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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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चना चबेना गंगाजल

कहानी

 

चना चबेना गंगाजल

श्याम बिहारी श्यामल


तो, इसे कहते हैं अस्सी का चौरासी फेरा. रूका था कुछ मिनटों के लिए किंतु दो घंटे पूरे होने को आये और अब भी यहां से खिसक पाना आसान नहीं. मित्रों की जकड़ ढीली पड़ने का नाम नहीं ले रही. पप्पू से पोय की चाय-दुकानों तक अड़ी पर अड़ी. यहां से वहां तक चौपालें ही चौपालें. आचार्य जी से मिलने का समय तो निकला जा रहा है किंतु लम्बे अंतराल के बाद यहां आने का सुख सब पर भारी पड़ रहा है. बनारस छूटने के बाद दिल्ली में यही सुख तो सपना बन गया है ! माह में दो-एक बार सौ-डेढ़ सौ रुपये इकट्ठे ढीलने का साहस जुटाओ तो मोहनसिंह पैलेस, कॉफी हाऊस या श्रीराम सेंटर में कुछ घंटे कहकहों से आबाद हो पाते हैं ! वह भी कामचलाऊ बौद्धिक जुगाली! कह लीजिये कि वैचारिक गाज-फेन छोड़ने की वैकल्पिक सुविधा-भर. फचाफच गाली-गिलौरी के बीच अस्सी वाली यह गलाफाड़ चिल्ला-चिल्ली, पीठियाठोंक हुरपेटा-हुरपेटी और पूंछतान सिंघफंसव्वल-टंगअड़व्वल बनारस के सिवा भला और कहां!

मन में आया कि सबको बताकर आचार्य जी से मिलने चला जाऊं. लौटने के बाद यहां फिर से एक बार खूंटा गाड़ा जायेगा. किंतु, दूसरे ही पल सतर्क हो जाना पड़ा. कहीं ऐसा नहीं कि नाम आते ही यहां की सारी तोपें आचार्य जी की ओर मोड़ दी जायें और बैठे-बिठाये खुद ही किचकिच में फंस जाऊं ! बहस और विमर्शों में मशगूल झुण्ड के झुण्ड. जरा-सा उठता तो कभी पीछे से कोई गर्मजोश स्वागती व्यग्र स्वर तो कभी आगे से कोई व्यंग्य पुकार. वाद-विवाद, वाद-अपवाद और वाद-संवाद. कहकहे से लेकर मुंहबिरव्वल और जीभऐंठव्वल तक. तर्क-सतर्क, तर्क-वितर्क और तर्क-कुतर्क. कहीं अर्थ-नीति पर भाषा की अनर्थ-सीमा तक जाकर बनारस से अमरीका वाया दिल्ली स्तरीय मीमांसा, तो कहीं गठबंधन की राजनीति पर दोनों परस्पर विपरीत नजरियों की आक्रामक पड़ताल. बतरस, बतकुच्चन और बतबनव्वल. क्षेत्रीय दलों का एक्सरे भी और राष्ट्रीय दलों का पोस्टमार्टम भी. गलबजव्वल, गललड़व्वल और गलचऊर. किसी झुण्ड में साहित्य तो किसी में संगीत-कला से लेकर मोबाइल-इंटरनेट तक की तकनीकी खूबियों-खामियों का बारीक निरीक्षण. अध्ययन-आलोचन, खनन -मनन और उत्खनन-चिन्तन. सितार-शहनाई पिंपिंयाने से लेकर ढोलक-तबले ढुकढुकाने-ठुकठुकाने वालों को बड़े-बड़े सम्मान देने के मुकाबले विचार और शब्द की दुनिया के क्रान्तिदर्शियों से डरने और उन्हें किनारे धकेलने की सरकारी नीतियों का कहीं लंका-दहनी अंदाज में खूंखार मूल्यांकन तो कहीं विचार और इतिहास की मौत का शोर गढ़ने वाले बाजारवादियों-उत्तर आधुनिकों की जमकर खबर. पुराने साथियों की अपेक्षा कि मैं चूंकि इन दिनों राजधानी में रह रहा हूं, इसलिए मुझे इन प्रसंगों पर दिल्ली का समकालीन नजरिया सामने रखना चाहिए! पता नहीं क्यों, ऐसे ज्यादातर मौकों पर न चाहकर भी मैं हां-हुं करके ही निकलता रहा! समय धार-वेग से बहता रहा. कहां शाम चार बजे का तय समय और कहां आठ! मैं उठ गया, चलकर देख लें! आचार्य जी कहीं बाहर नहीं निकले होंगे तो भेंट हो भी सकती है. देर के लिए क्षमा मांग लूंगा. गया सिंह और वाचस्पति ने प्रश्नवाचक दृष्टि अड़ायी तो जल्दी ही आगे से लौटने का इशारा कर मैंने कदम बढ़ा दिये.

घाट के रास्ते का भूगोल कुछ खास नहीं बदला था. बिजली गुल थी. सड़क पर अंधेरा काली रूई जैसा उड़ रहा था. अधिकांश भवनों में टिमटम इनवर्टरी प्रकाश. अभी थोड़ा इधर ही था कि चकित रह जाना पड़ा.

आचार्य जी के भवन के बंद गेट के बाहर दिखा एक तलमलाता हुआ व्यक्ति. जोर-जोर से चिल्लाता हुआ. ध्यान जाते ही घनघोर आश्चर्य, यह तो वीभत्स गालियां बरसा रहा है! दृश्य-सदृश्य, चित्रोत्पादक गालियां! कदम धीमे हो गये. अचानक भक्क्-से इलाका रोशन हो उठा. पास के पोल पर तेज बल्ब जाग उठा. व्यक्ति की स्पष्ट झलक मिली. लंबा, सूखा-सा वृद्ध. कमर से चलकर ठेहुने तक आकर सिमटी मटमैली धोती और पूरा निचुड़ा-सा शरीर उघार-निघार. त्वचा जर्जर पुरानी नाव की तरह काली पड़ी हुई. भीगने के बाद बगैर कंघी किये उठे-ऐंठें बाल, सिर पर बौखलाये-खमखमाये हुए-से. गंदी-घिनौनी व दुर्गंधपूर्ण गालियां जारी! आक्रोश नाव के मचलते पाल जैसा. गरियाता हुआ वह रह-रहकर कूदने लगता. गेट के पास पहुंचता और फिर उसी तरह पीछे वापस. गालियों में कभी ‘अचरजवा‘, कभी ‘मिसिरवा’ तो कभी ‘महंतवा’ के संबोधन. दुर्दान्त गालियों में वह कई पीढ़ियों को तबाह करता हुआ उनके निजी जीवन को भी रौंद रहा था.

मैंने गौर किया, आचार्य जी के घर का मेनगेट ही नहीं, अहाते के भीतर भी तमाम खिड़की-दरवाजे बंद. बहुत चिंता हुई, अब क्या करें! तभी कूदने-फांदने के क्रम में किसी तरह उसने मुझे अपनी ओर मुखातिब देख लिया. अचानक वह तेज गति से मुड़ा. मैं सन्न! कलेजा धक्क! कहीं झपट्टा न मार दे! यहां से अब भागना भी खतरे से खाली नहीं. क्या पता, दौड़ता देख वह उग्र और आक्रामक हो जाये! या, खदेड़कर पकड़ ही ले! न चाहते हुए भी कदम स्वमेव पीछे खिसक गये.

वह मेरी ओर उंगली उठाकर वहीं से चीखा, ‘‘ काऽ होऽ! तुहों कौनो दलाले हउवा काऽ ? अचरजवा साले से मिलेके हौऽ? आवा मिलाऽ! हम्मर आज के कोटा पूरा हो गल! हम ओने खिसकब अउर इ सरवा तुरंते सब खिड़की-दरवज्जा खोल ली! येतना कौनो सरीफ आदमी के सुनावल जाये तऽ सरवा इहें गंगा जी में कूद मरी! बाकी येकरा कौनो सरम ना हौ! बस माल हाथ से ना निकले के चाही, चाहे जूता मारके सब इज्जत ले लाऽ! ’’

वह तलमलाता हुआ धीरे-धीरे कदम बढ़ाता बगल से दूरी बनाये गुजरने लगा. शराब के तेज भभके छूट रहे थे. एक क्षण लगा, जैसे मैं ही चक्कर खा जाऊंगा. मैं कुछ देर ठिठका उसे जाते देखता रहा. जब वह रेंगता हुआ कुछ दूर निकल गया तो मैं गेट के पास गया. हांक लगायी. एक-एक कर खिड़कियां खुलती जा रही थीं. दरवाजा खुलने के बाद नौकर ने आकर मेन गेट खोला और हंसते हुए बाहर झांका, ‘‘ सरवा रोज नरक मचा देलाऽ! भागल कि नाऽ ? ’’

वह मुझे कमरे में ले गया. कक्ष की दीवारों पर आचार्य जी के विभिन्न सम्मान-अवसरों, बड़े-बड़े लोगों के साथ उनकी संगत और संगीत-समारोहों के ढेरों अनमोल क्षण चित्रों में उपस्थित. फ्रेमों की कतारें. सबमें उनकी भिन्न-भिन्न मुद्राओं में केंद्रीय उपस्थिति. किसी में रजत बाल-मूंछों सहित स्वर्णिम चिंतक मुद्रा तो किसी में महान संगीत-कलाकारों के साथ उनकी गहन मर्मज्ञता. किसी में माइक के सामने बोलते हुए वे खूब जीवंत भाव-मुद्रा में, तो किसी में गंगा-सेवा या घाट के सफाई अभियान के दौरान उनकी लोक-सेवक छवि. खड़ा-खड़ा निकट से यह सब देख रहा था कि आचार्य जी आ गये, ‘‘ अरे डाक्टर साहब, आप खड़े हैं! यहां टेबुल पर मिष्ठान्न और समोसे आपकी व्यग्र प्रतीक्षा कर रहे हैं! चाय भी आने ही वाली है. आइये, बैठिये! ’’
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Mohan thanvi [mohanthanvi@gmail.com] Bikaner - 2012-01-19 01:55:19

 
  श्यामल जी. प्रभावी कहानी के लिए बधाई। राजधानी दिल्ली की ठसक और ठेठ बनारसी जुबान मेँ आपका अँदाज ए बयाँ भी कथ्य मेँ रोचकता व उत्सुकता कायम रखे है। फिर फिर बाँचने की चाह होती है। 
   
 

pankaj shukla [pankajshukljhs@yahoo.com] jhansi - 2012-01-18 10:09:58

 
  श्यामल जी, इतनी सुंदर रचना के लिए धन्यवाद. 
   
 

Gita pandit [] - 2011-06-21 04:28:29

 
  भाव, भाषा और कथ्य का सुंदर संयोजन....
बधाई श्याम बिहारी श्यामल जी...
 
   
 

B.K. Kumar [] New Delhi - 2011-06-18 05:29:51

 
  कहानी एक दम में पढना ही बहुत कुछ बयां करता है. कथानक और उसकी बयानगी में इतनी रवानगी है जैसे गंगा की धार, जो ऊपर से तो शांत पर अंदर से महीन. ऐतवारू को सुनते वक़्त कई बार रोंगटे खड़े हुए...मानवीय गुणों से आप्लावित ऐतवारू और वही दलदल में फंसा एनजीओ के आचार्य- आज के सन्दर्भ में कई बातें उजागर करता है. कहानी वहां तक सीधे पहुंचती है, जहाँ जाकर आचार्य को जगाया जा सके. बहुत खूब श्यामल जी ! 
   
 

अशोक कुमार मिश्र [] दिल्ली - 2011-05-27 04:39:27

 
  आंचलिकता में रगी-पगी जीवंत कहानी. मेरी बधाई स्वीकार करें|आपने ने ऐसे लोगों की पोल खोल कर रख दी है, जो झूठी सफलता से आल्हादित हैं| आम तौर पर सच्ची स्थितियों पर लिखी गई कहानियां कहीं न कहीं आ कर फिसल जाती हैं| वैसे भारत के हर छोटे-बड़े शहरों में ऐसे अचरजवा भरे पड़े हैं| एनजीओ और कथित जनक्रांति करने वाले लोगों ने ही ऐसे अचरजवा को पैदा किया है और एतवारु जी जैसे लोग पीछे धकेल दिये गये हैं| धन्यवाद .... 
   
 

Awanish Kumar singh [awanish1233@gmail.com] Doha - 2011-05-27 04:36:31

 
  Shyam ji,behatrin prastuti,Language is very flowing.Ghajab ! 
   
 

vijay singh [vijaysikriwal@gmail.com] delhi - 2011-05-27 04:11:13

 
  कहानी ब्लेड की तरह धारदार है |भाषाई गलबजवल ने बनारस को खांटी अंदाज में जिन्दा रखा और जिस बारीक़ ढंग से कहानी बुनी गयी है, वह सबसे ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि‘‘ नशा तो मुर्दा खोजने का मेरा साधन भर है!’’  
   
 

राजीवशंकर मिश्रा बनारस वाले [rajivshankermishra@live.com] Kathmandu - 2011-05-27 03:56:28

 
  श्याम जी सादर.. धन्यवाद. कहानी पढ़ने क़ा दिल तो बहुत ही कर रहा है लेकिन क्या करूं पढ़ते ही मै बनारस की उस सोच में डूब जाउंगा. उन यादों से पीछे आना मेरे लिए बहुत ही कठिन है मित्र ..बनारसी ठाठ की जीवन्त भाषा में बेहतरीन कहानी है..लोग जो एक जूनून की तरह अपने काम को अंजाम देते है.. लेकिन ये सब बस मेरे लिए एक याद ही रह गयी है..आपकी सोच को सादर .. प्रणाम  
   
 

Arun Madhhukar [madhukararun@yahoo.in] Mangrol (Rajasthan) - 2011-05-27 03:52:57

 
  A real modern story with nice & heart touching local effect. 
   
 

Satya Mitra Dubey(satya Dubey) [] NOIDA - 2011-05-23 04:13:20

 
  सिस्टम, भाषा, विवरण, कथा. इतने सुंदर आलेख के लिये बधाई. 
   
 

mahender singh [mahenrijul@gmail] delhi - 2011-05-21 10:29:50

 
  कहानी वाकई दमदार है, बहुत दिनों बाद कुछ विचारोत्तेजक लेख पढने को मिला, आचार्य जी जैसे लोग तो हर कहीं मिल जायेंगे पर ऐतवारु जैसों का मिलना तो अब अपवाद ही है, एक अच्छी दमदार कहानी के लिए बधाई! 
   
 

Dr. Dinesh Tripathi 'shams' [] Balrampur - 2011-05-21 07:42:30

 
  श्यामल जी , बनारसी ठाठ की जीवन्त भाषा में बेहतरीन कहानी है ये , कहानी की भाषा और कथ्य दोनों ने ऐसा बांधा कि बस अभिभूत होकर रह गया , ऐसे आचार्य हर जगह मौजूद हैं , और इन्हें इतवारी जैसे लोग ही पह्चान पाते हैं.बहुत खूबसूरत ट्रीट्मेंट दिया है आपने कहानी को , बधायी. कन्था भी मैं नियमित पढ़ रहा हूं . 
   
 

रवि भूषण पाठक [rabib2010@gmail.com] मउ - 2011-05-21 05:05:53

 
  बहुत अच्‍छी कहानी ।इस कहानी का आचार्य तो मूलत: मिथिला का है ,परंतु हिंदी साहित्‍य में ऐसे आचार्यों की कमी नहीं है ,कुछ तो सभी तरह से बनारसी हैं जब हिंदी साहित्‍य इनसे पार पा लेगा तो साहित्‍य का भी भला होगा और बनारस का भी । 
   
 

अविनाश वाचस्‍पति [nukkadh@gmail.com] Sant Nagar - 2011-05-21 02:42:27

 
  जितनी बड़ी कहानी, उससे बड़े विचार, यह सधे विचार ही कहानीकार को मालामाल करवाते हैं।  
   
 

padmsingh [ppsingh8@gmail.com] Ghaziabad - 2011-05-21 02:27:47

 
  फचाफच गाली-गिलौरी के बीच अस्सी वाली यह गलाफाड़ चिल्ला-चिल्ली, पीठियाठोंक हुरपेटा-हुरपेटी और पूंछतान सिंघफंसव्वल-टंगअड़व्वल बनारस के सिवा भला और कहां!

बनारसी मिजाज़ की अद्भुद प्रस्तुति... कहानी जबरन उसी माहौल में ला खड़ा करती है. जिसने बनारस का असल रंग देखा हो उसके लिए परदेस में रह कर घर की याद जैसी है कहानी... अद्भुद !
 
   
 

रतन चंद 'रत्नेश' [ratnesh1859@gmail.com] चंडीगढ़ - 2011-05-21 02:14:30

 
  कहानी बहुत अच्छी लगी . भोजपुरी शब्दों का जादू पूरी तरह संप्रेषित हुआ है. अमृत-वाणी पर एतवारू को दिया गया उपदेश मन में उतरा गया. चना चबेना....पर एक बात और याद आई... सब कुकुर काशी चली जइहें त पत्ता के चाटी?? श्यामल जी को इस कहानी के लिए बधाई.. 
   
 

santosh chaturvedi [santoshpoet@gmail.com] allahabad - 2011-05-21 01:58:49

 
  बेहतरीन कहानी. शुक्र है समाज में आज भी किसी की परवाह न करने वाले ऐसे लोग भी हैं जो एक जूनून की तरह अपने काम को अंजाम देते है. ढेर सारी बधाई. 
   
 

देवेश तिवारी [deveshrisk@gmail.com] बिलासपुर -

 
  अदभुत...कहानी का अलग नया अंदाज. कभी लाइनों को दो तीन बार पढ़ना पड़ा तो कभी लाइनें एक बार में की कई मर्तबा पढ़ी जैसे लगीं. खास कर स्थानीय बोली में लिखी लाइनों का अलग ही अंदाज था. बहुत ही सुन्दर कहानी. अगली कहानी का इंतजार रहेगा. 
   
 

PRADEEP SHARMA [SHARMPRADEEP69@GMAIL.COM] -

 
  amazing treatment to story. after years a good story on benaras. congrats. 
   
 

shyam bihari shyamal [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] varanasi -

 
  प्रिय बंधु सर्वश्री रामकुमार तिवारी जी, रामकुमार बघेल जी, सनील कुमार बेहरा जी, मंजुलता सेन जी, हिमांशु जी, सविता जी और राहुल जी!
कहानी ‘चना चबेना गंगजल’ पर आपलोगों की प्रतिक्रियाओं ने मुझे रोमांचित कर दिया है! मैं तो पिछले दस साल से महाकवि जयशंकर प्रसाद के समय में विचरण कर रहा रहा। ‘कंथा’ उपन्यास-लेखन के दौरान तो सचमुच मुझे यही लगता रहा कि मैं अपने आसपास से बाहर ही हो चुका हूं! संभवतः अपनी इसी पीड़ा से निकलने और और अपनी वस्तुस्थिति जांचने के लिए ही कुछ समय पहले मैंने कुछ कहानियां लिखने का प्रयास चलाया। यह रचना भी उसी आत्मपरीक्षण-प्रक्रिया का हिस्सा रही! आपलोगों की गवाही से अब आश्वस्त हो पा रहा हूं कि मैं अपने समय से छिटककर कही अन्यत्र नहीं पड़ा हुआ हूं! यह सब अपना मनःसंघर्ष व्यक्त करने के लिए लिखा है! आप सबको हार्दिक आभार! सर्वथा अनौपचारिक! अनंत अतरंग शुभकामनायें.
 
   
 

Ramkumar Tiwari [ramkumarbilaspur@gmail.com] Bilaspur -

 
  आंचलिकता में रगी-पगी जीवंत कहानी. मेरी बधाई स्वीकार करें. 
   
 

Ramkumar Baghel [] Raipur, Chhattisgarh -

 
  लेखक ने ऐसे लोगों की पोल खोल कर रख दी है, जो झूठी सफलता से आल्हादित हैं. 
   
 

सुनील कुमार बेहरा [] Renukoot, Sonebhadra, UP -

 
  बहुत अच्छे से लेखक ने कहानी को ट्रीट किया है. आम तौर पर सच्ची स्थितियों पर लिखी गई कहानियां कहीं न कहीं आ कर फिसल जाती हैं. लेखक बहुत कुशलता से अंत तक कहानी को निभा ले गया है. 
   
 

मंजूलता सेन [] Kolkata -

 
  भारत के हर छोटे-बड़े शहरों में ऐसे अचरजवा भरे पड़े हैं. एनजीओ और कथित जनक्रांति करने वाले लोगों ने ही ऐसे अचरजवा को पैदा किया है और एतवारु जी जैसे लोग पीछे धकेल दिये गये हैं. कथाकार ने एक ऐसे विषय को उठाया है, जिससे बहुत से लोगों की आंखों के आगे छाया हरा रंग थोड़ा धुलेगा. 
   
 

Ashish Mishra [ashishmishra2012@sify.com] 5810 Reisterstown Road, Baltimore, United States, 21215 -

 
  आपने बहुत महीन धरातल पर कहानी लिखी है. हमने अपने कार्य कौशल को केवल समाज हित के कारण नहीं छोड़ा और दूसरी ओर कुछ पाखंडी अपने को इस तरह प्रचारित-प्रसारित करते रहे, जो वो कभी थे ही नहीं. यह कहानी बहुत प्रभावशाली है. यह कहना जल्दीबाजी होगी और शायद इसे फतवे की तरह भी लिया जा सकता है लेकिन एक पाठक तो यह कह ही सकता है कि आपकी यह कहानी आने वाले दिनों में हिंदी की श्रेष्ठ कहानियों में शुमार की जायेगी. मैं साहित्यकार नहीं हूं लेकिन एक पाठक होने के नाते कहानी के मर्म और पाठक का मन दोनों जानता-समझता हूं. 
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] नोयडा -

 
  जिसने श्यामल का धपेल और अग्निपुरुष पढ़ा हो, उनको समझ में आयेगा कि वे कितना आगे निकल गये हैं. भाषा और कथन के लेबल पर तो श्यामल का अब कोई मुकाबला ही नहीं है. जयशंकर प्रसाद वाले उपन्यास से भी आगे की भाषा है. आपका पूरा ट्रीटमेंट बताता है कि हिंदी की कहानी कितने महीन तरीके से चीजों को बुन रही है. 
   
 

SAVITA SINGH [savitasingh.singh7@gmail.com] jagatganj , varanasi -

 
  ‘चना चबेना गंगजल‘ कहानी जितनी जीवंतता से बनारसी मन-मिजाज की बानगी पेश करती है उससे कहीं अधिक दक्षता और संवेदन-सजगता से हमारे समग्र समय-समाज को रेशा-रेशा चित्रित करके सामने रख देती है! 
   
 

राहुल [] खजुरी,वाराणसी -

 
  आचार्य के बारे में स्थानीय लोगों की राय सचमुच ही बहुत खराब है। पता नहीं कैसे बाहरियों को अचार जी \\\'महान\\\' नजर आते हैं ! एतवारू जी असल बनारसी हैं। हमें उन पर फक्र है।  
   
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