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कर्ज से हारती किसान की जिंदगी

मुद्दा

 

कर्ज से हारती किसान की जिंदगी

राजेन्द्र बंधु  इंदौर से


किसान से कब बंधुआ मजदूर बन गया, यह नंदकिशोर को पता ही नहीं चला. महंगे कीटनाशक, महंगे बीज और रासायनिक खाद ने उसे कर्जदार बना दिया. अपने एक भाई, दो बेटियों और बुजुर्ग मां सहित छह सदस्यों का भरण-पोषण चार एकड़ खेती से संभव नहीं रहा और इधर साहूकार का 50 हजार का कर्ज सिर पर था. खेती की जिम्मेदारी भाई को सौंपकर खुद बंधुआ मजदूर बनकर साहूकार के ट्रेक्टर की ड्राईवरी करने लगा.

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सिहोर में आत्महत्या करने वाले किसान शिवप्रसाद के बच्चे


कुछ सालों तक बंधुआ मजदूर बने रह कर उसे लगा कि इससे तो कभी कर्ज उतरेगा नहीं. लिहाजा उसने बंटाई पर खेती करने की सोची. नंदकिशोर ने उसी साहूकार की 20 बीघा जमीन 25 हजार रूपए में बंटाई पर ली, जिसके यहां वह बंधुआ था. ये 25 हजार रूपए भी उसके सिर पर कर्ज के तौर पर बढ़ गए, जिसकी जमानत के रूप में उसने पत्नी के चांदी के जेवर गिरवी रखे. इस तरह बंधुआ मजदूरी और खेती साथ-साथ चलने लगी.

इस बीच बेटी बीमार हो गई, जिसके इलाज के 10 हजार रूपए भी उसी साहूकार से उधार लेने पड़े. बढ़ते कर्ज के बावजूद खेतों में लहलहाती फसलें उसमें उत्साह पैदा कर रही थीं. लेकिन ठंड पड़ते ही पाला पड़ गया और पूरी फसल तबाह हो गई. लहलहाती फसलों के बर्बाद होने का सदमा वह झेल नहीं पाया और कीटनाशक पीकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के दमोह जिले के हर्रई नामक गांव के नंदकिशोर की यह कहानी बताती है कि किस तरह लघु और सीमांत किसान मजदूर में तब्दील होते जा रहे हैं.

पिछले दो महीनों में मध्यप्रदेश में 38 किसानों ने आत्महत्या के प्रयास किए, जिनमें 22 किसानों ने हमेशा के लिए अपनी जिंदगी खो दी. इसके पीछे पाला पड़ना और फसलों का तबाह होना मुख्य कारण माना जा रहा है.

गौरतलब है कि इन 38 किसानों में से 26 किसान एक से पांच एकड़ की खेती वाले हैं, जबकि तीन किसान सात से दस एकड़ तथा तीन किसान पन्द्रह से बीस एकड़ जमीन के मालिक रहे हैं. इनमें दो किसान ऐसे भी पाए गए, जिनके पास अपनी जमीन नहीं है, बल्कि वे बंटाई पर जमीन लेकर खेती करते रहे हैं. यानी आत्महत्या करने वाले किसानों में सर्वाधिक तादाद लघु और सीमांत किसानों की है.

साहूकारी कर्ज से मुक्ति नहीं
किसानों की आत्महत्या के पीछे कर्ज एक बड़ा कारण है. लोगों का मानना है कि कम भूमि वाले किसानों के लिए बगैर कर्ज के खेती करना असंभव हो गया है. बैंकों से मिलने वाला कर्ज अपर्याप्त तो है ही, साथ ही उसे पाने के लिए खूब भाग-दौड़ करनी पड़ती है. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित बैंकों की शाखाएं अभी भी नौकरशाही से मुक्त नहीं हो पाई हैं, जो लघु व सीमांत किसानों के लिए असुविधाजनक हैं. इस दशा में किसान आसानी से साहूकारी कर्ज के चंगुल में फंस जाते हैं.

