नकली कप का असली संघर्ष
बात पते की
नकली कप का असली संघर्ष
कनक तिवारी
भारत के जांबाज क्रिकेट खिलाड़ियों ने अगले चार वर्षों के लिए सुनहरा विश्व कप हथिया
लिया है. सर सी. वी. रमन को जब नोबेल पुरस्कार मिला तो वह मिला भी और नहीं भी. घोषणा
हुई लेकिन धनराशि किसी धोखेबाज बैंक ने हथिया लिए थे. आई. सी. सी. ने भी नकली कप थमा
दिया. राष्ट्रवादी पवार को शैम्पेन की बोतल के आसपास दिखा दिया, असली कप के नहीं?
कस्टम विभाग भी नीयतन चुप रहा ताकि एक अपराध घटित हो सके.
वैसे तो क्रिकेट यूरोप बल्कि इंग्लैंड का सामंती खेल है. उसे उन देशों की गुलाम
प्रजा को दीक्षा में दिया गया, जहां यूनियन जैक को सलाम किया जाता रहा. लिहाज़ा
वेस्ट इंडीज़, दक्षिण अफ्रीका, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, कनाडा सहित
वह आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जिम्बाब्वे, नीदरलैंड्स तथा आयरलैंड वगैरह देशों में
विस्तृत है. उसे अमरीका, जर्मनी, फ्रांस वगैरह जाने क्यों नहीं खेलते.
क्रिकेट का वैश्विक कॉरपोरेट जगत से गहरा रिश्ता है. यह पौरुषमय खेल युवाओं को ठीक
ही आकर्षित करता है. इसमें कौतूहल, अनिश्चितता, उतार चढ़ाव और दुर्घटनाओं की
संभावनाओं का इतना घालमेल होता है कि पूरा खेल आखेट की तरह हो जाता है. अब हालत यह
है कि गांव-गांव की गलियों तक बहुत से बच्चे सचिन तेंदुलकर, महेन्द्र सिंह धोनी और
युवराज सिंह वगैरह बनने के सपनों को साकार करने में जुट गए हैं.
इस बार तो भारतीय टीम ने इतिहास रच दिया. उसका खेल क्रमशः विकसित होता रहा और फाइनल
में श्रीलंका को ले डूबा. सबको हराने वाला भारत लेकिन इंग्लैंड से मुकाबले की बराबरी
पर रहा. मानो अंगरेज से कह रहा हो कि गोरों अब हम तुम्हारे बराबर हैं. चाहते तो
तुम्हें पराजित भी कर सकते थे लेकिन जाओ छोड़ दिया. अंगरेजों से मुकाबला होते समय
देशभक्त भारतीयों में भी वह खुन्दक नहीं दिखाई पड़ी कि इन्हीं गोरों ने हम पर पौने
दो सौ बरसों तक हुकूमत की है. इसी देश ने हमारी छाती पर कॉमनवेल्थ की सदस्यता की
तख्ती लटका रखी है. हर भारतीय चाहता था कि इंग्लैंड हारे लेकिन वह अपेक्षाकृत
उत्तेजित नहीं आश्वस्त था कि भारत ही जीतेगा.
सेमीफाइनल में पाकिस्तान को हराने की जनआकांक्षाएं इस तरह योजनाबद्ध ढंग से परवान
चढ़ाई गईं मानो 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों की पुनरावृत्ति होने वाली है. चाहे
जो हो इतिहास, भूगोल और संस्कृति तो हमें याद दिलाते हैं कि भारत पाक भाई-भाई हैं,
हम और अंगरेज नहीं. अंगरेजों ने हम दोनों को छला और हमारा भविष्यमूलक शोषण किया है.
पाकिस्तान के कप्तान शाहिद आफरीदी और हमारे महेन्द्र सिंह धोनी दोनों ठंडा-ठंडा,
कूल-कूल प्रकृति के हैं. असुविधाजनक सवालों का पाक मीडिया में जवाब देते हुए आफरीदी
ने खुल्लमखुल्ला कहा कि दोनों देशों के दर्शक भारत-पाक क्रिकेट मैच को दुश्मनों के
संघर्ष की तरह क्यों देखते हैं. हम सदियों से एक रहे हैं और साझा संस्कृति के
हिस्सेदार हैं.
इस टूर्नामेन्ट में पाकिस्तान का सेमीफाइनल के पहले का रिकार्ड भारतीय टीम से बेहतर
रहा. करोड़ों भारतीयों के समर्थन का हमारी टीम के जोश, जुनून और जज्बे पर असर पड़ा.
भारत की जगह कोई गोरा मुल्क होता तो पाकिस्तान ने रौंद दिया होता. भले ही फाइनल और
संघर्षमय हो जाता.
इस टूर्नामेन्ट के बहाने मतलबी राजनेताओं को भी खिलाड़ी वृत्ति का मतलब समझ में आया.
भारतीय महाद्वीप के तीनों धुरंधरों-भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान ने इस सामंतवादी
खेल का एशियाईकरण कर दिया. एशिया में यदि क्रिकेट के खेल की तरह जीतने का जज्बा आ
जाए तो चीन और जापान वगैरह के साथ मिलकर गोरों की वैश्विक कारपोरेट दुकानदारी उठाई
जा सकती है.
मीडिया और दर्शकों के एक हिस्से ने श्रीलंका दहन जैसी अनावश्यक अवांछित और इतिहास
विरोधी धारणा को प्रोडक्ट की तरह बेचने की कोशिश की. श्रीलंका के लोग रावण के वंशज
नहीं हैं और क्रिकेट खिलाड़ी तो बिल्कुल नहीं. रावणवृत्ति यदि भारतीय नेताओं,
उद्योगपतियों, नौकरशाहों और दलालों वगैरह में नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट को क्यों
उनकी सेवा करनी पड़ रही है? श्रीलंका में ही शांति स्थापित करने की कोशिश में गलत
राजनीतिक समीकरणों के कारण देश ने राजीव गांधी को खोया है. एक मैच जीतने के लिए
इतिहास को विकृत करने के प्रयत्न मैच हारने के बराबर हैं. श्रीलंका के राष्ट्रपति
ने फाइनल मैच देखना कुबूल कर एक अच्छा संदेश दिया.
भारतीय कूटनीति को सफल बनाने के लिए विदेश मंत्रालय से ज्यादा मौजूं तो क्रिकेट का
मैच सिद्ध हुआ. कम से कम एक दिन तो दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों में खिलाड़ी भावना
का स्फुरण होता रहा. सोनिया गांधी को कभी किसी ने सार्वजनिक जगहों पर आकर इस तरह
खुशी का इजहार करते नहीं देखा था. मंत्रिपरिषद के सदस्य टेलीविजन पर बार-बार शक्ल
दिखाये जाने से पुलकित होते रहे कि उन्हें क्रिकेट के खेल की समझ है और उससे
लोकप्रियता का फायदा उठाने की.
अमिताभ बच्चन सपरिवार और शाहरुख खान, आमिर खान जैसे सैकड़ों फिल्मी कलाकारों ने
सड़कों पर आकर क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत के बहते इतिहास का एक दिन ही सही नायक तो
बना दिया. पूरा देश राष्ट्रीय जश्न में डूबा रहा. दूकानों, दफ्तरों, कारखानों,
शिक्षा संस्थाओं वगैरह में इस क्रीड़ा-युद्ध का जीवित गवाह बनने की अतुलनीय होड़ लगी
रही. यह केवल क्रिकेट के बल्ले की बल्ले बल्ले नहीं थी बल्कि हमारे महान खिलाड़ियों
के माध्यम से देश की जनता आपस में सीमेंट की तरह जुट गई थी. केवल इसी अर्थ में
विश्वकप टूर्नामेन्ट ज्यादा याद रखा जाना चाहिए.
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हमारे क्रिकेट खिलाड़ी खेल के मैदान से लखपति बनते रहे हैं लेकिन मॉडल की दुनिया
उन्हें करोड़पति बनाकर खुद अरबों खरबों कमवाती है. अब वह बाजार भाव सिक्सर की तरह
उछलेगा. कई बार इससे खेल जख्मी हुआ है और खिलाड़ी रिटायर. भावनाहीन विज्ञापन
संस्थाएं नए चेहरों का शिकार करती रहेंगी. सरकारें भी खिलाड़ियों पर बिछ गईं. धोनी
को झारखंड रत्न, उत्तराखंड रत्न, दिल्ली सरकार से दो करोड़ रुपए, मानद डॉक्टरेट की
उपाधि और न जाने क्या-क्या मिलेगा.
सबसे महान कप्तान होना सिद्ध करके भी धोनी ने खुद को पारम्परिक आस्थावान भक्त ही
घोषित किया. उन्होंने पंडित की सलाह पर मैच खत्म होने के बाद भोर में पौने तीन और
तीन बजे के बीच अपना मुंडन करवा लिया. ऐसा लगता है कि बाकी खिलाड़ियों ने भी कुछ न
कुछ तो कहीं न कहीं मन्नतें, मुरादें मांगी होंगी. देवी, देवता, औलिया, पंडित,
भविष्यवक्ता भी क्रिकेट की महाभारत के योद्धा हैं या शंकर जी की बारात की तरह?
पुरस्कारों को लेकर सरकारों ने ‘देश‘ के मुकाबले ‘प्रदेश‘ को महत्व दिया. दिल्ली,
पंजाब, उत्तरप्रदेश और गुजरात वगैरह ने अपने ही सपूतों का ध्यान रखा. सभी खिलाड़ियों
को धनराशि बांटकर दे देते तो क्या बिगड़ जाता. कर्नाटक के येदियुरप्पा ने सभी
खिलाड़ियों को प्लॉट देने का ऐलान किया. इससे उनका भूमि घोटाला प्रकरण जनस्मृति में
धुंधला भी सकता है. नरेन्द्र मोदी ने मुनाफ पटेल और यूसुफ पठान को करोड़पति नहीं
बनाया जबकि ये दोनों खिलाड़ी मध्यम वर्ग के हैं. उन्हें राज्य स्तर का एकलव्य
पुरस्कार देने का ऐलान किया गया जिसकी राशि बहुत बड़ी नहीं है. वैसे भी राष्ट्रीय
ख्याति के खिलाड़ियों को प्रदेश स्तर का पुरस्कार देने से खिलाड़ी कहां सम्मानित हुए?
लोहिया की प्रसिद्ध उक्ति ‘राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र और उससे भी बड़ा सौराष्ट्र‘
फिर जीवित हो जाती है. गुजरात क्या करे. हिन्दुत्व के इस महान प्रदेश से दो मुसलमान
खिलाड़ी ही देश का गौरव बढ़ाने के काम आए. मायावती ने सुरेश रैना और पीयूष चावला को
‘कांशीराम अन्तर्राष्ट्रीय खेल पुरस्कार‘ का ऐलान तो किया लेकिन उन्हें कोई
पारदर्शी थैली सरकारी टेंट से नहीं दी. रेलमंत्री ममता बनर्जी ने खिलाड़ी परिवारों
को पहियों पर राजमहल वाली रेलगाड़ी के आजीवन यात्रा के पास दिए हैं. ये परिवार क्या
रेलगाड़ियों में बैठने के लिए वक्त बर्बाद करते भी हैं.
देश के खेल संघों पर राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और नौकरशाहों का ऑक्टोपस कब्जा है.
क्रिकेट महाविजय से उनका कब्जा और मजबूत होगा. बाकी खेलों में भी यही होगा. खेलों
में गैर खिलाड़ी वृत्ति का व्यापार फलता फूलता रहेगा. खिलाड़ी चाकरी ही करते रहेंगे.
हॉकी और फुटबाल जैसे लोकप्रिय खेल धीरे-धीरे खेती और वन भूमियों की तरह कम होते जा
रहे हैं. देसी खेलों का तो कोई माई-बाप नहीं है. उनके खेल संघों के मैनेजर और
पदाधिकारी वायुयान और पांच सितारा होटलों के अतिथि होते हैं. खिलाड़ी रेलगाड़ी के
अनारक्षित डिब्बे में ठूंस दिए जाते हैं. सस्ते होटलों के शोहदे तक महिला खिलाड़ियों
को छेड़ने पहुंच जाते हैं.
सबने देखा, बहुत से भ्रष्ट चेहरे फिर सुर्खरू हो उठे हैं. क्रिकेट पदाधिकारी अपनी
सिकुड़ी त्वचा को चिकना करने में लग गए हैं. केन्द्र और दिल्ली सरकारों को उस दिन भी
जोश आना था, जब ओलंपिक प्रतिस्पर्धा में अभिनव बिंद्रा ने भारत के लिए स्वर्ण पदक
जीता था. उसका बाद में बाकायदा अपमान किया गया था. घर तो धोनी और कैफ का भी तोड़ा
गया था. कुछ खिलाड़ियों ने पदक तक वापस करने की कोशिश की. लेकिन क्रिकेट के इस
सुनामी ने खेल में कुटिल खलनायकों के बहुत से पाप धो दिए हैं.
यह आश्चर्य है कि महाराष्ट्र की राजधानी और सचिन के गृहनगर मुंबई में मैच जीतने पर
भी महाराष्ट्र सरकार ने आनन फानन में किसी पुरस्कार की घोषणा नहीं की. जबकि
अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में भारत के तीन खिलाड़ियों में दो सचिन और जहीर
महाराष्ट्र के ही हैं. मानवीय कहानियां तो ये हैं कि हरभजन और युवराज दूल्हे बनकर
विजेताओं की तरह घोड़ी पर चढ़ेंगे. युवराज के पिता हर जन्म में उसे ही अपना बेटा पाना
चाहते हैं. झारखंड जैसे प्रदेश का एक कड़ियल लड़का अभी और पायदानें इतिहास में चढ़ेगा.
गौतम गंभीर के चेहरे में शतक चूकने की चुनौतियां उसे और फौलादी बनाएंगी. विराट
कोहली को इमरान खान की निगाह से देश का भविष्य-खिलाड़ी मानना होगा. कपिल देव के जोश
की पुनरावृत्ति माही में तब तक रहेगी जब तक उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं मिल जाता.
लेकिन भारतीय क्रिकेट का असली सच यह है कि एक कवि के बेटे ने क्रिकेट को मनुष्य के
हौसलों की ऐसी कविता बना दी है जो इतिहास में ‘भूतो न भविष्यति‘ हो गई है. कहते हैं
नदियों में यमुना का पानी सबसे पवित्र है क्योंकि वह भारत की शासक राजधानी को
सराबोर करता है. ऐसा बीरबल ने अकबर से कहा था. फिर आगे यह भी कहा था कि गंगाजल की
तुलना तो किसी से नहीं हो सकती क्योंकि वह पानी नहीं अमृत है. कवि रमेश तेन्दुलकर
के बेटे सचिन के लिए भी क्या ऐसा नहीं कहा जाना चाहिए? काश! प्रभाष जोशी की कलम ने
यह मैच देखा होता!
07.04.2011, 10.16 (GMT+05:30) पर प्रकाशित