समान शिक्षा की लड़ाई
बहस
समान शिक्षा की लड़ाई
अम्बरीष राय
जनता की लम्बी लड़ाई के बाद सन 2002 में देश के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार,
86वें संविधान संशोधन के साथ संभव हो सका परन्तु यह अधिकार अपने आप में अपूर्ण तथा
सारे बच्चों को शिक्षा के दायरे में शामिल किये बगैर था. देश भर से विरोध के स्वर
उभरे कि इस अपूर्ण अधिकार को दुरुस्त किया जाये तथा 0-6 वर्ष के छूट गये लगभग 17
करोड़ बच्चों को संवैधानिक दायरे में शामिल किया जाये ताकि देश स्कूली शिक्षा शुरू
करने के लिए अपने बच्चों को तैयार करने की अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर सके. पर
हाल में संसद द्वारा पारित शिक्षा के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम,
2009 ने भी इस गलती को सुधारने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया और तीन से छह वर्ष के
बच्चों को राज्य सरकारों के भरोसे छोड़ दिया. साथ ही 14-18 साल तक के बच्चे भी
मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिये गये.
संवैधानिक अधिकारों की दूसरी बड़ी खामी यह थी कि इसे लागू करने की जिम्मेदारी राज्य
द्वारा बनाये गये कानून की मर्जी पर डाल दिया गया. इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट
द्वारा 1993 में जे पी उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश सरकार के मुक़दमे में दिये गये
फैसले का उल्लेख जरूरी है, जिसमें 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा
देना राज्य की जिम्मेदारी तय कर दी गई थी और उसके बाद भी बच्चे की शिक्षा जारी रखी
जाएगी , जो राज्य की आर्थिक क्षमता व विकास पर निर्भर करेगी.
इस फैसले और तत्पश्चात नागरिक समूहों की सक्रियता ने ही दरअसल सरकार को संवैधानिक
अधिकारों के लिए अनुच्छेद 21 (अब 21-अ) में संशोधन करने के लिए मजबूर कर दिया था पर
यह अधिकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के सामने कमजोर साबित हुआ. अब जबकि शिक्षा का
संवैधानिक अधिकार तथा उसको लागू करने का शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 पारित हो गया
है और इसे 1 अप्रैल 2010 से देश भर में लागू घोषित कर दिया गया है तो हम कह सकते
हैं कि यह कानून देश की जनता की अकांक्षा के अनुरूप खरा नहीं उतरता.
असल में इस कानून के छेद बच्चों की शिक्षा के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के
मामले में न केवल रोड़ा हैं बल्कि स्कूली शिक्षा के बाजारीकरण और निजीकरण के लिए नए
दरवाजे भी खोलते हैं. अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो शिक्षा खरीद-फरोख्त की वस्तु
बनी रहेगी और शिक्षा में 'सामान अवसरों की गारंटी' एक दूर की कौड़ी साबित होगी.
देश में शिक्षा के मामले में 'स्कूल की उपलब्धता,गुणवत्ता और सभी के लिए सामान अवसरों
का होना' हमेशा से चिंता का विषय रहा है. देश की सामाजिक बनावट व आर्थिक
श्रेनिबद्धता 'सभी के लिए एक जैसी शिक्षा' के सिद्धांत के सामने हमेशा यक्ष प्रश्न
रही है और शिक्षा हमेशा स्तरीय खांचो में बंटी रही है. वर्गीय ढांचे के अनुरूप
शिक्षा के भी कई ढांचे हैं, जो देश की सामाजिक संरचना में अन्तर्निहित मजबूत वर्गीय
विभाजन को अभिव्यक्त करते रहते हैं. अभिजात्यों के लिए उनकी हैसियत के मुताबिक महंगे
और साधन संपन्न स्कूल तथा गरीबों व मेहनतकशों के लिए सरकारी व अर्ध सरकारी स्कूल
जिनकी गुणवत्ता लगातार हमले का शिकार रही है, कभी धन के अभाव में तो कभी लचर ढांचों
के कारण तो कभी अकुशल, अनियमित और अल्प वेतन वाले अध्यापकों की अंधाधुंध भरती के
जरिये. विडंबना यह है कि देश की तीन चौथाई आबादी के लिए बने सरकारी स्कुलो की
दुर्दशा 'शिक्षा के लोकव्यापीकरण' के अंतरराष्ट्रीय नारे के नाम पर जारी है.
इन स्कूलों में बच्चों व अध्यापकों के अनुपात की तो बात ही निराली है. ग्रामीण इलाकों
में 100 बच्चों पर एक अध्यापक सभी विषय पढ़ाते मिल जाया करते हैं. इन स्कूलों में
लगभग 10 लाख अध्यापकों की कमी बनी हुई है. शिक्षाविद प्रोफ़ेसर कोठारी के शब्दों
में,' अमीरों के लिए शिक्षा और गरीबों के लिए साक्षरता'- वर्तमान में शिक्षा के
मौजूदा ढांचे की यही तार्किक परिणति है.
स्वर्गीय गोपाल कृष्ण गोखले ने 18 मार्च 1910 में ही भारत में 'मुफ्त और अनिवार्य
प्राथमिक शिक्षा' के प्रावधान के लिए ब्रिटिश विधान परिषद् के समक्ष प्रस्ताव रखा
था, जो निहित स्वार्थों के विरोध के चलते अंततः ख़ारिज हो गया.
आगे पढ़ें
1937 में महात्मा गाँधी ने सार्वभौमिक शिक्षा की बात की परंतु विरोधियों के रूख को
देखकर उन्होंने स्व-वित्त पोषित नयी तालीम में समाधान खोज लिया और 'ज्ञान की दुनिया
को काम की दुनिया' के साथ जोड़ने की वकालत की ताकि राष्ट्रीय परिवेश के अनुरूप
शिक्षा का स्वरुप निर्धारित किया जा सके.
बाबा साहब आंबेडकर को भी संविधान सभा में 14 साल तक के बच्चों को शिक्षा का
संवैधानिक अधिकार दिलाने के मामले में तरह-तरह के विरोध झेलने पड़े. अंतत उन्हें
अनुच्छेद 45 को मौलिक अधिकारों की जगह नीति निर्देशक सिद्धांतों में डालना पड़ा
जिसमें 10 वर्षो तक 0-14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा मुहैय्या कराने का वायदा किया
गया था. बाबा साहब ने दलितों के लिए जो तीन सूत्र दिये, उसमें पहला ही शिक्षा ग्रहण
करने का था, 'शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो'.
आजादी के बाद भी शिक्षा पर बहस जारी रही और तमाम तरह के आयोग गठित किये गये. संसद
में भी बहसें हुईं पर कोई कारगर परिवर्तन नहीं हुआ.
1966 में 'शिक्षा आयोग का गठन हुआ, जो कोठारी कमीशन के नाम से लोकप्रिय हुआ. इसने
स्कूली शिक्षा से लेकर तकनीकी शिक्षा तक अपनी संस्तुतियां पेश कीं. स्कूली शिक्षा
पर तमाम सीमाओं के वावजूद कोठारी कमीशन द्वारा की गईं संस्तुतियां शिक्षा में सुधार
के लिए मील के पत्थर की तरह हैं परन्तु दुर्भाग्य है कि बार-बार प्रतिबद्धता व्यक्त
करने के वावजूद सरकार ने इसे लागू करने कि जहमत नहीं उठाई.
कोठारी कमीशन ने सामाजिक विभेदों को दूर करने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में प्रयास
शुरू करने की बात कही थी और सभी के लिए 'समान अवसर उपलब्ध' कराने का सुझाव दिया था.
राष्ट्रीय एकता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने के लिए कमीशन
ने पड़ोसी स्कूल की अवधारणा पर आधारित शिक्षा के एक राष्ट्रीय ढांचे को बनाये जाने
पर जोर दिया, जिसे उन्होंने कॉमन स्कूल सिस्टम यानी समान स्कूल प्रणाली का नाम दिया.
जो पूरी तरह जनता के पैसे से यानी सरकारी निवेश खड़ा किया जाना था.
|
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में विश्व बैंक के बढते हस्तक्षेप ने भी शिक्षा के भारतीय ढांचें में ढेर सारे परिवर्तन किये. |
इसके लिये
उन्होंने 1966 में ही सकल घरेलु उत्पाद का 6% शिक्षा पर खर्च करने का सुझाव दिया
था. परन्तु सरकार ने पैसे की कमी बता कर इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया. आज भी
शिक्षा का बजट 3-4% के बीच झूलता रहा है. इसमें से कभी-कभी आधे से भी कम स्कूली
शिक्षा पर खर्च होता है. जबकि लगभग 40 करोड़ बच्चों का भविष्य स्कूली शिक्षा से जुडा
हुआ है. श्रीलंका जैसे पडोसी देश का शिक्षा बजट भी हमसे ज्यादा है. स्कूली शिक्षा
पर सरकार का यह अनौपचारिक रुख कमजोर बुनियाद पर मजबूत ईमारत बनाने जैसे दिवास्वप्न
की तरह ही है.
कॉमन स्कूल सिस्टम को परिभाषित करते हुए कोठारी कमीशन ने सरकार के पैसे से खड़े किये
गये सरकारी स्कूलों को शिक्षा की गुणवत्ता के केंद्र के रूप में विकसित करने की
कल्पना की थी ताकि 'अभिभावकों को महंगे निजी स्कूलों की तरफ देखने की जरुरत ही न पड़े'.
