जनसंघर्ष की दिशा की तलाश
वर्ल्ड सोशल फोरम | अफ्रीका का यथार्थ-3
जनसंघर्ष की दिशा की तलाश
सचिन जैन
सेनेगल से लौटकर
विश्व समाज मंच की शुरुआत उस एक संभावना के साथ हुई थी जिसमें यह माना गया था कि
मौजूदा आर्थिक विकास की पूंजीवादी नीतियों से बनने वाला समाज एक समतामूलक और शोषण
मुक्त समाज नहीं होगा, इसलिए हमें एक नई दुनिया के निर्माण का सपना देखना होगा.
हमारे मन में यह विश्वास होना चाहिये कि इस सपने को पूरा किया जा सकेगा और हम अपने
इस सपने को पूरा करने के मामले में किस दिशा में बढ़ रहे हैं, इसकी जांच पड़ताल करने
और समीक्षा करने के किये हम हर साल एक मंच पर इकट्ठा होंगे.
सेनेगल में आयोजित हुआ विश्व समाज मंच का आयोजन दो मायनों में महत्वपूर्ण है- एक कि
यह अफ्रीका की धरती पर आयोजित हुआ और दूसरा इसने यह बताया कि संघर्षशील समुदायों और
समूहों को यह विश्लेषण करना होगा कि राजनैतिक व्यवस्था में बदलाव के लिये हमारा
संघर्ष साझा कैसे होगा. आयोजन की व्यवस्थाओं के नज़रिए से बहुत कुछ गड़बड़ था, परन्तु
मध्यपूर्व और अफ्रीकी दुनिया के सवालों को एक साथ जानने-समझने का बेहतरीन अवसर भी
था.
जहाँ एक तरफ ठीक उन्हीं दिनों में मिस्र में तानाशाही से मुक्ति और लोकतंत्र की
बहाली के लिए लाखों लोग सड़क पर जुटे हुए थे तो वहीँ दूसरी ओर मिस्र के करीब ही पचास
हज़ार लोग दुनिया में लोकतंत्र और खुशहाली के रास्तों को खोज रहे थे.
यह एक सुखद अनुभव था, जब हमने यह देखा कि हर पल लोगों में यह जाने की उत्सुकता थी
कि हुस्ने मुबारक ने सत्ता छोड़ी या नहीं, इस पर बहसें थीं और चर्चाएँ भी. विश्व
समाज मंच में करीब 1000 लोग ऐसे थे, जो बर्मा, कांगो जैसे देशों में राजनैतिक
संघर्ष की प्रक्रिया में अपनी ही धरती से बेदखल कर दिए गये, वे अब फ्रांस, दक्षिण
अफ्रीका जैसे देशों में राजनैतिक शरण लिए हुए हैं.
मिस्र के जन संघर्ष के मामले में डाकार में एक बड़ी रैली हुई और वहाँ के मिस्र
दूतावास पर प्रदर्शन भी हुआ. इन्हीं दिनों में ट्यूनीशिय, अल्जीरिया, यमन, इरान,
लीबिया सहित कई देशों में इसी तरह का राजनैतिक माहौल बनने लगा. दुनिया भर के समूह
यह मान रहे थे कि हमें इन जनतंत्र के लिये जन संघर्षों के साथ खड़े होना चाहिए.
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अफ्रीका और यूरोप के हर अखबार में 10 दिनों तक सबसे ज्यादा जगह मिस्र और दूसरे
राज्यों में हो रही हलचल को मिल रहा था क्योंकि इनसे इन देशों के हित जुड़े हुये
हैं. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मध्यपूर्व और अफ्रीका का राजनैतिक माहौल क्या
है. डकार के मंच में इस बार अंतर्राष्ट्रीय पलायन, देशों के राजनैतिक चरित्र और
लोकतंत्र, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की लूट जैसे मुद्दों पर केन्द्रित था.
फरवरी के पहले हफ्ते में ये कार्यकर्ता यहां दुनिया भर से वर्ल्ड सोशल फोरम में
हिस्सा लेने पहुंचे थे. वर्ष 2001 में ब्राजील के पोर्टो एलीग्रे से शुरू हुई
सालाना बैठक का यह सिलसिला हर वर्ष बदस्तूर जारी है. एक नई और बेहतर दुनिया रचने के
लिए वर्ल्ड सोशल फोरम दुनिया भर के कार्यकर्ताओं को अपने प्रस्तावों और सामूहिक
गतिविधियों को साझा करने का मंच प्रदान करता है.
पहली बार वर्ल्ड सोशल फोरम की बैठक दावोस, स्विट्जरलैंड में आयोजित विश्व आर्थिक
मंच के सम्मेलन के जवाब में बुलाई गई थी. मानवीय जरूरतों के मुकाबले कारपोरेट लालच
की बढ़ती दखल के बीच वर्ल्ड सोशल फोरम ने यह प्रस्ताव रखने का साहस दिखाया कि वास्तव
में एक और दुनिया का सृजन संभव है. और आज वर्ल्ड सोशल फोरम को एक दशक हो गया है,
नवउदारवादी पूंजीवाद तथा सैन्य साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे सामाजिक आंदोलनों
को एक जुट करते हुए तथा मानवता को समर्पित व सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध दुनिया
की रचना का प्रयास करते हुए.
ब्राजील, भारत, केन्या और अब सेनेगल में हुई वैश्विक बैठकों की कड़ी से यह अंदाजा
लगाया जा सकता है कि न केवल स्थानीय, राष्ट्रीय व क्षेत्रीय फोरम बल्कि वर्ल्ड सोशल
फोरम ने भी अपना बुनियादी राजनीतिक रुझान वामपंथ की ओर खिसका दिया है. अफ्रीका में
एक बार फिर हुई वर्ल्ड सोशल फोरम की इस बैठक के जरिए यह कोशिश की गई कि इसका फोकस
स्थानीय सच्चाईयों को वैश्विक संघर्ष से जोड़ने पर केंद्रित किया जाए.
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सेनेगल में हुई वर्ल्ड सोशल फोरम का इस बार का मुख्य एजेंडा वैश्विक पूंजीवादी
व्यवस्था में जारी संकट पर ध्यान देने की ओर था. इस संकट का साफ तौर पर सीधा असर
दुनिया के गरीबतम देशों पर देखा जा सकता था. यह वित्तीय, खाद्यान्न तथा ऊर्जा
क्षेत्र में आए संकट व जलवायु परिवर्तन के तौर पर देखा जा सकता है. सार्वजनिक
संसाधनों के निजीकरण की नवउदारवदी नीतियों के चलते, जिसे विश्व बैंक व
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सरीखी संस्थाओं ने काफी प्रोत्साहित किया है, खासकर
अफ्रीका में काफी नकारात्मक असर देखने में आया है.
इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए डकार फोरम तीन मुख्य सिद्धांत बिंदुओं पर
केंद्रित रखा गया था. पूंजीवाद का बढ़ता आलोचनात्मक विश्लेषण, पूंजीवाद व
साम्राज्यवाद के खिलाफ ताकतवर होता संघर्ष तथा दमन व शोषण के इन तरीकों के विकल्प
के तौर पर लोकतांत्रिक व प्रचलित तरीकों पर अमल करना.
इस छह दिवसीय फोरम की शुरुआत डाउनटाउन डकार से यूनिवर्सिटी तक एक महारैली से की गई.
यूनिवर्सिटी में ही बाद में फोरम के कार्यक्रम आयोजित किए गए. इसमें भाग लेने वाले
सभी कार्यकर्ताओं का उत्साह देखते ही बनता था. उनके नारों और बैनर के संदशों से पता
चलता था कि सामाजिक न्याय के मुद्दों को कितनी विविधता मिल चुकी है.
इस महारैली के अंत में यूनिवर्सिटी में बोलीविया के वामपंथी राष्ट्रपति इवो मोरेल
का भाषण आयोजित किया गया. मोरेल ने साम्राज्यवाद की तीखी भर्त्सना करते हुए, फोरम
के महत्व की ओर यह कहते हुए इशारा किया कि यह एक ऐसे स्कूल की तरह है, जहां
कार्यकर्ता अपने सामाजिक आंदोलन को मजबूत, सशक्त तथा और ज्यादा ताकतवर बनाने की सीख
हासिल कर सकते हैं.
इस फोरम के मंच पर हजारों तरह की गतिविधियों की योजना तैयार की गई. बैठक का पहला
दिन अफ्रीका और अफ्रीकी प्रवासियों पर केंद्रित रहा. इसमें फ्रांज फेनन तथा माल्कम
दशम की बेटियों ने भी भागीदारी की, इसमें उन्होंने अपने मशहूर पिताओं की विरासत पर
चर्चा की. इसी तरह ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति लुइज इनासियो, लूला डा सिल्वा के
साथ भी बैठक हुई, जिसमें उन्होंने अफ्रीका तथा दक्षिण अमेरीकी देशों के बीच और
घनिष्ठ संबंधों के विकास पर जोर दिया. ब्राजील न केवल इस फोरम का घर है बल्कि वह
अफ्रीकी प्रवासियों की सबसे बड़ी आबादी का भी घर है.
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वर्ल्ड सोशल फोरम की वर्ष 2001 में हुई पहली बैठक काफी हद तक संसाधनों के निजीकरण के वाशिंगटन सर्वसहमति से प्रभावित रही थी. |
इसके बाद के दो दिनों में स्व-केंद्रित गतिविधियों के जरिए उन चिंताओं व हितों का
व्यापक दायरा देखा जा सका, जिनके साथ दुनिया भर के कार्यकर्ता इस बैठक में पहुंचे
थे. हमारी शामें संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों तथा अनौपचारिक मेल-मिलाप से भरी
रहीं. अंतिम के दो दिन संगठनों, नेटवर्क व अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों के समन्वय को
समर्पित रहे, जिन्होंने एक बेहतर दुनिया के गठन की सामूहिक सोच के आधार पर अपनी
गतिविधियों का प्रस्ताव रखा. फोरम की बैठक एक समापन समारोह के साथ अपनी परिणति पर
पहुंची जिसमें संगठनों ने अपनी घोषणाओं तथा कार्रवाईयों का उल्लेख किया.
शुरुआती तौर पर वर्ल्ड सोशल फोरम की अवधारणा एक ऐसे मंच के तौर पर की गई थी जहां
विभिन्न नागरिक समुदायों के समूह मिल-बैठकर अपनी साझा चिंताओं पर विमर्श करेंगे.
इसे इस तरह से बनाया गया था कि जमीनी संगठनों को आगे बढ़ने में मदद मिल सके व उनका
सशक्तिकरण हो, बजाय इसके कि किसी खास एजेंडे को हासिल करने के लिए एकसूत्रीय आंदोलन
का सृजन किया जाए.
लेकिन कई मसलों पर अपना पक्ष रख पाने में विफलता ने इसके अंदर आलोचना के दरवाजे खोल
दिए और ऐसे कई संगठन आगे आए तो अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में फोरम की मदद
चाहते थे. वर्ल्ड सोशल फोरम की वर्ष 2001 में हुई पहली बैठक काफी हद तक संसाधनों के
निजीकरण के वाशिंगटन सर्वसहमति से प्रभावित रही थी.
इसके चलते फोरम में शुरुआती तौर पर सरकारों को समस्या के एक भाग के तौर पर देखने की
अराजक प्रवृत्ति देखने में आई. इसके बाद से आयोजकों ने नागरिक समूहों की इस बैठक से
सरकारों, राजनीतिक दलों और सशस्त्र उग्रवादी आंदोलनों को दूर रखना शुरू कर दिया था.
बीते एक दशक में विश्व भर में हुए राजनैतिक बदलाव के चलते वाम ध्रुवीकरण साफ तौर पर
नजर आ रहा है, यह जितना साफ दक्षिण अमरीका में दिख रहा है उतना और कहीं नहीं. इसी
का नतीजा है कि अब ज्यादा से ज्यादा प्रतिभागी इस विचार का गर्मजोशी से स्वागत कर
रहे हैं कि वैश्विक पूंजीवाद के संकट का सामना कर रही समस्याओं के निदान के लिए
राजनीतिक दलों और सरकारों को औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.
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अन्य तमाम फोरम की बैठकों की ही तरह, इस बार भी अधिकांश प्रतिभागी मेजबान देश से ही
आए थे. इनके अलावा पड़ोसी पश्चिम अफ्रीकी देशों से भी बड़ी संख्या में भागीदारों का
कारवां पहुंचा था. सेनेगल के पूर्व औपनिवेशिक मालिक फ्रांस से भी बड़ी संख्या में
प्रतिभागी यहां शामिल होने आए थे. वहीं एशिया व अमरीका से तुलनात्मक तौर पर कम
प्रतिभागी समूह थे. अब तक अधिकांश फोरम की बैठकों में बहुभाषी आयोजन होते आए हैं
लेकिन फ्रेंकाफोन अफ्रीका में (यानी फ्रेंच बोलने वाले अफ्रीकी देश) में फ्रेंच
भाषा बात-चीत का मुख्य जरिया बन गई थी. इसके चलते ब्रिटिश उपनिवेश रहे नाइजीरिया व
केन्या सरीखे देशों से आए प्रतिभागी खुद को उपेक्षित से महसूस कर रहे थे.
इससे पहले के सोशल फोरम में डेढ़ लाख तक प्रतिभागी भाग ले चुके हैं. इसलिए डकार में
मौजूद 50 हजार प्रतिभागी तुलनात्मक तौर पर काफी कम कहे जा सकते हैं. कहना न होगा कि
अब तक के सबसे बड़े फोरम ब्राजील और भारत में आयोजित हुए हैं जहां सेनेगल की एक करोड़
20 लाख आबादी की तुलना में काफी ज्यादा आबादी निवास करती है. चूंकि ऐसे फोरम में
मेजबान देश से ज्यादातर प्रतिभागी शामिल होते आए हैं, इसलिए इस फोरम के आकार को
सफलता के तौर पर देखा जाना चाहिए न कि असफलता के.
हर सोशल फोरम ने अपनी शैली और खास तरह की चारित्रिक विशेषता हासिल की हुई है.
दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से 2011 के डकार फोरम को अपनी कुंठित अव्यवस्था की वजह से
ज्यादा जाना जाएगा. यह निश्चित तौर पर दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि यह ऐसा फोरम था
जिसमें जबर्दस्त क्षमता थी. यूं भी अफ्रीका सोशल फोरम की प्रक्रिया से कतई अनजान
नहीं था, इस क्षेत्र में किसी अन्य प्रायद्वीप की तुलना में अधिक सोशल फोरम हो चुके
हैं.
डकार फोरम को कई तरह की तार्किक समस्याओं से जूझना पड़ा. इस फोरम के आयोजन की
जिम्मेदारी जिस स्थानीय समिति को सौंपी गई थी वह उसकी क्षमता से कहीं ज्यादा थी.
इसके बावजूद उसने अंतरराष्ट्रीय मदद के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. इसके चलते वही हुआ
जो सोशल फोरम की बैठकों में अब एक मानक समस्या का स्वरूप बनता जा रहा है. यानी तमाम
आयोजनों में लेटलतीफी और उन्हें इस तरह से आयोजित करना कि कई भागीदारों के लिए अपने
सेशन के आयोजन स्थल को ढूंढना नामुमकिन नहीं तो बेहद कठिन जरूर बन गया.
इस कठिनाई को और बढ़ाने में मदद की उन कक्षाओं ने जो यूनिवर्सिटी में कुछ दिनों पहले
हुई हड़ताल की वजह से अलग से लगाई जा रही थीं. कई जगह विद्यार्थियों ने कार्यकर्ताओं
को उनकी बैठकों के लिए निर्धारित जगहों से बाहर निकाल दिया.
इससे प्रतिभागियों को
काफी हैरत हुई कि आखिरकार आयोजकों ने इन विद्यार्थियों को भी फोरम का हिस्सा बनाने
का बेहतर काम क्यों नहीं किया. आयोजकों ने ऐसी हालत में आनन-फानन में टेंट खड़े कर
बैठक करवाने की कवायद की लेकिन इस दौरान मची अफरातफरी में कई सत्र निरस्त करने पड़े.
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वैश्विक न्याय का यह आंदोलन किसी भी तरह से कमजोर नहीं पड़ सकता पर समीक्षा की जरूरत है. |
और इन सबसे बढ़कर यह हुआ कि ट्यूनीशिया और मिस्र में तानाशाह सरकारों के खिलाफ छिड़े
सफल विद्रोह के नतीजे में सेनेगल के राष्ट्रपति अब्डोलये वेड को यह डर सताने लगा कि
इतने संगठित व अनुशासित सामाजिक आंदोलन के जमावड़े से कहीं उनकी सरकार का भी तख्ता न
पलट जाए. ऐसी बड़ी बैठकों के आयोजन में रहने, खाने-पीने तथा अन्य इंतजाम संबंधी तमाम
व्यवस्थाओं के लिए निश्चित तौर पर मेजबान सरकार की अनुमति या सहयोगी की दरकार होती
है; लेकिन सेनेगल में एक विरोधी राष्ट्रपति ने तो फोरम को ही मटियामेट करने की
कोशिश की.
फोरम के भीतर यह बहस चल पड़ी कि क्या भारी वित्तीय लागत, पर्यावरणीय नतीजे और इंतजाम
की नाकामियों से भरपूर दुनिया भर के सामाजिक जनांदोलनों की ऐसी वैश्विक बैठक की
वास्तव में जरूरत है.
अधिकांश ऐसा होता है कि बेहतर संपर्क वाले गैर सरकारी संगठन,
जिनके पास समय, वित्तीय संसाधन तथा यात्रा के जरूरी वीसा जैसी सुविधाएं होती हैं वे
ऐसे फोरम में आसानी से हिस्सा ले सकते हैं, बनिस्बत उन जमीनी संस्थाओं के जिनका
आधार इतना ठोस नहीं है.
कई कार्यकर्ताओं ने ऐसी बैठक के बजाय आभासी बैठक का सुझाव दिया, हालांकि कई
यूनिवर्सिटियों में आनलाइन शिक्षा के बजाय अब वास्तविक कक्षाओं का रुख अपना लिया
गया है और अभी भी आमने-सामने की बैठक का ज्यादा महत्व माना जाता है.
दस वर्षों तक बैठकों के सफल सिलसिले के बावजूद वर्ल्ड सोशल फोरम का भविष्य अभी भी
अनिश्चित ही है. डकार की बैठक की समाप्ति के वक्त अंतरराष्ट्रीय आयोजन समिति ने
मिल-बैठकर भविष्य की रणनीतियों पर चर्चा की. पोर्टोएलीग्रे में जब फोरम की पहली
बैठक हुई थी, वैश्विक दक्षिण के नजरिए से सामाजिक व आर्थिक न्याय के लिए बैठकें
आयोजित करने का विचार समाहित किया गया था.
हालांकि रखरखाव संबंधी समस्याओं की वजह
से ऐसी बैठकों की शुरुआती चमक काफी हद तक फीकी पड़ गई, कई प्रतिभागियों के लिए अभी
भी हर दो साल में ऐसी वैश्विक बैठक में हिस्सा लेने आना मायने रखता है. उम्मीद यही
की जाती है कि जब तक वर्ल्ड सोशल फोरम की बैठकें होती रहेंगी, वैश्विक न्याय का यह
आंदोलन किसी भी तरह से कमजोर नहीं पड़ सकता पर समीक्षा की जरूरत है.
10.03.2011,
14.43 (GMT+05:30) पर प्रकाशित