सांप सीढ़ी का खेल
मुद्दा
सांप सीढ़ी का खेल
बिनोद रिंगानिया
गुवाहाटी से
तालस्ताय ने अपने उपन्यास "वार एंड पीस' में एक लंबा अध्याय इस बात पर लिखा है
कि समाज में घटनाएं कैसे घटती हैं? अल्फा के साथ वार्ता की प्रक्रिया जिस तरह
आगे चल निकली है, उसे देखते हुए लगता है कि घटनाओं का घटना सांप-सीढ़ी के खेल की
तरह होता है. सांप-सीढ़ी के खेल में आपकी गोटी को शून्य से बाहर निकलने के लिए
छह का अंक आने की जरूरत होती है. छह का अंक आया, आपकी गोटी बाहर निकली और इसके
ठीक बाद का अंक यदि आपको फिर से सांप के मुंह पर ले जाता है तो आप वापस शून्य
पर पहुंच जाते हैं. इसलिए सही घटनाओं का घटना और उनके सिलसिले का चलते जाना
जरूरी है. तभी आप सांपों के मुंह से बचते हुए 100 के अंक तक पहुंच पाते हैं.
अल्फा-सरकार वार्ता पर हम नजर डालें तो देखेंगे कि संगठन में जो लोग परेश बरुवा
की तानाशाही से परेशान थे, वे 2002 से ही वार्ता का कोई रास्ता तलाश रहे थे.
लेकिन मुख्य कमांडर परेश बरुवा था. चाबी उसके हाथ में थी. वह स्वाधीन असम से कम
कुछ सोचने के लिए तैयार नहीं था, जबकि बाकी लोगों को यह साफ नजर आ रहा था कि
संगठन तो आत्महत्या की ओर बढ़ ही रहा है, यह अपने साथ सैकड़ों लोगों को भी मौत के
मुंह में ठेल रहा है. लेकिन ये सदस्य गोली खाने के डर से कुछ बोल नहीं पा रहे
थे.
स्थिति में निर्णायक बदलाव आया बांग्लादेश में शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनते
ही. शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनने के बाद अल्फा नेताओं का यह विश्वास और
मजबूत होता गया कि अब स्वाधीन असम और भी असंभव हो गया है. लेकिन उन्हें परेश
बरुवा को समझाना भारी पड़ रहा था. 2009 के अंत में जब परेश बरुवा को छोड़कर अल्फा
के बाकी सभी बड़े नेताओं को बांग्लादेश में पकड़ लिया गया तो उनके लिए जैसे वार्ता
का रास्ता ही खुल गया. भारतीय जेल में और जेल के बाहर सरकारी सुरक्षा में ये
नेता परेश बरुवा के संभावित हमलों से सुरक्षित थे. अब वे अपने मन की बात कह सकते
थे.
जैसा कि हमने कहा, गोटी को शून्य से निकालने के लिए पासे पर छह का अंक आना जरूरी
है, लेकिन उसके बाद का अंक आपको सीढ़ी पर न पहुंचाकर सांप के मुंह पर पहुंचा दे
तो आप वापस शून्य पर आ सकते हैं. असम का सौभाग्य रहा कि उग्रवादी नेताओं के
बांग्लादेश में पकड़े जाने के कुछ ही महीनों बाद एक नागरिक अधिवेशन आयोजित करने
के लिए राज्य के बुद्धिजीवियों ने पहल की. इस अधिवेशन में राज्य के लगभग हर
छोटे-बड़े संगठन ने भाग लिया, यहां तक कि राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों ने
भी. इस अधिवेशन से अल्फा नेताओं को यह कहने का आधार मिल गया कि असम की जनता
हिंसक संघर्ष का किसी भी कीमत पर खात्मा चाहती है.
इधर केंद्र में बैठे गृह मंत्री और असम के मुख्यमंत्री यदि इतिहास द्वारा दिए
गए इस मौके को खो देते, तो गोटी वापस सांप के मुंह में चली जाती. लेकिन गृह
मंत्री चिदंबरम थे, शिवराज पाटिल नहीं. उन्होंने एक रिटायर्ड खुफिया अधिकारी को
वार्ता की पृष्ठभूमि बनाने का दायित्व देकर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया.
बैठकों के अवसर
मौका देखिए, कि 2011 के मार्च-अप्रैल में असम में विधानसभा चुनाव होने हैं.
मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने देख लिया कि चुनाव से पहले-पहले वे यदि वार्ता की
शुरुआत करवा देते हैं तो यह उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाएगी. इसलिए
हालदार नामक पूर्व खुफिया अधिकारी की नियुक्ति के बाद अच्छे अंक आते गए और गोटी
तेजी से आगे बढ़ने लगी. सारे अल्फा नेताओं को एक ही जेल में लाकर उन्हें आपस में
सलाह-मशविरा का मौका दिया गया, फिर तेजी के साथ उन्हें एक-एक कर जमानत पर रिहा
किया गया. बांग्लादेश में रुके हुए हथियारबंद उग्रवादियों को चुपचाप पुलिस
संरक्षण में असम आने का मौका दिया गया. उन्हें गुप्त स्थानों (इतने भी गुप्त नहीं
क्योंकि मीडिया के लोगों को प्रायः मालूम है कि किस जगह ये लोग ठहरे हुए हैं.
हालांकि इन्हें मीडिया से मिलने-जुलने की बिल्कुल इजाजत नहीं) पर ठहराया गया.
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