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क्यों जान दे रहे हैं किसान

मुद्दा

 

क्यों जान दे रहे हैं किसान

बाबा मायाराम होशंगाबाद से


मध्यप्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित बनखेड़ी तहसील के ग्राम दहलवाड़ा कला का निवासी चंदन तुमराम अब नहीं रहा. उसने 13 फरवरी की रात आत्महत्या कर ली. वह 5 एकड़ का छोटा किसान था. कहने को तो वह किसान था लेकिन उसने अपनी जमीन कौली यानी किराये पर दे दी थी और खुद उसमें बंटाईदार बन गया था. यानी एक तरह से वह मजदूरी ही कर रहा था. लगातार परेशानियों से दो-टार हो रहे चंदन तुमराम को फसल से कुछ मिलने की उम्मीद नहीं थी.

chandan-wife

तुमराम को अपनी मंझली लड़की सीमा की शादी करनी थी. जिसका रिश्ता तय भी हो गया था. लेकिन उसकी आर्थिक हैसियत शादी करने लायक नहीं थी. कुछ माह पहले ही उसके पिता का निधन हो गया था, जो पेशे से शिक्षक थे. लेकिन वे सेवानिवृत्त होने के बाद करीब 8 साल तक बीमार रहे. उनकी महंगी दवाईयों व इलाज में काफी पैसा खर्च हो गया.

चंदन का इकलौता लड़का दिनेश भी स्वस्थ नहीं है. उसे दौरे आते हैं. यद्यपि वह दसवीं कक्षा का छात्र है लेकिन बीमारी के कारण नियमित पढ़ाई नहीं कर पा रहा है. छोटी लकड़ी संगीता कक्षा आठवीं में पढ़ रही है. सिर्फ बड़ी बेटी के हाथ ही पीले हो सके हैं.

चंदन की पत्नी सावित्री अब इन बच्चों के पालन-पोषण में अपने आपको असमर्थ पा रही हैं. वे कहती हैं कि बच्चों की पढ़ाई तो दूर, उनका पेट पालना मुश्किल है.

खेती की बढ़ती लागत, पिता का इलाज और बच्चों की पढ़ाई के खर्चे से चंदन गहरे आर्थिक संकट में आ गया था. लेकिन रही-सही कसर पाले ने पूरी कर दी. तुअर की फसल पाले से खराब हो गई. शासन से कुछ राहत मिली लेकिन उसका चेक बैंक में था और पैसा हाथ में नहीं आ पाया. वह इसके लिए चक्कर काट रहा था.

चंदन के खेत में के कुआं का पानी सूख गया था. भूजल नीचे खिसक गया था. इससे मुक्ति के लिये उसने टयूवबेल खुदाया. लेकिन बिजली नहीं होने के कारण वह आज तक चालू नहीं हो पाया. चंदन पर करीब 2 लाख का कर्ज हो गया था. साहूकारों के चक्कर अलग से थे.

कुल मिला कर परिस्थितियां ऐसी बनीं कि चंदन को इन परेशानियों से उबरने का कोई रास्ता नज़र नहीं आया. अंत में चंदन ने आत्महत्या कर ली.

होशंगाबाद जिले की बनखेड़ी तहसील में बरसों पहले रिंग के कुओं का फैलाव हुआ था. इसके साथ ही फसल चक्र में भी बदलाव आया था. उसके बाद से परंपरागत मोटे अनाजों और मिश्रित खेती का स्थान सोयाबीन और गन्ने जैसी नगदी फसलों ने ले लिया. धान की खेती भी बढ़ रही है.

गन्ने और धान में पानी की खपत ज्यादा होती है. नतीजतन, कुएं सूख गए और ट्यूबवेल से सिंचाई की जा रही है. इस क्षेत्र में बड़ी तादाद में ट्यूबवेल खनन हुए हैं. लेकिन बिजली की समस्या है. बिजली संकट के कारण किसान अपनी फसलों को पानी नहीं दे पाते. फिर चंदन जैसे छोटे किसानों की तो हैसियत बिजली बिल देने की भी नहीं है. इसलिए उसका ट्यूबवेल कभी चालू ही नहीं हो पाया. दो साल पहले भी गांव में इन्हीं परेशानियों के कारण दो किसान आत्महत्या कर चुके हैं. एक दूसरे किसान को आत्महत्या करने से बड़ी मुश्किल से बचाया जा सका है.

होशंगाबाद जिले का बड़ा हिस्सा तवा बांध से सिंचित है और यह जिला गेहूं और सोयाबीन की पैदावार के लिए जाना जाता है. यहां बरसों से किसान कुओं और ट्यूबवेल से सिंचाई करते आ रहे हैं. लेकिन ज्यादातर जगहों में कुओं की जगह ट्यूबवेल ने ले ली है. लेकिन बिजली कटौती के कारण किसानों को सिंचाई में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

आम तौर पर किसानों की समस्याओं को प्राकृतिक आपदा बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है. इस वर्ष भी पाले को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

इसी तरह बिजली के वोल्टेज की समस्या के समाधान के रूप में निजी ट्रांसफार्मर का विकल्प पेश किया जा रहा है. कुछ संपन्न किसानों ने अपने पैसे खर्च करके ट्रांसफार्मर लगाए भी हैं. लेकिन छोटे और मध्यम श्रेणी के किसानों के वश में यह नहीं है.

बढती लागत घटती उपज, खाद-बीज का गहराता संकट, बिजली-पानी की समस्या और उपज का उचित दाम न मिलने से किसानों की समस्याएं बढ़ती जा रही है. और रही-सही कसर प्राकृतिक आपदाएं पूरी कर देती हैं. कुला मिलाकर खेती अब छोटे किसानों के लिये घाटे का धंधा हो गया है. किसान कर्ज में डूबा रहता है और सरकारें इस ओर से बेखबर.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में किसानों की आत्महत्या के 66 प्रतिशत मामले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों से हैं. मध्य प्रदेश में वर्ष 2004 में 1638, वर्ष 2005 में 1248, वर्ष 2006 में 1375, वर्ष 2007 में 1263, वर्ष 2008 में 1509 और वर्ष 2009 में 1500 किसानों द्वारा आत्महत्या करने के मामले प्रकाश में आए हैं. लेकिन सरकार इन से हमेशा पल्ला झाड़ लेती है.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश में लगभग 32 लाख से अधिक किसान कर्जे में डूबे हुये हैं. दूसरी ओर इन सब से बेखबर राज्य के मुख्यमंत्री किसानों की विकासगाथा के किस्से अखबारों और सरकारी विज्ञापनों में बता रहे हैं. जाहिर है, सरकार के लिये चंदन और चंदन जैसे दूसरे किसान उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं. फिलहाल तो सरकार बड़े कारपोरेट घरानों की स्थापना में परेशान है और जब कारपोरेट की चिंता हो तो फिर खेती, फसल और किसानों की चिंता कहां होगी ?

25.03.2011, 16.17 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

D,k, Rahangdale [dk_rahangdale@gmail.com] Balaghat

 
  किसान की आत्महत्या को किसान देख सकता है या कोई मानव जो वास्तविक में है, आज हम उनकी तरफ देखते हैं जो आज के सबसे भयानक दानव बने हुए है. किसान की आत्महत्या तब ही रुक सकती है जब किसान महसूस करने लगे कि उसके बिना कुछ भी नहीं हो सकता.. दुबारा हरित क्रांति लेन की जरुरत है...जय किसान 
   
 

Jatin [] Bangalore

 
  True saying, Govt are least bother about farmer suicide and what they are interested, to opening a new wine shop and transfer their land to some MNC.  
   
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