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बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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लेकिन असली नायक कहां हैं?

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आत्महत्या का पाप

मुद्दा
 

आत्महत्या का पाप

योगेश दीवान होशंगाबाद से


तंत्र-मंत्र, टीका-चंदन, बाबा-बैरागी के बाद अब किसानी आत्महत्या के पाप-पुण्य की व्याख्या की है भाजपा सरकार के प्रवचनकारों ने. मध्यप्रदेश में लगातार बढ़ती किसानी आत्महत्या को टीकाधारी प्रदेश के कृषिमंत्री ने किसानों का पिछले जन्म का पाप बताया है. उन्होंने कहा कि लगातार किसानों ने खाद और केमिकलयुक्त दवाओं को डालकर धरती मां को बीमार करने का जो पाप किया है, उसी का परिणाम है कि धरती मां फसल खराब कर रही है और उनका पुत्र यानी कि किसान मरने को मजबूर है.

किसान आत्महत्या


ऐसे उपदेशों की एक व्याख्या तो ये है कि किसान अपने कर्मों यानी पाप से मर रहा है. यानी उसकी आत्महत्या में किसी की जिम्मेदारी नहीं. न राज्य की, न केन्द्र की, न खाद-बीज बनाने वाली कंपनियों की, न नीति-निर्माताओं की और न बदलती प्रकृति की. दूसरी व्याख्या उन संघियों, एन.जी.ओ., सरकारी कारिंदों या तथाकथित् जैविक और प्राकृतिक खेती के पूजकों की है, जो कहते हैं कि हमने जल-जंगल-जमीन से जो छेड़छाड़ की, उसी का परिणाम है ये त्रासदी.

मतलब साफ है कि सब कुछ उस पापी किसान का ही किया धरा है. जबकि किसान और उसका खेत, बीज, खाद, सिंचाई, पैदावार उसके दाम और बाजार हमेशा सत्ता से नियंत्रित होते रहे हैं. फिर चाहे वो राजशाही हो, अंग्रेजी दौर की जमींदारी-सामंतशाही हो या फिर आज का तथाकथित लोकतंत्र. जिस हरित क्रांति या आधुनिक खेती को आज हमारे योजनाकार, राजनेता, सरकार, वैज्ञानिक या सामाजिक कार्यकर्त्ता लगातार गरिया रहे हैं, उसे किसान के खेतों तक पहुंचाने का पुण्यकर्म भी इन्होंने ही किया था. और आज किसान को पापी बताकर जैविक, प्राकृतिक या ऋषि की नारेबाजी भी यही खेत से दूर खड़े लोग कर रहे हैं.

असल में पाप-पुण्य की समझ ही खेती को धार्मिक कर्मकांड बना देने से निकली है. तभी तो प्रदेश के कृषि विभाग की वेबसाईट भरपूर अवैज्ञानिकता फैलाते हुए बताती है कि इस मुहूर्त या नक्षत्र में फलां वस्तु बोने से इतना फायदा होगा. इन्हें कौन बताये कि इल्ली का प्रकोप होने पर खेत में हवन करने पर इल्ली खत्म नहीं बल्कि भाग जाती है. प्रदेश का सिंचाई विभाग वॉटरशेड को शिवगंगा कह कर सिंचाई करने की बात करता है. प्रदेश का वन महकमा और उसके ज्ञानी वैज्ञानिक कहते हैं कि सीताफल और आंवले की पैदावार बढ़ाने के लिये पेड़ों को राग भैरवी सुनाना चाहिये और वो भी ऐरे-गैरे की नहीं प्रसिद्ध सितारवादक पं.रविशंकर के सितार से निकली हुई.

कृषिमंत्री को खुश करने के लिये प्रदेश के कृषि विश्वविधालय के वैज्ञानिक अब एक ‘‘अमृत पानी’’ तैयार कर रहे हैं, जिससे खेत की उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाये. आश्चर्य है कि इसका पहला प्रयोग उसी सीहोर जिले के गांव में किया गया, जहां सबसे पहले किसान ने आत्महत्या की.

एक और अंधा प्रयोग प्रदेश का साईंस एंड टेक्नालॉजी विभाग करोड़ों रुपये खर्च करके प्रायः हर साल कई जगह कर रहा है. इसमें सोमयज्ञ किया जाता है और उससे सूखे खेतों में पानी गिराने का दावा किया जाता है. अभी तक पानी की एक बूंद भी नहीं गिरी पर करोड़ों रुपये का चूना जरुर लगा. जबकि खेती और किसान की पद्धति अपने-आप में एक विज्ञान है. जो हमें भडूरी की कहावतों से लेकर कृषि विज्ञान की पुस्तकों में अपने तथ्य और तर्क के साथ हमेशा दिखाई देती है. असल में ऐसी ही अवैज्ञानिकता से निकलता है पाप-पुण्य का फंडा, जो कि मरे हुए किसान के सिर पर फोड़ा जाता है.

आश्चर्य है कि इस पापी किसान के मरने की खबरें भी उन इलाकों या जिलों से ज्यादा आ रही हैं, जो या तो मुख्यमंत्री या कृषिमंत्री के गृह और राजनैतिक क्षेत्र हैं. जहां से ये लोग इसी पापी किसान के दम पर चुनाव जीतते आ रहे हैं. पिछले 15 दिनों में प्रदेश में 18 किसानों ने आत्महत्या की है. और इस सबका तात्कालिक कारण अत्यधिक ठंड के कारण पड़ा पाला या तुसार है. इस पाला ने कई सालों बाद एक अच्छी फसल को पूरी तरह खत्म कर दिया. इस फसल से उस किसान ने अपने सिर पर चढ़े कर्जे को पटाने की आशा पाली थी. इस फसल के लिये उसने लागत भी भरपूर लगायी थी लेकिन पूरी फसल चौपट हो गई.

कितना दुखद है कि जिस कर्जे को माफ करने की बात केन्द्र और राज्य की सरकारें पिछले कुछ सालों से लगातार करती आई हैं, वही कर्जा आज भी किसानों के गले का फंदा बना हुआ है. जबकि कई करोड़ रुपये इस किसान के कर्ज के नाम पर घोषित हो चुके हैं. वहीं पिछले दो सालों में केन्द्र और राज्य की सरकारें इसी झूठे आश्वासन और नारों के दम पर फिर से चुन कर आ गईं. अभी तक मध्यप्रदेश किसान आत्महत्या के मामले में तीसरे पायदान पर था पर पिछले पन्द्रह दिन की रफ्तार बताती है कि प्रदेश शीघ्र ही पहले नहीं तो दूसरे नंबर पर आने को तैयार है. वह भी तब जब इस प्रदेश का मुख्यमंत्री हर सांस में अपने-आप को किसान पुत्र बताने से नही चूकता है. जब इस प्रदेश का कृषि मंत्री अचानक स्वंयभू जैविक बाबा बन जाता है और जैविक नीति बनाने में लग जाता है. जब प्रदेश का कृषि विभाग अचानक नाम बदलकर खेती का नहीं किसान के कल्याण का विभाग बन बैठता है. जब विभाग के अदना से लेकर अदना तक के कर्मचारी कर्मकांडी तरीके से किसानों की बात करने लगते हैं. जब संघ से जुड़े संगठन का किसान संगठन नूरा-कुश्ती के रुप में अपनी 185 मांगों के लिये दो दिन तक राजधानी को जाम कर देता है. जब जैविक खेती और भोजन के अधिकार के नाम पर किसानों को बहलाने के लिये ढेरों एनजीओ धो-पोंछकर अपनी दूकानें चमकाने लगते हैं और बाजार, सरकार, वित्तीय संस्थानों तथा तकनीक को गरियाते हुए अखबारों में छाने लगते हैं.
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