पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
  पहला पन्ना >मुद्दा >बात पते की Print | Share This  

जापान के सबक

बात पते की

 

जापान के सबक

अणुमुक्ति


जापान में चल रही परमाणु तबाही अभी थमी नहीं है. हालांकि इस हफ़्ते की शुरुआत से ही जापान की सरकार, और अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया यह माहौल बना रहा है कि फ़ुकुशिमा में सबकुछ नियंत्रण में आ चुका है. हमारे देश के परमाणु प्रतिष्ठान ने जहाँ फ़ुकुशिमा दुर्घटना की भयावहता को स्वीकार करने में सबसे ज़्यादा देर लगाई, वैसे ही अब ‘सब कुछ ठीक है’ की रट लगाने में भी भारतीय परमाणु नीति-निर्माताओं का कुनबा सबसे आगे है.

जापान

परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष सुकुमार बनर्जी ने हाल के एक टीवी सक्षात्कार में कहा कि परमाणु-दुर्घटनाओं से ज़्यादा मौतें हर साल दिल्ली की सड़कों पर होने वाले हादसों में होती हैं. परमाणु ऊर्जा विभाग की वेबसाइट में परमाणु ऊर्जा को इसलिये सुरक्षित और श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि अन्य ऊर्जा स्रोतों के मुकाबले परमाणु से बिजली उत्पादन के दौरान प्रति मेगावाट बिजली सबसे कम मृत्यु होती है.

इस कथन में निहित धारणाएँ यह हैं कि हमारे सामने आर्थिक वृद्धि के पागलपन से इतर ना ऊर्जा की बचत और टिकाऊ विकास का कोई वैकल्पिक तरीका नहीं है ना ही ताप या पनबिजली उद्योग में मुनाफ़े के लालच में जीवन के प्रति बरती जाने वाली कोताही रोकी जा सकती है. जैसे कि परमाणु बिजले का विरोध करने वाले बड़े बांधों और खतरनाक खनन का समर्थन करते हैं और आमलोगों के पास विकल्प बस यही है कि वे यह चुनें कि उन्हें कैसे मरना है- परमाणु विकिरण से, ताप-विद्युत निर्माण के दौरान कोयले की खान इत्यादि में या फ़िर दिल्ली की सड़कों पर अमीरों की गाड़ियों के नीचे.

मानव-जीवन और पर्यावरण के प्रति ऐसा निर्मम तकनीक-केन्द्रित रुख रखने वाले हमारे देश की ऊर्जा-नीति तय कर रहे हैं, यह सोच कर ही मन सिहर जाता है. लेकिन तब, ये सब कुछ ऐसे समय में हो रहा है जब एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री गोदामों में सड़ रहे अनाज को सर्वोच्च न्यायालय के कहने के बाद भी गरीबों में बाँटने से इसलिए मना कर देता है क्योंकि उसे लगता है कि इससे देश की ’अर्थव्यवस्था’ को नुकसान होगा.

लेकिन ये सब सिर्फ़ तकनीक या अर्थशास्त्र के नियमों के प्रति किसी मासूम अंध-व्यामोह की वजह से नहीं हो रहा. 14 मार्च को जब अफ़रातफ़री में रिएक्टरों में समुद्र का पानी डाला जा रहा था, NPCIL के चेयरमैन एस.के.जैन हमें समझा रहे थे कि फ़ुकुशिमा में कोई परमाणु दुर्घटना नहीं हुई है. यह सब कुछ बस संयंत्र के संचालकों द्वारा सुनियोजित व्यवस्थापरक तैयारी है.

जापान की कोशिश
इस बीच जापान ने फ़ुकुशिमा के नजदीकी इबाराकी और मियागी प्रांतों से देश के बाकी हिस्सों में जानेवाले खाद्य-पदार्थ पर रोक लगा दी है और फ़ुकुशिमा से 240 किलोमीटर दूर स्थित टोक्यो में विकिरण के कारण नल का पानी बच्चों को पिलाने से मना कर दिया है. जापान में परमाणु-दुर्घटना से हुई तबाही की लीपापोती में भारतीय परमाणु प्रतिष्ठान का अपना हित है- ये नहीं चाहते कि परमाणु-करार के बाद विदेशी कम्पनियों से खरीदे जा रहे रिएक्टरों को लेकर लोग और सवाल खड़े करें.

जर्मनी, स्वीडन, पोलैंड, फिलीपीन्स, इटली और कई अन्य देशों ने फ़ुकुशिमा की खबर के बाद अपने परमाणु कार्यक्रमों पर रोक लगा दी है और उनपर व्यापक पुनर्विचार और सुरक्षा-जाँच के आदेश दिये हैं. खुद फ़्रांस, जहाँ की कम्पनी अरेवा जैतापुर में बिना टेस्ट किये रिएक्टर लगा रही है, के राष्ट्रपति निकोलस सारकोजी ने कहा है कि वे फ़्रांसीसी रिएक्टर-डिजाइनों की युरोप के स्तर पर पुनर्समीक्षा करवाएंगे.

ऐसे में, पूरी दुनिया और खुद जापान की तुलना में फ़ुकुशिमा की दुर्घटना को कम करके आंकना और भारतीय रिएक्टरों के सुरक्षित होने का दावा करने के पीछे हमारे परमाणु नीति-निर्माताओं की खतरनाक मंशा साफ़ झलकती है.

सच्चाई यह है कि भारत के परमाणु बिजली-केंद्रों में छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं शुरु से होती रही हैं. उत्तरप्रदेश के नरोरा स्थित परमाणु-संयत्र में शीतन के लिये जरूरी बिजली पूरे 24 घंटे गुल होने और नियंत्रण-कक्ष की मशीनें फुँक जाने की घटना 1993 में हो चुकी है. हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भारत के रिएक्टरों की सुरक्षा-समीक्षा के लिये कहा है, लेकिन यह पूरी जाँच कागजी कारवाई से ज़्यादा कुछ साबित नहीं होगी क्योंकि हमारे देश में परमाणु-उद्योग के नियमन के लिये जिम्मेदार संस्था (परमाणु ऊर्जा नियमन बोर्ड- AERB) खुद परमाणु ऊर्जा अयोग (DAE) के मातहत काम करती है. इस विरोधाभास पर देश के कई प्रमुख विशेषग्य और जनपक्षधर समूह लगातार आवाज़ उठाते रहे हैं.

लगातार बिगड़ते हालात
उधर जापान में स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. इन पंक्तियों के लिखे जाते समय फ़ुकुशिमा में सामान्य से एक लाख गुना (2.8 बिलियन बेक्युरेल प्रति घन सेंटीमीटर) रेडियेशन पाया जा रहा है. 25 मार्च को फ़ुकुशिमा दाइ-इचि नम्बर-3 रिएक्टर में तीन मजदूरों की हालत गम्भीर हो गई, जब रिएक्टर से रिस रहा भारी विकिरण-युक्त पानी से उनके पैर जल गये.
आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in