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मिजाज सवा चालीस का पहाड़ा

स्मरण

 

मिजाज सवा चालीस का पहाड़ा

देव प्रकाश चौधरी औराही हिंगना से लौटकर


चलते हुए मन 'में-में' करता है, 'हक-हक' करता है, 'अस-बस' करता है और कभी-कभी 'कस -मस' भी करता है. क्यों नहीं करेगा भई, सड़क भले ही अब पक्का और चौड़ा हो गया हो, लेकिन रास्ता तो वही है न, जिसपर कभी लाल पान की बेग़म अपनी बैलगाड़ी में बैठकर इतराई थी. इन्हीं रास्तों पर तो हीरामन की बैलगाड़ी ने लीक छोड़कर हीराबाई को सुनाया था, महुआ घटवारिन का गीत. ऐसी सड़क पर चलते हुए मन में ही नहीं पीठ में भी गुदगुदी होती है. ठीक गाड़ीवान हीरामन की तरह. इस्स... जुलुम बात, पीठ में भी कहीं गुदगुदी होती है? होती है, कभी सिमराहा आ कर तो देखिए...कभी औराही हिंगना पहुंच कर देखिए कि कैसे फनीश्वरनाथ रेणु ने अपने गप्पों को शीर्षक लगाकर हिंदी साहित्य में 'टटकेपन' का अहसास कराया था....टटकेपन का ‘टीका’ बाद में, पहले औराही हिंगना की बात.

fanishwar-nath-renu


फ़ारबिसगंज से निकलकर औराही हिंगना गांव की ओर बढ़ते हुए मन के साथ साथ, सचमुच पूरे शरीर में झुरझुरी सी होने लगी थी-किसके घर से कागा अभागा नकबेसर लेकर भागा होगा? किस घर में झालदार बातें सुनने के बाद सिरचन के मर्मस्थल को 'ठेस' लगी होगी? किस गांव के किस टोले में 'पंचलाइट' जलाने के एवज में पंचों ने गोधन को सिनेमा का गाना गाने की छूट दी होगी? दसदुआरी पंचकौड़ी से यहीं कहीं किसी टोले में तो शोभा मिसिर के बेटे ने साफ साफ कहा था-तुम जी रहे हो कि थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया? जैसे जैसे औराही-हिंगना करीब आ रहा था,रेणु के एक पात्र एक एक कर सामने आते जा रहे थे.

चिड़िया-चूरमून की आवाजें,मोटरगाड़ियों का शोर, एक-दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में पीछे रह जाने वाले साईकिल सवारों की गालियां, स्कूल के कुछ जुवाये हुए लड़कों की मटरगश्ती, सड़क के किनारे बैठकर छोटे से लाउडस्पीकर के सहारे “खाऊं की खुजाऊं..." जुमले के साथ खुजली की दवा बेचने वाले कविराज और छोटी-छोटी लेकिन बेहद खूबसूरत चिड़ियों वाले एक पिंजरे से भागते ट्रक ड्राइवरों को लुभाता हुआ 13-14 साल का एक लड़का... बाहर का नजारा दिलचस्प था.

ड्राइवर ने बताया,"समझिए कि बस आ ही गए." तभी पूर्णिया-फारबिसगंज हाईवे से सटे सीमेंट के एक सादे और सपाट-से द्वार पर जाकर नजर ठहर सी गई-रेणु द्वार. द्वार के बगल में ड्राइवर ने गाड़ी खड़ी कर दी और खुद नीचे उतरते हुए बताता गया कि द्वार से जो सड़क जा रही है, वही औराही हिंगना जाएगी... खुद गाड़ी से उतरा तो पता चला कि उस जगह का नाम है सिमराहा और अब कुछ ही दूर है औराही हिंगना.

रेणु द्वार हाल की उपज है. पहले सिर्फ सड़क जाती थी,द्वार नहीं था. उससे पहले वह सड़क भी कच्ची रही होगी. महान कथाकार रेणु के सम्मान में यहां इस द्वार का निर्माण हुआ है. बाहर से आनेवालों को सुविधा हो गई है, लेकिन इससे पहले भी रेणु की कथा दुनिया को जानने और समझने के लिए आने वाले लोगों को कभी कोई दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि रेणु सिर्फ अपने लोक को शब्द ही नहीं देते थे, अपने लोक को जीते भी थे, तभी तो लिखते हुए उन्हें अपने लंगोटिया यारों की बेतरह याद आती थी- “इन स्मृति चित्रों को प्रस्तुत करते समय अपने लगभग एक दर्जन करीबी लंगोटिया यारों की बेतरह याद आ रही है. वे किसानी करते हैं, गाड़ीवानी करते हैं, पहलवानी करते हैं, ठेकेदार है, शिक्षक हैं, एमएलए हैं, भूतपूर्व क्रांतिकारी और वर्तमानकालीन सर्वोदयी हैं, वकील हैं, मुहर्रिर हैं, चोर और डकैत हैं. वे सभी मेरी रचनाओं को खोज-खोज कर पढ़ते हैं-पढवाकर सुनते हैं और उनमें मेरे जीवन की घटनाओं की छायाएं ढूंढ़ते हैं. कभी-कभी मुझे छेड़कर कहते हैं- साले उस कहानी में वह जो लिखा है, सो वहां वाली बात है न ?”

मैं भी रेणु द्वार पर खड़े होकर 'कुछ वहां वाली' बात सुनने का मोह संवार नहीं सका. आगे बढ़े तो मिले घोतन दास. घोतन दास सिर्फ पान की दुकान ही नहीं चलाते, 'मलमल के कुर्ते पर छींट लाले-लाल, पान खाए सैंया हमार हो', गीत भी गुनगुनाते हैं.

घोतन दास ने रेणु की कहानी पर बनी फिल्म 'तीसरी कसम' नहीं देखी है. किस्सा सुना है और फारबिसगंज में आए एक ठेठर (थियेटर) की बदौलत सालों से यह गाना उनके सर पर चढ़कर बोल रहा है-“गजबे गाना है कि...सुनकर मिजाज सवा चालीस हो जाता है.”
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

umesh soni [uk.soni@rediffmail.com] Bilaspur cg - 2011-04-27 17:35:27

 
  तुम्हारी उन्गली रसपिरिया बजाते ही टेढी हुई है,है ना? मोहना रे....। हीरामन.. पच्कौडी हरगोबिन सम्बदिया..। हम तो हिन्दी का लिगं-उगं नही जानता कुछ..बताव तो मिस दास को..आईमिन । दूर्वा नही दूर्वा...। 20 साल बाद आज फिर से सब कुछ याद आ गया जो मै रेणु साहित्य को लेकर पागल था। 
   
 

Brijesh [brijesh.ch@gmail.com] -

 
  शब्दों का बेहतरीन सामंजस्य. काफी दिनों के बाद अपनी भाषा वाला लेख पढ़ा.ऐसा लेख लिखने के लिये आपका आभारी हूं. 
   
 

कुमार भवेश चंद्र [] लखनऊ -

 
  देवप्रकाश...रेणु के गांव की आपकी यात्रा का संस्मरण पढ़ते हुए मुझे रेणु की वह रिपोर्टिंग याद आ रही थी जो उन्होंने पटना में बाढ़ के दौरान दिनमान में लिखी थी...तब मैं स्कूली छात्र था और रेणु की बोलती-खनकती भाषा का स्वाद पहली बार चखा था...पटना में बाढ़ का दृष्य हमने अपनी आँखों से भी देखा था पर जो रेणु ने एक रिपोर्टर के तौर पर पटना की बाढ़ का जो दृश्य खींचा था वह अदभुत था...आपकी भाषा भी सजीव है..भाषा में जीवंतता और देशीपन बनाए रखें...बधाई!!!!  
   
 

GURU SARAN LAL [gurusaranlal@gmail.com] BILASPUR(C.G.) -

 
  After learning this literary article, i get more knowledge about Fanishwar nath renu. thank you very much.All the best. 
   
 

उमेश चतुर्वेदी [uchaturvedi@gmail.com] -

 
  बेहतरीन संस्मरण...शब्दों का देसज प्रयोग रेणु की ही याद दिला रहा है. 
   
 

याज्ञवल्‍क्‍य [yagnyawalky@gmail.com] छत्‍तीसगढ -

 
  शब्‍दों को पढने के बाद लगा कि, जैसे मोहित सा बंध गया हूं। बधाई शानदार प्रस्‍तुति ।  
   
 

Sumeet Dwivedi [sumeetdwivedi@gmail.com] Allahabad -

 
  बेहतरीन वृतांत............ 
   
 

Krishna kr. Mantoo [kksinghjournalist@gmail.com] Amar Ujala -

 
  After reading this article I felt that i have just revisited from Renu ji village. really great remember story.  
   
 

Umashankar Mishra [umashankar19mishra@gmail.com] New Delhi -

 
  इस्स......... पीठ में गुदगुदी हो रही है.
आपका लेख पढ़कर लगा कि औराही हिंगना मानो सिमटकर अंतरजाल पर आ खड़ा हुआ हो.....खूब साक्षात्कार कराया आपने रेणु और उनके परिवेश से. निवेदन है कि और लिखें.
 
   
 

Awadhesh Kumar [awadheshkum@gmail.com] Delhi -

 
  देवप्रकाश, आपने कूची की तरह कलम से भी चित्र बना दिया है. मैं भी भारत बचायें, भारत बनायें अभियान के तहत उस इलाके में दो दिनों तक था लेकिन लिखने का ऐसा भाव नहीं पैदा कर सका. आपका साधुवाद. 
   
 

BANSHILAL PARMAR [parmar_photoes@rediffmail.com ] SUWASRA M.P. -

 
  रेणु जी के बारे में हमेशा मेरी जिज्ञासा रही है. जिन्होंने इतनी अच्छी कहानियां लिखीं, उनका परिवेश कैसा रहा होगा, आपके लेख ने उसकी उत्सुकता और बढ़ा दी. उस तीर्थ के दर्शन की इच्छा प्रबल हो गई. 
   
 

Arun khare [akkhare09@gmail.com] Delhi/Jabalpur -

 
  कमाल कर दिया देवप्रकाश. बस ऐसा ही लिखते रहो. प्रशंसा के लिए शब्द नहीं है.  
   
 

neha jain [] delhi -

 
  बहुत अच्छा लेख है. रेणु जी के बारे में काफी जानकारी है. इसके लिए धन्यवाद... 
   
 

पूर्णिमा वर्मन [] शारजाह -

 
  बड़ी रसीला संस्मरण है। मजा आ गया। आशा है आपका लिखा जल्दी ही कुछ और पढ़ने को मिलेगा। 
   
 

kumar prashant [prashantji@hotmail.com] mumbai -

 
  अच्छा लिखा है- और भी अच्छा होता यदि बातें गहरे में जाती और शाब्दिक भावुकता कम होती ! फिर भी मेरी बधाई. आपका यह प्रयास मेरी नज़र में पहली बार ही आया है - नज़र कमज़ोर है न ! पूरा संयोजन मुझे अच्छा लगा. मेरी बधाई. इसे बीच-बीच देखता रहूँगा. 
   
 

Anand Bharti [anandbharti03@gmail.com] Mumbai -

 
  यहां तक पढ़ कर लगा कि अभी इंट्रो ही पढ़ा है. मैं उसी इलाके का हूं लेकिन कई सालों से उधर जाना नहीं हुआ है. आप आगे की कथा ज़रुर लिखें. रेणु जी पर शुरु करें तो अंत का अंत नहीं होने दें. आगे भी लिखें, भूख जगाना गलत बात है. 
   
 

Anand [] -

 
  Gooooood! Great! Marvelous! Wonderful. 
   
 

neha [nehakashyap22june@gmail.com] Bangalore -

 
  after a long time read something which is very near to my heart..Renuji is my favorite writer because instead of writing He narrated his stories and novels and same i can feel in this article...really freshen.... 
   
 

payal [] -

 
  बहुत अच्छा लिखा है सर. 
   
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