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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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नकली कप का असली संघर्ष

बात पते की

 

नकली कप का असली संघर्ष

कनक तिवारी


भारत के जांबाज क्रिकेट खिलाड़ियों ने अगले चार वर्षों के लिए सुनहरा विश्व कप हथिया लिया है. सर सी. वी. रमन को जब नोबेल पुरस्कार मिला तो वह मिला भी और नहीं भी. घोषणा हुई लेकिन धनराशि किसी धोखेबाज बैंक ने हथिया लिए थे. आई. सी. सी. ने भी नकली कप थमा दिया. राष्ट्रवादी पवार को शैम्पेन की बोतल के आसपास दिखा दिया, असली कप के नहीं? कस्टम विभाग भी नीयतन चुप रहा ताकि एक अपराध घटित हो सके.

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वैसे तो क्रिकेट यूरोप बल्कि इंग्लैंड का सामंती खेल है. उसे उन देशों की गुलाम प्रजा को दीक्षा में दिया गया, जहां यूनियन जैक को सलाम किया जाता रहा. लिहाज़ा वेस्ट इंडीज़, दक्षिण अफ्रीका, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, कनाडा सहित वह आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जिम्बाब्वे, नीदरलैंड्स तथा आयरलैंड वगैरह देशों में विस्तृत है. उसे अमरीका, जर्मनी, फ्रांस वगैरह जाने क्यों नहीं खेलते.

क्रिकेट का वैश्विक कॉरपोरेट जगत से गहरा रिश्ता है. यह पौरुषमय खेल युवाओं को ठीक ही आकर्षित करता है. इसमें कौतूहल, अनिश्चितता, उतार चढ़ाव और दुर्घटनाओं की संभावनाओं का इतना घालमेल होता है कि पूरा खेल आखेट की तरह हो जाता है. अब हालत यह है कि गांव-गांव की गलियों तक बहुत से बच्चे सचिन तेंदुलकर, महेन्द्र सिंह धोनी और युवराज सिंह वगैरह बनने के सपनों को साकार करने में जुट गए हैं.

इस बार तो भारतीय टीम ने इतिहास रच दिया. उसका खेल क्रमशः विकसित होता रहा और फाइनल में श्रीलंका को ले डूबा. सबको हराने वाला भारत लेकिन इंग्लैंड से मुकाबले की बराबरी पर रहा. मानो अंगरेज से कह रहा हो कि गोरों अब हम तुम्हारे बराबर हैं. चाहते तो तुम्हें पराजित भी कर सकते थे लेकिन जाओ छोड़ दिया. अंगरेजों से मुकाबला होते समय देशभक्त भारतीयों में भी वह खुन्दक नहीं दिखाई पड़ी कि इन्हीं गोरों ने हम पर पौने दो सौ बरसों तक हुकूमत की है. इसी देश ने हमारी छाती पर कॉमनवेल्थ की सदस्यता की तख्ती लटका रखी है. हर भारतीय चाहता था कि इंग्लैंड हारे लेकिन वह अपेक्षाकृत उत्तेजित नहीं आश्वस्त था कि भारत ही जीतेगा.

सेमीफाइनल में पाकिस्तान को हराने की जनआकांक्षाएं इस तरह योजनाबद्ध ढंग से परवान चढ़ाई गईं मानो 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों की पुनरावृत्ति होने वाली है. चाहे जो हो इतिहास, भूगोल और संस्कृति तो हमें याद दिलाते हैं कि भारत पाक भाई-भाई हैं, हम और अंगरेज नहीं. अंगरेजों ने हम दोनों को छला और हमारा भविष्यमूलक शोषण किया है.

पाकिस्तान के कप्तान शाहिद आफरीदी और हमारे महेन्द्र सिंह धोनी दोनों ठंडा-ठंडा, कूल-कूल प्रकृति के हैं. असुविधाजनक सवालों का पाक मीडिया में जवाब देते हुए आफरीदी ने खुल्लमखुल्ला कहा कि दोनों देशों के दर्शक भारत-पाक क्रिकेट मैच को दुश्मनों के संघर्ष की तरह क्यों देखते हैं. हम सदियों से एक रहे हैं और साझा संस्कृति के हिस्सेदार हैं.

इस टूर्नामेन्ट में पाकिस्तान का सेमीफाइनल के पहले का रिकार्ड भारतीय टीम से बेहतर रहा. करोड़ों भारतीयों के समर्थन का हमारी टीम के जोश, जुनून और जज्बे पर असर पड़ा. भारत की जगह कोई गोरा मुल्क होता तो पाकिस्तान ने रौंद दिया होता. भले ही फाइनल और संघर्षमय हो जाता.

इस टूर्नामेन्ट के बहाने मतलबी राजनेताओं को भी खिलाड़ी वृत्ति का मतलब समझ में आया. भारतीय महाद्वीप के तीनों धुरंधरों-भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान ने इस सामंतवादी खेल का एशियाईकरण कर दिया. एशिया में यदि क्रिकेट के खेल की तरह जीतने का जज्बा आ जाए तो चीन और जापान वगैरह के साथ मिलकर गोरों की वैश्विक कारपोरेट दुकानदारी उठाई जा सकती है.

मीडिया और दर्शकों के एक हिस्से ने श्रीलंका दहन जैसी अनावश्यक अवांछित और इतिहास विरोधी धारणा को प्रोडक्ट की तरह बेचने की कोशिश की. श्रीलंका के लोग रावण के वंशज नहीं हैं और क्रिकेट खिलाड़ी तो बिल्कुल नहीं. रावणवृत्ति यदि भारतीय नेताओं, उद्योगपतियों, नौकरशाहों और दलालों वगैरह में नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट को क्यों उनकी सेवा करनी पड़ रही है? श्रीलंका में ही शांति स्थापित करने की कोशिश में गलत राजनीतिक समीकरणों के कारण देश ने राजीव गांधी को खोया है. एक मैच जीतने के लिए इतिहास को विकृत करने के प्रयत्न मैच हारने के बराबर हैं. श्रीलंका के राष्ट्रपति ने फाइनल मैच देखना कुबूल कर एक अच्छा संदेश दिया.

भारतीय कूटनीति को सफल बनाने के लिए विदेश मंत्रालय से ज्यादा मौजूं तो क्रिकेट का मैच सिद्ध हुआ. कम से कम एक दिन तो दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों में खिलाड़ी भावना का स्फुरण होता रहा. सोनिया गांधी को कभी किसी ने सार्वजनिक जगहों पर आकर इस तरह खुशी का इजहार करते नहीं देखा था. मंत्रिपरिषद के सदस्य टेलीविजन पर बार-बार शक्ल दिखाये जाने से पुलकित होते रहे कि उन्हें क्रिकेट के खेल की समझ है और उससे लोकप्रियता का फायदा उठाने की.

अमिताभ बच्चन सपरिवार और शाहरुख खान, आमिर खान जैसे सैकड़ों फिल्मी कलाकारों ने सड़कों पर आकर क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत के बहते इतिहास का एक दिन ही सही नायक तो बना दिया. पूरा देश राष्ट्रीय जश्न में डूबा रहा. दूकानों, दफ्तरों, कारखानों, शिक्षा संस्थाओं वगैरह में इस क्रीड़ा-युद्ध का जीवित गवाह बनने की अतुलनीय होड़ लगी रही. यह केवल क्रिकेट के बल्ले की बल्ले बल्ले नहीं थी बल्कि हमारे महान खिलाड़ियों के माध्यम से देश की जनता आपस में सीमेंट की तरह जुट गई थी. केवल इसी अर्थ में विश्वकप टूर्नामेन्ट ज्यादा याद रखा जाना चाहिए.
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