक तनाव जारी रहने की वजह से गारो और राभा समुदाय के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी
होती गई है और कड़वाहट बढ़ती गई है.
हालात को नियंत्रित करने के लिए हिंसा प्रभावित इलाकों में कर्फ्यू लगाया गया.
केंद्र की तरफ से अर्धसुरक्षा बदल की दो कंपनियों को तैनात किया गया. केंद्रीय
गृहमंत्रालय के एक प्रतिनिधि दल ने मंत्रालय के संयुक्त सचिव संभू सिंह के नेतृत्व
में हिंसा प्रभावित इलाके का दौरा किया. प्रतिनिधि दल ने ग्वालपाड़ा और गारो पहाड़
के प्रशासन से बातचीत भी की.
प्रेम और संघर्ष
असम-मेघालय सीमा क्षेत्र में वर्षों से एक साथ रहने वाले गारो और राभा समुदाय के
लोग शांतिप्रिय माने जाते हैं. राजनीतिक अदूरदर्शिता की वजह से दोनों ही समुदाय
एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गये. असम के एक हिस्से का बंटवारा कर जब मेघालय नामक
राज्य का गठन किया गया, उस समय इन दोनों समुदायों के गृह राज्य की पहचान भी बदल गई.
इसके बावजूद दोनों समुदायों में परस्पर सद्भाव का माहौल कायम था.
लेकिन जब राभा समुदाय की मांग को देखते हुए असम सरकार ने राभा समुदाय के लिए
स्वशासित परिषद का गठन किया, तब सरकार के फैसले से गैर-राभा लोगों में असंतोष पैदा
हुआ. गारो समुदाय के लोगों ने खुद को उपेक्षित महसूस किया. इस तरह भाईचारे की भावना
खत्म होने लगी और कड़वाहट बढ़ने लगी.
फिलहाल तो सेना की तैनाती के साथ ही छात्र संगठनों की पहल से हालात को नियंत्रित
किया गया है. जानकार मानते हैं कि वोट की राजनीति के चक्कर में राज्य सरकारें जब
किसी समुदाय विशेष की उपेक्षा करेगी तो वैमनस्य पैदा होगा ही. राभा स्वशासी परिषद
के इलाके में गारो लोगों के हितों की सुरक्षा के लिए भी सरकार को कदम उठाना पड़ेगा.
अगर विकास के नाम पर भेदभाव किया जाएगा तो इसी तरह से हिंसक टकराव सामने आएंगे.
24.01.2011, 09.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित