नव उपनिवेशवाद के बीच अफ्रीका
वर्ल्ड सोशल फोरम | अफ्रीका का यथार्थ-2
नव उपनिवेशवाद के बीच अफ्रीका
सचिन जैन
सेनेगल से लौटकर
अफ्रीकी देश अब नव-विकसित देशों जैसे भारत, चीन आदि के उपनिवेश बन रहे हैं. देश
के जाने माने समाजशास्त्री और विकास के नाम पर विस्थापन के विषय के जानकार वाल्टर
फर्नांडीस बताते हैं कि सहारा मरुस्थल के देशों में 4 करोड़ हेक्टेयर जमीन को अमीर,
पूंजीवादी समूह और सरकारें हड़पने की प्रक्रिया में हैं.
एक तरफ तो ज्यादातर अफ्रीकी देशों में तानाशाही है और लोकतंत्र का अभाव है, वहीं
दूसरी तरफ जीवन की बुनियादी सुविधाएं भी लोगों के पास उपलब्ध नहीं हैं. अफ्रीकी देश
सेनेगल की राजधानी डकार में 6 से 11 फरवरी 2011 के बीच आयोजित विश्व समाज मंच में
शामिल होने आये सूडान और कांगो के लोगों ने बताया कि जब उन्होंने बेहतर जीवन की
तलाश में पलायन करने का निर्णय लिया तो 2 वर्षों तक पैदल चलते हुए उन्होंने दुनिया
के सबसे बड़े रेगिस्तान सहारा रेगिस्तान को पार किया.
फिर छोटी कश्तियों से अटलांटिक महासागर पार करके यूरोपीय देशों में प्रवेश करने की
कोशिश की. इस कोशिश में कई लोग रास्ते में ही मर गए और कई लोग सीमा पार करके यूरोप
में घुसते हुए पकड़ लिए गए. कूटनीति की अमानवीयता देखिये कि उन लोगो को पकड़ कर फिर
सहारा में छोड़ दिया गया. अब फ्रांस, इटली, स्पेन जैसे यूरोपीय देश हर साल लगभग 10
अरब रूपए अफ्रीकी और मध्य-पूर्व देशों को दे रहे हैं ताकि ऐसी व्यस्थाएं की जाएँ कि
लोग यूरोप की सीमा में न घुस सकें.
विकसित देशों का यह समूह मानता है कि पलायन करके आने वाले इन लोगों के कारण उनकी
छवि और संसाधनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. कीनिया, नामीबिया, कांगो, अल्जीरिया
जैसे देशों से 10 लाख लोग इसी बदहाली के कारण पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं पर
उन्हें अब इसकी भी अनुमति नहीं है.
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उपनिवेशवाद विकास और उन्नति का चेहरा ओढ़ कर सामने आता है. वह पहले अभाव पैदा करता
है और उन अभावों को दूर करने के नाम पर उस समाज को अपना गुलाम बना लेता है.
उपनिवेशवादी जानता है कि किसी भी देश या समाज को गुलाम बनाने के लिए उसकी संस्कृति,
शिक्षा, संसाधनों और भाषा को नियंत्रण में लेना जरूरी है. यह प्रक्रिया अब भी
अफ्रीकी महाद्वीप में जारी है.
यह भी अब एक सच्चाई है कि उपनिवेशवाद अपना नए रूप में विस्तार कर रहा है. भारत जैसे
देश जो कभी खुद गुलामी और दासता के शिकार रहे, उन्होंने पिछले दो दशकों में आर्थिक
विकास के लिए उदारवादी नीतियां अपनाई. उन्होंने खेती और सामाजिक विकास के क्षेत्र
में सरकारी योगदान-रियायतों को कम किया और उद्योगों-पूंजीवादी ढांचों को खड़ा करने
के लिए धन आवंटन बढ़ाया.
मकसद यही होता है कि किस तरह से वृद्धि दर को बढ़ाया जाए. धन तो बढ़ा पर असामानता
उससे कहीं तेज़ गति से बढ़ी. भारत का अकेला एक औद्योगिक परिवार- अम्बानी परिवार भारत
के 5 फ़ीसदी सकल घरेलु उत्पाद को नियंत्रित करता है. सत्तर फ़ीसदी संसाधनों पर 8
फ़ीसदी लोगों का कब्जा हो चुका है और अब इसी भारत के औद्योगिक घरानों ने अफ्रीका को
अपने आर्थिक औपनिवेशिक साम्राज्य के विस्तार का लक्ष्य बनाया है.
इन समूहों ने अफ्रीकी देशों में उद्योगों के विस्तार की नीति के तहत प्राकृतिक
संसाधनों पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया है. चीन ने तो वहाँ उपलब्ध हो रहे रोज़गार
के अवसरों को भुनाने के लिए अपने चीनी नागरिकों को ही वहाँ भेजना शुरू कर दिया है.
इस तरह कभी विकासशील कहे जाने वाले देश खुद उपनिवेशवादी रवैया अख्तियार करने लगे
हैं. ज्यादा अफ़सोस तो इस बात का है कि हम उन्हीं को गुलाम बना लेना चाहते हैं, जो
हमारे सबसे करीब रहे हैं.
एक और समानता हम साफ़ तौर पर पाते हैं, अफ्रीका का समाज भी पूंजीवादी नीतियों का बड़ा
शिकार बना है. संसाधनों से संपन्न होने के बाद भी जब आप सेनेगल की राजधानी डकार के
पुराने शहर की तरफ कूच करते हैं तब सड़क और छोटी दुकानों पर बिकते हुए कपड़ों को देख
कर आप विपन्नता का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं.
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यहां दुकानों पर बच्चों, पुरुषों और महिलाओं के पुराने कपडे बिकते हुए पायेंगे.
हमारे फोटो खींचने पर उन्होंने फोटो न खींचने का निवेदन किया. वे अपनी स्थिति को
स्थायी नहीं बनाना चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि इस सच को कोई और देखे. एक सच यह भी
है कि यूरोपीय लोगों का पुराना उपयोग हुआ सामान अफ्रीका के इस शहर के बाज़ार में आता
है. यानी फैशन व्यवहार पर भी उनका कब्ज़ा-सा ही है.
स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत देख कर आँखें नम हो जाती हैं. वहाँ सरकारी या सार्वजनिक
स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर कोई हक़ लोगों को नहीं हैं. एक लाख प्रसव होने पर एक
हज़ार महिलायें अपना जीवन खो देती हैं क्योंकि उन्हें स्वास्थ्य सेवाएँ मिल ही नहीं
पाती हैं. निजी सेवाएँ भी इतनी कम हैं कि उनका दायरा राजधानी डकार तक ही सीमित है.
मैं बस एक उदाहरण दे दूं. फिलिस्तीन से आये हमारे एक साथी रामी को फ्लू और गले का
संक्रमण हो गया, जिसके इलाज़ के लिए चिकित्सक खोजने में 2 घंटे का समय लगाने के बाद
जो चिकित्सक मिले, उनकी फीस 26000 सेफा (सेनेगली मुद्रा) यानी 2600 रूपए थी. फिर
एंटीबायोटिक दवाएं और सामान्य पेरासिटामोल खरीदी गयी, जिनके लिए 49000 सेफा यानी
4900 रूपए का भुगतान किया गया. जहाँ प्रति व्यक्ति मासिक आय 2000 रूपए से कम हो,
वहां क्या बीमार पड़ना वाजिब है!
हम भी एक पर्यटक की तरह इस शहर में घूमते रहे, मोल-भाव किया पर 9 दिनों में इस देश
के एक भी व्यक्ति ने ऊँची आवाज़ में बात नहीं की. हमारी बात को सुना और पूरा सम्मान
दिया. उनमें कोई कुटिलता अभी भी नज़र नहीं आती तभी तो इमिग्रेशन अधिकारी आपसे थोड़ी
नज़रें झुका कर रिश्वत मांग ही लेता है और नहीं मिलने पर मुस्कुरा देता है, क्या
इससे बेहतर कोई सभ्यता हो सकती है!
नस्लभेदी उपनिवेशवाद कितना भयावह, हिंसक और अमानवीय होता है, इसका एक प्रमाण डकार
से लगभग 15 किलोमीटर दूर अटलांटिक महासागर में स्थापित 5 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र
में फैले गोरे द्वीप के रूप में नज़र आता है. इसे दासों के द्वीप के रूप में जाना
जाता है.
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चर्च की इस दासप्रथा में नकारात्मक भूमिका के लिए वेटिकन के पोप ने यहाँ आकर माफ़ी मांगी |
यह क्षेत्र आज के विकसित और संपन्न देशों के सबसे करीब है, इसलिए अफ्रीका के तमाम
देशों से लोगों को दास बना कर लाया जाता और इस द्वीप पर रखा जाता था. यहीं से
उन्हें समूहवार गुलामी के किये यूरोप और अमरीका के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता
था. इस द्वीप पर बनी इमारतों में 80 से 150 वर्गफुट के आकार के कमरे बनाए गए,
जिनमें 15 से 30 लोगों को रखा जाता था. हर रोज़ दिन में केवल एक बार शौच के लिए मौका
दिया जाता था. गंदगी में रहने के कारण यहाँ महामारी फैली और हजारों अफ्रीकी मारे
गए.
इस क्षेत्र में कुंवारी लड़कियों के लिए अलग कमरे बनाए गए, जहां कुंवारेपन की जांच
के बाद लड़कियों को रखा जाता और मनोरंजक शोषण के लिए दूसरे हिस्सों में भेजा जाता
था. गर्भवती होने के बाद उन्हें किसी अनजाने इलाके में छोड़ दिया जाता था. चूँकि
मुक्ति का यही एक मात्र रास्ता था, इसलिए लड़कियां जल्दी से जल्दी गर्भवती हो जाना
चाहती थीं. 14 वीं और 15 वीं शताब्दी के आस पास 300 सालों में अधिकृत आंकड़ों के
मुताबिक डेढ़ करोड़ लोग इस दासता के दौर में जान से हाथ धो बैठे. चारों तरफ समुद्र और
शार्क मछलियाँ थीं, ऐसे में जिन्होंने भी भागने की कोशिश की वे जिन्दा नहीं बचे.
रोचक तथ्य है कि केवल उन्हीं दासों को दासता के लिए आगे भेजा जाता था, जो स्वस्थ
होते थे और जिनका वजन 60 किलो से अधिक होता था. जिनका वजन कम होता, उन्हें ख़ास
भोजन देकर उनका वजन बढाया जाता और आगे भेज दिया जाता.
इस द्वीप पर रहने वाले लोग बताते हैं कि चर्च की इस दासप्रथा में नकारात्मक भूमिका
के लिए वेटिकन के पोप ने यहाँ आकर माफ़ी मांगी पर हमने उनसे कहा कि इतिहास की इस
कड़वी सच्चाई को हम माफ़ कर सकते हैं पर भूल नहीं सकते.
वाकई मानव ने अपने इतिहास में कुछ ऐसे अपराध किये हैं, जिन्हें भूला नहीं जा सकता.
अब सवाल यह नही है कि अब भी यूरोप और अमेरीकी देश नस्लवाद और उपनिवेशवाद से सराबोर
अपने चरित्र को क्यों नहीं त्यागना चाहते हैं. अब सवाल तो यह है कि जब विश्व समाज
मंच जैसे जनसंघर्ष और जनआंदोलनो के वैश्विक मंच खुद पूंजीवादी और औपनिवेशिक चरित्र
के जाल में फंसते चले गये हैं तो नई दुनिया बनाने का सपना कैसे पूरा होगा!
10.03.2011,
13.28 (GMT+05:30) पर प्रकाशित