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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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गांधी, तुम तो रोज मरते हो

बहस

 

गांधी, तुम तो रोज मरते हो

कनक तिवारी


इतिहास में अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि गांधी लोगों की मुसीबत हैं या लोग गांधी की. ताज़ा इतिहास का यह सबसे बड़ा दुनियावी शख्स लगभग सर्वसम्मति से सहस्त्राब्दी का नायक मान लिया गया है. यह मुख्यतः उस अमरीका की पहल पर हुआ है, जहां गांधी कभी नहीं गए थे. उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति की यह सलाह भी अनसुनी कर दी थी कि यदि गांधी चाहें तो अमरीका भारत की आज़ादी को लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मध्यस्थता करने को तैयार है.

गांधी की हत्या

अमरीका में ही मार्टिन लूथर किंग जूनियर हुए जिन्होंने अश्वेतों के पक्ष में प्रसिद्ध मांटगोमरी मार्च निकाला. उन्हें अमरीकियों ने मार डाला और वे दुनिया में अश्वेत गांधी के रूप में मशहूर हो गए. अमरीका का प्रजातांत्रिक ढांचा ऊपरी तौर पर मानव अधिकारों का रक्षक है. वहां न्यायपालिका की श्रेष्ठता असंदिग्ध है. इसके बावजूद अमरीका पूरी दुनिया में पूंजीवाद का सरगना शोषक बना हुआ है. उसके नाम से किसी देश की घिग्गी बंध जाती है. किसी दूसरे को मितली आने लगती है. कोई उससे छुटकारा पाने को मोक्ष के बराबर समझता है. दुनिया में लेकिन भारत वह महान देश है, जिसके प्रधानमंत्री मोहनदास करमचंद गांधी के रास्ते पर चलने की नीयत रखने के बदले अमरीका के मनमोहन बने हुए हैं.

इस वर्ष गांधी के निधन दिवस पर उसी नई दिल्ली में एक कथित जनयुद्ध की शुरुआत की गई, जहां 5 बजकर 17 मिनट पर गांधी को गोडसे की गोलियों ने भून दिया था. गांधी की शहादत का दिन भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बौद्धिकों, नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से प्रतीक के तौर पर चुना गया. उसी नई दिल्ली में आज़ादी के कोई पांच वर्ष पहले से गांधी के योग्यतम शिष्यों नेहरू और पटेल वगैरह ने उनके कर्म को दाखिलदफ्तर कर दिया था.

देश का विभाजन गांधी के विरोध के बावज़ूद हुआ. गांधी के सपनों का भारत कांग्रेस के कर्णधारों ने अपने पैरों तले कुचला लेकिन तोतारटंत की तरह उनके नाम का जाप करना जारी रखा. गांधी का नाम फिर भी भारत के लोकजीवन की झाड़ियों में छिपा रहा. इस वर्ष देश के करीब साठ शहरों में उसकी याद में केंद्र सरकार की भ्रष्टाचार-कथा के विरुद्ध एक जनचुनौती जूलूस, रैली और आमसभा बनकर सड़कें नापती रही.

गांधी तो विदेशी हुकूमत से लड़ा था. आज़ाद भारत में वह कुल जमा पांच छह महीने जीवित रहा. अपने सपनों के कुचले जाने के बावजूद गांधी ने अपने उत्तराधिकारियों का कोई ठोस विरोध नहीं किया. संविधानसम्मत प्रजातंत्र में यदि सरकारों के भ्रष्टाचार और कर्तव्यहीनता को लेकर गांधी के नाम पर आंदोलन किए जाएं तो गांधी से बड़ा कोई अराजक व्यक्ति इतिहास में नहीं दिखाई देता है. वह होता तो कहता कि सरकार के काले कानूनों को मत मानो. सरकार ने मानव अधिकार विरोधी जितने कानून बनाए हैं, उनको खुली चुनौती दो. वह कहता कि अवैध टैक्स देना बंद करो. वह शराब माफिया के खिलाफ अहिंसक आंदोलनों की झड़ी लगा देता. वह आमरण अनशन भी करता कि एक ओर संविधान में शराब बंदी लागू होने की घोषणा हो गई है तो सरकारें अतिरिक्त राजस्व की लालच में देश की पीढ़ियों के जिस्म में तेजाब क्यों भर रही हैं. वह किसी भी हालत में ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र‘ नहीं बनाने देता. वह विरोध करता कि धरती के नीचे जितनी भी खनिज संपदा है उसे एक बारगी खोदकर लुटेरों को नहीं दी जाए.

गांधी के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप यही है कि उसने आदिवासियों के लिए ठोस कुछ नहीं किया. उसने गरीबों को दरिद्रनारायण बनाया. अनुसूचित जाति के बंधुओं को हरिजन कहा. हरिजन यात्राएं निकालीं और ‘हरिजन‘ नाम का पत्र भी. गांधी ने पश्चाताप किया कि देश की सबसे बड़ी आबादी आदिवासी होने के बावजूद गरीबी की रेखा के काफी नीचे है. उसने अपने रचनात्मक कार्यक्रम में अलबत्ता आदिवासी सेवा को जगह दी थी. उसके सबसे प्रिय शिष्य और अब तो संघ परिवार के भी आराध्य सरदार पटेल ने संविधान की उपसमिति का अध्यक्ष होने के बावजूद आदिवासी अधिकारों को अमली जामा नहीं पहनाया. गांधी नक्सल-प्रभावित इलाकों में अहिंसा का बिगुल बजाने के साथ साथ यह सुनिश्चित करता कि देश के खनिज और वनोत्पाद सरकारी बिचौलिएपन के कारण पूंजीपतियों के हत्थे नहीं चढ़ जाएं.

गांधी पुण्यतिथि पर भरे हुए पेट के लोगों द्वारा बौद्धिक जनयुद्ध का आगाज़ बेहद मामूली मकसद के लिए किया गया है. हमारे कुछ समाजचेता केंद्र से यह मांग कर रहे हैं कि उनके द्वारा जन लोकपाल विधेयक को कानूनी जामा पहनाया जाए. उनके तर्क में हांगकांग है, जहां लोकपाल का कारगर कानून बनाने से भ्रष्टाचार का पैराग्राफ काफी नीचे गिर गया है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

PANKAJ [pankajvillage@gmail.com] VARANASI

 
  बेबाक लिखने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद. 
   
 

padm singh [ppsingh8@gmail.com] NCR

 
  घाव जब नासूर बन जाता है तो न जीते बनता है न मरते। ऐसे में एक ही इलाज कारगर है कि उसकी शल्य क्रिया की जाय... और जब सारा सिस्टम बीमार हो तो यह कार्य जनता को अपने हाथों मे लेना होगा, जन लोकपाल की अवधारणा स्पष्ट, पारदर्शी और व्यावहारिकता के करीब है। जन लोकपाल का आना बेहद ज़रूरी है।  
   
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