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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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सोनिया जी, कुछ करिए

बात पते की

 

सोनिया जी, कुछ करिए

कनक तिवारी


समाज के किसी आंदोलन या उसकी सत्ता का कोई न कोई केन्द्र हर वक्त होता है. यह वैचारिक या सत्ता संतुलन का नाभि-केन्द्र समझा जाता है. भारतीय स्वतंत्रता के आंदोलन में यह नाभि-केन्द्र मोहनदास करमचंद गांधी था. यद्यपि उनके साथ बहुत अधिक देशभक्तों का सहयोग भी था. उसी दौरान हिन्दुत्व के नाभि-केन्द्र विनायक दामोदर सावरकर थे और मुसलमानों के मोहम्मद अली ज़िन्ना तथा दलितों के डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर.

manmohan-sonia


आज़ादी के बाद जन आंदोलनों की भारत में भूमिका खत्म हो गई. देश और राजनीतिज्ञों को यह गुमान था कि लोकतंत्र की संस्थाएं ही जन आंदोलन का पर्याय हैं. इसलिए भारत की सरकार को ही लोकतांत्रिक आंदोलन समझ लिया गया. इसलिए क्रमशः हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जन आकांक्षाओं के नाभि-केन्द्रों की तरह इतिहास में समझे गए.

बाकी प्रधानमंत्रियों को अलग-अलग कारणों से मैनेजमेन्ट का प्रतीक ही माना गया. उनमें जन नेताओं की भूमिका उकेरी नहीं जा सकी. डॉक्टर मनमोहन सिंह भी इसी तरह के प्रधानमंत्री हैं. भले ही वे अपने दूसरे पांच सालाना कार्यकाल में हैं.

भारतीय लोकतंत्र का भविष्य किताबी उल्लेखों और नेताओं के चोवलों में भले उज्जवल कहा जाता हो लेकिन वह संदिग्ध और संगीन होता चला जा रहा है. अपनी सारी असमर्थताओं और अनिर्णयों के बावज़ूद जवाहरलाल नेहरू एक बड़े लोकतांत्रिक नेता थे. उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण नहीं किया.

इंदिरा गांधी ने उनके बरक्स ऐसी संस्थाओं को बार-बार गड्डमगड्ड किया. उनके लिए संसद, न्यायपालिका और अपनी खुद की पार्टी को अपनी महत्वाकांक्षाओं और अपने एजेण्डा के लिए तहस-नहस करने में भी कोताही नहीं की. उन्होंने राष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर भी खतरा उठाया. लेकिन बाद के इतिहास में इंदिरा गांधी ने सिद्ध किया कि उनके कुछ निर्णय पार्टी के बहुमत के मुकाबले सही थे.

अपनी मां की कुर्बानी से प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी युवकों के सत्ता नशीन नाभि-केन्द्र बने रहे. उन्होंने दो ऐतिहासिक सच कहे. एक यह कि नई दिल्ली से गांव तक पहुंचने वाले रुपए में से 15-20 पैसे ही पहुंच पाते हैं. दूसरा सच ये कहा कि सत्ता की व्यवस्था में दलाल ही दलाल भरे पड़े हैं उनका सफाया होना चाहिए.

शास्त्री जी ने पारदर्शी ईमानदारी के कीर्तिमान स्थापित किए. अटल बिहारी वाजपेयी ने भी गठबंधन की राजनीति के अलग तरह के प्रतिमान गढ़े. लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री के पद का अवमूल्यन नहीं किया. इंदिरा गांधी को बांग्लादेश बनने के कारण दुर्गा का अवतार कहना और गुजरात के दंगों के कारण नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह देना बाजपेयी ही संघ परिवार में रहकर कर सकते थे.

कोई माने या न माने. यह लगभग पहली बार हुआ है जब पिछले छह सात वर्षों से सत्ता का नाभि-केन्द्र कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी में है, प्रधानमंत्री में कतई नहीं. सोनिया गांधी मूलतः विदेशी हैं. मूलतः राजनीतिक परिवार से नहीं हैं. राजनीतिक परिवार में ब्याही गई हैं. उनके पति भाई और माता की दुर्घटनाग्रस्त मौतों के कारण अनिच्छापूर्वक राजनीति में आए. सोनिया गांधी को भारतीय बुद्धिजीवियों और आलोचकों की निन्दा अभियान को लगातार सहना पड़ा है.

इन सब विपरीत स्थितियों के बावजूद अपनी सहनशीलता, कूटनीतिक बुद्धि और धैर्य के कारण सोनिया गांधी ने एक विदेशी जीवन पद्धति में वह मर्तबा हासिल कर लिया है जो विश्व इतिहास में किसी को नसीब नहीं है. जो लोग उनके हिन्दी के उच्चारण की हंसी उड़ाते हैं. क्या वे खुद अन्य किसी विदेशी भाषा में (अंगरेज़ी को छोड़कर जो भारतीय संविधान के अनुसार हमारे देश की स्वीकृत राजभाषा है) गुफ्तगू कर सकते हैं.

सोनिया गांधी ने जब प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया तो वे लोकप्रियता के सबसे ऊंचे सोपान पर जाकर खड़ी हो गईं. उन्होंने देश को एक तथाकथित ईमानदार अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री दिया. उनकी उम्मीद थी कि एक विशेषज्ञ प्रधानमंत्री होने से भारतीय इतिहास को समझना होगा कि अर्थशास्त्र की राजनीति शास्त्र पर प्राथमिकता है.

यह अजीब बात है कि डॉक्टर मनमोहन सिंह वित्त मंत्री के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के सबसे विश्वस्त थे जिनकी सोनिया गांधी से कोई निकटता स्वीकृत नहीं है. इसमें कहां शक है कि प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह एक गैर राजनीतिज्ञ हैं जिन्हें अपनी मातृ संस्था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास, संस्कार और योगदान से कुछ लेना देना नहीं है. उनके लिए संसद एक औपचारिक संगठन है जो उनकी चुनी हुई वैचारिक टीम के प्रस्तावों पर मुहर लगाए. कांग्रेस संगठन के वरिष्ठ नेताओं से संपर्कहीनता के कारण प्रधानमंत्री के साथ विचार विमर्श की अफवाहें तक नहीं फैलतीं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

NK Thakur [] RAJNANDGAON C.G.

 
  अरे भाई साहब,जो कुछ हो रहा है,सोनिया ही कर रही हैं. आगे भी जो होने वाला है. वो भी वही करेंगी. मेरी समझ से परे है कि सोनिया से देश हित की कुछ भी आशा की जाए. उनका मक़सद है यह सिद्ध करना कि सारे हिंदुस्तानी बेवकूफ़ हैं और इसलिये राहुल को प्रधानमंत्री बनाना चाहिये, और इसका फायदा गठबंधन के सब लोग उठा रहे हैं. सोनिया भी किसी को मना नहीं कर सकतीं. अब ऐसी परिस्थितियों का निर्माण किया जायेगा कि राहुल प्रधानमंत्री बने और घोटालों का रहस्य सदैव छिपा रहे.  
   
 

devesh [deveshrisk@gmail.com] bilaspur

 
  जिस देश के प्रधानमंत्री मंत्री अपनी कमजोरी और सोनिया परायणता को और गठबंधन धर्म के साथ की गई ईमानदारी, जिससे भले ही देश के साथ गद्दारी हुई हो, उसे छिपाने के लिए मजबुरी की दुहाई दे रहे हों, हम उनसे उम्मीद भी क्या कर सकते हैं. 
   
 

दीपक [deepakrajim@gmail.com] आबूधाबी

 
  आप का कहना सही है ...यह विशेषज्ञ प्रधानमंत्री काफ़ी कमजोर दिखता है, इससे ना महंगाई कंट्रोल होती है ना ही कुछ और !! 
   
 

ashish [ashish.pathak74@gmail.com] ratlam

 
  इस देश में जब तक कांग्रेस है तब तक कुछ भी नहीं हो सकता..उम्मीद तो किसी से भी नहीं है लेकिन बाबा रामदेव ने एक लौ जलाई है. पता नहीं, वो भी कुछ अकेले कर पाएंगे या नहीं, क्योंकि इन भ्रष्टों में उन की कितनी चलेगी राम जाने.लेकिन इस लेख से ये तो पता चला है कि आज भी देश में दर्द बहुत है. 
   
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