मध्यप्रदेश में पिछले दो महीनों में आत्महत्या करने वाले किसान 20 हजार से लेकर 3 लाख रूपए तक के साहूकारी कर्ज में दबे थे. साहूकारी कर्ज की ब्याज दर इतनी ज्यादा होती है कि साल भर के अंदर की कर्ज की मात्रा दुगनी हो जाती है. ऐसे में यदि फसल खराब हो जाए तो आने वाले समय में यह संकट और भी बढ़ जाता है.

आत्महत्या करने वाले पांच एकड़ जमीन वाले छह किसानों पर तो एक लाख रूपए से अधिक का कर्ज था. जिन 38 किसानों ने आत्महत्या के प्रयास किए, उनके नाम पर कुल मिलाकर साहूकारों के 45 लाख रूपए और बैंको के 11 लाख रूपए का कर्ज है. इस तरह उनके कुल कर्ज का 80 प्रतिशत हिस्सा भारी ब्याज वाले साहूकारी कर्ज का है. यानी ग्रामीण क्षेत्रों तक बैंकों की पहुंच और किसान क्रेडिट कार्ड के बावजूद किसान साहूकारों के सामने हाथ पसारने को विवश है.

दमोह जिले के कुलुआकला गांव में बंटाई पर खेती करने वाले 25 वर्षीय नंदराम रैकवाल पर करीब सवा लाख रूपए का साहूकारी कर्ज था. इसी कर्ज की चिंता में उसने खुद को आग लगाकर जान दे दी. सागर जिले के देवरी गांव में 7 एकड़ जमीन पर खेती करने वाले त्रिलोकी पर डेढ़ लाख रुपये का कर्ज था. कीटनाशक पीकर आत्महत्या का प्रयास करने वाले दमोह जिले के मोहन रैकवार पर डेढ़ लाख रुपये के साहूकारी कर्ज का बोझ है.

छतरपुर जिले के नाथनपुरवा गांव के कुंजीलाल के पास मात्र 7 एकड़ जमीन थीं और कर्ज तीन लाख. विदिशा जिले के रंगई गांव में तीन एकड़ जमीन के मालिक दौलतसिंह पर साहूकारों का 50 हजार का कर्ज है. कर्जदार किसानों की यह फेहरिश्त यहीं खत्म नहीं होती है, बल्कि मध्यप्रदेश के लगभग सभी लघु और सीमान्तर किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं.

यदि मध्यप्रदेश में किसानों पर कर्ज की मात्रा का आंकलन करें तो इसका ग्राफ दस हजार करोड़ से उपर पहुंचा दिखाई देता है. क्योंकि अपेक्स बैंक के रिकॉर्ड में प्रदेश के किसानों पर साढ़े सात हजार करोड़ रूपए कर्ज के रूप में दर्ज है. इसमें यदि कम से कम ढाई हजार करोड़ रूपए साहूकारी कर्ज से जोड़ दें तो यह आंकड़ा दस हजार करोड़ को पार कर लेता है. इसमें दूसरे निजी बैंकों के कर्ज के आंकड़े शामिल नहीं हैं. वर्ष 2006 में गठित राधाकृष्णन समिति ने भी किसानों की आत्महत्या के लिए कर्ज को मुख्य कारण माना है.

भारत सरकार द्वारा किसानों की कर्ज माफी की घोषणा को राहत के रूप में देखा गया था. किन्तु 32 लाख से भी अधिक किसानों पर आज भी बैंकों का कर्ज बकाया है. सहकारी संस्थाओं में हुए घोटालों की वजह से किसानों के सौ करोड़ के भी अधिक के कर्ज माफ नहीं हो पाए.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Motilal Menria [motilal.menaria@yahoo.com] Sarthala - 2011-12-25 12:03:37

 
  किसान विद्युत विभाग से भी दुखी है क्यों वह साल में 4 महीने बिजली उपयोग करता है और 8 महीने तक उनकी मोटरें नहीं चलती है. फिर भी उसे 12 महीने का बिल भरना पड़ता है और फसल वाले मौसम में बिजली 3 घंटे कर दी जाती है इसके लिए सरकार ही जिम्मेदार है. 
   
 

Sangeeta Patidar [ruralreporter@gmail.com] Indore -

 
  अब यह खबरें भी आ रही है कि मध्‍यप्रदेश में किसानों की राहत के नाम पर आवंटित राशि राशि पटवारियों की मनमर्जी से बांटी जा रही है। लगता है सरकार का प्रशासन पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। पटवारी मनमर्जी से काम कर रहे है और किसान परेशान है।  
   
 

Cholelal Bharti [ccnmedia@rediffmail.com] Indore -

 
  सचाई को सामने लाने वाली रिपोर्ट है। अब तक पढा तो बहुत कुछ था, लेकिन जो तथ्‍य इस रिपोर्ट में मिले वे दिल दहला देने वाले है। क्‍या सरकार का भी दिल दहलेगा।  
   
 

Rahul [adl_rahul@yahoo.com] Bhopal -

 
  चूंकि बड़े-बड़े नेता और अफसरों भी बडी जमीन और खेती के मालिक हैं, इसलिए वे लघु व सीमांत किसानों के लिए कुछ नही सोचते। उनकी सोच बड़े किसानों तक ही सीमित है। इसलिए ज्‍यादातर योजनाएं लघु व सीमान्‍त किसानों के लिए फायदेमंद नहीं रह पाती है।  
   
 

Rachana Patidar [] Indore -

 
  इस रिपोर्ट के तथ्‍यों को देखकर आंखे खुल गई। राजेन्‍द्र जी ने दूरदराज के क्षेत्रों में घूम घूम करे जो सचाई सामने रखी है, वह हमे यह सोचने के लिए विवश करती है कि यदि हमने खेती किसानी के हालात नहीं सुधारे तो आने वाले समय बहुत ही संकट में होगा।  
   
 

SAMARTH [parmar.samarth@gmail.com] Indore -

 
  इस विश्‍लेषण से पता चलता है कि किसानों की स्थिति कितनी बदतर है। लगता है लघु और सीमांत किसान सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। सरकार ने खेती से संबंधित जितनी भी योजनाएं चलाई उनका ज्‍यादातर लाभ बड़े किसानों को ही मिलता है। इस रिपोर्ट में दिए गए तथ्‍य बहुत ही महत्‍वपूर्ण है। रिपोर्ट से पता चलता है कि मध्‍यप्रदेश में आत्‍महत्‍या करने वाले ज्‍यादातर लोग लघु और सीमान्‍त किसान की श्रेणी में ही आते हैं। 
   
 

राजेन्‍द्र मेवाडा [yuvavikasmandal@yahoo.in] आष्‍टा, जिला सीहोर -

 
  सच्‍चाई को उजागर करती रिपोर्ट। मप्र सरकार कहती है कि किसान पागल होने के कारण आत्‍महत्‍या कर रहे है, सरकार का झूठ उजागर होता है। एक तरफ सरकार किसानों के सुखी होने का दावा कर रही है, दूसरी तरफ केन्‍द्र से राहत के लिए पैकेज मांग रही है। सरकार का यह झूठ कब तक चलेगा। सरकार को सचाई छुपाने के बजाय उसका सामना करना चाहिए और उसे बदलने की योजना बनानी चाहिए। यह रिपोर्ट सरकार की नीति और नियत पर तो सवाल उठाती ही है, साथ ही पाठकों के सामने सचाई का खुलासा भी करती है।  
   
 

LAXMI NARAYAN LAHARE [shahil.goldy@gmail.com] KOSIR /C.G. -

 
  दिखावे पर न जायें. विज्ञापनों में तो मध्यप्रदेश की सूरत देखते ही बनती है. 
   
 

देवेश तिवारी [deveshrisk@gmail.com] बिलासपुर -

 
  तरक्की कि जो राह चुनी उसे नाम दिया भारत निर्माण... टी वी पर जब भारत सरकार के इस विज्ञापन को देखता हू तो किसान खुश होकर उसमे अपनी कहानी बयाँ करता है. मगर शायद वो कलाकार इस सच्चाई को जान ले कि किसानों कि वास्तविक दशा क्या है, तो उसे अपने किये विज्ञापन अभिनय पर शर्म आने लगेगी. 
   
 

Tanaya T. [Tanayat@yahoo.com] MUMBAI -

 
  मध्य प्रदेश में लघु और सीमांत किसान इतनी बुरी तरह से समस्याओ से परेशांन है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है इस बात से संदेह होता है| प्रशासन को तो अब जाग जाना चाहिए नहीं तो न जाने कितने और किसान बंधुआ मजदुर बन जाएँगे और साहूकार के कर्ज से बंध जाएँगे| इसलिए सरकार को रहत राशि की रकम नुकसान के ८०% देनी चाहिए| उन्नत बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक कम दाम में उपलब्ध कराने चाहिए| औद्योगिक विकास के नाम पर होने वाला भूमि अधिग्रहण रोकना चाहिए | लघु एवं सीमांत किसानो को भूमिहीन होने से रोकना चाहिए| खेती सरकार की प्राथमिकता का विषय है, किसानों के लिए राहत पैकेज जारी करके सरकार इसे बनाए रखे| ऐसा करने से सरकार के नियम और नीति पर संदेह नहीं होगा|  
   
 

अर्चना गड्कर [archvi910@yahoo.co.in] इन्‍दौर -

 
  किसानों की समस्‍या का बहुत अच्‍छा विश्‍लेषण किया गया है। भारत जेसे क़षि प्रधान देश में किसानों की आत्‍महत्‍या बहुत ही दुखद है। प्रदेश की क़षि नीति में इस तरह के बदलाव की जरूरत है, जिससे लघु और सीमान्‍त किसानो की समस्‍याएं हल हो सकें।  
   
 

दीपक [deepakajim@gmail.com] आबूधाबी -

 
  अगर खेती करे तो उसमे श्रम और अर्थ कि अनेक समस्या आती है और उन्हे सही बाजार नही मिल पाता ऐसी योजनाये बनायी जानी चाहीये जिसमे कि आठ दस गांव के किसानो से उनकी जमीन सरकार लीज पर ले फ़िर उन्ही किसानो कि समीती बनाकर योग्य कृषी वैज्ञानीक कि देखरेख मे उसमे कृषी संबंधी बुनीयादी प्रयोग हो जो कि अंतराष्ट्रीय बाजार के पुरक बन सके इस तरह धीरे-धीरे कृषी उन्नत हो सकती है और किसानो का स्तर उपर उठ सकता है ! आजकल विशेषज्ञो कि ही मांग है इसलिये एक गांव एक किसान सिर्फ़ जोताइ करे तो दुसरे गांव के किसान निंदाइ ही करे यह काम लगातार करने से उनकी कुशलता देखने लायक होगी और उनके श्रम कि मांग बढेगी और इस तरह गांवो मे परस्पर निर्भरता बढेगी और यह अनेक तनाव को भी खतम करने वाला होगी !
मगर इस सब के लिये सरकारो कि ईमानदार भागीदारी चाहीये ..मगर ये तो आरोप प्रत्यारोप कि राजनीति मे लगे है !
 
   
 

दीपक [deepakajim@gmail.com] आबूधाबी -

 
  हमारी सबसे बडी समस्या है कि हमारा चिंतन वैज्ञानीक नही है ,हम खेती किये तो जा रहे है मगर टैक्नालाजी के उपयोग नये अनुसंधान का प्रयोग हम लगभग नही के बराबर करते है इसलिये किसानों की हालत दयनीय है. नेताओ के पास सिर्फ़ सांत्वना के नाम पर कुछ रुपयों की मदद है मगर बुनीयादी आधारभूत योजना नही है जिससे कृषि उन्नत हो सके और अतंराष्ट्रीय बाजार में स्थान पा सके ! और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आप स्थान तभी बना पायेंगे जब आप की पैदावार समय पर हो और उसमे गुणवत्ता हो. अब कृषि को एक उद्योग बनाने की जरुरत है. 
   
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