जैतापुरः अंधेरा फैलाने वाली बिजली
मुद्दा
जैतापुरः अंधेरा फैलाने वाली बिजली
आशीष
कुमार ‘अंशु’
रत्नागिरी, महाराष्ट्र से लौटकर
जनवरी के पहले सप्ताह की बात है, जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण
दावा कर रहे थे-“मैं राज्य में कोई भी ऐसी तकनीक यहां आने नहीं दूंगा, जो
महाराष्ट्र की जनता के लिए असुरक्षित हो. हमारे राज्य में पहले से छह रिएक्टर चालू
हालत में हैं. यह कहना मुर्खतापूर्ण तर्क है कि परमाणु रिएक्टर असुरक्षित हैं.
महाराष्ट्र में परमाणु रिएक्टर के खिलाफ एक सस्ती राजनीति की जा रही है.”
असल में मुख्यमंत्री की चिंता में महाराष्ट्र और महाराष्ट्र की जनता से कहीं अधिक
जैतापुर परमाणु संयंत्र परियोजना शामिल था, जिसके पक्ष में वे एक माहौल बनाने की
कोशिश में अपना पसीना बहा रहे थे. मुख्यमंत्री की यह कोई पहली और आखरी कोशिश नहीं
थी. पिछले कुछ समय से कोंकण में जैतापुर परमाणु संयंत्र परियोजना को लेकर इलाके का
माहौल गरमा रहा है और मुख्यमंत्री समेत कई राजनेता इसी गरम माहौल में अपने-अपने तवे
पर राजनीतिक रोटी सेंकने में जुटे हुये हैं.
परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार जहां इसे विकास से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं इस
परियोजना के खिलाफ खड़े लोगों का स्पष्ट मानना है कि यह परियोजना कोंकण के विनाश की
कहानी की शुरुवात करने वाली साबित होगी.
9900 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के काम को छह इकाइयों में फ्रांसिसी कंपनी
अरेवा के हाथों पूरा होना है. योजना के अनुसार पहले चरण में प्रस्तावित छह ईकाइयों
में 1650-1650 मेगावाट वाले दो इकाइयों का काम पूरा होगा. यह दोनों ईकाइयां
रत्नागिरी जिले के मड़वन में होंगी. योजना के अनुसार इस परियोजना के पहले चरण को
2013-14 तक पूरा होना है और बची चार ईकाइयों का काम भी 2018 तक पूरा कर लिया जाना
है.
वर्तमान में देश में कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की भागीदारी 2.90 प्रतिशत की
है. देश में इसे 2020 तक बढ़ाकर 6 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है और 2030 तक इसे 13
प्रतिशत की भागीदारी में बदल दिया जाएगा. इसके लिए मड़वन, जैतापुर की तरह कई
परियोजनाओं की देश को जरुरत होगी. लेकिन माड़वन में बिजली और विकास के नाम पर जो
कुछ घट रहा है, उससे इलाके के हज़ारों लोग अपना जीवन अंधेरे में डूब जाने की आशंका
में गुजार रहे हैं.
माड़वन में लगने वाली परमाणु ऊर्जा की ईकाइ में पांच गांव माड़वन, मीठागवाने, करेल,
वारिलवाडा और नीवेली की 938 हेक्टेयर जमीन जानी है. लेकिन चर्चा में माड़वन
(जैतापुर) गांव का नाम ही बार-बार आ रहा है. इसकी पहली वजह यह है कि छह ईकाइयों में
पूरे हो रहे इस परियोजना की पहली दो ईकाइयों का काम माड़वन में ही पूरा होना है.
दूसरी वजह जनहित सेवा समिति के प्रवीण परशुराम गवाणकर बताते हैं, “परियोजना में
जाने वाले कुल 938 हेक्टेयर जमीन में 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है.”
माड़वन को रत्नागिरी जिले में स्वतंत्रता सेनानियों के गांव के रुप में जाना जाता
है. इस गांव में आधे दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों का परिवार रहता है.
अंग्रेजों से लड़ने वालों के परिवारो को अब अपनी सरकार से लड़ना पड़ रहा है. गांव वाले
मानते हैं कि उनके लिए अपनी सरकार अंग्रेजों से भी अधिक क्रूर साबित हो रही है.
कमसे कम अंग्रेजों ने इन्हें अपने घर से तो बेदखल नहीं किया था, इनकी जमीन से तो
इन्हें नहीं हटाया था!
