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यहां सूरज नहीं निकलता
मुद्दा
यहां सूरज नहीं निकलता
आशीष कुमार ‘अंशु’
सिलीगुड़ी से लौटकर
विशाखा का असली नाम कम ही लोग जानते हैं.
नहीं, यह बुद्ध की शिष्या विशाखा नहीं है, जिसने श्रावस्तीह में उस जमाने में 20
करोड़ स्वर्ण मुद्रायें खर्च कर के बौद्ध विहार बनाया था. वह नक्षत्र भी नहीं, जो
आकाशगंगा में है.
विशाखा से पूछें तो वह कहती हैं- “ मैं एक यौनकर्मी हूं, यौनकर्म मेरा पेशा है.”
दो जून की रोटी के लिये अपना देह बेचने वाली विशाखा की जिंदगी में तो सूरज कभी उगा
ही नहीं. दुनिया को समझने की उम्र होती, उससे पहले ही उसे एक ऐसी काली कोठरी में
धकेल दिया गया, जहां आज तक कोई रोशनी पहुंची ही नहीं.
लगभग 24 साल पहले एक मुंहबोली मौसी ने विशाखा को मात्र छह हजार रुपए में सोनागाछी
में एक यौनकर्मी के हाथों बेच दिया था. उस वक्त विशाखा की उम्र महज चौदह साल थी.
दक्षिण 24 परगना के सुंदरवन गांव की रहने वाली विशाखा कोलकाता में क्या काम करती
है, यह बात उसका परिवार जानता है. इस पेशे में होने की वजह से विशाखा के घरवालों को
गांव वालों ने दस साल तक अलग-थलग रखा. जब दस साल के बाद वह पहली बार घर गई तो गांव
वालों ने उसका सामूहिक बहिष्कार किया. उसे गांव से बाहर निकल जाने के लिए कहा.
विशाखा ने उन्हीं गांव वालों से पूछा- “अगर मैं गांव मैं रुक जाती हूं तो क्या
तुममें से कोई मुझे खाने के लिए देगा ? ”
जाहिर है, इसका जवाब किसी के पास नहीं था.
विशाखा से बातचीत करते समय किसी का फोन आया. विशाखा ने बातचीत के बाद बताया कि उसके
चाचाजी का फोन था- “ किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं. बिस्तर से उठ नहीं सकते. मुझे
देखना चाहते हैं.”
विशाखा बहुत साफगोई से बात करती हैं, बिना कुछ छिपाने की कोशिश किये.
सिलीगुड़ी की वेश्याबस्ती खालपाड़ा में रहने वाली महिलाओं के साथ लंबे समय तक काम कर
चुकी सामाजिक कार्यकर्ता सुष्मिता घोष कहती हैं- “ कोई पचास-सत्तर रुपए लेकर वे
आपके सामने अपने को पूरी तरह उघाड़ कर रख देंगी. निश्चित तौर पर इस काम को करने के
पीछे उनकी कोई बड़ी मजबूरी होगी. आप ही सोचिए क्या कोई खुशी से इस काम को कर सकता है
?”
सिलीगुड़ी सोयायटी फॉर सोशल चेंज के एक सर्वेक्षण के मुताबिक खालपाड़ा में काम करने
वाली साठ फीसदी यौनकर्मियों की उम्र बीस साल से कम है.
मीता मंडल उत्तर 24 परगना के बोसीहाट की रहने वाली है. वह रविन्द्र संगीत सीखना
चाहती थी. लेकिन इसके लिए उसके पिता और उसकी नई मां जो पिता की दूसरी शादी के बाद
घर आई थीं, तैयार नहीं हुए. नई मां चाहती थी कि मीता दूसरों के घर में चूल्हा चौका
करे और जो भी कमाई हो, वह लाकर उनके हाथ में रख दे.
मीता को लगा कि अपना रास्ता खुद ही तय करना होगा. एक दिन वह संगीत सीखने के लिए
अकेली कोलकाता निकल गई. यहीं मीता की मुलाकात एक आदमी से हुई, जिसने संगीत सीखाने
और नौकरी दिलाने का वादा किया. लेकिन मीता को कहां मालूम था कि संगीत के नाम पर उसे
एक ऐसे नरक में धकेल दिया जायेगा, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी. उस आदमी ने
उसे एशिया के सबसे बड़े वेश्याबस्ती सोनागाछी पहुंचा दिया.
हालांकि मीता इस बस्ती में पहले से रह रही दूसरी लड़कियों से अधिक खुशकिस्मत थीं. एक
गैर सरकारी संस्था दुर्वार महिला समन्वय समिति की कार्यकर्ताओं ने उस नरक से उन्हें
छुड़ा लिया. लेकिन उस बस्ती में रह रही सैकड़ों, हजारों लड़कियां अब भी उसी नरक को
भोग रही हैं.
अब अंजली को ही ले लीजिए.उनके माता-पिता छोटी उम्र में उसे छोड़कर चले गए. एक पड़ोसी
ने उसकी हालत पर तरस खाकर उसे घर का काम करने के लिए सिलीगुड़ी के एक घर में रखवा
दिया. यहां अंजली ने बंधुआ मजदूर की तरह दो वक्त की रोटी खाकर आठ साल तक काम
किया.यहां से वह बहुत मुश्किल से निकली और जिसके सहारे निकली, उसी ने एक दिन उसे
खालपाड़ा पहुंचा दिया.
लेकिन इस नरक का अंत यहीं नहीं हुआ. एक दुर्घटना में उसने अपना एक पांव गंवा दिया.
अब अंजली अपना एक पांव कटने के बाद भी खालपाड़ा में बतौर यौनकर्मी सक्रिय है. इसके
अलावा वह कुछ घरों में झाड़ू पोछा भी करती है. अंजली कहती हैं- “ दो ही काम सीख पाई
इस जिन्दगी में, एक झाड़ू पोछा और दूसरा यौनकर्म, वही कर रही हूं.”
कंचनजंघा उद्धार केन्द्र से जुड़े संजय विश्वकर्मा बताते हैं कि इस इलाके में सक्रिय
यौनकर्मियों में से अधिकांश को उनके गांवों से काम करने के बहाना लाया गया. उन्हें
प्लेसमेंट एजेंसियों ने अच्छा खाना, कपड़ा और वेतन का लालच देकर यहां बुलाया और फिर
उन्हें यौनकर्म के पेशे में डाल दिया.
संजय कहते हैं- “ यहां काम करने वाली नब्बे फीसदी प्लेसमेंट एजेंसियों का कोई
पंजीकरण नहीं है. यहां प्लेसमेंट के नाम पर मानव तस्करी का धंधा जोरो पर है.”
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विश्वकर्मा बताते हैं, किस तरह नेपाल के मोरम जिले का रहने वाला रॉयल नेपाल आर्मी
का एक पूर्व जवान लड़कियों की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार हुआ. शर्मनाक बात यह थी
कि इस तस्करी में उसकी पत्नी और बेटी भी उसकी सहयोगी की भूमिका में थीं.
खुफिया विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार असम में सक्रिय कुछ दलाल पिछड़े और गरीब जिलों
में जाकर तीन से पांच हजार रुपए में युवा लड़कियों को खरीदकर दस से बारह हजार रुपए
में वेश्या बस्तियों में बेचने का काम करते हैं.
कुछ मामले ऐसे भी हैं, जहां लड़कियां मजबूरी में जरुर वेश्या बस्तियों तक लाई गईं
लेकिन यहां लाने के लिए उनके साथ कोई धोखा नहीं किया गया. उन्होंने तय करके इस पेशे
को अपनाया क्योंकि उनकी मजबूरी ही कुछ ऐसी थी.
शिवानी कर्मकार का मामला ऐसा ही है, जो अपनी इच्छा से यौनकर्मी बनीं. उनके पति दमा
के मरीज हैं. बेटे को थैलीसीमिया है. इनके ईलाज के लिए इन्हें हर महीने एक निश्चित
रकम की जरुरत होती है. कोई सरकारी-गैर सरकारी संस्था उनके मदद के लिए आगे नहीं आई.
सरकार की मदद इतनी भर है कि एक सरकारी अस्पताल में उनके पति और बेटे का ईलाज चलता
है. उसके बावजूद दवा और समय-समय पर होने वाले जांच का पैसा उन्हें देना ही होता है.
इसके साथ अपना और अपने बेटे का परिवार चलाना, आसान काम नहीं था. ऐसे में शिवानी को
इस पेशे में उतरना पड़ा.
शिवानी के परिवार में उनकी तीन बेटिया भी थीं, जिनकी शादी शिवानी ने कर दी लेकिन
अपने होने वाले दामादों से यह बिल्कुल नहीं छुपाया कि वे काम क्या करती हैं ? चूंकि
वे नहीं चाहती थीं कि कल को इस भेद के खुलने से उनके बेटियों को किसी प्रकार के
मुश्किलों का सामना करना पड़े. आज शिवानी कर्मकार के चारों बच्चे उनका बहुत सम्मान
करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी जिन्दगी पर किसी प्रकार की आंच ना आए, इसके
लिए उनकी मां ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया.
सीता लोहार की कहानी शिवानी से अलग नहीं है. ग्यारह साल की उम्र में भाई ने उन्हें
घर से निकाल दिया. घर से निकलने के बाद वे चार साल तक बाल सुधार गृह में रहीं. कोई
काम आता नहीं था. पढ़ाई-लिखाई कर नहीं पाईं. वहीं एक लड़की से दोस्ती हो ग. उसी ने
लोहार का पहला परिचय रेड लाईट एरिया से कराया. दिल माने ना माने, पेट कहां मानने
वाला था. सो उन्होंने इस काम को स्वीकार लिया. इस नरक में आने के बाद भी उन्होंने
अपनी दोनों लड़कियों को इस दुनिया से दूर ही रखा. आज लोहार की दोनों लड़कियां
अंग्रेजी माध्यम के एक अच्छे पब्लिक स्कूल में पढ़ती हैं.
स्वतंत्र पत्रकार रुपक मुखर्जी के अनुसार इस पेशे में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं,
जो अपनी और अपने परिजनों की मर्जी से यह सब कुछ कर रहे हैं. मुखर्जी के अनुसार
अनुसार- “ बड़ी संख्या में ऐसे मामले भी सामने आये हैं, जिसे मानव तस्करी का नाम
दिया गया, जबकि मामला ऐसा नहीं था. भेजने वालों को भी पता है कि वह जिसे भेज रहा
है, उसे कहां ले जाया जाएगा और जाने वाले को भी पता है कि उसे जो ले जा रहा है, वह
कहां लेकर जाएगा ?”
मुखर्जी आगे कहते हैं- “बड़ी संख्या में सिलीगुड़ी से लड़कियां दुबई जा रहीं हैं.
यहां ऐसे मां बाप हैं, जिनकी आंख उस वक्त खुलती हैं, जब लड़की को ले जाने वाला लड़की
के बदले हर महीना पैसा भेजना बंद कर देता है.”
मुखर्जी की बातों की पुष्टि सिलीगुड़ी के पूर्व एएसपी केबी दोरजी ने किया. उनकी
जानकारी में ऐसे कई मामले हुए, जिसमें लड़की की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने घर वाले
लड़की की गुमशुदगी के छह महीने या एक साल के बाद आए. इस देरी की कोई वजह भी उनके पास
नहीं थी.
दोरजी के अनुसार- “ इस समस्या की जड़ इस क्षेत्र की गरीबी, अशिक्षा और जागरुकता की
कमी है. शादी और नौकरी दिलाने के नाम पर अधिकांश लड़कियों को यहां से ले जाया गया.
नौकरी के नाम पर बाहर जाने वाली लड़कियों के परिजन अगर प्लेसमेंट एजेंसी या नाम-पता
के बारे में पुलिस थाने में पहले से सूचना दे दें तो ऐसी घटनाओं पर रोकथाम कर पाना
संभव होगा.”
हालांकि इस संबंध में जिला पुलिस, एसडीओ ऑफिस, सीआईडी, गैर सरकारी संस्थाएं और
पंचायत की तरफ से जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है लेकिन उनका असर कम ही है. पश्चिम
बंगाल में लगभग 65 हज़ार और देश भर में सक्रिय लगभग 6 लाख यौनकर्मियों की संख्या
में लगातार होता इजाफा तो कम से कम यही बताता है. ये वो आंकड़े हैं, जिनमें फ्लांइग
सेक्स वर्कर्स और कॉल गर्ल्स की संख्या शामिल नहीं है. हां, यह ज़रुर है कि सरकारी
आंकड़ों में यौनकर्मी मनुष्य से कहीं अधिक आंकड़े के रुप में ही जानी जाती हैं,
जिसकी चिंता सभ्य समाज को भी नहीं है और सरकार को भी नहीं.
02.03.2011, 20.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Manoj [Manojhotboy143@gmail.com] Mumbai - 2012-01-27 03:34:59 | | | |
मैंने मुंबई का कमाठीपुरा इलाका देखा है. यहां पर मैंने बहुत गरीब लोगों को देखा है, जो गरीबी के कारण अपना देह बेच रहे हैं और उसके सहारे अपना पेट भर रहे हैं. यह बहुत दुखद है कि इस पेशे में 14 साल तक की उम्र के बच्चे हैं. | | | | | | | | Naresh Kumar Paras [naresh.paras@gmail.com] Agra - 2011-07-18 10:45:07 | | | |
this is very emotional story.thank u for write this story.i share u a story of agra s women protection home where a child 14 yrs. name was munni. she arrested without any crime.pls send me detail. | | | | | | | | rakesh gautam [www.a@r.c.g.com] agra - 2011-07-01 06:45:43 | | | |
हमारी सरकार को चाहिये कि वह कल्पना जैसी लोगों को सहारा दे. उन्हें मुक्त करने के अलावा उनके पुनर्वास की भी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिये. | | | | | | | | डॉ0 मनोज अबोध [manojabodh@gmail.com] बिजनौर उत्तर प्रदेश - | | | |
कलेजा हिल जाता है एक बारगी.... वे कौन लोग हैं जो उनके साथ यौनकर्म में लिप्त होते हैं...या जो उन्हें इस नर्क में धकेलते हैं...शायद,उनकी संवेदना मर चुकी होती होगी । | | | | | | | | अविनाश वाचस्पति [tetaalaaa@gmail.com] 110065 - | | | |
आंखें खोलने वाली रपट, पर आंखें हैं कि खुलती ही नहीं। | | | | | | | | Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi - | | | |
यह वही बंगाल है, जहाँ प्रसिद्ध काली मंदिर है. दर-असल हमारे धर्म सिर्फ़ हमारे पाखण्ड हैं. भारत एक घोर पाखण्ड मे जी रहा है और उसमें सच का सामना करने का साहस नही है. यह इतना बडा सेक्स उद्योग समाज की एक जरुरत को दर्शाता है जो प्राकृतिक चीज जैसे सेक्स और प्यार को सप्रेस करने के कारण पैदा हुआ है. | | | | | | | | Jagdish Chandra Das [jagdish_chandradas@yahoo.com] Jagdalpur, Chhattisgarh - | | | |
Women\\\'s condition is in our Indian society reflects the overall mindset.This is also the total failure of our political & socio economic system which can not provide food , shelter & education to each and every citizen of the country.As we know, our learned political leaders will never accept the lapses on their part .In my opinion ,if our parliament will have will power to do so,the condition of women as well as poor will gradually improve & i think this is only possible in socialistic pattern of the system.
हिंदी-ऊर्दू के महान लेखक प्रेमचंद ने लिखा है-स्त्रियों की दुर्दशा का मुख्य कारण उनकी आर्थिक पराधिनता है.
ये आज भी सच है. हमें ये भी ध्यान रखना चाहिये कि भले ही सेक्स वर्कर हों, जीने का हक तो सभी को है. | | | | | | | | pankaj [] pune - | | | |
The report is debatable as in many places, sex workers have collectivised and have resorted to adopting 100% safety measures such as regular condom use and health check ups. The concern today is not that sex workers infect, but the fact that HIV has reached women among the general population. Connecting the spread of HIV infection with sex workers or sex work is a matter of the past. | | | | | | | | Nasim Ansari [tcs.pbh@gmail.com] Pratapgarh (U.P.) - | | | |
देश में गर औरतें इस हाल में लाचार हैं, दिल पर रख कर हाथ कहिये, देश क्या आज़ाद है ? | | | | | | | | अतुल श्रीवास्तव [aattuullss@gmail.com, atulshrivastavaa.blogspot.com] राजनांदगांव, छत्तीसगढ - | | | |
शर्मनाक। विशाखा जैसी लडकियों की कहानी पढकर शर्म आ गई कि हम 21 वीं सदी के भारत में हैं। जिस देश में बेटियों को मजबूर होकर अपना शरीर बेचना पड रहा है उस देश की तरक्की पर यह सवालिया निशान है। यह वही देश है जहां महिलाओं को शक्ति का प्रतीक और देवी की पदवी दी गई है लेकिन क्या यह हकीकत है।
विचारणीय रिपोर्ट। | | | | | | | | Paramita Ghosh [paramita.ghosh@yahoo.co.uk] Kolkata - | | | |
The annual report (2009-10) of the health ministry\'s Aids control department states that India has the third largest number of people living with HIV/AIDS -22.7 lakh, as per the provisional HIV estimates of 2008-09.
The report says though sex workers are 0.5% of adult female population, they account for 7% of HIV-infected women. According to this report, Sex work continues to act as the most important source of HIV infections in India due to the large size of clients that get infected from sex workers... Men who buy sex are the single most powerful driving force in India\'s HIV epidemics and constitute the largest infected population group in the country. | | | | | | | | Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida - | | | |
माथा शर्म से झुक जाता है कि आज़ादी के इतने सालों तक हम लोगों को ढंग से रोटी नहीं दे सके और लोग अपने मनुष्य होने को भुला कर इस नरक में रह रहे हैं. इन बहनों की कहानियां पढ़ कर आंख भर आई. मैं सोचता हूं कि क्या यह हमारी अपनी सगी बहनें होतीं तो भी क्या हम इसी तरह संवेदनहीन होते ? | | | | | | | | देवेश तिवारी [deveshrisk@gmail.com] bilaspur - | | | |
दुखद बहुत दुखद...और क्या कहा जा सकता है..! | | | | | | | | kishore diwase [kishore_diwase@yahoo.com] bilaspur ,chhattisgarh - | | | |
रौशनी तो अपने दिल में जरूरी है...
विशाखा सिर्फ सिलीगुड़ी में ही नहीं भारत के हर राज्य में है. उसे यौन कर्म में नहीं होना चाहिए,मेहनत कर आत्मसम्मान की जिंदगी जीना चाहिए. आदि आदि बातें कहना बेहद आसान है....इस गुनाह की जड़ें हमारे देश में अतीत से रही हैं, जिसे कभी धर्म तो कभी समाज ने भी पुचकारा है. आज की तारीख़ में यह इलीट क्लास और दीगर वर्गों में भी अलहदा मुखौटे में दिखाई देती है.शिक्षा, व्यक्तिवादी सोच की बेहतरी और अपना फैसला ही इस नरक में जाने या न जाने की राह के लिए जिम्मेदार होगा.प्लेसमेंट एजेंसियों पर नकेल कैसे और कौन लगेगा? जरूरतें बढ़ाने की अंधी हवस पर कंट्रोल करना सोचना होगा. आशीष कुमार का लेख अच्छा लगा. | | | | | | |
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