निशाने पर मीडिया
निशाने पर मीडिया
हर्शी चितरंगी परेरा
कोलंबो,
श्रीलंका से
श्रीलंका में पत्रकारों पर लगातार बढ़ते हमले से मीडिया जगत सकते में है. चरमपंथी
संगठनों और सरकार दोनों ही मीडिया को निशाना बना रहे हैं. पिछले 2 सालों में ही कम
से कम 9 पत्रकार मारे गए हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में पत्रकारों की प्रताड़ना,
उन पर होने वाले हमले, उनके अपहरण और लापता होने की घटनाएं सामने आई हैं.
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तिस्सायनयगम की गिरफ्तारी के चार महीने से अधिक हो गए हैं
लेकिन अब तक अभियोग का कहीं अता-पता नहीं है. |
ताज़ा मामला पत्रकार तिस्सायनयगम का है. www.outreach.sl के संपादक तिस्सायनयगम
पिछले 9 मार्च से अपने 2 सहयोगियों एन जसीहरन और उनकी पत्नी वालारमथि समेत हिरासत
में हैं. श्रीलंका की आतंकवादी सूचना शाखा ने उन्हें गिरफ्तार किया था और चार महीने
बाद भी वे हिरासत में ही हैं.
तिस्सायनयगम इन दिनों आंखों की गंभीर समस्या से संघर्ष कर रहे हैं. हालत ये हो गई
है कि अगर जल्द ही उनकी आंखों का इलाज नहीं करवाया गया तो वे हमेशा के लिए अपनी आंखों
की रोशनी खो देंगे. उनके सहयोगी वालारमथि का भी यही हाल है. उन्हें भी इलाज की
जरुरत है
तिस्सायनयगम पर श्रीलंका की आतंकवादी सूचना शाखा ने चरमपंथी संगठन एलटीटीई की मदद
का आरोप लगाया है. ये और बात है कि उनकी गिरफ्तारी के चार महीने से अधिक हो गए हैं
लेकिन अब तक अभियोग का कहीं अता-पता नहीं है. यहां तक कि जब आपातकाल नियमावली के
तहत 90 दिन से अधिक समय तक आतंकवादी सूचना शाखा की हिरासत में रखने को लेकर उन्हें
कोलंबो में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो कोर्ट ने भी उन्हें जमानत देने से
इंकार कर दिया.
तिस्सायनयगम के अधिवक्ता रोमेश डी सिल्वा ने पिछले शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय में
साफ कहा कि तिस्सायनयगम को अगर रिहा नहीं किया जाता तो इसका आशय यह है कि किसी के
बयान मात्र के आधार पर किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता का हनन किया जा सकता है.
उन्होंने यह भी कहा कि–“राज्य का एक धड़ा आम जनता के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार
कर रहा है और मनमाने तरीके से लोगों को हिरासत में रखा जा रहा है.”
निंदा
कोलंबो के एंग्लिकन बिशप रेव्ड डूलीप डी चिकेरा ने पत्रकारों के साथ हो इस तरह के
व्यवहार पर चिंता व्यक्त की है. मीडिया को जारी एक बयान में उन्होंने कहा कि “ देश
और दुनिया के लोग इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर श्रीलंका में पत्रकारों के
साथ ऐसा क्यों हो रहा है. मैं राष्ट्रपति से अनुरोध करता हूं कि वे व्यक्तिगत तौर
पर पत्रकारों के हिरासत के मामलों को देखें. अगर वे किसी तरह के अपराध के लिए दोषी
पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाही की जाए. अगर वे निर्दोष हैं तो
उन्हें अविलंब रिहा किया जाए.”
चिकेरा के अनुसार जिन अधिकारियों को हिंसा के मामलों में छानबीन करना है, उसमें उनकी
अक्षमता को साक्ष्यों की कमी का हवाला दे कर छुपाया नहीं जा सकता. आज की तारीख में
देश में बेहतर खुफिया तंत्र उपलब्ध है. जाहिर है, कानून और व्यवस्था को स्वतंत्रता
से काम करने की अनुमति होनी चाहिए, जिससे मीडियाकर्मियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा
और व्यवसायिक आज़ादी मिल सके.
चिकेरा कहते हैं- “मैं अलग-अलग दलों से जुड़े सभी सांसदों और मंत्रियों से इस मुद्दे
को उठाने और इस पर बहस की अपील करुंगा. ऐसा आपको करना चाहिए. आप इस पर मौन नहीं रह
सकते, इस परंपरा को उचित नहीं ठहरा सकते.”
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि दक्षिणी श्रीलंका
में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ रिपोर्ट कर रहे पत्रकारों को धमकियाँ मिली हैं और देश
में ऐसा माहौल बन गया है कि जिम्मेवार
लोगों को सज़ा भी नहीं मिल रही है.
इसके अलावा उत्तर और पूर्वी हिस्सों में काम कर रहे तमिल पत्रकारों को ख़तरा सेना
और उन हथियारबंद तमिल गुटों से बढ़ा है जो सेना के इशारे पर काम कर रहे हैं.
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया निगरानी संगठन, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने प्रेस
स्वतंत्रता के मामले में श्रीलंका को विश्व के सबसे खराब देशों में गिनाया है.
संगठन ने कहा है कि तमिल विद्रोहियों के साथ फिर से गृह युद्ध शुरू होने पर पत्रकारों
के लिए काम करना ज्यादा कठिन हो गया है.
स्रोत बताओ नहीं तो...
पिछले तीन दशकों से उत्तर और पूर्वी इलाकों में सरकार और विद्रोहियों के बीच लगातार
चल रहे संघर्ष में बड़ी संख्या में पत्रकार मारे गए हैं. एमटीवी टेलीविजन नेटवर्क
के जाफना जिला संवाददाता छत्तीस वर्षीय पी. देवकुमार और उनके मित्र की इस साल 28 मई
को जब हत्या हुई तो पत्रकारों का गुस्सा सड़कों पर भी नजर आया लेकिन सरकार पर इसका
कोई असर नहीं पड़ा. देवकुमार उन 9 पत्रकारों में शामिल थे, जिन्हें पिछले 2 वर्षों
में मार डाला गया.
एक अन्य पत्रकार किथ नोयर पर जिस तरह हमला बोला गया, उससे पत्रकार जगत भौंचक रह गया.
एक अखबार में सह संपादक के पद पर कार्यरत 21 वर्षीय किथ देश की सुरक्षा के मुद्दे
पर लिखने वाले पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं.
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अपहर्ता किथ से कुछ खबरों के स्रोत जानना चाह रहे थे और जब
उन्हें इसका जवाब नहीं मिला तो उन्होंने किथ का यह हाल किया
था. |
इस साल 22 मई को जब वे रात को कार चलाते हुए अपने घर तक पहुंचे तो उन्होंने अपने घर
के गेट पर किसी अनजान व्यक्ति को देखा. उन्हें लगा कि किसी को मदद की दरकार है. कार
का इंजन और हेडलाइट चालू हालत में छोड़कर जब वे अपनी कार से उतरे तो उन्हें इस बात
का अनुमान नहीं था कि उनके आसपास खतरा मंडरा रहा है. कार से उतरते ही उन्हें कुछ
लोगों ने अपने कब्जे में कर लिया. हाथ और आंखों पर पट्टी बांध कर उन्हें एक सफेद
वैन में डाल दिया गया.
करीब सात घंटे बाद जब किथ को अपहर्ताओं ने जब उनके घर के बाहर छोड़ा तो वे बड़ी
मुश्किल से किसी तरह अपने घर के अंदर जा सके. उनकी पत्नी, 12 साल के बेटे और 10 साल
की बेटी ने जब उन्हें इस हालत में देखा तो उनकी चीख निकल गई. उनके शरीर से खून बह
रहा था. किथ के होठ सूजे हुए थे और कान पर चोट साफ नजर आ रहा था. सर पर जगह-जगह
गूमड़ बने हुए थे जो क्रूरता और वहशियाना मारपीट का नतीजा था. उनके पैर कांप रहे थे
क्योंकि किथ के पैर और एड़ी को भी अपहर्ताओं ने अपना निशाना बनाया था.
अपहर्ता किथ से कुछ खबरों के स्रोत जानना चाह रहे थे और जब उन्हें इसका जवाब नहीं
मिला तो उन्होंने किथ का यह हाल किया था.
हमला दर हमला
इसी महीने एक जुलाई को ब्रिटिश दूतावास के अधिकारी
महेंद्र रत्नवीरा और स्वतंत्र पत्रकार नमल परेरा की कार को रोक कर कुछ अज्ञात लोगों
ने उन पर हमला बोला और उन्हें डंडों से पीटा गया. उनकी कार में भी बुरी तरह
तोड़-फोड़ की गई.
मीडिया में आने वाली खबरों के अनुसार श्रीलंका के कई समाचार वेबसाइट हैकरों के
निशाने पर हैं और उन्हें खोला पाना मुश्किल हो रहा है.एक वेबसाइट के प्रधान संपादक
इंडिका गामेज ने फ्री मीडिया मूवमेंट की संयोजक सुनंदा देशप्रिय को एक पत्र लिख कर
उनसे इस मामले में अविलंब हस्तक्षेप करते हुए इसे गंभीरता से लेने का अनुरोध किया
है.
श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय ने तमिल विद्रोहियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की
आलोचना करने वाले पत्रकारों को ‘खिलंदड़ सुरक्षा विश्लेषक’ और ‘देश के दुश्मन’
घोषित करते हुए उन पर लगातार हमला बोल रखा है.
मानवाधिकार कार्यकर्ता और अधिवक्ता किशली पिंटो जयवर्द्धना ने संडे टाइम्स में लिखा
है कि देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी सरकार ने अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता को बुरी तरह से खत्म कर दिया है.
लेकिन मीडिया के इस शर्मनाक दमन के लिए कौन जिम्मेवार है ?
श्रीलंका की मुख्य विपक्षी पार्टी जोसेफ माइकल परेरा ने संसद में यह सनसनीखेज आरोप
लगाया है कि इन हमलों के पीछे सेना के कमांडर सारथ फोंसेका का हाथ है, जिनके
नेतृत्व में एक विशेष दल पत्रकारों पर हमले कर रहा है. जो पत्रकार युद्द में हो रही
सरकारी गड़बड़ियों को उजागर कर रहे हैं, वे राज्य प्रायोजित हिंसा के मुख्य निशाने
पर हैं.
लेकिन मीडिया मंत्री अनुरा प्रियदर्शना इस तरह के आरोपों से इंकार करते हैं. अनुरा
के अनुसार पत्रकार नमल परेरा और ब्रिटिश दूतावास के अधिकारी महेंद्र रत्नवीरा पर
हुए हमले में ऐसे लोग शामिल थे, जो सरकार को बदनाम करना चाहते थे.
जाहिर है, मामला फिलहाल सवाल जवाब और बयानों में उलझा हुआ है और पत्रकार इन सबों से
जूझते हुए अपने काम में लगे हुए हैं.
17.07.2008,
15.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित