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चना चबेना गंगाजल
कहानी
चना चबेना गंगाजल
श्याम बिहारी श्यामल
तो, इसे कहते हैं अस्सी का चौरासी फेरा. रूका था कुछ मिनटों के लिए किंतु दो घंटे
पूरे होने को आये और अब भी यहां से खिसक पाना आसान नहीं. मित्रों की जकड़ ढीली पड़ने
का नाम नहीं ले रही. पप्पू से पोय की चाय-दुकानों तक अड़ी पर अड़ी. यहां से वहां तक
चौपालें ही चौपालें. आचार्य जी से मिलने का समय तो निकला जा रहा है किंतु लम्बे
अंतराल के बाद यहां आने का सुख सब पर भारी पड़ रहा है. बनारस छूटने के बाद दिल्ली
में यही सुख तो सपना बन गया है ! माह में दो-एक बार सौ-डेढ़ सौ रुपये इकट्ठे ढीलने
का साहस जुटाओ तो मोहनसिंह पैलेस, कॉफी हाऊस या श्रीराम सेंटर में कुछ घंटे कहकहों
से आबाद हो पाते हैं ! वह भी कामचलाऊ बौद्धिक जुगाली! कह लीजिये कि वैचारिक गाज-फेन
छोड़ने की वैकल्पिक सुविधा-भर. फचाफच गाली-गिलौरी के बीच अस्सी वाली यह गलाफाड़
चिल्ला-चिल्ली, पीठियाठोंक हुरपेटा-हुरपेटी और पूंछतान सिंघफंसव्वल-टंगअड़व्वल बनारस
के सिवा भला और कहां!
मन में आया कि सबको बताकर आचार्य जी से मिलने चला जाऊं. लौटने के बाद यहां फिर से
एक बार खूंटा गाड़ा जायेगा. किंतु, दूसरे ही पल सतर्क हो जाना पड़ा. कहीं ऐसा नहीं कि
नाम आते ही यहां की सारी तोपें आचार्य जी की ओर मोड़ दी जायें और बैठे-बिठाये खुद ही
किचकिच में फंस जाऊं ! बहस और विमर्शों में मशगूल झुण्ड के झुण्ड. जरा-सा उठता तो
कभी पीछे से कोई गर्मजोश स्वागती व्यग्र स्वर तो कभी आगे से कोई व्यंग्य पुकार.
वाद-विवाद, वाद-अपवाद और वाद-संवाद. कहकहे से लेकर मुंहबिरव्वल और जीभऐंठव्वल तक.
तर्क-सतर्क, तर्क-वितर्क और तर्क-कुतर्क. कहीं अर्थ-नीति पर भाषा की अनर्थ-सीमा तक
जाकर बनारस से अमरीका वाया दिल्ली स्तरीय मीमांसा, तो कहीं गठबंधन की राजनीति पर
दोनों परस्पर विपरीत नजरियों की आक्रामक पड़ताल. बतरस, बतकुच्चन और बतबनव्वल.
क्षेत्रीय दलों का एक्सरे भी और राष्ट्रीय दलों का पोस्टमार्टम भी. गलबजव्वल,
गललड़व्वल और गलचऊर. किसी झुण्ड में साहित्य तो किसी में संगीत-कला से लेकर
मोबाइल-इंटरनेट तक की तकनीकी खूबियों-खामियों का बारीक निरीक्षण. अध्ययन-आलोचन, खनन
-मनन और उत्खनन-चिन्तन. सितार-शहनाई पिंपिंयाने से लेकर ढोलक-तबले
ढुकढुकाने-ठुकठुकाने वालों को बड़े-बड़े सम्मान देने के मुकाबले विचार और शब्द की
दुनिया के क्रान्तिदर्शियों से डरने और उन्हें किनारे धकेलने की सरकारी नीतियों का
कहीं लंका-दहनी अंदाज में खूंखार मूल्यांकन तो कहीं विचार और इतिहास की मौत का शोर
गढ़ने वाले बाजारवादियों-उत्तर आधुनिकों की जमकर खबर. पुराने साथियों की अपेक्षा कि
मैं चूंकि इन दिनों राजधानी में रह रहा हूं, इसलिए मुझे इन प्रसंगों पर दिल्ली का
समकालीन नजरिया सामने रखना चाहिए! पता नहीं क्यों, ऐसे ज्यादातर मौकों पर न चाहकर
भी मैं हां-हुं करके ही निकलता रहा! समय धार-वेग से बहता रहा. कहां शाम चार बजे का
तय समय और कहां आठ! मैं उठ गया, चलकर देख लें! आचार्य जी कहीं बाहर नहीं निकले होंगे
तो भेंट हो भी सकती है. देर के लिए क्षमा मांग लूंगा. गया सिंह और वाचस्पति ने
प्रश्नवाचक दृष्टि अड़ायी तो जल्दी ही आगे से लौटने का इशारा कर मैंने कदम बढ़ा दिये.
घाट के रास्ते का भूगोल कुछ खास नहीं बदला था. बिजली गुल थी. सड़क पर अंधेरा काली
रूई जैसा उड़ रहा था. अधिकांश भवनों में टिमटम इनवर्टरी प्रकाश. अभी थोड़ा इधर ही था
कि चकित रह जाना पड़ा.
आचार्य जी के भवन के बंद गेट के बाहर दिखा एक तलमलाता हुआ व्यक्ति. जोर-जोर से
चिल्लाता हुआ. ध्यान जाते ही घनघोर आश्चर्य, यह तो वीभत्स गालियां बरसा रहा है!
दृश्य-सदृश्य, चित्रोत्पादक गालियां! कदम धीमे हो गये. अचानक भक्क्-से इलाका रोशन
हो उठा. पास के पोल पर तेज बल्ब जाग उठा. व्यक्ति की स्पष्ट झलक मिली. लंबा, सूखा-सा
वृद्ध. कमर से चलकर ठेहुने तक आकर सिमटी मटमैली धोती और पूरा निचुड़ा-सा शरीर
उघार-निघार. त्वचा जर्जर पुरानी नाव की तरह काली पड़ी हुई. भीगने के बाद बगैर कंघी
किये उठे-ऐंठें बाल, सिर पर बौखलाये-खमखमाये हुए-से. गंदी-घिनौनी व दुर्गंधपूर्ण
गालियां जारी! आक्रोश नाव के मचलते पाल जैसा. गरियाता हुआ वह रह-रहकर कूदने लगता.
गेट के पास पहुंचता और फिर उसी तरह पीछे वापस. गालियों में कभी ‘अचरजवा‘, कभी
‘मिसिरवा’ तो कभी ‘महंतवा’ के संबोधन. दुर्दान्त गालियों में वह कई पीढ़ियों को तबाह
करता हुआ उनके निजी जीवन को भी रौंद रहा था.
मैंने गौर किया, आचार्य जी के घर का मेनगेट ही नहीं, अहाते के भीतर भी तमाम
खिड़की-दरवाजे बंद. बहुत चिंता हुई, अब क्या करें! तभी कूदने-फांदने के क्रम में किसी
तरह उसने मुझे अपनी ओर मुखातिब देख लिया. अचानक वह तेज गति से मुड़ा. मैं सन्न! कलेजा
धक्क! कहीं झपट्टा न मार दे! यहां से अब भागना भी खतरे से खाली नहीं. क्या पता,
दौड़ता देख वह उग्र और आक्रामक हो जाये! या, खदेड़कर पकड़ ही ले! न चाहते हुए भी कदम
स्वमेव पीछे खिसक गये.
वह मेरी ओर उंगली उठाकर वहीं से चीखा, ‘‘ काऽ होऽ! तुहों कौनो दलाले हउवा काऽ ?
अचरजवा साले से मिलेके हौऽ? आवा मिलाऽ! हम्मर आज के कोटा पूरा हो गल! हम ओने खिसकब
अउर इ सरवा तुरंते सब खिड़की-दरवज्जा खोल ली! येतना कौनो सरीफ आदमी के सुनावल जाये
तऽ सरवा इहें गंगा जी में कूद मरी! बाकी येकरा कौनो सरम ना हौ! बस माल हाथ से ना
निकले के चाही, चाहे जूता मारके सब इज्जत ले लाऽ! ’’
वह तलमलाता हुआ धीरे-धीरे कदम बढ़ाता बगल से दूरी बनाये गुजरने लगा. शराब के तेज भभके
छूट रहे थे. एक क्षण लगा, जैसे मैं ही चक्कर खा जाऊंगा. मैं कुछ देर ठिठका उसे जाते
देखता रहा. जब वह रेंगता हुआ कुछ दूर निकल गया तो मैं गेट के पास गया. हांक लगायी.
एक-एक कर खिड़कियां खुलती जा रही थीं. दरवाजा खुलने के बाद नौकर ने आकर मेन गेट खोला
और हंसते हुए बाहर झांका, ‘‘ सरवा रोज नरक मचा देलाऽ! भागल कि नाऽ ? ’’
वह मुझे कमरे में ले गया. कक्ष की दीवारों पर आचार्य जी के विभिन्न सम्मान-अवसरों,
बड़े-बड़े लोगों के साथ उनकी संगत और संगीत-समारोहों के ढेरों अनमोल क्षण चित्रों में
उपस्थित. फ्रेमों की कतारें. सबमें उनकी भिन्न-भिन्न मुद्राओं में केंद्रीय उपस्थिति.
