सोनिया जी, कुछ करिए
बात पते की
सोनिया जी, कुछ करिए
कनक तिवारी
समाज के किसी आंदोलन या उसकी सत्ता का कोई न कोई केन्द्र हर वक्त होता है. यह
वैचारिक या सत्ता संतुलन का नाभि-केन्द्र समझा जाता है. भारतीय स्वतंत्रता के
आंदोलन में यह नाभि-केन्द्र मोहनदास करमचंद गांधी था. यद्यपि उनके साथ बहुत अधिक
देशभक्तों का सहयोग भी था. उसी दौरान हिन्दुत्व के नाभि-केन्द्र विनायक दामोदर
सावरकर थे और मुसलमानों के मोहम्मद अली ज़िन्ना तथा दलितों के डॉक्टर भीमराव
अम्बेडकर.
आज़ादी के बाद जन आंदोलनों की भारत में भूमिका खत्म हो गई. देश और राजनीतिज्ञों को
यह गुमान था कि लोकतंत्र की संस्थाएं ही जन आंदोलन का पर्याय हैं. इसलिए भारत की
सरकार को ही लोकतांत्रिक आंदोलन समझ लिया गया. इसलिए क्रमशः हुए प्रधानमंत्री
जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और अटल बिहारी
वाजपेयी जन आकांक्षाओं के नाभि-केन्द्रों की तरह इतिहास में समझे गए.
बाकी प्रधानमंत्रियों को अलग-अलग कारणों से मैनेजमेन्ट का प्रतीक ही माना गया. उनमें
जन नेताओं की भूमिका उकेरी नहीं जा सकी. डॉक्टर मनमोहन सिंह भी इसी तरह के
प्रधानमंत्री हैं. भले ही वे अपने दूसरे पांच सालाना कार्यकाल में हैं.
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य किताबी उल्लेखों और नेताओं के चोवलों में भले उज्जवल कहा
जाता हो लेकिन वह संदिग्ध और संगीन होता चला जा रहा है. अपनी सारी असमर्थताओं और
अनिर्णयों के बावज़ूद जवाहरलाल नेहरू एक बड़े लोकतांत्रिक नेता थे. उन्होंने
लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण नहीं किया.
इंदिरा गांधी ने उनके बरक्स ऐसी संस्थाओं को बार-बार गड्डमगड्ड किया. उनके लिए संसद,
न्यायपालिका और अपनी खुद की पार्टी को अपनी महत्वाकांक्षाओं और अपने एजेण्डा के लिए
तहस-नहस करने में भी कोताही नहीं की. उन्होंने राष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर भी
खतरा उठाया. लेकिन बाद के इतिहास में इंदिरा गांधी ने सिद्ध किया कि उनके कुछ
निर्णय पार्टी के बहुमत के मुकाबले सही थे.
अपनी मां की कुर्बानी से प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी युवकों के सत्ता नशीन
नाभि-केन्द्र बने रहे. उन्होंने दो ऐतिहासिक सच कहे. एक यह कि नई दिल्ली से गांव तक
पहुंचने वाले रुपए में से 15-20 पैसे ही पहुंच पाते हैं. दूसरा सच ये कहा कि सत्ता
की व्यवस्था में दलाल ही दलाल भरे पड़े हैं उनका सफाया होना चाहिए.
शास्त्री जी ने पारदर्शी ईमानदारी के कीर्तिमान स्थापित किए. अटल बिहारी वाजपेयी ने
भी गठबंधन की राजनीति के अलग तरह के प्रतिमान गढ़े. लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री के पद
का अवमूल्यन नहीं किया. इंदिरा गांधी को बांग्लादेश बनने के कारण दुर्गा का अवतार
कहना और गुजरात के दंगों के कारण नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह
देना बाजपेयी ही संघ परिवार में रहकर कर सकते थे.
कोई माने या न माने. यह लगभग पहली बार हुआ है जब पिछले छह सात वर्षों से सत्ता का
नाभि-केन्द्र कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी में है, प्रधानमंत्री में कतई नहीं.
सोनिया गांधी मूलतः विदेशी हैं. मूलतः राजनीतिक परिवार से नहीं हैं. राजनीतिक
परिवार में ब्याही गई हैं. उनके पति भाई और माता की दुर्घटनाग्रस्त मौतों के कारण
अनिच्छापूर्वक राजनीति में आए. सोनिया गांधी को भारतीय बुद्धिजीवियों और आलोचकों की
निन्दा अभियान को लगातार सहना पड़ा है.
