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अन्ना की सुनो पा जी!
बात पते की
अन्ना की सुनो पा जी!
कनक तिवारी
देश के विख्यात गांधीवादी, ईमानदार और पारदर्शी चरित्र के अन्ना हजारे जन लोकपाल
विधेयक पारित कराने के लिए आमरण अनशन पर जंतर मंतर पर बैठ गए हैं. हजारे और देश के
हजारों बुद्धिजीवी नागरिक एक अरसे से देश में कैंसर की तरह पनप रहे भ्रष्टाचार को
मिटाने के लिए परेशान दिमाग और सक्रिय रहे हैं. सर्वोच्च पदों पर बैठे मंत्री और
अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर दंड देने का कोई कारगर कानून नहीं है.
पूरी दुनिया में सबसे पहले स्वीडन में अम्बुड्समान अर्थात् लोकपाल के पद का
आविष्कार किया गया था. उसे ऐसी शक्तियां दी गई थीं कि वह भ्रष्ट लोकसेवकों के खिलाफ
कारगर कार्यवाही कर सके. भारत में भी इस तरह की चिंताएं आजादी के बाद से ही रही
हैं. पहले प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा था “मैं जानता हूं कि मंत्रालय और सचिवालय
में भ्रष्टाचार है. मैं भ्रष्टाचार दूर भले नहीं कर पाऊं लेकिन सत्ता के राजमहल की
दीवारों में इतनी सूराख जरूर कर देना चाहता हूं जिसमें से जनता झांक कर देख सके कि
अंदर क्या हो रहा है.”
नेहरू ने झल्लाकर यह भी कहा था कि भ्रष्टाचारियों को बिजली के खंभे पर लटकाकर फांसी
देनी चाहिए.
बहरहाल देश में कई राज्यों में लोकायुक्त कानून बने हुए हैं. इनमें से कुछ के
प्रावधान बेहतर हैं जैसे कर्नाटक में. लेकिन वहां की आरोपी येदियुरप्पा सरकार ने
मुख्यमंत्री के खिलाफ आरोपों की जांच करने से लोकायुक्त को रोकने के लिए एक नया
कानून बना दिया. कर्नाटक के लोकायुक्त देश में सबसे अधिक चर्चित और मशहूर हैं.
संतोष हेगड़े सुप्रीम कोर्ट के सफल वकील थे. हाईकोर्ट के जज बने बिना सीधे सुप्रीम
कोर्ट के जज बना दिए गए. इन्हीं संतोष हेगड़े ने कुछ बुद्धिजीवियों के साथ बैठकर
प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक बनाया है.
लोकायुक्त का सबसे लचर कानून छत्तीसगढ़ में है. उसे नखदंतविहीन बना दिया गया है.
केवल फुफकारने वाले सांप से मदारी तो क्या बच्चे भी नहीं डरते हैं. छत्तीसगढ़ में
प्रमुख लोकायुक्त का पद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के लिए आरक्षित किया
गया है, जबकि कई राज्यों में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज या हाईकोर्ट के
सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश के लिए. इसीलिए छत्तीसगढ़ में प्रमुख लोकायुक्त के कई
आदेश कानूनी दृष्टि से असंगत और आधारहीन नज़र आते हैं.
यह कभी नहीं हुआ कि अपने आप को महान विधिमंत्री समझने वाले बड़बोले वीरप्पा मोइली ने
प्रदेशों के लोकायुक्तों की कोई बैठक बुलाकर कानूनों में एकरूपता लाने की कोशिश की
हो. एक जैसे भ्रष्टाचार के लिए अलग-अलग प्रदेशों के लोकसेवकों को अलग-अलग तरीके से
दंडित किए जाने के विरोधाभासी और कछुआ गति के प्रावधान हैं. केन्द्र सरकार का कानून
मंत्रालय क्या ऐश करने के लिए बनाया गया है कि वह ऐसी टिप्पणियां ही करता रहे कि यदि
किसी सत्र न्यायालय ने कथित तौर पर गलत फैसला कर दिया है तो भी उसकी बौद्धिक आलोचना
नहीं की जानी चाहिए.
पिछले बयालीस वर्षों से लोकपाल अधिनियम लुंजपुंज, लंगड़ा लूला और निकम्मा होने के
बावजूद संसद में पारित भी नहीं हो रहा है. ईमानदारी के मूर्तिमान अवतार प्रधानमंत्री
इसके बाद भी चिकनी चुपड़ी क्रूरता के साथ कह रहे हैं कि सरकार को जनता की तरफ से
सुझाव दिए जाएं तो वह गौर करेगी. सरकार द्वारा बनाया गया ताजा अधिनियम बकवास है. यह
बात प्रधानमंत्री भी स्वीकार करते हैं.
क्या सरकार को इसीलिए चुना गया है कि वह बेशर्मी से लचर कानून बनाए और विरोध करने
वाली जनता को लॉलीपॉप पकड़ाए कि वह चाहे तो प्रार्थनापत्र की शक्ल में कुछ लिख कर दे
दे. यही तो एक पूर्व नौकरशाह को देश का प्रधानमंत्री बनाने से लोकतांत्रिक गणतंत्र
का अपमान होता है.
कांग्रेस इन दिनों चिकने चुपड़े और आतंकियों, नक्सलियों, ड्रग माफिया, तस्करों से
लेकर यूनियन कार्बाइड तक की शक्ल और परंपरा के जनविरोधी मुअक्किलों से करोड़ों की
फीस वसूलने वाले वकील प्रवक्ताओं के चक्कर में है. भाजपा भी कंधे से कंधा मिलाकर चल
रही है. 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में कपिल सिब्बल का बड़बोला बयान है कि देश को नुकसान
कहां हुआ. अन्ना हजारे प्रकरण को लेकर सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और मनीष तिवारी
जैसे प्रवक्ता अपना क्रोध तक कैमरे के सामने नहीं छिपा पा रहे हैं. वे एक घटिया
कॉमनवेल्थी विक्टोरियन भाषा का अंगरेजी संवैधानिक जुमला चस्पा कर रहे हैं कि बाहरी
व्यक्तियों को संसदीय विधायन में काम देना संविधान का उल्लंघन है.
ये सभी बड़े वकील यह फिकरा रट चुके होंगे कि ‘हम भारत के लोग‘ खुद संविधान के
निर्माता हैं. केवल हम सार्वभौम हैं. संसद नहीं, विधानसभाएं नहीं, राष्ट्रपति और
प्रधानमंत्री भी नहीं, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट भी नहीं और यहां तक कि खुद
संविधान भी नहीं. ऐसे में यदि जनता के चुनिन्दा प्रतिनिधि एक प्रस्तावित विधेयक पर
पचास प्रतिशत संख्या की भागीदारी के आधार पर सरकार के साथ विचार विमर्श करने का
आहवान करते हैं तो उसमें क्या अनर्थ है?
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स्थायी मालिक यदि अपने पांच वर्षों के लिए चुने गए सेवकों के साथ उदारता दिखाते हुए
बैठकर विमर्श करते हैं और समझाइश देते हैं तो किस संवैधानिक परंपरा का उल्लंघन हुआ?
दरअसल कांग्रेस पार्टी के नौकरशाह रहे कुछ मंत्री और वकील-प्रवक्ता ‘संसदीय
प्रक्रिया‘ और ‘संवैधानिक क्षेत्राधिकार‘ शब्दों में घालमेल कर रहे हैं.
इन दिनों भाजपा एक चतुर पार्टी बनती जा रही है. अन्ना हजारे के अनशन से भी तो उसे
ही अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है. वह एक तरफ अन्ना से अनशन खत्म करने की अपील करती है
और दूसरी ओर आग में घी डालने में कंजूसी नहीं करती. वहां भी बौद्धिक वाचाल नेतृत्व
कानूनदां लोगों के हाथों में है जिनकी अगुआई राम जेठमलानी, अरुण जेटली, रविशंकर
प्रसाद और सुषमा स्वराज वगैरह कर रहे हैं. अन्ना समर्थकों ने इसीलिए राजनेताओं अजित
सिंह, ओमप्रकाश चौटाला, उमा भारती और मदनलाल खुराना वगैरह को अपमानित कर वापस जाने
के नारे लगाए. हालांकि यह भी एक गैर गांधीवादी और असभ्य तरीका है.
अन्ना के इस आंदोलन को पूरी तौर पर गांधीवादी कहने के पहले इसमें जेपी के आंदोलन की
याद भी कर लेनी चाहिए. उनके कारण इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाना पड़ा था. लेकिन बाद
में वह आंदोलन पूंजीवाद समर्थक कांग्रेसियों के हत्थे चढ़ गया था फिर बाद में उसका
फायदा अपने मजबूत संगठन के कारण जनसंघ ने उठा लिया था.
आंदोलन के बाकी नेताओं अरविन्द केजरीवाल, स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी, प्रशांत भूषण
वगैरह से भी देश को मुकाम पर पहुंचने की जल्दी के बदले गंभीर चिंतन, धैर्य और लचीली
रणनीति की उम्मीद होनी चाहिए. सत्ता में बहुत ताकत होती है. गांधी और जेपी के वक्त
तो मीडिया पूरी तौर पर बिका हुआ नहीं था. सरकार के दबाव में नहीं था.
आज भारतीय मीडिया का बहुलांश अफवाहों का मीनाबाजार है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के
घर-घर में घुस जाने तथा मोबाइल फोन करोड़ों हाथों में होने से एक दिन में अफवाहें
देश को लबालब कर सकती हैं. अन्ना हजारे का जीवन इतना सस्ता नहीं है कि उसे किसी
सम्भावित ताशकंद समझौते की पूर्व संध्या पर बलि वेदी पर चढ़ा दिया जाए.
राजनीति इन दिनों शासक वर्ग के हाथों में है. इनमें से अधिकांश पांच सितारा संस्कृति
के जीवन-प्रतिनिधि हैं. वर्षों से उनकी देह से पसीना नहीं निकला होगा सिवाय टेनिस,
स्क्वाश या नुमाइशी क्रिकेट खेलते हुए. ऐसे लोगों से जंतर मंतर को तहरीर चौक बनाए
बिना बैठकर लड़ना आसान नहीं होगा.
रिजर्व बैंक, विश्व बैंक और राज्य सभा के राजपथ पर चलते हुए लोगों को अब भी नहीं
मालूम होगा कि राजपथ की लंबाई जनपथ से छोटी है. इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दुस्तान
के पीड़ित, शोषित अवाम में नैतिक ताकत तो बहुत है परंतु यदि वह हर वक्त समय पर उठ
खड़ा होता तो सदियों तक भारत गुलामी क्यों ढोता.
यह लोहिया ने ही कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं. ए. राजा,
देवास, आदर्श सोसायटी, थॉमस, कलमाड़ी, येदियुरप्पा वगैरह के रहते एक दिन भी इंतजार
क्यों किया जाए. देश की व्यग्रता अन्ना हजारे के लिए प्राणपद वायु है. इसलिए हजारों
वर्ष पुराने भारतीय सोच में यह चेतावनी घर कर गई है.
डॉ. मनमोहन सिंह में मछली मारने की कला तो प्रवीण है. तभी तो शशि थरूर, अशोक
चव्हाण, कलमाड़ी के सहायक और बड़ी मुश्किल से ए. राजा को उन्होंने मछली मारने की बंशी
में फंसा दिखाया. सरकार ने वह जाल अब तक क्यों नहीं बनाया जिसमें मगरमच्छ फंसें.
खुले आम देश के करोड़ों अवाम की गाढ़े पसीने की कमाई लूटो और सुप्रीम कोर्ट, पी ए सी,
जे पी सी, सी बी आई, सी वी सी जैसी महत्वपूर्ण एजेन्सियों को धता बताने की कोशिश
करते रहे कि हम तो निर्दोष हैं. हमारी निजी बातचीत में यदि देश को लूटने का षड़यंत्र
हो तो भी उसे सुनने का किसी को अधिकार नहीं और कार्यवाही करने का तो बिल्कुल नहीं.
सरकार, भ्रष्ट नौकरशाह, हसन अली, उद्योगपति, नीरा राडिया जैसे लोग मिलकर संसद तक
में जनता के साथ फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी‘ का वह मशहूर डायलॉग बोल रहे हैं ‘चित मैं
जीता पट तू हारी.‘ इतना होने के बाद भी भारतीय प्रधानमंत्रियों में डॉ. मनमोहन सिंह
किस्मत के सिकंदर हैं. जो जीता वही सिकंदर वाले भी सिकंदर भी कि उन्हें अन्ना हजारे
तक ईमानदारी का प्रमाणपत्र दे रहे हैं.
भारतीय दंड संहिता में अपराधों को छिपाने, अपराधियों को पनाह देने, षड़यंत्र करने,
अपराध का उत्प्रेरण करने जैसे अनेक गुनाहों की परिभाषा दी गई है. लॉर्ड मैकाले की
शिक्षा पद्धति का लबादा ओढ़ने वाली भारतीय सरकार मैकाले रचित ताजीराते हिन्द को
जानती तो है. फिर भी प्रधानमंत्री ईमानदार और निर्दोष कैसे हो सकते हैं.
भारत के लिए यह गौरव की बात है कि दुनिया के 178 देशों में अब भी आधी संख्या के देश
हमसे ज्यादा बेईमान हैं. जो आधे हमसे ज्यादा ईमानदार हैं हम उनकी नकल क्यों करें.
हमारे सांसदों और अधिकारियों के कार्यालय, मंत्रियों की कोठियां, पांच सितारा होटल
और कारपोरेट घरानों के फॉर्म हाउस भारतीय जन जीवन की सड़ांध के मवाद-घर बन रहे हैं.
देश की जनता के सामने इतिहास का यह सवाल अन्ना हजारे के नेतृत्व में फिर पैदा हुआ
है. इसे दूसरी आजादी का आंदोलन कहा जाए या नहीं-यह अलग मसला है. लेकिन इसे भ्रष्ट
लोकसेवकों के लिए पहली गुलामी का काल तो जरूर बनाना चाहिए.
08.04.2011, 11.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Shuddhabrata Sengupta [shuddha@sarai.net] New Delhi | | | |
This time around, I have to say that the print media has acted (upto now) with a degree of restraint that I think is commendable. Partly, this has to do with the different natures of the two media. If you have to write even five hundred words about the Jan Lokpal bill, you run out of platitudes against corruption in the first sentence (and who can speak ‘for’ corruption anyway?) and after that you have to begin thinking about what the bill actually says, and the moment you do that, you cannot but help consider the actual provisions and their implications. On television on the other hand, you never have to speak for more than a sound-byte, (and the anchor can just keep repeating himself or herself, because that is the anchor’s job) and the accumulation of pious vox-pop sound bytes ‘against corruption’ leads to a tsunami of ‘sentiment’ that brooks no dissent.
Between the last NDA government and the current UPA government, we have probably experienced a continuity of the most intense degree of corruption that this country has ever witnessed. The outcome of the ‘Anna Hazare’ phenomenon allows the ruling Congress to appear gracious (by bending to Anna Hazar’s will) and the BJP to appear pious (by cozying up to the Anna Hazare initiative) and a full spectrum of NGO and ‘civil society’ worthies to appear, as always, even holier than they already are.
Most importantly, it enables the current ruling elite to have just stage managed its own triumph, by crafting a ‘sensitive’ response (ably deployed by Kapil Sibal) to a television media conjured popular upsurge. Meanwhile, the electronic media, by and large, have played their part by offering us the masquerade of a ‘revolution’ that ends up making the state even more powerful than it was before this so called ‘revolution’ began. Some people in the corridors of power must be delighted at the smoothness and economy with which all this has been achieved. Hosni Mubarak should have taken a few lessons from the Indian ruling class about how to have your cake and eat it too on Tahrir Square,
We have been here before. Indira Gandhi’s early years were full of radical and populist posturing, and the mould that Anna Hazare fills is not necessarily the one that JP occupied (despite the commentary that repeatedly invokes JP). Perhaps we should be reminded of the man who was fondly spoken of as ‘Sarkari Sant’ – Vinoba Bhave. Bhave lent his considerable moral stature to the defence of the Internal Emergency (which, of course, dressed itself up in the colour of anti-corruption, anti-black marketeering rhetoric, to neutralize the anti-corruption thrust of the disaffection against Indira Gandhi’s regime). And while we are thinking about parallels in other times, let us not forget a parallel in another time and another place. Let us not forget the example of how Mao’s helmsmanship of the ‘cultural revolution’ skilfully orchestrated popular discontent against the ruling dispensation to strengthen the same ruling dispensation in China.
These are early days, but Anna Hazare may finally go down in history as the man who - perhaps against his own instincts and interests – (I am not disputing his moral uprightness here) - sanctified the entire spectrum of Indian politics by offering it the cosmetic cloak of the provisions of the draft Jan Lokpal Bill. The current UPA regime, like the NDA regime before it, has perfected the art of being the designer of its own opposition. The method is brilliant and imaginative. First, preside over profound corruption, then, utilise the public discontent against corruption to create a situation where the ruling dispensation can be seen as the source of the most sympathetic and sensitive response, while doing nothing, simultaneously, to challenge the abuse of power at a structural level. | | | | | | | | भास्कर मिश्र 'पारस' [bapubhaskar23@gmail.com] बिलासपुर,वर्तमान में हैदराबाद टीवी पत्रकार | | | |
कनक तिवारी जी प्रदेश के एक जाने माने अधिवक्ता हैं.उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि तंत्र में कितने छेद हैं,उनकी साफगोई अच्छी लगती है,मै उनसे पूरी तरह से सहमत हूं कि कानून मंत्री और देश का पीएम चिकनी चुपड़ी बात करने में पारंगत हैं.कांग्रेस हमेशा कमजोर रीढ़ वाले को प्रधानमंत्री के कुर्सी पर देखना चाहता है,और इस बहाने मलाई खाने में लोगों को कोई दिक्कत भी नहीं होती,बेशक मनमोहन सिंह ईमानदार हों लेकिन देश को इस ईमानदारी का कोई फायदा नहीं मिला,वे केवल अपना चेहरा ही चमकाते रह गये,नतीजा ये हुआ कि न तो वे अपने आप को साफ रख सके न देश को ही बचा सके,भाजपा भी इसी राह पर है मै कनक जी से पूरी तरह से सहमत हूं, | | | | | | | | Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi | | | |
जनलोकपाल बिल को एक शुरुवात मात्र माना जाना चाहिये,यह समझ लोगों में गहरी होनी चाहिये कि यह लडाई पूरी राजनीति के खिलाफ है. इस पखाने को साफ किये बिना घर से गँदगी नही जाने वाली !
चूँकि यह आँदोलन शुरुवात पर है इसलिये इसे सम्हालने और हवा देने कि जरुरत है !! | | | | | | |
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