लेकिन माड़वन में केवल जमीन जा रही हो, ऐसा नहीं है. परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के लिए
चुनी गई यह जमीन पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है. समुद्र का किनारा, 150
किस्म के पंक्षी, 300 किस्म की वनस्पतियां. खास बात यह है कि इनमें कई वनस्पतियों
और पंक्षियों की किस्म दुर्लभ है. समुद्र के इस मनोरम तटीय क्षेत्र में एक दर्जन से
अधिक परमाणु ऊर्जा संबंधित प्रकल्प प्रस्तावित हैं. जबकि रत्नागिरी को राज्य सरकार
ने उद्यानिकी जिला घोषित किया है और इसका पड़ोसी जिला सिंधदुर्ग गोवा से भी लगा हुआ
होने के कारण पर्यटकों की खास पसंद रहा है. बड़ी संख्या में गोवा आने वाले पर्यटक
सिंधदुर्ग का रुख करते हैं.
पर्यावरणविद इस बात से अचंभित है कि जिस रत्नागिरी को दुनिया भर में जैव विविधता के
हॉट स्पॉट के तौर पर देखा जाता है, उस जिले के लिए परमाणु ऊर्जा संबंधित परियोजना
के करार पर उस साल हस्ताक्षर होता है, जब पूरी दुनिया “अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता
वर्ष” का उत्सव मना रही है. 2010 को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष के रुप में
मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने बर्लिन में की थी.
साखरी नाटे मछुआरों की बस्ती है. वहां मिले मच्छीमार कृति समिति के उपाध्यक्ष, अमजद
बोरकर. वे और उनके साथी समुद्र को लेकर अपने रागात्मक रिश्तों की बात करते-करते
भावुक हो जाते हैं.
बोरकर कहते हैं- “समुद्र के साथ हमारा रिश्ता पीढ़ियों का है. हमारे पूर्वजों के समय
से यह समुद्र हमें रोटी दे रहा है. सरकार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प को कोंकण और
महाराष्ट्र का विकास कहकर प्रचारित कर रही है. लेकिन यह विकास का नहीं, कोंकण की
बर्बादी का समझौता है.”
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जनहित सेवा समिति के संयोजक प्रवीण गवाणकर से पिछले महीने ही उनके घर पर माड़वन में
मुलाकात हुई थी. उसी वक्त उन्हें आशंका थी कि पुलिस उन्हें ले जाएगी. वजह साफ है,
वे दो लाख करोड़ के जैतापुर परमाणु ऊर्जा प्रकल्प का विरोध जो कर रहे हैं.
हाल ही में जब पावस के एक मराठी पत्रकार प्रशांत हरचेकर से फोन पर बात हो रही थी तो
उन्होंने बताया कि प्रवीण को पुलिस ने सात दिनों के न्यायिक हिरासत में ले लिया है.
हरचेकर ने ही बताया कि प्रवीण पर धारा 317, 395, 353, 341, 427, 143, 03 और 07 लगाई
गई है.
प्रवीण के गिरफ्तारी के ठीक बाद माड़वन में महाराष्ट्र के एक बड़े नेता अपने समर्थकों
के साथ एक बड़ा ‘रेला’ करने वाले हैं. उम्मीद है, यह लेख पाठकों तक पहुंचने से पहले
यह खबर आ चुकी होगी कि माड़वन के लोग परियोजना के साथ हैं. जबकि रेला में शामिल
लोगों का काफिला रत्नागिरी, चिपलून और आस पास के क्षेत्रों से इकट्ठा किए जाने की
योजना है. इसके लिये खुद को जैतापुर वाला बताकर कुछ लोग मीडिया में आकर गलत बयानी
भी कर रहे हैं.
अमजद बोरकर के अनुसार महाराष्ट्र की सरकार प्रकल्प के नाम पर गंदी राजनीति कर रही
है. वे बताते हैं कि किस तरह कोई डॉ. जयेन्द्र पुरुलेकर एक मराठी चैनल पर आकर और
खुद को जैतापुरवाला बताकर परियोजना के पक्ष में बोलते रहे, जबकि उनका जैतापुर से
कोई ताल्लुक नहीं है.
बोरकर कहते हैं, “हम साखरी नाटे में रहने वाले लोगों ने मिलकर पुरलेकर के झूठ के
खिलाफ उसका पुतला जलाया.”
टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंस की एक रिपोट के अनुसार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के
लिए सरकार ने जो स्थान तय किया है, वह बिल्कुल उपयुक्त नहीं है. टिस की यह रिपोर्ट
महेश कांबले ने इस इलाके के 120 गांवों में जाकर लोगों से मिलकर तैयार की है.
कांबले के अनुसार इस परियोजना का स्थानीय और पर्यावरणीय परिवेश पर बहुत बुरा प्रभाव
पड़ेगा. रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरकार तथ्य को तोड़ मरोड़ रही है और माड़वन के उपजाऊ
जमीन को बंजर बनाकर कर पेश कर रही है.
जैतापुर के जिस 626.52 हेक्टेयर जमीन को बंजर बताकर दिखाया जा रहा है, वहां के
किसान उस जमीन पर धान, फल, सब्जी लगा रहे हैं. वर्ष 2007 में बाढ़ में सरकार ने
राजापुर के किसानों को आम की फसल खराब होने पर एक करोड़ सैंतीस लाख सात हजार रुपए का
मुआवजा दिया था.
पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता विवेके भिड़े से जब बातचीत हुई तो उनका कहना था
कि “कोंकण की जमीन पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है. यहां दो सौ पचहत्तर
किलोमीटर के क्षेत्रफल में जिस तरह 17 परियोजनाओं पर एक साथ काम हो रहा है, इससे यह
बात साफ हो गई है कि कोंकण पर किसी की बुरी नजर लग गई.”
भिड़े बताते हैं कि प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित होने वालों की संख्या भले ही दस हजार
के आस पास नजर आ रही हो लेकिन इससे वास्तव में प्रभावित होने वालों की संख्या लाखों
में होगी क्योंकि जैतापुर परियोजना से पूरा कोंकण प्रभावित होगा.
अर्थक्वेक हजार्ड जोनिंग ऑफ इंडिया के अनुसार जैतापुर जोन तीन में आता है, जो
भूकम्प के लिहाज से रिस्क जोन माना जाएगा. ऐसे इलाके में परमाणु से जुड़े किसी
प्रकल्प को शुरु करना कम खतरे की बात नहीं है. स्थानीय लोगों के लिए रेडिएशन का
मामला भी एक बड़ा मुद्दा है. परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के आस पास जो लोग होंगे, उनके
स्वास्थ पर इसका दुष्प्रभाव एक बड़ी चिन्ता बना हुआ है.
गांव वाले पूछते हैं, यदि यह प्रकल्प इतना सुरक्षित है तो यहां काम करने वाले
अधिकारियों के लिए आवास की व्यवस्था प्रकल्प से पांच-सात किलोमीटर दूर क्यों
प्रस्तावित है? उनके रहने के लिए आवास परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के परिसर में क्यों
नहीं किया जा रहा?
माड़वन जैतापुर में रहने वाले जानना चाहते हैं, यदि फ्रेंच कंपनी अरेवा उनके गांव आ
रही तो यहां वह कोई समाज सेवा करने तो नहीं आ रही है. वह एक निजी कंपनी है, जो यहां
कमाई के इरादे से आएगी और कोंकण की जमीन पर पहली बार वह अपने ईपीआर तकनीक की जांच
भी कर पाएगी. जिसे पहले कहीं जांचा-परखा नहीं गया है. क्या अरेवा भारत को परमाणु
ऊर्जा प्रकल्प के नाम पर अपनी प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है?
लेकिन राज्य सरकार के लिये यह कोई मुद्दा ही नहीं है. राज्य के मुख्यमंत्री
पृथ्वीराज च्वहाण कहते हैं कि स्थानीय लोग जमीन देने के लिए राजी हैं. और जब वे खुद
मुम्बई में इस मुद्दे पर बातचीत के लिए माड़वन के लोगों को बुलाते हैं तो गांव वाले
जाने से साफ इंकार कर देते हैं. अब इसका क्या अर्थ निकाल जाए?
गांव वालों का पक्ष साफ है कि बातचीत तो उस समय की जाये, जब हमें भी अपनी बात कहने
का मौका मिले और उम्मीद हो कि हमने अपनी बात से मुख्यमंत्रीजी को विश्वास में ले
लिया तो परियोजना रुक जाएगी. ऐसी जगह बात करने का क्या फायदा जिसमें माड़वन में
प्रकल्प लगाने का फैसला पहले से सुरक्षित है ?
11.02.2011, 00.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित