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बनियों का देश

बात पते की

 

बनियों का देश

प्रीतीश नंदी


जाति व्यवस्था, अनिष्टकारी, जटिल या रहस्यात्मक जैसी भी हमें लगे, एक समय में हमारे समाज में गहरी जड़े जमा रखी थी. ब्राह्मण ज्ञान और शासन कला, क्षत्रिय युद्ध करते थे और हमारे सम्मान एवं राष्ट्रीयता की रक्षा करते थे. बनिये व्यापार और लेन देन करते थे. उपजातीयां (जो की गिनती में कई सौ तक थीं) अपनी भूमिका करती थी. सब कुछ तब तक ठीक चल रहा था, जब तक नीची जातियों जो कि इस व्यवस्था का आखरी खुरदुरा हिस्सा थी, ने विद्रोह करना शुरू किया. उन्होंने इतिहास द्वारा सौंपे गए काम करने से इंकार किया(जिनमे से अधिकांश कम प्रतिष्ठापूर्ण थे) और उन्हें उभरते भारत में एक नया स्तर मिला. यह अवश्यम्भावी था, इसने जाति व्यवस्था की ईमारत को ध्वस्त कर दिया. योग्यता ही नया पैमाना बन गयी.

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पर इस योग्यता की जीत ने अपनी तकलीफो को जन्म दिया. हम ऐसे कुछ ही लोगों को जानते हैं, जो वो काम कर रहे हैं, जिसे उनके पूर्वज बहुत अच्छे से किया करते थे. ज्यादातर तो नयी नौकरियों में आ गए हैं, बिना उस योग्यता के जो उन्हें आवश्यक हो. कुछ तो जात निकाला कहलाने की स्थिति में हैं. और मजेदार ये है कि चाहे उनके अंदर कैसा भी हुनर हो, वे बनियों के काम करना चाहते हैं. अधिकतर व्यापार करना चाहते हैं, बहुत-सा पैसा कमाना चाहते हैं. बहुत सी जातियों, बहुत से हुनर वाले इस महान देश से हम धीरे-धीरे अमरीका बन रहे हैं, जहाँ हर कोई टीचर से लेकर डॉक्टर, रॉकस्टर तक सभी ये मानते हैं कि ईश्वर ने उन्हें इस ग्रह पर सिर्फ पैसा कमाने के एकमात्र उद्देश्य के साथ भेजा है. धन के लिए व्यग्रता इतनी सनकी, इतनी अश्लील हो गई है कि कई पेशों की प्रतिष्ठा ही ख़त्म हो गयी है.

कहाँ चले गए हैं, वे उच्च विचारक? वे महान डॉक्टर? वे महान संगीतज्ञ, चित्रकार, दार्शनिक, शिक्षक, परिवर्तन लाने वाले नेता? प्रतीत होता है कि सभी पैसे के पीछे की दौड़ में शामिल हो गए हैं. चित्रकार अपने कैनवास की कीमत पर ज्यादा बात करता है, बजाय अपनी हुनर के जादू के. लेखक अपने लिखे से कहीं अधिक अपने किताबों की बिक्री के आंकड़ों पर विचार कर रहे हैं. चिकित्सक ईलाज करने से कही अधिक अपनी फीस पर बात करते हैं. शिक्षक ज्ञान अर्जित करने को नहीं कहते हैं बल्कि वे बात करते हैं कोचिंग क्लास करने की, जिससे परीक्षा पास किया जा सके, धन लाभ वाली नौकरी पा सकें. यहाँ तक की भविष्यवक्ता प्यार करने को बताते हैं और कुछ मूढ़तापूर्ण कीमती पत्थर पहनने की सलाह देते हैं. जिससे कि ज्यादा पैसे बनाये जा सकें.

क्रिकेटर अब खिलाडी नहीं रह गए हैं. वे अब मवेशी की तरह हैं, उनकी कीमत तय होती है, गुलामों की नीलामी में वे क्या पाते है. सौरव या ब्रायन लारा सिर्फ इसलिए खारिज होते हैं कि किसी ने आईपीएल में उनकी बोली नही लगाई. किसी नेता की क्षमता उसके भारत के लिए कुछ करने से नही बल्कि स्विट्जरलैंड में उसके गुप्तधन से पता चलती है. ये देश अब एक ऐसा बाज़ार बन गया है, जहां सभी कुछ ख़रीदा और बेचा जा रहा है, स्पेक्ट्रम से वक्फ प्रापर्टी तक, कम उम्र वधुओं से लेकर संसद की सीटों तक. हर कोई एक बनिया है. हर कोई खरीद-बेच रहा है. कला को अपनी दीवार सजाने के लिए नहीं, बल्कि गुप्त तहखानो में छिपा कर रखने के लिए ख़रीदा जा रहा है.

मुंबई में बिकने वाले 50 % फ्लैट निवेशकों या नेताओं और सरकारी अफसरों द्वारा खरीदे जाते हैं, जिससे कि वे अपने गलत तरीके से पाए पैसों को ठिकाने लगा सकें. इससे कीमत का एक स्तर निश्चित हो जाता है, जो सही अर्थों में घर बनाने वाले की पहुंच से बाहर है.

एक समय था, जब कलाकारों ने अपनी श्रेष्ठतम रचनाएं आनंद के लिए बनाईं. कोलकाता के मेरे फ्लैट के लिविंग एरिया को जतिन दास ने एक नशे भरी रात में ही पेंट किया था. यही एक कारण था कि कोलकाता छोड़ने के 26 वर्ष बाद भी मैंने उस फ्लैट को न तो किराये पर दिया, न ही बेचा. मेरी कविताओ की किताबों के लिए हुसैन, मनु पारेख, समीर मंडल, मंजीत बावा जैसे दोस्तों ने पेंटिंग की. कभी किसी ने पैसे के लिए नही कहा. न ही किसी ने पैसे की पेशकश की. ये सिर्फ प्यार, सम्मान, दोस्ती थी, जिसने हमें करीब लाया. मैं सालों पुरानी बात याद करता हूँ, जब कोलकाता आर्ट फेयर में मैंने सुनील दास की सैकड़ों पेंटिंग 10 रुपए प्रति पेंटिंग की दर से खरीदी थी. उन्हें मैंने अपने सभी दोस्तों को दिया. सूज़ा ने मुझे कई पेंटिंग उपहार में दिये थे, उन्हें भी मैंने दे दिया. कला इसी लिए होती है. मेरे किताबों की लायब्रेरी में सभी किताबें विभिन्न लेखको, प्रकाशको की दोस्तों से मिली हुई है. मेरे पालतू कुत्ते कभी ख़रीदे नही गए. वे मेरे घर आते हैं और रहते हैं.

जीवन लेन-देन नही है. ना ही दोस्ती, प्यार, शादी, काम. मैंने कभी पैसे के लिए जॉब नही की. मैं मुंबई आया, सिर्फ उतने के लिए जो मेरे कोलकाता के अर्जन का एक अंश भर थे, केवल इसलिए कि मैं एक पत्रकार बनना चाहता था. मैं संसद पंहुचा, यह सोचकर कि शायद मैं वहां कोई बदलाव ला सकूं. मैं फिल्मे बनता हूँ क्योंकि मैं उस से आनंदित होता हूँ. कभी हम सफल होते हैं, अक्सर हम हारते हैं. पर पैसा दोनों को ही तय नहीं करता. हमेशा पूछे जाने वाला सवाल यही है कि क्या इसे बनाने में हमें आनंद आ रहा है? क्या ये टिक पायेंगी?

मैं अपने आसपास एक बाज़ार देखता हूँ, जहाँ हरेक खरीदने-बेचने में लगा है. अब मुझे समझ आ रहा है कि क्यों हमारे पूर्वजो ने जाति व्यवस्था बनाई. अपनी सभी कमियों के बावजूद नकदी के अलावा भी चल मुद्राओं की सहमति दी. उस समय ज्ञान था, हुनर था, चातुर्य था. उस समय बल, सम्मान और गौरव था. उस समय कला संगीत चिकित्सा का रहस्यात्मक विज्ञान था. बहुत से चीज़े थीं, जिन्होंने जीवन को जादुई बना दिया था. पर अब सिर्फ एक मुद्रा हमें चला रहा है, वो है पैसा. हमारा देश बनियों का देश बन चुका है या या फिर जैसा कि अमरीकी गर्व से कह सकेंगे-उद्यमियों का देश.

01.03.2011, 16.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

GGShaikh [ggshgs@gmail.com] Bharuch-Gujarat - 2011-05-03 10:35:35

 
  हम जहाँ हैं और आज़ादी के बाद से अब तक जहाँ हम पहुंचे है, उसकी संवेदनशील जानकारी देता लेख. हमारे आज का जैसे एक दस्तावेज़. जाति व्यवस्था का अनिष्टकारी तत्व यह था कि हमने हमसे इंसानों को अछूत बना दिया था. उनके जीने के न्यूनतम अधिकारों को पेम्पर किया गया था, उन्हें ज़ाहिर जीवन से बेदख़ल किया गया था. सब से उच्च कोटि के सफाई काम को सबसे नीचा मना गया था और यह काम करनेवालों की हैसियत को कुचला गया था, उन्हें निरंतर प्रताड़ित किया गया था...उनकी बेगुनाही के बावजूद. आज वंचित भी जैसे पैसा पाने की कोई opportunity छोड़ना नहीं चाहता. भ्रष्टाचार को भी इसी बनियागीरी ने देश के चप्पे-चप्पे में फैला दिया है. आज हम जैसे point of no return पर खड़े हैं. Give and Take का दस्तूर है. इंसानियत चरमरा रही है और मानवता पर आज का समय कुछ भारी-भारी सा... 
   
 

surendra ku katiyar [skatiyar_sai@yahoo.co.in] kanpur -

 
  बिल्कुल सही है. हर चीज बिकाउ है, जिसकी जिम्मेदार खादी है. 
   
 

Sainny Ashesh [] http://snehlove.blogspot.com -

 
  मैं एक लेखक हूं. उसी का अनुभव बताउं तो सच ये है कि \'चर्चितों\', \'सम्मानितों\'और \'पुरस्कृतों\' के बीच बैठने का जब भी अवसर आया, मैं पछताया. अब तो अकेले और गुमनाम रहने में आनंद महसुस होता है. बुल्लेशाह और कबीर जैसे हर व्यक्ति ने कहा ही है कि ऐसी जगह रहो, जहां कोई तुम्हें न मानता हो, न देखता हो. बुद्ध ने कहा है कि किसी चीज की इच्छा न करो. लाओत्से ने उससे भी आगे जा कर कहा है- ऐसे जीओ कि कोई तुम्हारी इच्छा न करे. टंटा ही खत्म ! 
   
 

Anil Kumar Shriwas [anil3143@gmail.com] Bilsapur (C.G.) -

 
  प्रीतीश जी, आपने सौ फीसदी सही कहा है. आज का भारत, भारत नहीं है, यह इंडिया बनता जा रहा है.  
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi -

 
  लफ़्ज बा लफ़्ज सच कहा आपने ... 
   
 

देवेश तिवारी [deveshrisk@gmail.com] बिलासपुर -

 
  सचमुच लोग पैसे के पीछे इस कदर भागने लगे हैं कि अब वे अपनी पसंद से भी समझौता करने लगे हैं अब लोग वो काम नहीं करते जिसमे वो पारंगत हैं या जो उन्हें प्रिय है बल्कि वो काम करना पसंद करते हैं जिसमे उन्हें ज्यादा से ज्यादा पैसा नजर आता है ... मै आज जब भी लोगों से मिलता हूँ लोग मुझसे पूछते हैं कि बी.सी.ए. करने के बाद मैंने एम्.सी.ए.क्यों नहीं किया बल्कि पत्रकारिता की पढ़ाई क्यों की .. ये लेख एक जवाब है जो मै उन्हें दे सकता हूँ ..मुझे अमरुद खाने की इच्छा थी, मुझे वही पसंद है तो मै सेब क्यों खाऊ? क्योंकि सेब अमरुद से ज्यादा दाम में बिकता है.  
   
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