इन सब विपरीत स्थितियों के बावजूद अपनी सहनशीलता, कूटनीतिक बुद्धि और धैर्य के कारण
सोनिया गांधी ने एक विदेशी जीवन पद्धति में वह मर्तबा हासिल कर लिया है जो विश्व
इतिहास में किसी को नसीब नहीं है. जो लोग उनके हिन्दी के उच्चारण की हंसी उड़ाते
हैं. क्या वे खुद अन्य किसी विदेशी भाषा में (अंगरेज़ी को छोड़कर जो भारतीय संविधान
के अनुसार हमारे देश की स्वीकृत राजभाषा है) गुफ्तगू कर सकते हैं.
सोनिया गांधी ने जब प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया तो वे लोकप्रियता के सबसे ऊंचे
सोपान पर जाकर खड़ी हो गईं. उन्होंने देश को एक तथाकथित ईमानदार अर्थशास्त्री
प्रधानमंत्री दिया. उनकी उम्मीद थी कि एक विशेषज्ञ प्रधानमंत्री होने से भारतीय
इतिहास को समझना होगा कि अर्थशास्त्र की राजनीति शास्त्र पर प्राथमिकता है.
यह अजीब बात है कि डॉक्टर मनमोहन सिंह वित्त मंत्री के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री
नरसिंह राव के सबसे विश्वस्त थे जिनकी सोनिया गांधी से कोई निकटता स्वीकृत नहीं है.
इसमें कहां शक है कि प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह एक गैर राजनीतिज्ञ हैं जिन्हें
अपनी मातृ संस्था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास, संस्कार और योगदान से कुछ
लेना देना नहीं है. उनके लिए संसद एक औपचारिक संगठन है जो उनकी चुनी हुई वैचारिक
टीम के प्रस्तावों पर मुहर लगाए. कांग्रेस संगठन के वरिष्ठ नेताओं से संपर्कहीनता
के कारण प्रधानमंत्री के साथ विचार विमर्श की अफवाहें तक नहीं फैलतीं.
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प्रधानमंत्री की दृष्टि में केवल दुनिया का अर्थशास्त्र है जिसके सन्दर्भ में भारत
को अपनी आर्थिक स्थितियों को चुस्त दुरुस्त करते चलना है. वे यह तक नहीं देख पाते
कि मध्य एशिया के देशों की यात्रा में उनके साथ गए अधिकारी गलत वैदेशिक बयान देते
हैं. उनके सहयोगी पाकिस्तान को लेकर उत्तेजक बयान भी देते हैं. प्रधानमंत्री
इंग्लैंड जाकर उस कौम का भारतीयों पर बौद्धिक अहसान मानते हैं. वे अमरीकी नेताओं को
एक तरह से भारतीय नेताओं का संरक्षक समझते हैं. कई बार वे संकेतों में अपने हटने का
माहौल भी रचते हैं ताकि लोग उनसे अपने पद पर बने रहने की मिन्नतें करते रहें. अफवाहें
तो ये भी हैं कि कई बार प्रधानमंत्री सोनिया गांधी की नहीं सुनते और अपनी बात मनवा
लेते हैं.
कांग्रेस एक ऐतिहासिक और भौगोलिक संगठन है. उसने देश की आज़ादी का नेतृत्व किया और
सबसे लंबे समय तक हुकूमत भी. इस पूरे दौर में कांग्रेस ने पारंपरिक नेताओं को तरज़ीह
दी और उनके अनुभव, वरिष्ठता और लोकप्रियता का मोटे तौर पर ख्याल रखा. यह भी लेकिन
सही है कि वर्षों से कांग्रेस में चोर दरवाज़े से गैर कांग्रेसी तत्व इस तरह घुलते
घुसते गए जैसे दूध में पानी. इनमें सेवानिवृत्त और मझधार में नौकरी छोड़कर आए
नौकरशाह, पूर्व सामंती तत्व, दूसरी पार्टियों के नेता और गैर राजनीतिक क्षेत्रों
जैसे सिनेमा, उद्योग और खेलकूद आदि के लोग भी शामिल होते गए. ऐसे लोगों का रसोई
मंत्रिमण्डल बहुत तेजी से बन जाता है.
ऐसे रसोई मंत्रिमण्डल में वे सब नाम शामिल होते रहे हैं जिनका सड़क की राजनीति से और
संसदीय प्रक्रियाओं से भी कोई रिश्ता नहीं होता. भले ही उन्हें बीच-बीच में मंत्री
बना दिया जाए. अरुण नेहरू, अरुण सिंह, माखनलाल फोतेदार, राजकुमार धवन, आर. डी.
प्रधान, सतीश शर्मा, अलेक्जेण्डर वगैरह बीसियों नाम हो सकते हैं जिन्होंने गांधी
परिवार के अहम फैसलों में सार्थक भूमिका का निर्वाह किया होगा.
आज लेकिन कांग्रेस संगठन को कुछ नई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है. प्रधानमंत्री के
नेतृत्व में दावा करने के बावजूद देश की माली हालत खस्ता है. खनिज नीति, कृषि नीति,
उद्योग नीति और व्यापार नीति के जरिए देश का सभी तरह का कच्चा माल देशी विदेशी
उद्योगपतियों को औने-पौने में बेचा जा रहा है. इस बेशर्म लूट से प्राप्त धन को
विकास सूचकांक के रूप में प्रायोजित किया जा रहा है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं.
उपभोक्ताओं को सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी सड़ा अनाज तक खाने को नहीं मिल रहा है.
मंत्रिपरिषद है कि देश को लूटे पड़ी है.
प्रधानमंत्री मानते हैं कि भ्रष्टाचार हो रहा है. लेकिन वे हटना नहीं चाहते. यह उस
कांग्रेस में हो रहा है जिसमें एक रेल दुर्घटना के कारण लाल बहादुर शास्त्री ने रेल
मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. सोनिया गांधी इतिहास को बताएं कि मनमोहन सिंह
कांग्रेस की इतनी बड़ी मजबूरी क्यों हैं कि देश का सबसे बड़ा राजनीतिक महल दरक रहा है
और उसके कारीगर उस पर पलस्तर तक नहीं लगाना चाहते.
युवा नेता राहुल गांधी में कम से कम एक बात अच्छी है कि वे कारपोरेट घरानों के
पैरोकार बनकर सामने नहीं आए हैं जैसा कि प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी कर रहे हैं.
उन्होंने देश में हर जगह दुखती रग पर हाथ रखने की कोशिश तो ज़रूर की है. लेकिन लक्षणों
से इतिहास नहीं बनता. कांग्रेस के युवा वर्ग को यह सोचना होगा कि उनके भविष्य का
भारत कैसा होगा. छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा सहित पूरे भारत में वन, खनिज और आदिवासी
संपत्तियों की खुले आम लूट हो रही है. क्या मौजूदा पीढ़ी भारत को खोखला कर दे तब भी
युवक चुप बैठे रहेंगे.
इसमें कोई शक नहीं कि इस देश के उद्योगपतियों ने लाइसेंस परमिट राज में विपरीत
स्थितियों के चलते अपने हुनर और छोटी मोटी बेईमानी के साथ काफी दौलत कमाई. टाटा,
बिड़ला, धीरूभाई अंबानी, बजाज जैसे कई परिवार भारतीय सामाजिक जीवन का भी हिस्सा बनते
गए हैं.
इन पितृ पुरुषों के नक्शे कदम पर चलने के बदले उनके मौजूदा वंशज उनसे ज़्यादा तरक्की
इसलिए नहीं कर रहे हैं कि वे बेहतर हैं. वे दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की इसलिए कर रहे
हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारतीय संसद ने ऐसे अधिनियम रचे
हैं जिनके कारण देश की संपत्ति और प्राकृतिक संसाधनों पर आर्थिक डाका डालने का
कानूनी अधिकार इजारेदारों को मिल गया है. जबरिया भूमि हड़पना और विशेष आर्थिक
क्षेत्र इसके उदाहरण हैं. ऊर्जा क्षेत्र में भी निजी निवेशकों की चांदी है. भारतीय
पूंजीवाद वैश्विक पूंजीवाद का सहोदर बना दिया गया है. उसकी कोई स्वतंत्र इयत्ता नहीं
है.
इन खबरों से भारतीय जनमानस स्वाभाविक ही विचलित होता है कि प्रधानमंत्री मोण्टेक
सिंह अहलूवालिया को वित्त मंत्री बनाना चाहते हैं और कुछ और पूर्व नौकरशाहों या
कथित विशेषज्ञों को देश इस वक्त राजनीति के गैर राजनीतिकीकरण से जूझ रहा है. यही
हालत रही तो भारतीय राजनीतिक जीवन में उस स्पंदन की कमी हो जाएगी जो लोकतंत्र का
असली अर्थ है.
एक व्यक्ति इतिहास में इतना बड़ा नहीं होता कि वह देश या समाज के लिए निर्विकल्प हो
जाए. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को इन सवालों से जूझने का वक्त बुरी तरह घेर रहा
है. ये चुनौतियां बिहार के चुनाव में सघन होकर मुखरित हुई हैं. यदि नौकरशाह,
भ्रष्टाचारी, किताबी बुद्धिजीवी, पांच सितारा संस्कृति के लोग और अरबपति, खरबपति
देश पर हावी हो जाएंगे तो देश का क्या होगा.
18.02.2011, 16.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित