पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
  पहला पन्ना >मुद्दा >बिहार Print | Share This  

मजबूर नीतीश कुमार

बात पते की

 

मजबूर नीतीश कुमार

मनीष शांडिल्य


अपने ऊपर हो रहे चौतरफा हमलों के बाद मजबूर होकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले दिनों समाचार चैनलों के संपादकों से मुखातिब हुए थे. उनकी और उनके सलाहकारों की समझदारी रही होगी कि इस नई तरह की प्रेस-वार्ता में चंद सवालों, जिसमें बहुत सारे सवाल प्रायोजित लग रहे थे, का जवाब देने के बाद शायद कम-से-कम प्रधानमंत्री की ओर अंगुलियां कुछ कम उठे. लेकिन हुआ इसका उल्टा. प्रेस-वार्ता में प्रधानमंत्री ने जिस तरह सारा दोष गठबंधन सरकार की मजबूरियों पर डालने की कोशिश की, इस तर्क ने प्रधानमंत्री को एक नये आलोचना के केंद्र में ला दिया है.

nitish-kumar-cm


प्रधानमंत्री की 'बेचारगी' सुनने के बाद उसी दिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें मजबूरी बताने के बजाए जनता के बीच जाने की सलाह दी थी. पिछले दिनों नीतीश कुमार ने एक बार फिर गठबंधन की राजनीति पर अपने विचार रखे.

बिहार विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जिस दिन गठबंधन की सरकार चलाना हमारे लिए मजबूरी बन जायेगी, उसी क्षण मैं इस्तीफा दे दूंगा. ऐसा कह कर नीतीश कुमार ने एक बार फिर एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की.

नीतीश कुमार ने अपने जवाब से न सिर्फ विपक्ष के हमलों से अपनी सरकार का बचाव किया बल्कि उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को फिर यह याद दिलाया कि भविष्य के प्रधानमंत्री के रुप में देखा जा रहा एक व्यक्ति वर्तमान प्रधानमंत्री की तरह मजबूर नहीं है. साथ ही उन्होंने अपने गठबंधन के जूनियर पार्टनर भाजपा को भी संकेत दिया कि वो उन्हें किसी भी तरह से मजबूर न करे. नीतीश कुमार ने अपने जवाब में गठबंधन से संबंधित टिप्पणी करने के साथ ही जात-पात की राजनीति और भ्रष्टाचार पर भी अपने 75 मिनट के भाषण का कुछ हिस्सा खर्च किया.

लेकिन अगर हम विधानसभा में दिये गये मुख्यमंत्री के जवाब को तथ्य और तर्क की कसौटी पर कसें, उसकी समीक्षा करें तो कुछ दूसरी ही तस्वीर सामने आती है. बिहार में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के उद्भव, उसके पिछले पांच से अधिक वर्षों के कार्यकाल और इस दौरान खुद नीतीश कुमार के बदलते एजेंडों, बयानों और कार्यशैली का मूल्यांकन कई तरह की मजबूरियों को सामने लाता है.

नीतीश कुमार की राजनीतिक मजबूरी का सबसे ताजा उदाहरण है सवर्ण आयोग का गठन. साथ ही नीतीश कुमार सामाजिक रूप से जिस तरह दो छोरों को साधते हुए दुबारा मुख्यमंत्री बने हैं, यह कलाबाजी सवर्ण आयोग के गठन के रूप में राजनीतिक-सामाजिक कीमत भी वसूल रही है.

गौरतलब है कि महादलित आयोग का कार्यकाल 25 दिसम्बर, 2010 को ही समाप्त हो गया लेकिन नए का अभी तक पुनर्गठन नही हुआ है. लेकिन चुनावी वादों को पूरा करने की मजबूरी में सरकार ने संविधान की मूल प्रस्थापनाओं के विरूद्ध आर्थिक आधार पर आरक्षण की संभावनाओं की तलाश करने के लिए सवर्ण आयोग का गठन कर दिया है.

दूसरी ओर नीतीश कुमार ने विधानसभा में अपने जवाब में यह सवाल भी खड़ा किया था कि प्रधानमंत्री आज गठबंधन की मजबूरी में भ्रष्टाचार से समझौता कर रहे हैं, क्या गठबंधन चलाने के लिए देश को तोड़ दिया जायेगा? यह कहते हुए प्रकारांतर से नीतीश यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे कि भ्रष्टाचार से समक्षौता देश को विखंडन की राह पर धकेलने सरीखा है.

नीतीश कुमार की इस चिंता से एक स्तर तक सहमत होते हुए क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि भाजपा जैसी राजनीतिक ताकत के साथ उनका गठबंधन क्या एक नये प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए है? अफसोस की बात यह है कि ऐसा नहीं है. गणतंत्र दिवस के दिन कश्मीर के लाल चौक पर झंडा फहराने के लिए भाजयुमो द्वारा जनवरी में आयोजित एकता यात्रा इसका सबसे ताजा उदाहरण है. हालांकि एनडीए, जिसकी सबसे बड़ी घटक दल भाजपा है, ने इससे किनारा कर लिया था. लेकिन लालू प्रसाद यादव ने जहां लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को रोकने का साहस दिखाया था, वहीं नीतीश कुमार ने इस यात्रा की रस्मी आलोचना भर की. परिणाम यह हुआ कि भाजपा का युवा मोर्चा पटना, गया सहित राज्य के कई शहरों में माहौल को एक बार फिर सांप्रदायिक रंग में रंगकर आगे बढ़ गया. जाहिर है ऐसा हुआ क्योंकि नीतीश कुमार मजबूर थे.

एकता यात्रा का बिहार से सफलतापूर्वक गुजरना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि किस तरह नीतीश कुमार का सहारा पाकर बिहार में सांप्रदायिक ताकतें लगातार मजबूत हो रही हैं. 15वें बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम भी उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत को ही दिखाता है. इन चुनाव परिणामों से जो सबसे चिंताजनक पहलू सामने आया है वो है 2005 के चुनावों के मुकाबले भाजपा के सीटों में जबरदस्त उछाल. विधानसभा में भाजपा का आंकड़ा 55 से 91 पर पहुंच गया. भाजपा के बागी और समर्थक विजेताओं को भी अगर साथ जोड़ लिया जाए तो यह संख्या 95 हो जाती है.

नीतीश कुमार के नाम पर भाजपा को इस बार अप्रत्याशित रूप से मुसलमानों का समर्थन भी बड़े पैमाने पर मिला है, जबकि उसने अल्पसंख्यकों संबंधी अपनी राजनीति में फिलहाल कोई व्यापक सकारात्मक बदलाव नहीं लाया है. हां इतना भर जरूर है कि वह कम-से-कम बिहार में रणनीतिक रूप से लगभग चुप है. लेकिन विधानसभा चुनाव परिणाम के आईने में नीतीश कुमार को यह देखना चाहिए कि भाजपा का बिहार में मजबूत होना परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी को भी मजबूत करता है.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Hindustani [] India

 
  वाहियात लेख. प्रत्येक अक्षर में लेखक की अज्ञानता झलक रही है. रविवार पर ऐसी घटिया रुदाली का क्या मतलब? बेकार हमारा समय खराब किया.  
   
 

Amit Kumar [amit_59@ymai.com] Patna

 
  मेरी समझ में ये बात नहीं आई कि आप यात्रा मतलब क्या समझते हैं. दूसरा ये कि बिहार में सवर्ण आयोग की जरुरत है या नहीं, इसके लिये थोड़ा बिहार के आंकड़े उठा कर देख लें तो शायद उचित होगा. एक बात और, बिहार जैसा सेकुलर राज्य देश में कोई और नहीं है, इस बात को आप अपने जेहन में उतार लें. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in