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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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जैतापुरः अंधेरा फैलाने वाली बिजली

मुद्दा

 

जैतापुरः अंधेरा फैलाने वाली बिजली

आशीष कुमार ‘अंशु’ रत्नागिरी, महाराष्ट्र से लौटकर


जनवरी के पहले सप्ताह की बात है, जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण दावा कर रहे थे-“मैं राज्य में कोई भी ऐसी तकनीक यहां आने नहीं दूंगा, जो महाराष्ट्र की जनता के लिए असुरक्षित हो. हमारे राज्य में पहले से छह रिएक्टर चालू हालत में हैं. यह कहना मुर्खतापूर्ण तर्क है कि परमाणु रिएक्टर असुरक्षित हैं. महाराष्ट्र में परमाणु रिएक्टर के खिलाफ एक सस्ती राजनीति की जा रही है.”

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असल में मुख्यमंत्री की चिंता में महाराष्ट्र और महाराष्ट्र की जनता से कहीं अधिक जैतापुर परमाणु संयंत्र परियोजना शामिल था, जिसके पक्ष में वे एक माहौल बनाने की कोशिश में अपना पसीना बहा रहे थे. मुख्यमंत्री की यह कोई पहली और आखरी कोशिश नहीं थी. पिछले कुछ समय से कोंकण में जैतापुर परमाणु संयंत्र परियोजना को लेकर इलाके का माहौल गरमा रहा है और मुख्यमंत्री समेत कई राजनेता इसी गरम माहौल में अपने-अपने तवे पर राजनीतिक रोटी सेंकने में जुटे हुये हैं.

परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार जहां इसे विकास से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं इस परियोजना के खिलाफ खड़े लोगों का स्पष्ट मानना है कि यह परियोजना कोंकण के विनाश की कहानी की शुरुवात करने वाली साबित होगी.

9900 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के काम को छह इकाइयों में फ्रांसिसी कंपनी अरेवा के हाथों पूरा होना है. योजना के अनुसार पहले चरण में प्रस्तावित छह ईकाइयों में 1650-1650 मेगावाट वाले दो इकाइयों का काम पूरा होगा. यह दोनों ईकाइयां रत्नागिरी जिले के मड़वन में होंगी. योजना के अनुसार इस परियोजना के पहले चरण को 2013-14 तक पूरा होना है और बची चार ईकाइयों का काम भी 2018 तक पूरा कर लिया जाना है.

वर्तमान में देश में कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की भागीदारी 2.90 प्रतिशत की है. देश में इसे 2020 तक बढ़ाकर 6 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है और 2030 तक इसे 13 प्रतिशत की भागीदारी में बदल दिया जाएगा. इसके लिए मड़वन, जैतापुर की तरह कई परियोजनाओं की देश को जरुरत होगी. लेकिन माड़वन में बिजली और विकास के नाम पर जो कुछ घट रहा है, उससे इलाके के हज़ारों लोग अपना जीवन अंधेरे में डूब जाने की आशंका में गुजार रहे हैं.

माड़वन में लगने वाली परमाणु ऊर्जा की ईकाइ में पांच गांव माड़वन, मीठागवाने, करेल, वारिलवाडा और नीवेली की 938 हेक्टेयर जमीन जानी है. लेकिन चर्चा में माड़वन (जैतापुर) गांव का नाम ही बार-बार आ रहा है. इसकी पहली वजह यह है कि छह ईकाइयों में पूरे हो रहे इस परियोजना की पहली दो ईकाइयों का काम माड़वन में ही पूरा होना है. दूसरी वजह जनहित सेवा समिति के प्रवीण परशुराम गवाणकर बताते हैं, “परियोजना में जाने वाले कुल 938 हेक्टेयर जमीन में 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है.”

माड़वन को रत्नागिरी जिले में स्वतंत्रता सेनानियों के गांव के रुप में जाना जाता है. इस गांव में आधे दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों का परिवार रहता है. अंग्रेजों से लड़ने वालों के परिवारो को अब अपनी सरकार से लड़ना पड़ रहा है. गांव वाले मानते हैं कि उनके लिए अपनी सरकार अंग्रेजों से भी अधिक क्रूर साबित हो रही है. कमसे कम अंग्रेजों ने इन्हें अपने घर से तो बेदखल नहीं किया था, इनकी जमीन से तो इन्हें नहीं हटाया था!

लेकिन माड़वन में केवल जमीन जा रही हो, ऐसा नहीं है. परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के लिए चुनी गई यह जमीन पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है. समुद्र का किनारा, 150 किस्म के पंक्षी, 300 किस्म की वनस्पतियां. खास बात यह है कि इनमें कई वनस्पतियों और पंक्षियों की किस्म दुर्लभ है. समुद्र के इस मनोरम तटीय क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक परमाणु ऊर्जा संबंधित प्रकल्प प्रस्तावित हैं. जबकि रत्नागिरी को राज्य सरकार ने उद्यानिकी जिला घोषित किया है और इसका पड़ोसी जिला सिंधदुर्ग गोवा से भी लगा हुआ होने के कारण पर्यटकों की खास पसंद रहा है. बड़ी संख्या में गोवा आने वाले पर्यटक सिंधदुर्ग का रुख करते हैं.

पर्यावरणविद इस बात से अचंभित है कि जिस रत्नागिरी को दुनिया भर में जैव विविधता के हॉट स्पॉट के तौर पर देखा जाता है, उस जिले के लिए परमाणु ऊर्जा संबंधित परियोजना के करार पर उस साल हस्ताक्षर होता है, जब पूरी दुनिया “अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष” का उत्सव मना रही है. 2010 को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष के रुप में मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने बर्लिन में की थी.

साखरी नाटे मछुआरों की बस्ती है. वहां मिले मच्छीमार कृति समिति के उपाध्यक्ष, अमजद बोरकर. वे और उनके साथी समुद्र को लेकर अपने रागात्मक रिश्तों की बात करते-करते भावुक हो जाते हैं.

बोरकर कहते हैं- “समुद्र के साथ हमारा रिश्ता पीढ़ियों का है. हमारे पूर्वजों के समय से यह समुद्र हमें रोटी दे रहा है. सरकार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प को कोंकण और महाराष्ट्र का विकास कहकर प्रचारित कर रही है. लेकिन यह विकास का नहीं, कोंकण की बर्बादी का समझौता है.”
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