गरीबों के गलत आंकड़े
बात पते की
गरीबों के गलत आंकड़े
देविंदर शर्मा
उच्चतम न्यायालय ने एक सार्थक कदम उठाते हुए देश में गरीबों की गिनती के आधार पर
सवाल उठाया है. उच्चतम न्यायालय ने महसूस किया है कि गरीबी रेखा वास्तविकता से कम
आंकी गई है. न्यायालय का यह ऐसा काम है, जिसे देखने में हमारे अर्थशास्त्री पिछले
कई सालों से असफल रहे हैं.
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छायाकारः सैकत |
असल में अर्थशास्त्रियों ने जानबूझकर गरीबी रेखा को नीचे रखते हुए गरीबों के साथ
विश्वासघात किया था. गरीबी के इस गलत आकलन की वजह से विकास की तमाम रणनीतियों व
कार्यक्रमों की नींव ही गलत पड़ गई. कोई आश्चर्य नहीं कि आजादी के 64 साल के सफर के
बावजूद गरीबी लगातार बरकरार है और हकीकत में बढ़ भी रही है. विकास कार्यक्रमों के
असफल होने का यही वह प्राथमिक कारण है, जिसके चलते गरीबों को निर्धनता के शिकंजे से
नहीं निकाला जा सका है.
पिछले एक माह से मैंने गरीबी के नए आंकड़े नहीं देखे हैं. वास्तव में, गरीबी के इतने
ज्यादा आकलन किए गए हैं कि मेरे लिए उन्हें गिनना मुश्किल है. इन आकलनों में से
अधिकतर उसी गलत तरीके पर आधारित हैं, जिसके चलते सही अर्थों में गरीबी को कम करने
में कोई मदद नहीं मिली है. मैं यह समझ पाने में असमर्थ हूं कि अर्थशास्त्री सच के
साथ खड़े होने में क्यों डरते हैं, जबकि सच के साथ खड़े होने पर ही सही आकलन में
मदद मिलेगी.
अब जरा इन आंकड़ों को देखें. नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन 2004-05 की रिपोर्ट के
अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 12 रूपए और शहरी क्षेत्रों में 17 रूपए प्रतिदिन से
कम खर्च करने वाले व्यक्ति गरीब हैं. इसी आकलन को उच्चतम न्यायालय ने आश्चर्यजनक
माना है. आखिर भारत के योजनाकार जमीनी हकीकत के प्रति इतने अंधे कैसे हो सकते हैं?
भारत के योजनाकार यह कैसे सोच सकते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र का कोई व्यक्ति 12 रूपए
प्रतिदिन और शहरी क्षेत्र का व्यक्ति 17 रूपए प्रतिदिन पर गुजर-बसर कर सकता है.
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व मुखिया सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता
में एक समिति बनाई गई. इस समिति ने नए सिरे से अध्ययन किया और आकलन में भोजन,
शौचालय और शिक्षा जैसे कुछ और पैमानों का समावेश किया. रोजमर्रा की व्यय सूची में
कुछ और चीजें जोड़ी गई, इससे जो नया आकलन तैयार किया गया, वह ग्रामीण क्षेत्रों में
15 रूपए का और शहरी क्षेत्र में 19 रूपए प्रतिदिन का बना. यह आकलन भी हकीकत से दूर
था.
मुझे नहीं मालूम कि सुरेश तेंदुलकर क्यों खुद यह महसूस नहीं कर सके कि उनकी टीम
द्वारा अपनाए गए गरीबी के संकेतक अपर्याप्त थे, जिनसे जमीनी हकीकत पर रोशनी नहीं
पड़ती थी. न तो कोई अर्थशास्त्री गरीबों की इस गणना के विरोध में खड़ा हुआ और न ही
इसे चुनौती दी गई. मैं नहीं जानता, वे ऎसा क्यों महसूस करते हैं कि गरीबों की संख्या
छिपाकर वे देश की सेवा कर रहे हैं.
गरीबी एक हकीकत है, जिससे लड़ने के लिए पहली और सर्वाधिक जरूरत सही आंकड़ों की है.
योजना आयोग ने पूर्व में गरीबी का प्रतिशत 26 आंका था. सुरेश तेंदुलकर समिति ने इसे
बढ़ाकर 37.2 प्रतिशत कर दिया. इसका अर्थ यह हुआ कि सिर्फ चार साल में ही 11 करोड़
अतिरिक्त लोग गरीबी रेखा से नीचे के पायदानों पर आ गए.
इतना ही पर्याप्त नहीं, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के लिए ऑक्सफोर्ड पावर्टी
एंड ह्यूमन डेवलपमेन्ट इनीशिएटिव द्वारा तैयार किए गए मल्टी-डाइमेन्सनल पावर्टी
इंडेक्स (बहुमुखी गरीबी सूचकांक), के अनुसार भारत में 55 फीसदी लोग गरीबी के शिकंजे
में हैं.
मुझे बताया गया है कि यह आकलन भी गलत हैं, क्योंकि यह कैलोरीज के परंपरागत बैरोमीटर
पर विश्वास करता है. भारत गरीबी को कम दिखाने के लिए जानबूझकर ग्रामीण आबादी के लिए
2400 कैलोरीज के मानक का इस्तेमाल करता है. यदि आकलन का यह आधार ही गलत है, तो फिर
बाल मृत्यु, स्कूल नामांकन, पेयजल और साफ-सफाई जैसे संकेतक न्याय नहीं कर सकते.
मेरा यह मानना है कि वर्ष 2007 की अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट गरीबी के सही
आकड़ों पर रोशनी डालती है. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत की 77 फीसदी आबादी
रोजाना 20 रूपए से अधिक खर्च करने में असमर्थ है. इस रिपोर्ट को देखते हुए देश की
नई गरीबी रेखा को पुनर्भाषित करना चाहिए. तेंदुलकर समिति, जिसने 37.2 प्रतिशत जनता
को गरीबी रेखा से नीचे बताया है, वास्तव में यह प्रतिशत भूख रेखा (हंगर लाइन) के
नीचे रहने वालों का होना चाहिए. यह जानते हुए कि शहर में कोई 19 रूपए में अपना पेट
नहीं भर सकता, इससे खाद्य असुरक्षा का अनुमान लगाना चाहिए. भूख से पीडित आबादी के
लिए तुरन्त ही खाद्य सहायता कार्यक्रम शुरू करना होगा.
दूसरे शब्दों में, भारत की मौजूदा गरीबी रेखा वास्तव में भूख रेखा का शब्द आडंबर
है. मैं केवल उम्मीद करता हूं कि उच्चतम न्यायालय दो तरह की रेखाओं के लिए सरकार को
निर्देशित करे. एक गरीबी की रेखा हो, जो अर्जुन सेनगुप्ता समिति के सुझावों के
अनुरूप हो और दूसरी भूख रेखा हो, जिसके तहत बीपीएल आबादी आए.
बहरहाल, क्या ये सभी आकलन गरीबों की स्थिति में अंतर लाएंगे? दयाभाव के साथ, उन्हें
तो यह भी नहीं मालूम कि वे किस आकलन में मुफीद बैठते हैं. हालांकि वे निश्चय ही यह
जानते हैं कि गरीबी उनकी नियति है, बाकी सब तो आर्थिक बाजीगरी है.
24.03.2011, 07.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित