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आलोक तोमर के बहाने

बात पते की

 

आलोक तोमर के बहाने

दिवाकर मुक्तिबोध


आलोक तोमर को मैं व्यक्तिगत रुप से नहीं जानता. औपचारिक परिचय का सिलसिला भी कभी नहीं बना. हालांकि वे एकाधिक बार रायपुर आए पर खुद का परिचय देने के अजीब से संकोच की वजह से उनसे कभी नहीं मिल पाया किंतु बतौर पत्रकार मैं भावनात्मक रुप से उनसे काफी करीब रहा. पता नहीं इस दृष्टि से वे मुझे कितना जानते थे, किंतु मैं यह मानकर चलता हूं कि वे मुझे इतना तो जानते होंगे कि मैं उन्हीं की बिरादरी का हूं, हमपेशा हूं.

alok-tomar-media

बहरहाल इस बात का अफसोस बना रहेगा कि मैं एक प्रखर व तेजस्वी पत्रकार से रुबरु नहीं हो पाया. मैं उनकी प्रतिभा का उस समय से कायल था जब उन्होंने जनसत्ता, नई दिल्ली में कदम रखा था. निश्चय ही अपनी रिपोर्टिंग एवं विश्लेषणात्मक लेखों के जरिए जिन पत्रकारों ने अत्यल्प समय में अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई उनमें आलोक तोमर महत्वूपर्ण थे.

प्रभाष जोशी ने न केवल उनकी प्रतिभा को पहचाना बल्कि उन्हें उडऩे के लिए पूरा आकाश भी दिया. आलोक तोमर ने उनके विश्वास का कायम रखा लेकिन बतौर प्रभाष जोशी वे और भी आगे बढ़ सकते थे. जनसत्ता में अपने विख्यात स्तंभ 'कागद कारे’ में उन्होंने एक बार अपने उन सहयोगियों का जिक्र किया हैं जिनमें अटूट संभावनाएं थी किंतु उन संभावनाओं को 'पॉलिटिक्स एंड ब्यूरोक्रेसी’ का ग्रहण लग गया. आलोक तोमर भी इनमें से एक थे.

दरअसल प्रभाष जोशी जी ने जो बात संकेतों के रुप में कही, उसका आशय यही था कि आलोक एवं जनसत्ता के कुछ अन्य युवा पत्रकार अंतत: व्यवस्था का दबाव बर्दाश्त नहीं कर सके. यदि वे और अधिक दृढ़ता दिखाते और दिग्भ्रमित न होते हुए तो यकीनन बहुत ऊंचे जाते. इतने ऊंचे कि लंबे समय तक कोई उन्हें छू भी नहीं पाता. फिर भी यह तो मानना पड़ेगा कि आलोक तोमर ने बहुत यश कमाया. उनके असामयिक निधन से निश्चित ही हिन्दी पत्रकारिता में एक विराट शून्य घिर आया है.

चूंकि आलोक से मेरा सीधा परिचय नहीं था अत: उनके व्यक्तित्व एवं सामाजिक सरोकारों पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा किंतु यह जरुर कह सकता हूं कि पत्रकारों की बिरादरी में वे बिरले थे. उनकी कलम में गज़ब का ओज़ एवं समदृष्टि थी जिसके बल पर वे बेबाकी से घटनाओं की चीरफाड़ किया करते थे. वे भूसे में से भी सुई ढूंढ निकालने की कूव्वत रखते थे. जनसत्ता सहित यत्र-तत्र प्रकाशित उनकी रिपोर्टस इस बात की गवाह है कि ऐसी कई सुइयां उन्होंने ढूंढ़ निकाली और खोजी पत्रकारिता में नये आयाम स्थापित किए. निश्चय ही उनके न रहने से प्रिंट मीडिया में ऐसी स्तब्धता छा गई है कि इससे उबरने में वक्त लगेगा. जब कभी मीडिया के सौंदर्यशास्त्र पर चर्चा होगी, आलोक तोमर सम्मान के साथ याद किए जाएंगे.

यहां आलोक तोमर के बहाने मीडिया के सामाजिक दायित्व एवं मीडिया के प्रति समाज के दृष्टिकोण पर केंद्रित कुछ मूलभूत बातों पर चर्चा करना जरुरी प्रतीत होता है.

यह भयानक त्रासदी है कि शब्दों के साथ जीने-मरने वाले बहुत जल्द भुला दिए जाते हैं. यह कहा जाता है, और इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी है कि व्यक्तिश: कीर्ति मौत के बाद हासिल होती है. वे लोग सचमुच भाग्यवान है कि जिनके जीते जी उनके कार्यों का मूल्यांकन हो जाता है और वे इतिहास पुरुष का दर्जा पा लेते हैं. यद्यपि ऐसे लोग काफी कम होते हैं और पर होते जरुर हैं.

साहित्य, कला और संस्कृति सहित विभिन्न विधाओं में तकरीबन एक जैसी स्थिति है. सिर्फ मीडिया ही एक मात्र विधा है जहां बीते हुए कल को याद नहीं किया जाता. न लेखन को, न व्यक्ति को. जबकि साहित्य की तरह पत्रकारिता में भी स्थायी भाव होता है. यानी छपे हुए शब्दों की दुनिया का एक ऐसा हिस्सा जो सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों एवं घटनाक्रमों से हमें परिचित कराता है तथा भविष्य का संकेत भी देता है.

प्रख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं ''अखबार का सब कुछ लिखा हुआ, दूसरे दिन रद्दी नहीं होता और अखबार का कुछ लिखा हुआ ऐसा जरुर होता है जो कभी रद्दी नहीं होता”. मीडिया के महत्व को रेखांकित करने वाले विनोद कुमार शुक्ला अकेले नहीं है. समूचा समाज मीडिया को लोकतंत्र के संवाहक के रुप में सम्मान की दृष्टि से देखता है लेकिन समाज में मीडिया की इतनी महत्वपूर्ण उपस्थिति के बावजूद आमतौर पर मीडिया अध्येताओं को वह स्थान हासिल नहीं है जो साहित्य, कला, संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े मनीषियों को हासिल है. क्या वजह है इसकी? क्या महज इसलिए कि अखबारों में छपे शब्द अगले दिन बासी हो जाते है? किंतु बासी का भी तो अपना महत्व है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Prabhat [prabhat5kumar@rediffmail.com] Chandigarh - 2011-05-14 15:39:00

 
  We will must miss Aalok Tomar dear but whatever they have been done for media and the way they have been seen up. we will try to follow. 
   
 

raghwendra sahu [raghwendrasahu@indiatimes.com] durg - 2011-04-24 05:33:15

 
  मुक्तिबोध जी आपकी बात सही है. अक्सर देखने में आता है कि हमारे पत्रकार बिरादरी के लोग ही किसी पत्रकार के साथ हुई किसी दुर्घटना को उतना महत्व नहीं देते हैं. रही बात आलोक तोमरजी की तो मैंने उनका लम्बा साक्षात्कार भड़ास4मीडिया में पढ़ा था. वाकई में वो ओजस्वी पत्रकार हैं. आपका लेख काफी प्रभावी है. 
   
 

Ratan jaiswani [ratan.jaiswani@gmail.com] janjgir, chhattisgarh -

 
  बाजारवाद के अंधेरों में खो रही पत्रकारिता का एक उजला पक्ष दुनिया से चला गया। आलोक तोमर जी के बारे में थोड़ा बहुत पढ़ा था और उनके निधन के बाद तो बहुत ज्यादा पढ़ने को मिला। आलोक जी के समय की पत्रकारिता का युग तो अब लौटने से रहा। खूबियां और खामिया हर किसी में होती हैं पर उनके जैसे तेज तर्रार, हौसलामंद, बेबाक व्यक्तित्व बिरले ही होते हैं। पत्रकारिता को रोशन करने वाला एक और दीया बुझ गया, विनम्र श्रध्दांजली।  
   
 

RAMESH MISHRA CHANCHAL [paryavaranvimarshnewdelhi@gmail.com] NEWDELHI -

 
  आलोक तोमर के बहाने मीडिया के सामाजिक दायित्व एवं मीडिया के प्रति समाज के दृष्टिकोण पर केंद्रित कुछ मूलभूत बातों पर चर्चा करना जरुरी प्रतीत होता है. 
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi -

 
  आपकी बात सही लगती है साथ ही यह कहुँगा कि पत्रकारिता मे प्रयोगधर्मिता का भी अभिनव प्रयास होना चाहीये ...लिखने वालो की दलील है कि लोग पढते ही नही ..और मेरा अनुभव ये कहता है कि अधिकाँश लिखने वाले कागज काले करते है लिखते नही, इसीलिये कोई पढता ही नही ....आज भी अगर चीजे दिल से लिखी जाती है तो सीधे दिल को ही पहुँचती है !! 
   
 

भास्कर मिश्र 'पारस' [bapubhaskar23@gmail.com] बिलासपुर,वर्तमान में हैदराबाद टीवी पत्रकार -

 
  दिवाकर जी के बहुत नजदीक रहते हुए भी मैं बहुत दूर रहा,मै तो उन्हें अच्छी ढंग से जानता हूं,वे हमेशा जीवन्त और प्रखर पत्रकारिता के पूजक हैं,दिवाकर जी ने तोमर जी के बारे जितना भी लिखा वह अक्षरस सत्य है.तोमर जी बहुत बड़े पत्रकार थे,मेरा मानना है कि अब पत्रकारिता में कुछ ऐसे तत्वों ने कब्जा जमा लिया है,जिनका पत्रकारिता के बारे में कुछ लेना देना नहीं है,संक्षेप में कहें कि अब मीडिया में दलालों ने कब्जा जमा लिया है,इसुलिये अब इस स्थित को लेकर काफी चिंतित हैं,और तोमर जैसे पत्रकारों की उन्हें कमी खल रही है,मेरा मानना है कि पत्रकार कभी खत्म नहीं होता,शरद जोशी,प्रभाश जोशी,राजेन्द्र यादव,आलोक नाथ श्रीवास्तव,जैसे पत्रकार हमारे बीच में नहीं होते हुए भी हमारे बीच जीवित हैं,सच्चे पत्रकार आज भी उनके पदचिन्हों पर चल रहे हैं,हां इतना जरूर कहना चाहूंगा कुछ भौंडे लोगों ने पत्रकारिता और पत्रकारों को बदनाम किया है, दिवाकर जी से मैं सौ प्रतिशत सहमत हूं कि आज मीडिया में अध्येताओं को दरकिनार किया गया है,लेकिन मै इसके साथ मैं ये भी जोड़ना चाहुंगा कि अब मीडिया में अध्येताओं की भी भारी कमी है,मुझे पूरा विश्वास है कि पुतुल और दिवाकर जी जैसे लोग साहित्य के साथ ही पत्रकारिता की शुचिता को बनाने में पुरजोर कोशिश कर रहे हैं,और आगे भी इस पंरपरा को बनाए रखेंगे 
   
 

navneet pandey [poet_india@yahoo.co.in] bikaner -

 
  जब होती है, बात या घटना ही होती है. सार्वजनिक प्रकाशन से ही बनती है बात या घटना खबर. अच्छी रिपोर्ट है 
   
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