किसी में रजत बाल-मूंछों सहित स्वर्णिम चिंतक मुद्रा तो किसी में महान संगीत-कलाकारों
के साथ उनकी गहन मर्मज्ञता. किसी में माइक के सामने बोलते हुए वे खूब जीवंत
भाव-मुद्रा में, तो किसी में गंगा-सेवा या घाट के सफाई अभियान के दौरान उनकी
लोक-सेवक छवि. खड़ा-खड़ा निकट से यह सब देख रहा था कि आचार्य जी आ गये, ‘‘ अरे डाक्टर
साहब, आप खड़े हैं! यहां टेबुल पर मिष्ठान्न और समोसे आपकी व्यग्र प्रतीक्षा कर रहे
हैं! चाय भी आने ही वाली है. आइये, बैठिये! ’’
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मैंने बैठते हुए अपने दोनों पंजे आपस में सटाये और आंखें मूंदकर सिर तेज-तेज हिलाते
हुए कहा, ‘‘ बाप रे बाप! वह आदमी कितनी गालियां उढ़ेल गया! एकदम दरवाजे पर चढ़कर! ऐसी
गंदी- गंदी गालियां! गोलियों से भी ज्यादा आग्नेय और तेज-कर्कश! कैसे आपने इतना सब
बर्दाश्त कर लिया! हमलोग से कोई ऐसे उलझता तो यहां से सलामत नहीं लौट पाता! ’’
वे सहज भाव से ताकते रहे. कुछ यों जैसे उक्त व्यक्ति वाले प्रसंग पर मेरी टिप्पणी
सुनी ही न हो, ‘‘दिल्ली जाकर तो आप अपने बनारस को भूल ही गये हैं! ’’
‘‘ नहीं! कदापि नहीं! जन्मभूमि कभी बिसरती है क्या! नौकरी है, इसलिए ... ’’
‘‘ आप प्रश्नावली लेकर आये हैं नऽ ?’’
‘‘ नहीं! ’’
‘‘ ऐसा है कि वह सब जानकारी लेने के लिए मुझे भी बीएचयू के एक प्राध्यापक मित्र से
मदद लेनी होगी. आप प्रश्नावली देंगे तभी काम आगे बढ़ेगा! ’’
‘‘ मैं तो आज यहां आने का कार्यक्रम ही भूल गया था... आया था गोदौलिया, बच्चों के
साथ... मिसेज की दोनों बहनें अपने बच्चों के साथ विश्वनाथ गली में मिल गयीं. बच्चे
घुल-मिल गये बच्चों से और तीनों बहनें आपस में मशगूल! ...मैं पड़ गया अकेला!
...मैंने उनलोगों को एक जरुरी काम का हवाला दे दिया और अस्सी निकलने की बात बता इधर
आ गया... अब अस्सी का हिसाब-किताब आपको क्या बताना! वहां कैसे बतकहियों में घंटे पर
घंटा घुंटता चला गया पता ही न चला! ...वहीं अचानक कुछ मिनट पहले स्मरण हुआ कि आज
शाम चार बजे का आपका समय तो मेरे नाम आवंटित था! ’’
मेरे आखिरी वाक्य के परिहास पर वे हो-हो कर हंसने लगे. आश्चर्य कि उनकी इस हंसी पर
कुछ देर पहले की गालियों का एक भी खरोंच या दाग-धब्बा नहीं!
मैंने अपनी बात आगे बढ़ायी, ‘‘ देर काफी हो गयी थी, लगा कि चलकर क्षमा तो अवश्य मांग
ली जाये! भागा-भागा आने लगा तो यहां गेट को छेंके विस्फोट करता वह गालीबाज दिख गया!
मैं तो कुछ दूरी पर ठिठका यहां से लौट जाने की बात भी सोचने लगा था कि... ’’ मुझे
आश्चर्य हो रहा था कि कैसे वे गालीबाज वाले प्रसंग को सीधे पी गये!
‘‘ अरे, वह ऐसे ही है! रोज इसी तरह एकदम इसी समय गेट के सामने आकर खड़ा हो जाता है
और यही दृश्य उपस्थित करता है. दस से बारह मिनट तक अपना काम करता है फिर खुद चला
जाता है! ’’
‘‘ आंय! रोज? वह रोज इसी तरह दरवाजे चढ़कर गालियां बरसाता है? ’’
‘‘ हां! हाड़ गला देने वाला पाला पड़ रहा हो या बाढ़ गिरा देने वाली मूसलधार बरसात.
शहर में कर्फ्यू लगा हो या उमड़ रहा हो मेला... कोई भी बंदी या होली-दशहरा जैसा कोई
पर्व-त्योहार ही, वह यहां आता अवश्य है... जब तक वह यहां आकर अपना यह काम पूरा नहीं
कर लेता उसे चैन नहीं मिलता... कभी कोई लाश-वाश निकालने में देर-अबेर हो जाये तो यह
सीन कुछ देर आगे-पीछे खिंच सकता है... उसी तरह बीमार-वीमार पड़ने पर कभी छठे-छमाही
भले यह एक-दो दिन टल जाये लेकिन आम तौर पर उसका यह शो अटल है... वह करीब
पैंतीस-अड़तीस साल से यह कार्यक्रम चला रहा है. मैं जब यात्राओं पर होता हूं तब भी
वह आता है... ऐसे समय वह यात्राओं का जिक्र करता हुआ कुछ नये ढंग के आरोप वाली
गालियां बरसाता है... ’’
‘‘ गजब! आप यह सब पैंतीस सालों से भी ज्यादा समय से बर्दाश्त करते आ रहे हैं? ’’
‘‘ हां, क्या करें! शुरू में उसे रोकने का प्रयास किया था... एक-दो बार उसे
ठुंकवाया- पिटवाया भी... वह मरने-मारने तक पर उतारु हो जाता है लेकिन गाली में कभी
कोई रियायत नहीं... बाद में मैंने ही हार मान ली... अब शाम में उसके समय पर हमींलोग
अपने खिड़की-दरवाजे और गेट -ग्रिल सब बंद कर लेते हैं... वह जब यहां से खिसक लेता
है, तब फिर सब खोलते हैं. ...खैर, तो बन्धु ऐसा है कि अभी मुझे एक शिष्य से मिलने
बीएचयू जाना है... वह गाजीपुर से आकर एक साथी के साथ महेंद्रवी में टिका है...
इसलिए मैं तो अभी लंका की ओर निकलूंगा! क्या आप साथ देंगे? ’’
‘‘ नहीं, मुझे अनुमति दीजिये ! असल में कई बार रिंग कर चुका हूं, घर का मोबाइल आफ
बता रहा है... हो सकता है विश्वनाथ गली से रिश्तेदारों का पूरा गोल मेरे घर ही
पहुंच गया हो! ऐसे अवसरों पर गप्पबाजी को अबाध रखने के लिए मोबाइल आफ हो जाता है न!
...तो मैं यहीं से सीधे मलदहिया के लिए ऑटो लेकर निकलना चाहता हूं! ...वहीं
लहुरावीर से आगे दो मिनट के लिए एटीएम पर उतरूंगा उसके बाद सीधे घर! ...लेकिन कृपया
यह तो बता दीजिये कि वह गालीबाज आखिर है कौन ? आपसे वह इस कदर क्यों है नाराज ? ’’
‘‘ अरे उसकी चिंता छोड़िये! वह एतवारु मल्लाह है. एक नंबर का गोताखोर! गंगा में डूबे
का जो लाश खोजने में सभी गोताखोर हार मान लें उसे वह एक छलांग में खोजकर बाहर ला
देता है! दिन में कभी आ जाइये, यहीं अस्सी घाट पर कहीं टहलता मिल जायेगा! खैर तो
उसे अब बिसारिये! ’’ वे साथ ही बाहर निकले. लगा कि शायद आगे कुछ दूर तक साथ चलें
लेकिन गेट के पास रूककर उन्होंने तेज आवाज लगायी, ‘‘ अरे, चौबे! गाड़ी जल्दी निकालो!
अब तो देर हो गयी है काफी! ’’
मैने नमस्कार किया और आगे बढ़ने लगा.
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सुबह विचार आया कि अभी ही चलकर आचार्य जी को प्रश्नावली दे देना अच्छा रहेगा. वे न
मिलें तो लिफाफा घर में थमाया जा सकता है. इसके बाद वहीं से आगे बढ़कर घाट पर एतवारु
को भी दूर से देखा जा सकता है. ठीक-ठाक वक्त लगे तो मिला भी जा सकता है.
आचार्य जी के घर के सामने से रिक्शा जब आगे बढ़ गया तो जेब की प्रश्नावली का ध्यान
आया. सोचा अब घाट से लौटते हुए उन्हें सौंपूंगा. मिल जायेंगे तो कुछ गप्पबाजी भी हो
जायेगी अन्यथा लिफाफा घर में ही किसी को देकर निकल लूंगा.
गाढ़ी होती धूप. धीपता अस्सी घाट. गंगा के किनारे सुबह-सुबह ऐसी गर्मी! बहती धारा की
ओर से आने वाला झोंका बीच-बीच में शीतलता का पुष्ट स्पर्श दे रहा था. बेहाल मन इस
छुअन से जलतरंग की तरह गोल-गोल घूमता फैलता-खिलता चला जाता लेकिन तुरंत दूसरे ही पल
फिर वही ब्लेड जैसी धूप. किनारे लगी नावों के आसपास नहाने वालों की मामूली हलचल.
इनमें बच्चे व महिलाओं की संख्या ज्यादा.
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मैंने सीढ़ियों पर बैठे हुए लोगों को ध्यान
से देखते हुए चक्कर लगाने शुरु किये. कई बार इधर से उधर और उधर से इधर. उसका कहीं
पता नहीं चल पा रहा था. धूप उग्र होती जा रही थी. सीढ़ियों पर मंदिरों-आश्रमों की
बनती प्रच्छाया और जहां-तहां लटकती दूसरी छायाओं के संरक्षण में कुल कोई पचास-पचपन
लोग. इनमें कुछ विदेशी पर्यटकों की जोड़ियां सुबह-सुबह ही काम के मूड में. थक जाने
पर लगा कि मैं अब उसे यहां शायद ही खोज सकूं. अब और भटकने-थकने से अच्छा है कि लौट
चलूँ!
तभी एक युवक पास आ गया, ‘‘ घूमेंगे क्या! नाव निकालें? ’’
‘‘ नाहीं इयार! हम कौनो बिदेस से नाहीं आयल हईं...’’
उसने हंसते हुए बीच में ही बात काट दी, ‘‘ अच्छा, कौनो बात नाहीं हौ! बनारसो के लोग
नाव से खूब घूमऽलन! चलबा त चलाऽ! अस्सी से राजघाट तक अउर फिर वापसी! तीन सौ दे
दिहाऽ! बस! बिदेसिन लोग त पांच सौ से आठ-नौ सौ तक दे देलन! कुछ सोचाऽ मत, चलाऽ
आवाऽ! ’’
मैंने उसकी ओर गौर से ताका, ‘‘ अरे इयार, हम एतवारु से मिले आइल हईं, घूम्मे नाहीं!
’’
‘‘ एतवारु बाबा से? काहेऽ ? केहू बूड़ल हौ काऽ ? ’’
‘‘ नाहीं हो! बस, उनकरा से मिल्लेके हौ! ’’
‘‘ अरे तऽ पहिचानऽलऽ ना काऽ ? उहे नऽ हउवन एतवारु बाबा!’’ उसने हाथ उठाकर ऐन मेरे
ही पीछे पान की छोटी-सी गुमटी की ओर संकेत किया. मुड़कर देखा तो मैं चौंक गया. महज
एक हाथ की दूरी पर गुमटी की ओट में बैठा था एतवारु. नीचे पीढ़ा की तरह प्लास्टिक का
कोई गुल्टियाया हुआ टुकड़ा रखे. गौर करने पर चेहरा रात की देखी शक्ल से तो मिलता-सा,
लेकिन उसकी इस मुख-मुद्रा और रात की गालियों की उस बरसात में तालमेल बिठाना
मुश्किल. मन ही मन यह मान लेना पड़ा कि मैं अपने बूते तो उसे इस भावशून्य चेहरे में
कत्तई नहीं पहचान पाता. लड़के का आभार माना. एतवारु वैसे ही उघार-निघार. केवल कमर
में एक-सवा हाथ की घिंचोरायी हुई धोती. अधभीगी व गंदी. चेहरे पर कोई गति नहीं. थकान
और स्थगन से लदी-फदी निढाल चुप्पी. लगा कि यह व्यक्ति सचमुच इतना वृद्ध हो चुका है
कि मजबूरी में ही काम कर रहा होगा. मजबूरी न होने पर कोई भी व्यक्ति इस उम्र में
भला क्यों काम करेगा! वह भी गोताखोरी का ऐसा खतरनाक काम! सामने से आते एक परिवार को
देख लड़का आगे लपक गया था. मैंने बहुत बारीकी से निरीक्षण करते हुए करीब जाकर पूछा,
‘‘ आप ही एतवारु बाबा हैं नऽ? ’’
‘‘ अरे हम कौनो बाबा-फाबा नाहीं हैं! केवट बंस के हैं. गंगाजी में से बूड़ल लाश
खोजकर निकालते हैं! समझे? यहां एक बाबाजी भी इसी नाम के हैं! आप किसे खोज रहे हैं ?
’’ वह साफ हिन्दी बोल रहा था. ध्यान आया, यहां तो ज्यादातर मल्लाह विदेशी पर्यटकों
से अंग्रेजी में भी बतिया लेते हैं. तो यह घाट का दिया हुआ इल्म है! सामने वाला
लोकल लगे तो खांटी बनारसी, हिन्दी में बोले तो हिन्दी, विदेशी हों तो अंग्रेजी भी
हाजिर!
‘‘ रात में आप ही न थे आचार्य जी के दरवाजे पर? गुस्से में? ’’ मेरे मुंह से जब बात
अचानक फिसल गयी तो भूल का अहसास हुआ. लगा कि उसकी बोली-बानी तौलने में यह तो बड़ी
गलती हो गयी! अब क्या हो! वह कहीं बिगड़ न जाये! रात का उसका रूप-स्वरुप याद आते ही
सिहर गया. कहीं बवाल न खड़ा कर दे! ऐसे व्यक्ति का क्या ठिकाना! एहतियात के तौर पर
तत्काल दो कदम पीछे खिसक आया. दिमाग पर जोर देते हुए उसने मुंह को सिकोड़ा, ‘‘ मैं
पहचान नहीं पा रहा... आप हैं कौन? कहां से आ रहे हैं ? कोई काम ? ’’
‘‘ अरे बाबा! मैं आप से ऐसे ही मिलने आ गया हूं... कोई काम नहीं है! आपका बहुत नाम
सुना है... गोताखोरी में आपकी विलक्षण दक्षता के कई किस्से! इसी आकर्षण में आपसे
मिलने मैं यहां तक आ गया! ’’
‘‘ अच्छा! अच्छा! तो बैठिये! आइये! चाय पियेंगे? मंगायें? ’’
‘‘ हां, हां! हमलोग एक साथ बैठकर चाय पीते हुए कुछ देर बतिया लें तो अच्छा रहेगा!
’’
‘‘ देखाऽ, भइया! चलाकी मत बतियावाऽ! तोरा कौनो काम होवे तऽ साफ बतावाऽ! हम गंगाजी
में डुबकी लगाके बूड़ल मुर्दो खींच लिहिला अउर चलाक आदमी के दिमाग से गड़ल बातो! ’’
‘‘ नहीं! नहीं! आप विश्वास करिये मैं न अखबार का आदमी हूं न कालेज का रिसर्चर!
शुद्ध निजी जिज्ञासा में आप तक आ गया हूं!” उसके संदेह पर मैं सकपका कर रह गया ‘‘
मैं भी बनारसी हूं. गांव मेरा सेवापुरी के पास ही है. यहां शहर में नाटीइमली में
हमलोगों का पुराना घर है. मलदहिया में भी अपना मकान है. दिल्ली के एक कालेज में
नौकरी लग गयी है... इसलिए आजकल वहीं रह रहा हूं! ’’
‘‘ अच्छा, तो तूं प्रोफेसर हउवाऽ! ...लेकिन तूं ई बतावाऽ बनारस में बीएचयू हौ,
विद्यापीठ हौ, सम्पूर्णानंद हौ... तोरा इहां नोकरी ना मिलल! तूं काशी छोड़ देलाऽ! ’’
‘‘ काशी छोड़ने का तो सवाल ही नहीं. अभी नौकरी के लिए ही... ’’
आश्चर्य कि उसकी भाषा अचानक प्रच्छन्न हो गयी, ‘‘देखिये, बड़े-बड़े राजे-महाराजे किसी
समय अपना सारा राजपाट और सुख-ऐश्वर्य छोड़कर इसी काशी में अंतिम समय बिताने आया करते
थे... कहा गया है कि भगवान अगर चना-चबेना भी पूरा कर रहे हों तो काशी को कभी नहीं
छोड़ना चाहिए क्योंकि यह बाबा विश्वनाथ का दरबार है! आपने यह प्रसिद्ध पद सुना होगा-
चना चबेना गंगजल जो पुरवै करतार, काशी कभी न छाड़िये विश्वनाथ दरबार! ’’ वाणी तरल और
आंखें डबडब. मेरा मन भी उमड़ते-घुमड़ते छिजते बादलों से भर गया.
‘‘ हां! मेरा मतलब यही कि आप मुझे गलत न समझें! ’’
‘‘ कोई बात नहीं! अब साफ बात यह कि यह चाय मैं पिला रहा हूं. ऐसा नहीं कि एक कप चाय
पिलाकर आप हमसे कुछ उगलवा रहे हैं! हां, तो अभी आप कुछ पूछ रहे थे रात में
अचरजवा...’’
‘‘ वाह! यह तो बहुत अच्छा है कि आप स्पष्टवक्ता हैं! मैं भी साफ बता दूं... रात में
मैं आचार्य जी के यहां उनसे मिलने गया था तो वहीं गेट पर आप खड़े मिले... बहुत
तेज-तेज चिल्लाते हुए! ’’
‘‘ साफ कहिये न! मैं अचरजवा को गरिया रहा था! ’’ तनाव से मुक्त परिहास का अंदाज.
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‘‘ मैं आचार्य जी से आपकी नाराजगी की वजह तो नहीं जानता और उम्र में भी आपके
बेटे-पोते की तरह ही हूं लेकिन आपसे एक बात कहना चाहता हूं... ’’
‘‘ क्या, बोलिये! ’’ उसने जैसे अपनी दृष्टि मेरे चेहरे पर चुभो दी.
‘‘ बाबा! इस शरीर से निकलने वाला हर पदार्थ घृणित व दुर्गंधपूर्ण है. आप खुद सोचकर
देखिये न! नाक से, कान से, आंखों से या पूरे शरीर से जो कुछ भी निकलता है, वह सब
क्या है, कैसा है! दुनिया का सबसे गंदा पदार्थ यदि कहीं से निकलता है तो वह यही
शरीर है. वह चाहे कोई राजा हो, बाहुबली हो, अकूत धन-सम्पति वाला या कैसा भी कोई
संत-विद्वान; किसी की यह औकात नहीं कि अपने शरीर से विसर्जित होने वाले घृणित
पदार्थों को बदल दे. क्या कोई राजा या धनवान या बाहुबली चाहकर भी अपने शरीर से
गुलाबजल या स्वर्णमल विसर्जित कर सकता है? कौन माई का लाल है जो अपनी ही आंखों से,
नाक से या कान से सुवासित पदार्थ विसर्जित करके दिखा दे! इसके ठीक विपरीत यह देखिये
कि प्रकृति ने क्या चमत्कार किया है, वह यह कि कोई भी मनुष्य, वह चाहे कोई नितांत
निर्धन हो या निर्बल, यदि चाह ले तो अपनी वाणी में अमृत पैदा कर सकता है. इसके लिए
न राजा होना जरूरी है, न अमीर, न बाहुबली, न विद्वान! तो सोचिये कि हमारे लिए ईश्वर
का यह कैसा दुर्लभ उपहार है! इकलौता मौका! ...ऐसे में इसे क्यों खाली जाने दिया
जाये! क्यों न हम अपनी वाणी में अमृत की अनंत धार बहा लें!...’’
एतवारु गंभीरता से पूरी बात सुन लेगा, इसकी उम्मीद नहीं थी. कुछ क्षणों तक वह मुझे
देखता रहा. एकटक. हिलती पलकों के भीतर पुतलियों पर सक्रिय चुप्पी. उसने मुंह खोला
तो आवाज में मिठास थी, ‘‘बेटा, ऐसा है, आपकी यह बात मेरे दिल को छू गयी है... सचमुच
बहुत अच्छी लगी! ...इसका पालन निःसंदेह सबको करना चाहिए... लेकिन मुझे क्षमा करना,
उसके बारे में मैं अपना प्रण नहीं तोड़ूंगा! मैं जब तक जिंदा हूं उसे रोज गरियाऊंगा
और यह अहसास कराता रहूंगा कि तुम वही नहीं हो जो दिख रहे हो... बल्कि तुम
विश्वासघाती और बेईमान हो तो हो! दुनिया मतलबी है, रंग बदल लेती है... कल के चोर को
आज गाड़ी और रूतबे में देख लोग सलाम ठोंकते है ...मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा! आपको
नहीं पता है कि मैंने उस व्यक्ति को कैसे-कितना सहारा दिया और किस हद तक जाकर मदद
की थी! लेकिन वह क्षण भर में ऐसा बदल गया कि मेरे लिए मनुष्य जाति का पूरा
मनोविज्ञान ही पहेली बनकर रह गया! आदमी इस तरह भला रातोंरात बदलता है! ’’
चाय आ गयी थी. केतली और पुरबे से भरी डोल्ची पकड़े खड़ा युवक रफ्तार में था, ‘‘
जल्दी! जल्दी!’’
हमदोनों ने एक-एक पुरबा पकड़ लिया. वह चाय डालकर चला गया. हमदोनों चुस्कियां लेने
लगे. उसका अंदाज खास. आंखें मुंदी हुईं और गाढ़ी तन्मयता. मिठास और ताप से निकली
ऊर्जा का रंग हर घूंट के साथ उसके चेहरे पर रेंग-रेंग जाता. कुछ ही घूंट में मेरा
पुरबा भी खाली. उसने फेंकते हुए आंखें खोली, ‘‘...सबसे पहले तो आपको मैं यह बता दूं
कि मैंने संस्कृत से शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की है! वह भी आज की तरह देह ऐंठकर
या गुरुओं का झोला ढोकर नहीं, बल्कि ग्रंथों को घोंट-मथकर...’’
मैं हक्का-बक्का. बातों के दौरान बीच-बीच में चमक उठने वाले उसके शुद्ध उच्चारणों
का भेद अब जाकर समझ में आया! मैं अवाक् मुंह ताकता रहा. उसकी वाणी में खांटीपन की
ठनक, ‘‘...हां एक बात और! मैंने अपना पुश्तैनी धंधा और गंगा का किनारा छोड़ना कभी
स्वीकार नहीं किया... जीवन के आरम्भ में ही परिवार में कुछ ऐसे भूचाल आये कि मैं
टूटकर रह गया! ...तो अब यह बहुत पुरानी बात हुई... यह उन्हीं दिनों की बात है जब
मैं छात्र था... दशाश्वमेध घाट पर एक रात मुझे एक लड़का दिखा... उम्र में मुझसे कुछ
छोटा ही... सीढ़ी पर बीमार लेटा हुआ... भीड़- भाड़ जा चुकी थी... चांदनी रात... मैं
कुछ दूर से उसे देख रहा था... वह रह-रहकर उल्टी करता, फिर पड़ रहता... ज्योंही उसकी
स्थिति की गम्भीरता का अंदाजा लगा, मैं तुरंत उसके पास जा पहुंचा... निचली सीढ़ी पर
उबकाई धीरे-धीरे टघर-फैल रही थी... निढाल पढ़ा वह अशक्त दृष्टि से ताक रहा था... तभी
उसके सिर के नीचे दबी एक पुस्तक पर ध्यान गया... भरी हुई आंखों में चमक भी विशेष
लगी!... मैंने उससे पूछा-सिर के नीचे कौन-सी पुस्तक है भाई? ...उसका उच्चारण शुद्ध
और वाणी में गाम्भीर्य- कुमारसम्भवम्! मेरे पूछने पर उसने संक्षेप में अपने बारे
में सारी जानकारी दे दी... वह बिहार के मिथिलांचल से भटकता हुआ यहां आया था... पिता
की असमय मौत के बाद पढ़ाई छोड़कर, रोजी-रोटी की तलाश में... इसी क्रम में वह लगातार
दो दिनों तक यहां-वहां धूल फांकता फिरा... दिन भर भटकना और रात में घाट की सीढ़ियों
पर सो जाना! ...न खाने का कोई जुगाड़ न जेब में पैसे! तबीयत हो गयी खराब... सबकुछ
सुनने-जानने के बाद मैंने उसे सहारा देकर उठाया और अपने साथ घर ले गया... वह भी
संस्कृत का ही अध्ययेता निकला, इस कारण बहुत अपनापन महसूस होता रहा... मैंने अपनी
पढ़ाई तो रोक दी लेकिन उसे आचार्य तक की परीक्षा दिलायी... वह साथ ही घाट पर रहता और
काम में हाथ बंटाता... कुछ साल अच्छे बीते...
“एक दिन घाट पर ही एक वयोवृद्ध महंत जी से मैंने उसका परिचय कराया... उन्होंने उसे
अपने साथ आश्रम चलने को कहा... वह सहर्ष चला गया... उसके बाद कुछ ही माह के भीतर
महंत जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गयी... मैं उससे मिलने गया तो मुझे
बैरंग वापस आना पड़ा... बाद में भी दो-तीन बार और गया लेकिन वह कभी मुझसे मिला
नहीं... उसने दूसरे दावेदारों से भिड़ते हुए आश्रम पर कब्जा जमा लिया था... उसके बाद
तो वह धड़ाधड़ आश्रमों पर कब्जे जमाता चला गया... उसकी दबंगता और आपराधिक प्रवृत्ति
के बारे में किस्से उड़ने लगे... पता चलता रहा कि वह बहुत खूंखार हो चुका है... दस
साल के भीतर उसके कब्जे में आधा दर्जन आश्रम आ चुके थे... कई-कई कीमती गाड़ियां और
दो-दो शादियां! इसके समानांतर गंगा-सेवा का उसका एक ऐसा ढोंग शुरु हुआ कि कुछ मत
पूछिये... काशी में उसकी सर्वज्ञात छवि के विपरीत नेशनल और इंटरनेशनल मीडिया में
उसे महान पर्यावरण-पुरुष के रूप में चित्रित किया जाने लगा... एक ऐसा शख्स जो गंगा
को प्रदूषण-मुक्त बनाने के लिए अनथक महान कार्य करने में प्राणपन से जुटा हुआ हो!
उससे मिलने अमरीका और ब्रिटेन तक से नेता और पर्यावरण-कर्णधार आने लगे... मेरे लिए
यह पूरा वृतांत बेचैन कर देने वाला...
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“खैर! उसने जब अस्सी वाला वह मकान खरीदा तो एक
दिन मैं मकान में पहुंचा... जबरन भीतर घुस गया... वह कई लोगों के साथ बैठा था...
दसेक सालों बाद उसका पूरा व्यक्तित्व बदला हुआ मिला... कहां वह गली-पिचकी काया और
कहां यह हवा में खिलते पाल जैसा रूप-निखार! ...मैंने पहुंचते ही गालियां शुरु कर
दी... उसने वहीं लठैतों से अपने सामने मुझे पिटवाया... उसके बाद से ही मैंने तय
किया कि अब जब तक जिंदा रहूंगा, इसे रोज दरवाजे पर चढ़कर गाली दिया करूंगा... यह
कितना गंदा है आप खुद समझिये कि इसने इस उम्र में अभी दो-तीन साल पहले एक और विदेशी
कन्या को रख लिया है! इसमें कहीं से न कोई नैतिकता है न धार्मिक भावना लेकिन महान
महंत और ज्येष्ठ विद्वान भी यही बना फिर रहा है! एक एनजीओ बनाकर
गंगा-प्रदूषण-मुक्ति के नाम पर माल भी खूब पेल रहा है और महान पर्यावरण-संरक्षक भी
बन गया है..! हर साल संगीत समारोह कराकर संगीत-उद्धारक भी बना हुआ है.... ऐसे
व्यक्ति को रोज गाली न दूं तो क्या करूं? ’’
पता नहीं किधर से ऐन उसी समय दो पुलिस वाले आ गये. दोनों ज्योंही पास में खड़े हुए,
नजर पड़ते ही एतवारु में दूसरे ढंग की सक्रियता जाग उठी, ‘‘ काऽ भइया, काल्ह सांझे
वाला बॉडी ना निकलल ? ’’
सांवले वाले पुलिसकर्मी ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिये, ‘‘ चच्चाऽ! ई काम तोरे लगले
बिना केहु दोसर से नाऽ होई! अब, चलाऽ! ...नोकरी मत खतम करावा! लड़िकवा जे डुब्बल हौ,
मेरठ के कौनो बड़का भारी नेता के रिश्तेदार रहल! लखनउ से फोन पर फोन आवत हौ. एसपी
साहेब हम्मन के डंडा कइले हउवन! उठाऽ, चलाऽ चच्चा! ’’
मुझे अफसोस हुआ कि उससे कुछ और खास बतियाने का अच्छा-खासा मौका हाथ से निकल रहा है!
कहां मिलेगा फिर ऐसा अवसर! दूसरे ही पल इसके समानांतर यह भाव भी उठने लगा कि एतवारु
यदि जाने में आना-कानी करे तो अपनी ओर से मैं भी उसे भेजने में जोर लगा दूं! जिसका
बेटा डूबा है, उसका कलेजा फट रहा होगा!
एतवारु ने शर्त रखी, ‘‘ तीन हजार रोपेया पहिले लेब! तूं पुलिसन के कौनो विश्वास
नाहीं हौऽ... पहिले नोट गिनाऽ तब चलीं! नाव के व्यवस्था भी जल्दी कराऽ और हमार
पूज्जा के भीऽ! ’’
‘‘ अरे तूं तीन हजार रोपेया पहिले ले लाऽ बाउऽ! ’’ उसने अपने साथी को कुछ इशारा
किया और जेब से निकालकर नोट उसे थमा दिये. एतवारु ने नोट पकड़कर खड़े होते हुए नीचे
से प्लास्टिक का बैग उठ लिया. तहदार मुड़ा झोला. उसमें से एक और चिकनी छोटी
प्लास्टिक निकाली जिसमें रुपये रखे और फिर सब पूर्ववत् मोड़-लपेट छोटा कर कांख में
दबा लिया. दूसरा सिपाही तेज कदमों से गया और कुछ दूर खड़ी अपनी मोटर साइकिल से
भारी-भरकम झोला उतार लाया.
नाव आ गयी थी. दोनों पुलिसकर्मी व एतवारु चढ़ गये थे. मैं किनारे खड़ा उन्हें देख रहा
था. तभी नाव पर से एतवारु ने आवाज दी, ‘‘ तुहों आवाऽ बाउ साब! ’’
मुझे लगा कि कहीं ऐसा नहीं कि वह जिद ही पकड़ ले! जितनी जल्दी हो मुझे पिण्ड छुड़ा
यहां से खिसक लेना चाहिए. उसने फिर हांक लगायी, ‘‘ चलाऽ, आवाऽ! देख लाऽ कि कइसे ई
काम होलाऽ! ई लोग आ गइल हउवन तऽ कामे देख लाऽ नाहीं तऽ इहे सब बतिया हम मुंहे से
बतइतीं! ’’
मुझे अचानक सूझा, सचमुच यह तो दुर्लभ मौका है! बेशक मुझे यह अनुभव प्राप्त करने का
अवसर कतई नहीं छोड़ना चाहिए! लपक कर आगे बढ़ा और नाव पर सवार हो गया. पुलिसवाले आंखें
तरेरकर मुझे देख रहे थे.
एतवारु मुस्कुराया, ‘‘ ई हम्मर आपन अदमी हउवन! संगे रहियन! ’’ उसने मेरी पीठ पर हाथ
फिराया तो बहुत भला लगा. दूसरे ही पल तेवर बदल लिये और नाव खे रहे युवक को आंखें
तरेरकर देखा, ‘‘ तूं सांस मत खींचाऽ! एकदम एके बार में सर्र-से इहां से राजघाट पुल
के लग्गे ले चलाऽ! ’’ युवक ने सहमते हुए स्वीकार में सिर हिलाया और सामने ताकने
लगा.
कुछ ही दूर आगे बढ़ने पर झोला खुल गया. उसने सब खोलकर देखना शुरु किया. शराब की तीन
बड़ी और चार छोटी बोतलें. चार बड़ी-बड़ी पोटलियां. घाट पर मैंने यह झोला देख सोचा भी
नहीं था कि खुद पुलिस वाले उसकी खिदमत में इस तरह शराब लेकर आये होंगे! इसकी भनक भी
मिल गयी होती तो किसी भी कीमत पर मैं नाव पर नहीं चढ़ता. मुझे यह समझते देर नहीं लगी
कि अब तो सब के सब मिल-बांटकर पियेंगे. यह बूढ़ा पीकर क्या-क्या कर सकता है, यह मेरे
लिए समझना कठिन नहीं रह गया था. ...तो, मैं तो इसमें फंस ही गया न! कैसे निकला जाये
इस भंवर से! बहुत चिंता होने लगी. किसी हद तक घबराहट भी. आखिर यह पानी पर तैरती हुई
नाव है! कहीं इसी पर कोई धमाचौकड़ी मचने लगे तो! मुझे तो कुछ बहाना बनाकर हर हाल
में उतर ही लेना चाहिए! उतरने में क्या है, नाव को जरा-सा किनारे करके कहीं भी किसी
घाट से हल्के सटा दे! उतर लूंगा और सरपट अपनी राह ले लूंगा. दूसरे ही पल खुद ही यह
भी लगा कि मैं शायद बहुत अच्छे ढंग से बहाना नहीं बना सकूंगा. मेरा ध्यान नाव खे
रहे युवक पर गया तो राहत महसूस हुई. वह झोले की तरफ नजर भी नहीं डाल रहा था! मतलब
यह कि मेरे साथ एक शायद वह भी ऐसा हो जो न पिये!
एक बोतल को बाहर निकालते हुए पुलिसकर्मी ने कहा, ‘‘ चच्चाऽ, तोहार कोटा इहां पूरा
हौ! बस काम जल्दी करावाऽ! देखाऽ, बुलानाले जाके ठठेरी बाजार से तोरे लिये एक से एक
नमकीन लावल गल हौ. काजू के अलग, मखाना के अलग! गुजराती गठिया भी हौ, बनारसी दलमोट
भी! तूं जमके मारऽ लेकिन काम कराऽ! ’’
एतवारु ने मुंह में मुट्ठी भर-भरकर लगातार दो बार काजू झोंका और हापुस-हापुस चबाने
लगा. सिर को आसमान की ओर कर बोतल लगा ली और मुंह से तभी हटायी जब वह पूर्णतः खाली
हो चुकी. यह छोटी बोतल थी. तो, क्या बड़ी वाली भी इसी तरह एक ही सांस में धकेल लेगा!
बहुत डर लगा.
अब तक यह संकेत भी मिल चुका था कि झोले का सारा कोटा अकेले उसी का है. यानी बाकी
सभी लोग होश में ही रहेंगे. थोड़ी-सी राहत!
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उसने इस बार बड़ी बोतल खोल ली. नाव पर से
ही पानी की सतहों का उसका मुआयना गजब बारीक! जैसे आंखों से ही जल के तल को इंच-इंच
बुहार रहा हो. एक बार में इस तरफ मुंह करके आंखों से जाल फेंकता तो दूसरी बार में
उधर घूमकर पूरजोर दृष्टि-दौड़! जल के तल के एक-एक स्पंदन को वह जैसे जज्ब कर रहा हो!
हां, एकदम इसे ही तो कहेंगे सिंहावलोकन! दशकों से लिखे-पढ़े जा रहे इस शब्द का सटीक
अर्थ अचानक सामने आकर जैसे साकार खड़ा हो गया हो. जंगल का राजा जैसे अपने साम्राज्य
के चप्पे-चप्पे की खबर लेता कदम बढ़ाता है!
उसने मुझे लक्ष्य किया, ‘‘ केवट वंश! समझ रहे हैं न? ’’
मैंने संदेह से उस पर नजर डाली. यह किसकी आवाज है, एतवारु की या शराब की ? क्या अभी
से शराब ने अपना कंठ खोल लिया! डर लगा, कहीं यह आदमी नरक न कर दे!
आश्चर्य कि न तो नाव लड़खड़ा रही थी न उसकी आवाज, ‘‘ क्षीरसागर में भगवान जब शेषशय्या
पर होते तो एक कछुआ नीचे से चढ़ता हुआ उनके चरणों की ओर बढ़ने लगता... भगवान के चरणों
की सेवा में जुटी माता लक्ष्मी की दृष्टि उस पर पड़ जाती और वह झिड़ककर उसे हटाने
लगतीं... तब तक शेषनाग की आंखें जल उठतीं... वे ऐसी फुंफकार मारते कि कछुआ करोड़ों
कोस दूर जा गिरता! लेकिन लक्ष्य-भंग का न कोई क्षोभ न पस्ती का कोई भाव! वह फिर
वहीं से यात्रा शुरु कर देता. युगों-युगों तक चलकर वह फिर-फिर क्षीर सागर पहुंचता
लेकिन फिर-फिर वही फुंफकार और वही करोड़ों कोस दूर जाकर गिरना और वैसे ही पुनः पुनः
वही यात्रा! अथक-अनन्त और अपराजेय आस्था! उसने कभी हार नहीं मानी. लाखों साल तक
शेषनाग ने कछुए को भगवान के चरणों तक पहुंचने से रोके रखा. लेकिन जब त्रेता में
रामावतार हुआ तब जाकर कछुए को केवट के रूप में भगवान के श्रीचरणों की
महास्पर्श-सिद्धि मिली. यहां भी लक्ष्मण के वेश में शेषनाग ने उसे रोकने का भरपूर
प्रयास किया लेकिन भगवान को तो जन्म-जन्म के अपने इस भक्त का मर्म पता था, तो वही
है यह केवट वंश! ’’
कंठ से कथा-प्रसंग के समानांतर ही नेत्रों से अविरल बह रही हैं कथा-रस की विरल
धाराएं, ‘‘...तो केवट वंश का काम ही है सबको पार लगाना... डूबते को बचाना और जो डूब
गया उसे भवसागर पार लगाना! लेकिन क्या करें बेटा! पेट है! पैसा न कमायें तो खायें
क्या ? ’’
पुलिस वाले उसकी बातों में नहीं, पानी पर उसके मुआयना के जाहिर हो रहे संजीदा अंदाज
पर ध्यान गड़ाये हुए हैं. इस तरफ सीढ़ियां-घाट और किनारे के बड़े-बड़े भवन पीछे छूटते
जा रहे हैं किंतु दूसरी तरफ बालुका-राशि साथ-साथ चल रही है. ऊंचे घाटों, ऊपर उठती
सीढ़ियों और गगनचुंबी भवनों की ओर दृष्टि गयी तो लगा जैसे हम आंगन में रखी किसी गहरी
भरी थाली में तैर रहे हों! बालुका राशि देख मन में रेत-बवंडर जैसी अनुभूति! तभी
सामने से सीधा इधर ही आते एक बड़े बजड़े ने ध्यान खींचा. लोग लदे हुए. यह एकदम इस तरह
सीधे क्यों चला आ रहा है! कहीं यह अनियंत्रित तो नहीं हो चुका है? चिंता तब और बढ़ी
जब इस ओर से दोनों सिपाहियों व अपने नाविक को एकदम गाफिल पाया. मन में आया कि इन
तीनों का ध्यान इस ओर खींचूं लेकिन चुप रहा. बजड़ा सामने से एकदम बुलडोजर की तरह
बढ़ता ही चला आ रहा है!
मुझे लगा कि अब चुप रह जाना आत्मघाती साबित हो सकता है. मैंने बगैर किसी से मुखातिब
हुए भयमिश्रित आश्चर्य जताया, ‘‘ बाप रे! ई बजड़ा केतना बड़हन हौ! ’’ नाविक ने मेरी
ओर देखा, फिर तुरंत मुंह फेर लिया.
अब महज कुछ लग्गी ही दूर रह गया है बजड़ा. वह जिस तरह बढ़ता चला आ रहा है, भय लगातार
बैलून की तरह फूल रहा है- यह सचमुच कहीं हमारी इस नाव पर ही न चढ़ जाये! अब तक मिलने
वाली दूसरी छोटी-मंझौली नावों से ऐसा डर जरा भी नहीं लगा था. सांसें पहले रूंधती-सी
महसूस हुईं फिर सिर में चक्कर-सा घूमने लगा. बजड़ा एकदम सामने! सांसें, भंवर के बीच!
डूबती हुई-सी. बगल से गुजरने लगा तो कलेजा धक्क-से करके रह गया, एक हाथ से भी कम का
अंतर! खैर, टक्कर टली! जान में जान आयी. बजड़े और नाव का यह युग्म गिल्ली-डंडे जैसा.
संकट सामने से गुजर गया. अब हम दशाश्वमेध के सामने आ गये. वही गति, वही अंदाज. वही
संजीदा मुआयना.
एक जवान ने राजेंद्र प्रसाद घाट की तरफ इशारा किया, ‘‘ चच्चा, देखा! एकदम इहें से
उऽ लड़िका नहायेके लेल पानी मे कूदल रहल! ’’
‘‘ अबे चोप्प! तूं दिमाग मत खराब कर! ढेर अइंठबऽ तऽ इहें उतर जाब साले! हाथ मीसत रह
जइबाऽ! ’’ एतवारु ने आंखें ऐसे तरेरी कि वह तत्काल सटक गया. मैं चकित. कहीं ऐसा न
हो कि इसे दबोच ही लें दोनों जवान! भला कोई पुलिसवालों से ऐसे बोलकर बच सकता है!
नशे में ही तो कर रहा है वह ऐसा! दूसरे ही क्षण घोर आश्चर्य! उसकी गाली पर दोनों
खिलखिलाकर हंस रहे हैं!
एतवारु रात वाले अंदाज में आ गया है, ‘‘ ई पुलिसन के शराफत देखा! आपन काम फंस गइला
पर गाय बन जाऽलन! लेकिन कौनो मोटा मामिला पकड़ा जाये तो आपन बापो के पहिचाने से मुकर
जालन! बहुत हरामी जात! केहु के आपन नाहीं! ’’
दोनों जवान एतवारु की बात को जैसे सुन ही नहीं रहे हों! नहीं तो यह आदमी तो अपनी भी
दुर्गति करा लेता और जाने-अनजाने इसमें मुझे भी कुछ न कुछ झेलना पड़ जाता! एतवारु ने
तीसरी बोतल खोल ली थी. खाली बोतलों को वह बहुत सावधानी से झोले में रख रहा था. गंगा
में फेंकने का तो सवाल ही नहीं, नाव से भी कोई स्पर्श नहीं! बोला, ‘‘ ई गंगा माई
हइन! बाबा विश्वनाथ के तीसरकी आंख! ’’ फिर आचार्य-मुद्रा में टिप्पणी, ‘‘ गंगा माई
की पवित्रता की समकालीन युग में किसी को चिन्ता नहीं... तो ऐसे में क्या होगा ? वह
इसी तरह बलि लेंगी और क्या! अइसहीं नहीं न कोई डूब जाता है गंगा की धार में! ’’
एक जवान की जिज्ञासा, ‘‘ चच्चा! लाश इहें कहीं होई कि आगे बहुत दूर निकल गल होई ?’’
‘‘ एकदम बैल हो ? नाव कहां होगा, इसका कोई निश्चित विधान थोड़े न है! कहीं भी होगा!
गंगा जी का मन! जहां दबाये रखी हों! ’’ हर बार एतवारु का अंदाज सख्त लेकिन पुलिस
वालों का रवैया खिलंदड़ेपन से भरा.
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प्रहलादघाट से थोड़ा पहले एतवारु ने दाहिनी तरफ
कुछ देख लिया है! मुंह बंद. आंखें फैलती हुईं. चेहरे पर लहराता लकीरों का जाल. कुछ
टटोलती हुई-सी पुतलियां. अंग-अंग में गति. उसका पूरा शरीर जैसे बोल रहा हो! उसने
तेज-तेज हाथ हिलाये और गति धीमी कर लेने का संकेत किया. एतवारु जितना ही एकाग्र, जल
भी उतना ही थिर-स्थिर. बेहरकत.
एक जवान ने दूसरे को बताया, ‘‘ इहां तो रात भर हमलोगों ने एक-एक चप्पा छान मारा है!
यहां तो नो चांस! ’’ एतवारु ने पानी से ध्यान समेटकर उसके चेहरे पर गड़ा दिया. वह
आगे बोलता चला गया, ‘‘ कई-कई बार दोनों गोताखोर एकदम यहीं आसपास उतरते और बैरंग
लौटते रहे! ’’
एतवारु का चेहरा लपटों की तरह फफा उठा, ‘‘ साला! चोप!’’ सभी सटक सीताराम! वह आगे
चीखा, ‘‘ इहां अगर नाव नहीं निकला तो आज ही हम जलसमाधि ले लेंगे! ...यहीं!
...तुरंत! ’’
दोनों सिपाही स्तब्ध. मैं भी. नाविक भी. शुक्र कि दूसरे ही पल उसने अपना मुंह फिर
धारा की ओर फेर लिया! देखते ही देखते नाव कुछ आगे बढ़ गयी तो एतवारु ने सिर नचाकर
पानी पर से नजर उठायी और दांत पीसते हुए नाविक को घूरा. वह घबराकर हकला उठा, ‘‘
समझली बाबा! लौटत हईं फिर पीच्छवें... उहैं! गोस्सा मत बाबा! ’’
नाविक का कमाल! उसने पानी को काटते हुए धाराओं को दबोचते नाव को सांय से ऐसे मोड़ा
कि यह पूरी प्रक्रिया करतब जैसी लगी. पल भर में गोलार्द्ध घूमकर नाव पीछे! जैसे
तीखी कटान का चौथाई चांद भरे-पूरे चमकते आसमान में कलाएं दिखाने लगा हो. मौका ऐसे
दुःख का नहीं होता तो यह दृश्य मन पर अवश्य ही कुछ अनोखी आनन्द-रेखाएं खींचता.
एतवारु नाव पर खड़ा हो गया है. एकदम जल पर एकाग्र. पलकें झपकना भूल गयी हैं. चौकस
-चौकन्ना. दृष्टि एकदम बगुले की तरह, जल-राशि की बून्द-बून्द की तलाशी लेती हुई.
सभी उसकी आंखों के निशाने का अंदाजा लगाते हुए जल-विस्तार पर अपने-अपने हिसाब से
नजर रखने के भरसक प्रयास में मशगूल. तभी जल के तल पर एक बड़ा बुलबुला आया- गुड़्प्प!
इसके आकार की पुष्टता और आने-फूटने की क्रिया! सबने यह सब देखा. नाव को आगे-पीछे
करते हुए बार-बार वहीं रखने का प्रयास जारी रहा. कुछ ही क्षणों बाद वहीं से फिर
वैसा ही परिपुष्ट बुलबुला- गुड़्प्प!!
एतवारु ने दोनों पंजे सटाये हुए अपने प्रणामी हाथ आसमान की ओर उठा लिये हैं, ‘‘ जै
गंगा माई! ’’ और दूसरे ही क्षण छलांग. पानी से उसके शरीर के टकराने का शब्द जोरदार
गूंजा- छप्पाक्क्!
जरूर तेज चोट आयी होगी! दूसरे ही क्षण अब जल के भीतर उसका कहीं जरा भी अता-पता तक
नहीं. कश्मकश का यह अंतराल बेचैन कर देने वाला. छलांग से पहले जब वह जल-तल के
निरीक्षण में गुम था, उसके वृद्ध होने का खयाल कर मुझे भय होता रहा कि कहीं इसके
साथ कुछ गड़बड़ न हो जाये! लेकिन, पुलिस वालों के चेहरे पर कोई संशय नहीं था. कहीं
ऐसा तो नहीं कि उसे उसका यही अति-आत्मविश्वास ही...
अचानक जल का तल गुल्टियाती चादर-सा हल्के उठा और दूसरे ही क्षण पानी से एतवारु का
सिर उठता हुआ बाहर निकल आया. सबकी निगाहें उसके आसपास नाचने लगीं. वह तेज-तेज
सांसें ले रहा है और सिर हिलाकर पानी झाड़ रहा है. देखते ही देखते उसका मुखमण्डल
चमकने लगा है. यानी यह सफलता का संकेत है! एक हाथ से पानी काटता हुआ वह नाव के करीब
आने लगा तो उसके बगल में जल कुछ उठा-उठा-सा दिखने लगा. अब दूसरे हाथ से लाश पकड़े
होने का आभास!
पानी से जूझता हुआ वह नाव के काफी निकट आ चुका है. हिलते जल पर उसके पीछे लाश अब
रह-रहकर साफ झलकने लगा है. सिपाहियों के चेहरे खिल उठे हैं. पहुंचते ही दोनों
जवानों ने मिलकर लाश को नाव पर खींच लिया और धक्का देकर एक ओर लुढ़का दिया. पानी में
फुलने-गलने व नुंचने -चुंथने से यह विकृत हो चुका है. सिपाहियों के चेहरे पर राहत
रेंग रही है!
एतवारु आ गया है नाव पर. एक जवान ने गुणगान शुरु कर दिया, ‘‘ चच्चा ! तोहरे पर गंगा
माई के कौनो खास किरपा जरूर हौ! बतावाऽ, एकदम इहैं रात भर जाल गिरत रह गल... दू-दू
ठे गोताखोर कूदत रह गइलन... लेकिन सब मेहनत बेकार! कौनो सुरागो ना लागल! लेकिन, वाह
चच्चा ! तूं एके बार कूदला अउर लाश हाथ में! ’’
‘‘ अब चलाऽ, मस्का मत लगावा! ’’ होठों के आसपास बहुत बारीक मुस्कान जिसमें स्वयं की
प्रशंसा से उत्पन्न सलज्जता की महीन आभा. किंतु आवाज वैसे ही कांटेदार, ‘‘...तूं
तारीफ पेलके हम्मे चूना लगावल चाहत हउवा? ...कायदे से तोहार काम हो गइल, अब जल्दी
से पांच सौ रोपैया और ढीलाऽ! ...हम्मे अस्सी पहुंचावाऽ! ’’ दूसरे ही पल उसने बोतलों
पर नजर फेंकी, ‘‘ हमार तऽ कोटा ढेरे बांचल रह गल इयार! ’’
नाव लेकर दोनों जवान दशाश्वमेध घाट पर ही उतर गये हैं. उन्होंने नीचे से ही एतवारु
और नाविक को अलग-अलग कुछ नम्बरी नोट थमाये. मैंने उतरना चाहा तो एतवारु ने हाथ पकड़
लिया, ‘‘ आप कहां! अस्सी चलिये! ’’ मैं रूक गया हूं.
वह जैसे आत्मा से बोल रहा हो, ‘‘ नशा तो मुर्दा खोजने का मेरा साधन भर है!’’ झोले
में बोतलों को बांधने में जुटा है वह, ‘‘ लाश शुरू में मिल गया तो कोटा तुरंत बंद!
अब यह सब चला झोले के अंदर! केवल एक छोटी बोतल रात में आचार्य जी की वंदना के
निमित्त बाहर रखूंगा... बस ! ...क्या आपको अब तक विश्वास नहीं हुआ कि शराब पीकर मैं
केवल और केवल मुर्दा खोजता हूं! रोज पानी के भीतर का मुर्दा तो नहीं मिलता लेकिन वह
बे-पानी आचार्य नामक मुर्दा हर शाम मिलना लगभग फिक्स है! इसीलिए भर दम पीकर उसके
दरवाजे पर जाता हूं... भई, जिसके भीतर ईमान, धरम और इंसानियत सब मर गये हों, वह
मुर्दा ही तो हुआ!... मैं तो कहता हूं कि यह आचार्य नामक मुर्दा असली शवों से भी
ज्यादा खतरनाक है... क्योंकि यह दुर्गन्ध भर नहीं फैला रहा, बल्कि पूरे समाज और
समग्र जीवन-मूल्यों को ही लाश बना देने पर आमादा है! ...इसलिए इसे रोज दुत्कारने,
धिक्कारने और गरियाने को मैं एक जरूरी कार्रवाई मानकर अंजाम दे रहा हूं!’’
मैंने जेब से लिफाफा निकाल लिया है. आश्चर्य कि यह अजीब ढंग से घृणास्पद लग रहा है!
निस्तेज, निष्प्राण, असह्य और यथाशीघ्र त्याज्य. पता नहीं औचक कहां से हाथों में
आवेग आ गया और यह टुकड़े-टुकड़े! भरी हुई मुट्ठी को हवा में जोर से लहराया किंतु
सामने मचल रहे झोंके ने अपना अस्वीकार दर्ज कराने में क्षणांश भर भी देर नहीं की.
तत्काल, तीव्र प्रतिरोध. तमाम चिंदियां चक्कर खाकर निकट ही गिरने लगीं. किनारे के
मंथर जल पर पास-पास ही बिखरे कागज के टुकड़े छहलाने-मंडराने लगे हैं. एकदम मुर्दों
की तरह.
22.02.2011, 00.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Mohan thanvi [mohanthanvi@gmail.com] Bikaner - 2012-01-19 01:55:19 | | | |
श्यामल जी. प्रभावी कहानी के लिए बधाई। राजधानी दिल्ली की ठसक और ठेठ बनारसी जुबान मेँ आपका अँदाज ए बयाँ भी कथ्य मेँ रोचकता व उत्सुकता कायम रखे है। फिर फिर बाँचने की चाह होती है। | | | | | | | | pankaj shukla [pankajshukljhs@yahoo.com] jhansi - 2012-01-18 10:09:58 | | | |
श्यामल जी, इतनी सुंदर रचना के लिए धन्यवाद. | | | | | | | | Gita pandit [] - 2011-06-21 04:28:29 | | | |
भाव, भाषा और कथ्य का सुंदर संयोजन....
बधाई श्याम बिहारी श्यामल जी... | | | | | | | | B.K. Kumar [] New Delhi - 2011-06-18 05:29:51 | | | |
कहानी एक दम में पढना ही बहुत कुछ बयां करता है. कथानक और उसकी बयानगी में इतनी रवानगी है जैसे गंगा की धार, जो ऊपर से तो शांत पर अंदर से महीन. ऐतवारू को सुनते वक़्त कई बार रोंगटे खड़े हुए...मानवीय गुणों से आप्लावित ऐतवारू और वही दलदल में फंसा एनजीओ के आचार्य- आज के सन्दर्भ में कई बातें उजागर करता है. कहानी वहां तक सीधे पहुंचती है, जहाँ जाकर आचार्य को जगाया जा सके. बहुत खूब श्यामल जी ! | | | | | | | | अशोक कुमार मिश्र [] दिल्ली - 2011-05-27 04:39:27 | | | |
आंचलिकता में रगी-पगी जीवंत कहानी. मेरी बधाई स्वीकार करें|आपने ने ऐसे लोगों की पोल खोल कर रख दी है, जो झूठी सफलता से आल्हादित हैं| आम तौर पर सच्ची स्थितियों पर लिखी गई कहानियां कहीं न कहीं आ कर फिसल जाती हैं| वैसे भारत के हर छोटे-बड़े शहरों में ऐसे अचरजवा भरे पड़े हैं| एनजीओ और कथित जनक्रांति करने वाले लोगों ने ही ऐसे अचरजवा को पैदा किया है और एतवारु जी जैसे लोग पीछे धकेल दिये गये हैं| धन्यवाद .... | | | | | | | | Awanish Kumar singh [awanish1233@gmail.com] Doha - 2011-05-27 04:36:31 | | | |
Shyam ji,behatrin prastuti,Language is very flowing.Ghajab ! | | | | | | | | vijay singh [vijaysikriwal@gmail.com] delhi - 2011-05-27 04:11:13 | | | |
कहानी ब्लेड की तरह धारदार है |भाषाई गलबजवल ने बनारस को खांटी अंदाज में जिन्दा रखा और जिस बारीक़ ढंग से कहानी बुनी गयी है, वह सबसे ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि‘‘ नशा तो मुर्दा खोजने का मेरा साधन भर है!’’ | | | | | | | | राजीवशंकर मिश्रा बनारस वाले [rajivshankermishra@live.com] Kathmandu - 2011-05-27 03:56:28 | | | |
श्याम जी सादर.. धन्यवाद. कहानी पढ़ने क़ा दिल तो बहुत ही कर रहा है लेकिन क्या करूं पढ़ते ही मै बनारस की उस सोच में डूब जाउंगा. उन यादों से पीछे आना मेरे लिए बहुत ही कठिन है मित्र ..बनारसी ठाठ की जीवन्त भाषा में बेहतरीन कहानी है..लोग जो एक जूनून की तरह अपने काम को अंजाम देते है.. लेकिन ये सब बस मेरे लिए एक याद ही रह गयी है..आपकी सोच को सादर .. प्रणाम | | | | | | | | Arun Madhhukar [madhukararun@yahoo.in] Mangrol (Rajasthan) - 2011-05-27 03:52:57 | | | |
A real modern story with nice & heart touching local effect. | | | | | | | | Satya Mitra Dubey(satya Dubey) [] NOIDA - 2011-05-23 04:13:20 | | | |
सिस्टम, भाषा, विवरण, कथा. इतने सुंदर आलेख के लिये बधाई. | | | | | | | | mahender singh [mahenrijul@gmail] delhi - 2011-05-21 10:29:50 | | | |
कहानी वाकई दमदार है, बहुत दिनों बाद कुछ विचारोत्तेजक लेख पढने को मिला, आचार्य जी जैसे लोग तो हर कहीं मिल जायेंगे पर ऐतवारु जैसों का मिलना तो अब अपवाद ही है, एक अच्छी दमदार कहानी के लिए बधाई! | | | | | | | | Dr. Dinesh Tripathi 'shams' [] Balrampur - 2011-05-21 07:42:30 | | | |
श्यामल जी , बनारसी ठाठ की जीवन्त भाषा में बेहतरीन कहानी है ये , कहानी की भाषा और कथ्य दोनों ने ऐसा बांधा कि बस अभिभूत होकर रह गया , ऐसे आचार्य हर जगह मौजूद हैं , और इन्हें इतवारी जैसे लोग ही पह्चान पाते हैं.बहुत खूबसूरत ट्रीट्मेंट दिया है आपने कहानी को , बधायी. कन्था भी मैं नियमित पढ़ रहा हूं . | | | | | | | | रवि भूषण पाठक [rabib2010@gmail.com] मउ - 2011-05-21 05:05:53 | | | |
बहुत अच्छी कहानी ।इस कहानी का आचार्य तो मूलत: मिथिला का है ,परंतु हिंदी साहित्य में ऐसे आचार्यों की कमी नहीं है ,कुछ तो सभी तरह से बनारसी हैं जब हिंदी साहित्य इनसे पार पा लेगा तो साहित्य का भी भला होगा और बनारस का भी । | | | | | | | | अविनाश वाचस्पति [nukkadh@gmail.com] Sant Nagar - 2011-05-21 02:42:27 | | | |
जितनी बड़ी कहानी, उससे बड़े विचार, यह सधे विचार ही कहानीकार को मालामाल करवाते हैं। | | | | | | | | padmsingh [ppsingh8@gmail.com] Ghaziabad - 2011-05-21 02:27:47 | | | |
फचाफच गाली-गिलौरी के बीच अस्सी वाली यह गलाफाड़ चिल्ला-चिल्ली, पीठियाठोंक हुरपेटा-हुरपेटी और पूंछतान सिंघफंसव्वल-टंगअड़व्वल बनारस के सिवा भला और कहां!
बनारसी मिजाज़ की अद्भुद प्रस्तुति... कहानी जबरन उसी माहौल में ला खड़ा करती है. जिसने बनारस का असल रंग देखा हो उसके लिए परदेस में रह कर घर की याद जैसी है कहानी... अद्भुद ! | | | | | | | | रतन चंद 'रत्नेश' [ratnesh1859@gmail.com] चंडीगढ़ - 2011-05-21 02:14:30 | | | |
कहानी बहुत अच्छी लगी . भोजपुरी शब्दों का जादू पूरी तरह संप्रेषित हुआ है. अमृत-वाणी पर एतवारू को दिया गया उपदेश मन में उतरा गया. चना चबेना....पर एक बात और याद आई... सब कुकुर काशी चली जइहें त पत्ता के चाटी?? श्यामल जी को इस कहानी के लिए बधाई.. | | | | | | | | santosh chaturvedi [santoshpoet@gmail.com] allahabad - 2011-05-21 01:58:49 | | | |
बेहतरीन कहानी. शुक्र है समाज में आज भी किसी की परवाह न करने वाले ऐसे लोग भी हैं जो एक जूनून की तरह अपने काम को अंजाम देते है. ढेर सारी बधाई. | | | | | | | | देवेश तिवारी [deveshrisk@gmail.com] बिलासपुर - | | | |
अदभुत...कहानी का अलग नया अंदाज. कभी लाइनों को दो तीन बार पढ़ना पड़ा तो कभी लाइनें एक बार में की कई मर्तबा पढ़ी जैसे लगीं. खास कर स्थानीय बोली में लिखी लाइनों का अलग ही अंदाज था. बहुत ही सुन्दर कहानी. अगली कहानी का इंतजार रहेगा. | | | | | | | | PRADEEP SHARMA [SHARMPRADEEP69@GMAIL.COM] - | | | |
amazing treatment to story. after years a good story on benaras. congrats. | | | | | | | | shyam bihari shyamal [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] varanasi - | | | |
प्रिय बंधु सर्वश्री रामकुमार तिवारी जी, रामकुमार बघेल जी, सनील कुमार बेहरा जी, मंजुलता सेन जी, हिमांशु जी, सविता जी और राहुल जी!
कहानी ‘चना चबेना गंगजल’ पर आपलोगों की प्रतिक्रियाओं ने मुझे रोमांचित कर दिया है! मैं तो पिछले दस साल से महाकवि जयशंकर प्रसाद के समय में विचरण कर रहा रहा। ‘कंथा’ उपन्यास-लेखन के दौरान तो सचमुच मुझे यही लगता रहा कि मैं अपने आसपास से बाहर ही हो चुका हूं! संभवतः अपनी इसी पीड़ा से निकलने और और अपनी वस्तुस्थिति जांचने के लिए ही कुछ समय पहले मैंने कुछ कहानियां लिखने का प्रयास चलाया। यह रचना भी उसी आत्मपरीक्षण-प्रक्रिया का हिस्सा रही! आपलोगों की गवाही से अब आश्वस्त हो पा रहा हूं कि मैं अपने समय से छिटककर कही अन्यत्र नहीं पड़ा हुआ हूं! यह सब अपना मनःसंघर्ष व्यक्त करने के लिए लिखा है! आप सबको हार्दिक आभार! सर्वथा अनौपचारिक! अनंत अतरंग शुभकामनायें. | | | | | | | | Ramkumar Tiwari [ramkumarbilaspur@gmail.com] Bilaspur - | | | |
आंचलिकता में रगी-पगी जीवंत कहानी. मेरी बधाई स्वीकार करें. | | | | | | | | Ramkumar Baghel [] Raipur, Chhattisgarh - | | | |
लेखक ने ऐसे लोगों की पोल खोल कर रख दी है, जो झूठी सफलता से आल्हादित हैं. | | | | | | | | सुनील कुमार बेहरा [] Renukoot, Sonebhadra, UP - | | | |
बहुत अच्छे से लेखक ने कहानी को ट्रीट किया है. आम तौर पर सच्ची स्थितियों पर लिखी गई कहानियां कहीं न कहीं आ कर फिसल जाती हैं. लेखक बहुत कुशलता से अंत तक कहानी को निभा ले गया है. | | | | | | | | मंजूलता सेन [] Kolkata - | | | |
भारत के हर छोटे-बड़े शहरों में ऐसे अचरजवा भरे पड़े हैं. एनजीओ और कथित जनक्रांति करने वाले लोगों ने ही ऐसे अचरजवा को पैदा किया है और एतवारु जी जैसे लोग पीछे धकेल दिये गये हैं. कथाकार ने एक ऐसे विषय को उठाया है, जिससे बहुत से लोगों की आंखों के आगे छाया हरा रंग थोड़ा धुलेगा. | | | | | | | | Ashish Mishra [ashishmishra2012@sify.com] 5810 Reisterstown Road, Baltimore, United States, 21215 - | | | |
आपने बहुत महीन धरातल पर कहानी लिखी है. हमने अपने कार्य कौशल को केवल समाज हित के कारण नहीं छोड़ा और दूसरी ओर कुछ पाखंडी अपने को इस तरह प्रचारित-प्रसारित करते रहे, जो वो कभी थे ही नहीं. यह कहानी बहुत प्रभावशाली है. यह कहना जल्दीबाजी होगी और शायद इसे फतवे की तरह भी लिया जा सकता है लेकिन एक पाठक तो यह कह ही सकता है कि आपकी यह कहानी आने वाले दिनों में हिंदी की श्रेष्ठ कहानियों में शुमार की जायेगी. मैं साहित्यकार नहीं हूं लेकिन एक पाठक होने के नाते कहानी के मर्म और पाठक का मन दोनों जानता-समझता हूं. | | | | | | | | Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] नोयडा - | | | |
जिसने श्यामल का धपेल और अग्निपुरुष पढ़ा हो, उनको समझ में आयेगा कि वे कितना आगे निकल गये हैं. भाषा और कथन के लेबल पर तो श्यामल का अब कोई मुकाबला ही नहीं है. जयशंकर प्रसाद वाले उपन्यास से भी आगे की भाषा है. आपका पूरा ट्रीटमेंट बताता है कि हिंदी की कहानी कितने महीन तरीके से चीजों को बुन रही है. | | | | | | | | SAVITA SINGH [savitasingh.singh7@gmail.com] jagatganj , varanasi - | | | |
‘चना चबेना गंगजल‘ कहानी जितनी जीवंतता से बनारसी मन-मिजाज की बानगी पेश करती है उससे कहीं अधिक दक्षता और संवेदन-सजगता से हमारे समग्र समय-समाज को रेशा-रेशा चित्रित करके सामने रख देती है! | | | | | | | | राहुल [] खजुरी,वाराणसी - | | | |
आचार्य के बारे में स्थानीय लोगों की राय सचमुच ही बहुत खराब है। पता नहीं कैसे बाहरियों को अचार जी \\\'महान\\\' नजर आते हैं ! एतवारू जी असल बनारसी हैं। हमें उन पर फक्र है। | | | | | | |
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