निजी स्कूलों की मजबूत लॉबी की ताकत को आंकते हुए तथा अपने कमीशन की सीमाओं को समझते
हुए प्रोफ़ेसर कोठारी ने निजी स्कूलों को बंद करने या संविधान के अनुच्छेद 19 को
संशोधित करने की बात कहने के बजाये 'शिक्षा के राष्ट्रीय ढांचे' को ही मजबूत करने
के लिए कई सुझाव दिये. जिसमें जाति, वर्ग, लिंग, सामाजिक व आर्थिक हैसियत से परे सभी
बच्चों का पड़ोसी स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करना, प्रशिक्षित व कुशल अध्यापकों की
नियुक्ति, विविधता पूर्ण पाठ्यक्रम (जो हमारे सांस्कृतिक बहुलता का प्रतिनिधित्व करे),
6% सकल घरेलु उत्पाद का हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना आदि सुझाव शामिल हैं.
कोठारी कमीशन की इन्ही संस्तुतियों ने देश भर में समान शिक्षा के लिए लोगों को
आंदोलित कर दिया और हमारे जैसे लोग 70-80 के दशक में 'निर्धन हो या हो धनवान, शिक्षा
होगी एक समान' जैसे नारों के साथ सड़कों पर उतर पड़े थे. बाद में प्रसिद्ध गाँधीवादी
आचार्य राममूर्ति ने भी कॉमन स्कूल सिस्टम का जोरदार समर्थन किया परन्तु अल्पसंख्यक
समुदाय द्वारा सरकारी अनुदान से संचालित स्कूलों को इसके दायरे में शामिल किये जाने
को एक चुनौती के रूप में चिन्हित किया गया. जाहिर है, इसे सामंजस्य पूर्ण राजनीतिक
प्रणाली ही सुनिश्चित कर सकती है.
1992 में संसद ने एक प्रस्ताव के जरिये कॉमन स्कूल सिस्टम को लागू किये जाने की बात
मान ली परन्तु दुर्भाग्यवश इसे हकीकत में तब्दील नहीं किया जा सका. सरकार की वर्गीय
इच्छाशक्ति निश्चित ही इसे लागू करने में एक जबरदस्त रोड़ा थी. इसी बीच
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में विश्व बैंक के बढते हस्तक्षेप ने भी
शिक्षा के भारतीय ढांचें में ढेर सारे परिवर्तन किये. डी.पी.इ.पी. और सर्व शिक्षा
अभियान स्कूली शिक्षा की दुर्दशा के लिए एक ख़राब अनुभव की तरह याद किये जायेंगे.
आगे पढ़ें
स्कूली शिक्षा के औपचारिक ढांचे को कमजोर करने तथा शिक्षा की गिरती गुणवत्ता के
मामले में इन योजनाओं ने काफी योगदान किया है. अनौपचारिक शिक्षा तथा पारा टीचर
परिघटना इन्हीं योजनाओं की ही देन है.
शिक्षा के अधिकार का मौजूदा अधिनियम, 2009 हालांकि इस नुकसान की आंशिक भरपाई करता
दिखता है परंतु समान अवसरों के मामले में यह विफल रहा है. शिक्षा में बढ़ती खाई से
आक्रोशित प्रगतिशील तबके लगातार शिक्षा के अधिकार अधिनियम को कॉमन स्कूल सिस्टम के
फ्रेमवर्क में बनाने की मांग करते रहे हैं. पीपुल्स कैम्पेन फार कॉमन स्कूल सिस्टम
सहित कई संगठनों ने अपने प्रतिवेदन सरकार को सौंपे मगर उसका कोई प्रतिफल सामने नहीं
आया.
मौजूदा कानून अपनी सीमाओं के बावजूद कुछ गिने-चुनी उपलब्धियों के साथ हमारे सामने
मौजूद है, जिसका देश के बच्चों के हित में इस्तेमाल किया जाना जरुरी है ताकि आगे की
लड़ाई को गति दी जा सके. इसे संपूर्णता में ख़ारिज करना जनता की उपलब्धियों पर पानी
फेरने जैसा होगा. मगर इसे अंतिम उपलब्धि मान लेना या शिक्षा के अधिकार के लिए एक
संपूर्ण कानून मान लेना भी एक गंभीर भूल होगी.
कुछ निहित स्वार्थी तत्त्व व प्राइवेट स्कूल लॉबी इस कानून के विरुद्ध न्यायालय में
लड़ाई लड़ रहे हैं और इसे निष्क्रिय कर देने पर आमादा है. इस कानून ने सभी तरह के
स्कूलों के लिए अनुदान रहित प्राइवेट स्कूलों सहित कैपिटेशन फ़ीस व दाखिले के लिए
स्क्रीनिंग पर पाबन्दी, स्कूलों के लिए निर्धारित मापदंड का उल्लंघन करने पर दंड का
प्रावधान आदि जैसे अच्छे कदम उठाये हैं. साथ ही अध्यापकों को एक सीमा अवधि में
प्रशिक्षित किये जाने तथा 1 किलोमीटर की दूरी में स्कूल उपलब्ध करने का प्रावधान रखा
है.
अनुदान रहित प्राइवेट स्कूलों में पड़ोस के गरीबों को स्कूल की कुल संख्या का 25
प्रतिशत आरक्षण भी शायद प्राइवेट स्कूलों की संरचना को प्रभावित करने में असरकारी
साबित होंगे हालाँकि यह कॉमन स्कूल सिस्टम का स्थानापन्न नहीं हो सकता है.
|
कॉमन स्कूल सिस्टम के लिए जरुरी है कि सरकारी स्कूल बचे रहें बल्कि ठीक से उनकी गुणवत्ता उन्नति करती रहे. |
मौजूदा कानून में स्कूल मैनेजमेंट कमिटी बनाने का प्रावधान भी है, जिसमें 75
प्रतिशत अभिभावक व 50 प्रतिशत महिलाएं तथा कमजोर वर्गों की उचित भागीदारी की बात कही
गई है. इस से सरकारी व अर्ध सरकारी स्कूलों को सुधारने व उनकी देख रेख करने में जनता
की सक्रिय भागीदारी का स्वागत योग्य रास्ता खुलेगा. स्कूल मैनेजमेंट कमिटी यदि
जीवंत ढंग से गठित हों और ठीक से कार्य कर पायें तो स्कूलों में सुधार के साथ ही इसे
समान शिक्षा के लिए एक देशव्यापी मंच के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
हालांकि यह सब होने पर भी इस कानून में निगरानी की व्यवस्था बहुत कमजोर है, जो
केंद्र व राज्य के बाल संरक्षा आयोग की सक्रियता पर बहुत कुछ निर्भर है. इसीलिए इस
कानून के सकारात्मक पहलुओं को लागू करा पाने का बहुत हद तक दारोमदार जनता के संगठनों
पर ही निर्भर है. देश में एक मजबूत लॉबी है, जो सरकारी स्कूलों को भी निजी हाथों
में सौपने का अभियान चलाती रहती है ताकि देश के विभिन्न हिस्सों में मौजूद सरकारी
स्कूलों के ढ़ांचों पर कब्ज़ा जमाया जा सके और स्कूली शिक्षा से भी ढ़ेर सारा मुनाफा
बटोरा जा सके. यह ध्यान रखना होगा कि कॉमन स्कूल सिस्टम के लिए जरुरी है कि सरकारी
स्कूल न केवल सरकारी क्षेत्र में बचे रहें बल्कि ठीक से उनकी गुणवत्ता उन्नति करती
रहे. सरकारी नीतियों के दोहरेपन पर भी रोक लगाना होगा.
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप और विशेष प्रतिभा विद्यालयों, मॉडल स्कूल, नवोदय,
केंद्रीय विद्यालयों आदि को सरकारी क्षेत्रों में खोलने तथा उन्हें आम सरकारी स्कूलों
के मुकाबले ज्यादा धन व सुविधाएँ आबंटित करने की नीतियों पर भी सवाल उठाना होगा. आप
ही सोचिये, यदि सरकारी संरक्षा में विशेष सुविधा के साथ केंद्रीय विद्यालय आदि की
गुणवत्ता निजी विद्यालओं की तुलना में बेहतर बना कर रखी जा सकती है तो जनता के लिए
उपलब्ध आम सरकारी स्कूल क्यों नहीं बेहतर हो सकते हैं?
नए संदर्भों में नागरिक समूहों व जन अभियानों को दो स्तर पर अपने कार्यभार को जारी
रखना होगा. पहला- दीर्घकालिक कार्य भार के बतौर शिक्षा के समान अवसरों के लिए कॉमन
स्कूल सिस्टम की लड़ाई को तेज करना, समान विचार के लोगों को गोलबंद करना तथा सरकार
के विभिन्न हिस्सों में भी अपनी आवाज उठाते रहना और दूसरा, मौजूदा कानून के अमल के
लिए लोगों को न केवल जागरूक करना बल्कि इसके प्रावधानों के अमल पर निगरानी रखना और
जन दबाव बनाये रखना.
*लेखक पीपुल्स कैम्पेन फार
कॉमन स्कूल सिस्टम के संयोजक हैं.
01.02.2011, 17.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित