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बिहार के नये सामाजिक समीकरण

बहस

 

बिहार के नये सामाजिक समीकरण

महेन्द्र सुमन पटना से
 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कर्पूरी ठाकुर जयंती समारोह के अवसर पर अति पिछड़ों के लिए विधायिका में आरक्षण की मांग कर एक नया व दीर्घकालिक राजनीतिक एजेंडा पेश कर दिया है. पंचायतों में अति पिछड़ों को आरक्षण देकर नीतीश ने निचले स्तरों पर उनके सशक्तीकरण का ऐतिहासिक काम कर दिखाया तो यह वाजिब ही है कि वह उच्च स्तरों पर भी उनके सशक्तीकरण के लिए आवाज दें. बिहार चुनाव परिणामों के विश्लेषण में यह बात बार-बार दोहराई गई कि जाति पर विकास की जीत हुई है. तो फिर मंडल युग के जाने-पहचाने तेवर में स्वयं नीतीश कुमार द्वारा ऐसी मांग उठाने के निहितार्थ क्या हैं ?

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पिछले चुनाव में सवर्ण एवं अति पिछड़ा जाति समूहों को सबसे अधिक लाभ हुआ. उन्हें पिछले चुनावों की तुलना में क्रमशः 56 की जगह 76 और 7 की जगह 17 सीटें प्राप्त हुईं. गौर से देखें तो यही दोनों समूह लालू यादव के कोर समूह- एम-वाइ की भांति नीतीश के सामाजिक समीकरण के कोर समूह का निर्माण करते हैं. ये ही उस समीकरण में आबादी के लिहाज से बड़ा ब्लॉक एवं राजनीतिक रूप से सबसे आक्रामक समूह हैं. बाकी सब इस कोर समूह के इर्द-गिर्द गोलबंद समूह हैं, धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चले जाने को अभिशप्त. पिछड़ों के दो राजनीतिक ध्रुवों में बंटने से सवर्ण एवं अति पिछड़ा समूह महत्वपूर्ण हो गए, परिणामतः उनका कोर समूह बनना स्वाभाविक था.

नीतीश के लिए थोड़ी असहज स्थिति है कि उनके कोर के दोनों संघटक सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से कई अर्थों में बेमेल हैं, उनके बीच कोई मजबूत राजनीतिक सूत्र नहीं है और साथ ही वह दोनों में से किसी का स्वाभाविक प्रतिनिधि नहीं हैं. यह असहज स्थिति तो अब उनके साथ बनी रहेगी.

यह भी उल्लेखनीय है कि अति पिछड़ा वर्ग अपने कोर के सह-संघटक सवर्ण समूह की ऐतिहासिक रूप से प्राप्त बेहतर स्थिति का मुकाबला नहीं कर सकता. लिहाजा, यह जरूरी है कि नीतीश उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं को अपना स्वर दें, जैसा कि उन्होंने दूसरे संघटक सवर्ण समूह को मंत्रिमंडल में अच्छी-खासी जगह देकर पुरस्कृत किया और उसी कतार में है सवर्ण आयोग गठन का निर्णय.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के बीच यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि बिहार में नीतीश के साथ ही ओबीसी की लम्बी पारी का संभवतः अंत होगा और इसके पूरे आसार हैं कि ईबीसी की पारी का आगाज हो. भूमंडलीकरण-उदारीकरण के इस युग में सबाल्टर्न राजनीति की कम होती प्रासंगिकता को देखते हुए सवर्णों की वापसी के तर्कों की भी कमी नहीं है. बहरहाल, यह दूर की बात है, लेकिन यह संक्रमण काफी दिलचस्प होगा और संक्रमणकाल में किसी भी संभावना को नकारा नहीं जा सकता.

चलिए, विधायिका में अति पिछड़ों के आरक्षण की मांग पर पुनः आते हैं. अति पिछड़ों के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से मुखर मछुआरा जाति समूह यानी निषादों की उन मांगों पर एक नजर डालें, जो वे पिछले कई दशकों से उठाते रहे हैं. उनकी प्रमुख मांगे हैं- सभी स्तरों के राजनीतिक सत्ता निकायों में आरक्षण, निषाद जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करना, नौसेना तथा पुलिस के नाविक व गोताखोर दल में आरक्षण, नदी व बालू घाटों, सैरातों आदि का उनके नाम बंदोवस्ती, नदी थानों की स्थापना, मत्स्य सहकारी समितियों तथा उत्पादन इकाइयों में प्राथमिकता. इसके अलावा मांगों की एक लम्बी फेहरिस्त है.

क्या नीतीश पश्चिम बंगाल और असम की तरह निषादों को अनुसूचित जाति में शामिल कर सकते हैं ? अगर अति पिछड़ों की कुछ अविकसित जातियों को इस सूची में डाल दें तो विधायिका में आरक्षण का मार्ग ऐसे ही प्रशस्त हो जाएगा, संविधान संशोधन जैसे बेहद मुश्किल काम की नौबत ही नहीं आएगी. सभी जानते हैं कि ऐसा करना व्यावहारिक नहीं है, उल्टे यह कई दबे-पुराने एवं बहुतेरे नए झमेलों को न्यौता देगा और इससे वंचित समूहों की एकता ही खंडित होगी. गुर्जर प्रश्न पर राजस्थान में जारी गतिरोध इसकी ताजा मिसाल है.

भारत में पॉजिटिव डिस्क्रिमिनेशन (सकारात्मक भेदभाव) के कई बड़े कदम उठाए जा चुके हैं, कुछ क्षेत्रों में निश्चय ही उठाना बाकी है, जिस पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है. लेकिन बदले हालात में, ये कदम उन रूपों में नहीं उठाए जा सकते जैसा कि पिछले कई दशकों का चलन रहा है. बल्कि आज ज्यादा जरूरी है उन कदमों पर सही-सही अमल की गारंटी करना और उससे भी आगे जाकर सकारात्मक कार्यों की पहल करना. बेशक, नीतीश कुमार पॉजिटिव डिस्क्रिमिनेशन को राजनीतिक एजेंडा के रूप में जिन्दा रखें, इसे जिन्दा रखा भी जाना चाहिए. हो सकता है इससे नीतीश कुमार की राजनीतिक कद-काठी सुडौल बना रहे. मगर अति पिछड़ा समूहों को राजनीतिक सत्ता के हाशिए पर बने रहने में शायद ही दिलचस्पी हो, क्योंकि वे स्वयं अपने दमखम पर सत्ता के शीर्ष पर दावा ठोंकने की तैयारी में हैं.

बिहार का इतिहास देखें- वही सामाजिक समूह सत्ता में या सत्ता के शीर्ष पर रहा है, जो राजनीतिक रूप से जागरूक हो गया हो, उनमें थोड़ी-बहुत संपन्नता आ गई हो और उनके बीच एक बौद्धिक वर्ग पैदा ले चुका हो. संख्या बल भी हो तो क्या कहना, और यहां अति पिछड़ों का कोई जोड़ नहीं. हालांकि सापेक्षिक तौर पर एक समरूप समूह के रूप में उनके उभरने में अभी भी बहुत-सी व्यावहारिक राजनीतिक कठिनाइयां हैं.

पिछली सदी के पूर्वाद्ध तक बिहार की राजनीति पर एक ऐसे जाति समूह का वर्चस्व था, जो बिहार की आबादी में एक फीसदी से भी कम था क्योंकि तब दूसरे सामाजिक समूहों में उपर्युक्त्त अर्हताएं नहीं थीं. दूसरे समूहों में जैसे-जैसे जागरूकता, संपन्नता और बौद्धिकता आई, उन्होंने पहले को अपदस्थ कर खुद को सत्तासीन किया. इसी क्रम में ओबीसी की बारी आई और अब ईबीसी बेताबी से इंतजार में हैं. कम से कम इतिहास का गतिक्रम तो यही कहता है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्ता में भागीदारी सामाजिक समूहों में जागरूकता, संपन्नता और बौद्धिकता की प्रक्रिया को अपने तईं बढ़ावा देती है लेकिन यह उसकी मोहताज नहीं. यह कई स्रोतों से आती है. मसलन राजनीतिक-सामाजिक संघर्षों में हिस्सेदारी से, आर्थिक क्षेत्र में उद्यमशीलता से और शिक्षा के प्रसार से.

बिहार का अति पिछड़ा वर्ग राजनीतिक रूप से सबसे गतिशील समूह है और उनमें उद्यमशीलता एवं बौद्धिकता की नई बयार भी धीरे-धीरे दस्तक दे रही है. बिहार के व्यापक दलित-पिछड़े समाज में शिक्षा के प्रति बढ़ता जुनून एक शानदार सूचक है. लालू और नीतीश की पिछली सरकारों ने इस प्रक्रिया को जाने-अनजाने बढ़ावा ही दिया है. आज जरूरी है कि मौजूदा सरकार इस प्रक्रिया को आवेग देने के लिए व्यापक सकारात्मक कार्यक्रम बनाए. संभवतः मछुआरों ने ही सबसे पहले नदी थानों की मांग की थी. बिहार सरकार ने अभी हाल में पांच नदी थाना खोलने की घोषणा की है.

सरकार सकारात्मक कदम उठाते हुए इन थानों में मछुआरा जाति समूहों को प्राथमिकता दे सकती है क्योंकि नदियों को सबसे बेहतर ये ही समूह जानते हैं. इसी प्रकार, आज बिहार को दूसरी हरित क्रांति की हृदयस्थली बनाने और नीली क्रांति की चर्चा जोरों पर है. अति पिछड़ा समूहों की व्यापक भागीदारी के बिना ये दोनों क्रांतियां अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकतीं. नीतीश कुमार अगर उन्हें इन क्रांतियों की आधार शक्त्ति बनाते हैं तो सत्ता के नीचे से ऊपर तक सारे ढांचों पर उनका प्रतिनिधित्व ही नहीं, वर्चस्व भी स्वतः स्थापित हो जाएगा. क्या नीतीश कुमार सचमुच उनकी ताजपोशी के निमित बनेंगे?

कर्पूरी जयंती के अवसर पर मुख्यमंत्री द्वारा इस राजनीतिक मांग का मौजूदा परिप्रेक्ष्य कुछ-कुछ यही है. आज कर्पूरी ठाकुर सबसे अधिक प्रासंगिक हो गए हैं तो इसकी कई कारण हैं. भाजपाई उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी अति पिछड़ों के लिए कई आकर्षक योजनाओं की घोषणाएं की और बिहार भाजपा ने यहां तक कि कर्पूरी ठाकुर को भारतरत्न पुरूस्कार देने की मांग कर डाली. कर्पूरी ठाकुर को जब हम याद कर रहे होते हैं, तो उनके रणनीतिक कौशल और राजनीतिक साहस की भी याद आ जाती है. कर्पूरी ठाकुर ने निहायत प्रतिकूल स्थितियों में व्यावहारिक एजेंडों को बड़ी सूझबूझ से लागू किया था और बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था. राजनीतिक नेतृत्व की खास समय में अपनी मजबूरियां हो सकती हैं लेकिन एक रैडिकल एजेंडा को छोड़कर दूसरा एजेंडा में शिफ्ट करना कहीं से कर्पूरी ठाकुर की फितरत नहीं थी.

मौजूदा हालात में बंटाईदारी सिफारिशों को लागू करने का सबसे ज्यादा लाभ अति पिछड़ों को ही होता. आने वाले दिनों में अति पिछड़ा वर्ग ही यह तय करे कि बटाईदारी सिफारिशें ज्यादा समीचीन तथा व्यावहारिक थीं जो उनके सत्तारोहण में मददगार होतीं या विधायिका में अति पिछड़ों के आरक्षण की मांग?

06.02.2011, 02.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

gaurav kumar [gauravgaya@rediffmail.com] new delhi

 
  महेंद्र सुमन जी द्वारा लिखा गया ये आलेख प्रशंस्नीय एवं विचारनीय है. नितीश के सत्तासीन बिहार में वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक उथल-पुथल को इस आलेख के माध्यम से समझने को तो मिला ही, साथ ही मछुआरों की जाति निषाद को बिहार की राजनितिक पृष्ठभूमि में उभारने का आह्वान करना सराहनीय लगा. उम्मीद है, महेंद्र जी आगे भी सामाजिक गतिविधियों से अवगत कराते रहेंगे.  
   
 

अनीश अंकुर [anish.ankur@gmail.com]

 
  महेंद्र सुमन जी का आलेख काफ़ी पसंद आय़ा.एक नये ढ़ंग का विश्लेषण पढ़ने को मिला ऐसे विचारोत्तेज़क आलेख कम देखने को मिलते हैं. नीतीश कुमार के दुबारा सत्तसीन होने के पश्चात सामाजिक ताकतों के अंदरुनी संबंधों मे आ रही तब्दीली को भी समझ्ने में भी ये टिप्प्णी मदद करती है. उम्मीद है महेंद्र जी ऐसे आलेख और भी लिखते रहेंगे. 
   
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