खाली पेट गणतंत्र
बात पते की
खाली पेट गणतंत्र
सचिन कुमार जैन
देश का पहला बजट 200 करोड़ रूपये का था. 60 वर्षों में इसका आकार 200 करोड़ से 10 लाख
करोड़ रूपये पर पहुँच गया. पर अफसोस यदि कुछ नहीं बदला तो गरीबी और भुखमरी का दर्द.
इस गणतंत्र के पर्व पर भी हम गर्व से नहीं कह सकते हैं कि आर्थिक विकास ने लोगों को
भूखी रातों से मुक्ति दिला दी है. यहां आज भी हर रोज 42 करोड़ लोग पेट भरे बिना नींद
के आगोश में जाते हैं.
सवाल यह है कि बजट जब 5000 गुना बढ़ता है, तब अनाज उत्पादन चार गुना ही बढ़ पाता है.
ग्रामीण भारत में 23 करोड़ लोग अल्पपोषित हैं, 50 फीसदी बच्चों की मृत्यु का कारण
कुपोषण है. 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग में हर 3 में से एक व्यक्ति कमजोर है. सरकार
लगभग 22.8 करोड़ टन अनाज उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने की जद्दोजहद में है परन्तु
वर्ष 2015 में इसे अपनी जरूरत पूरा करने के लिए 25 से 26 करोड़ टन अनाज की जरूरत होगी,
यह पूरा हो पाना संदेहास्पद है. दुनिया की 27 प्रतिशत कुपोषित जनसंख्या केवल भारत
में रहती है.
5 वर्ष से कम उम्र के 70 फीसदी बच्चों में खून की कमी है. 19 में से 11 राज्यों में
75 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे एनीमिया के शिकार हैं. मतलब यह है कि भारत का विकास
आंकड़ों का मकड़जाल है. यह लोगों की जिन्दगी में बदलाव का सूचक नहीं है.
1972-73 में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 15.3 किलोग्राम अनाज को उपभोग होता था, अब वह
12.22 किलोग्राम प्रतिमाह आ गया है. 2005-06 में एक सदस्य औसतन उपभोग 11.920
किलोग्राम था और वहीं 2006-07 में औसत भोजन का उपभोग घटकर मात्र 11.685
(1.97प्रतिशत कम) किलोग्राम प्रति व्यक्ति रह गया.
एक तरफ तो लोग भूखे सोने पर मजबूर हैं और दूसरी तरफ लाखों मीट्रिक टन अनाज खुले में
पड़ा है. भारत में 415 लाख टन अनाज सुरक्षित रखे जाने की क्षमता है. 190 लाख टन अनाज
केवल पन्नियों के नीचे असुरक्षित परिस्थितियों में पड़ा है. इस अनाज के त्वरित वितरण
से एक बड़े हिस्से को राहत पहुंचाई जा सकती है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के 35
किलो अनाज वितरित करने के निर्देश का भी पालन नहीं किया जा रहा है और 20 से 25 किलो
अनाज ही बांटा जा रहा है। खुले में रखे इस अनाज का उपयोग इस गैप को खत्म करने में
किया जा सकता है. 600 लाख टन अनाज के भंडारण के बावजूद इस राजनैतिक-प्रशासनिक
इच्छाशक्ति का अभाव है कि इसे गरीब और सबसे वंचित वर्ग तक पहुंचाया जा सके.
आजादी के बाद से ही यह मान लिया गया कि विकास तो औद्योगिकरण से ही होगा. आर्थिक
नीतियां ही ऐसी बनाई गईं, जिनमें खेती को ‘‘अकुशल श्रम’’ माना गया और खेती के श्रम
के मूल्य को कम आंका गया. सरकारों द्वारा शहरी क्षेत्र, उद्योगों और नौकरशाहों को
तरह-तरह की सब्सिडी भी दी गई, जिससे वे तो तेजी से सम्पन्न हुए और किसान, ग्रामीण
मजदूर और गाँव गरीब होते गए.
खाद्यान्न उत्पादन में उपयोग की जा रही जमीन और पानी को छीनकर उद्योगों को देने में
खाद्यान्न सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी ? लाखों आदिवासियों को पालने वाले जंगलों को
खदानों और फैक्ट्रियों के लिए नष्ट किया जा रहा है. इस पर रोक लगनी चाहिये.
खाद्य असुरक्षा का प्रमुख कारण है कृषि क्षेत्र के लगातार शोषण से उत्पन्न उसमें
मौजूदा संकट. हालात यह हैं कि आज देश की 66 प्रतिशत आबादी सीधे कृषि पर निर्भर है,
पर इस आबादी का देश की कुल कमाई में हिस्सा केवल 17 प्रतिशत है. दूसरी तरफ निजी
कंपनियों का एक प्रतिशत से भी कम होने के बावजूद वह देश की 33 प्रतिशत कमाई पर अपना
दावा करता है. असली ‘‘खाद्य सुरक्षा’’ तभी मिल सकती है जब न केवल शोषण और विस्थापन
की नीतियाँ बदलें, बल्कि भारत की राजनैतिक अर्थव्यवस्था ही बदली जाए. जब तक देश से
कुपोषण समाप्त न हो जाए तब तक खाद्यान्न के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाये.
अमीर देशों में पशु और पोल्ट्री में गरीब देशों से आयातित अनाज खिलाया जा रहा है
जबकि हमारे देश के गरीब भूखे रह रहे हैं. खरीद सभी मंडियों से हो ताकि सरकारी खरीद
का फायदा सभी इलाकों को मिले न कि सिर्फ पंजाब, हरियाणा, आंध प्रदेश और उत्तरप्रदेश
के कुछ इलाकों से, जैसा कि फिलहाल होता है.
कई ऐसे इलाके हैं जहां खाद्यान्न की किल्लत है. इसलिए यह जरूरी है कि सार्वजनिक
वितरण प्रणाली के माध्यम से कमी वाले इलाकों में खाद्यान्न पहुंचाना केन्द सरकार की
जिम्मेदारी होनी चाहिए, जो जन वितरण प्रणाली का बुनियादी मकसद रहा है. हर ब्लॉक में
अन्न भण्डारण के लिए भंडार होने चाहिए, वर्तमान में उचित भण्डारण की कमी के कारण
हजारों टन अनाज सड़ रहा है. सरकार न तो इस अनाज के सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था कर
रही है और न ही इसे भूखे लोगों में वितरित कर रही है. स्थानीय खरीदी, भण्डारण और
वितरण के जरिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये गांव स्तर पर अनाज बैंक
स्थापित किये जायें.
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