घर किसी भी दिशा में था
कहानी
घर किसी भी दिशा में था
रामकुमार तिवारी
सूरज को निकले चार घंटे हो गये थे, फिर भी रात कहीं-कहीं रह गई थी. नगर निगम के
दफ़्तर में चमन की टेबल के आसपास अंधेरा था. कमलेश ने अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे,
चमन की ओर देखा. जल रही सिगरेट के चारों ओर चमन का चेहरा था.
चमन का चेहरा अधिकांशत: उसके सहकर्मियों को दिखता नहीं था. यह अलग बात थी कि वे एक
ही हांल में एक ही छत के नीचे बैठते थे और उनके बीच कोई दीवार नहीं थी. कमलेश की
टेबल के पास खिड़की थी. उसमें धूप आती थी. चमन अपनी कुर्सी से उठकर सिगरेट के लिए
कमलेश की कुर्सी के पास गया तो सबको दिख गया.
रोज की तरह बालों में कंघी नहीं की गई थी. बायीं आंख में कीचड़ देखकर कमलेश ने पूछा-
“क्या तबीयत खराब है?”
चमन ने कहा- “ठीक हूं” और वापस अपनी कुर्सी पर आकर सिगरेट पीने लगा. सिगरेट का धुआं
हाल में भर गया. लोगों को सांस लेने में दिक्कत होने लगी. परसू ने पंखा चला दिया तो
लोगों को राहत मिली.
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लंच का समय हो गया था. कमलेश चमन के पास गया. चमन अपनी कुर्सी पर बैठा-बैठा ऊंघ रहा
था. उसने चमन के कंधे पर हाथ रखा. चमन ने अंगड़ाई ली. फिर वे दोनों चाय पीने के लिए
बाहर आ गये. चुपचाप चाय पीते रहे. बात करने के लिए कुछ नहीं था. बात करने पर
बार-बार कहे को एक बार और कह कर ऊबना पड़ता.
कमलेश को छोड़कर बाकी लोग चमन से दूर रहते थे. चमन भी दूरी को भरने का प्रयास कर
नहीं पाता था. चमन के साथ कुछ ऐसा था कि भूल कर भी अगर कोई चमन की ओर आ जाये तो भी
उनके बीच की दूरी कम नहीं होती थी. कमलेश और चमन के बीच भी दूरी थी लेकिन दूरी में
सिगरेट का पुल था, जिस पर चलकर चमन, कमलेश के पास आ जाता था और उसी पुल में सिगरेट
पीता वापस चला जाता था.
कमलेश के सहकर्मियों का बोलना-सुनना इस तरह तयशुदा और जाना हुआ होता था कि उनके बीच
चमन का कुछ नहीं बोलना या बड़बड़ाना कमलेश को अच्छा लगता था.
पांच बज चुके थे. दफ़्तर के लोग जा चुके थे. कमलेश ने चमन से चलने के लिए कहा तो
चमन चौंका. दोनों बाहर आकर अपने-अपने घर की दिशाओं में चल दिये. चमन का घर किसी एक
दिशा में नहीं रहता था. वह चमन के चलने और पहुंचने पर निर्भर करता था.
आज जब चमन घर पहुंचा तो घर धन्नू के रोने की दिशा में था. धन्नू चमन का तीसरे नम्बर
का बेटा है. उसकी उम्र लगभग तीन वर्ष है. उससे बड़ा सत्तू सात वर्ष का है और सबसे
बड़ा दीपू दस वर्ष का है. सबसे छोटी मुन्नी छ: महीने की है.
धन्नू को उसकी मां मालती पीट रही थी. मालती की उम्र निश्चित नहीं है. वह उसकी
मन:स्थिति पर निर्भर करती है. चमन ने घूर कर मालती को देखा. मालती और जोर-जोर से
पीटने लगी. रोते-रोते धन्नू का बुरा हाल हो गया. चमन ने धन्नू को उठाकर मालती के
ऊपर फेक दिया. मालती से टकराकर धन्नू नीचे गिर गया. सहमे हुए तीनों बच्चे और सहम
गये. मालती बड़बड़ाती चीखती दूसरे कमरे में चली गई. धन्नू के रोने की आवाज़ चारों ओर
से थककर वापस उसके पास आ गई और चुप हो गई.
बहुत देर बाद चमन ने बच्चों की तरफ मुंह करके पूछा, “खाना खाया?”
दीपू ने सिर हिलाकर कह दिया "नहीं."
वह बड़बड़ाता गाली बकता बाहर चला गया. चमन डबलरोटी के दो पैकेट लेकर लौटा. बच्चों के
साथ उसने भी दो पीस खाये. चमन बच्चों को पढ़ने की हिदायत देकर बाहर निकल गया.
शहर की बनावट बड़ी रहस्यमय है. लखनऊ की भूल-भूलैया से ठीक उल्टी. जो जहां जाना चाहता
है, वह किसी भी दिशा में, किसी भी सड़क से जाये, वहीं पहुंच जायेगा. चमन चलते-चलते
रूका. सड़क के उस पार शराब की दुकान थी. सड़क पर ट्रैफिक बहुत था. चमन को देर हो रही
थी. वह वाहनों से बचने-कुचलने के मामूली अंतर में से गुजरकर उस पार पहुंच गया.
बाद में रात बहुत हो गई और सड़कें सुनसान. भीड़ के बिना चौराहों की पहचान खो गई. सब
कुछ अनचीन्हा-सा लग रहा था. दिन की इतनी सारी भीड़ एक साथ मकानों के अंदर सो सकती
है, विश्वास नहीं होता. कभी-कभी लगता, शहर कहीं खो गया है और इक्के-दुक्के लोग शहर
को ढूंढ रहे हैं. रात में अपने शहर के खो जाने का दुख कुछ लोगों को बहुत होता है.
वे रात-भर शराब पीते रहते हैं और सड़कों पर अपने शहर को खोजते रहते हैं. नशे में चमन
की आंखें बार-बार बंद हो रही थीं. वह लगातार चल रहा था. रात में दिन की तरह लगातार
चलना मजबूरी नहीं है. वह कभी भी रूक सकता है या पुलिस द्वारा रोका जा सकता है. यह
भी हो सकता है कि वह कुछ भी कर दे और किसी को पता न चले.
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इसी तरह के ख्यालों में वह अपने घर के सामने पहुंच गया. उसने आंखें
खोलकर घर को देखा. दरवाजा पीटने लगा. पड़ोसी भट्ट साहब के घर की लाइट जली और बुझ गई.
भट्ट साहब के घर को किसी का इंतज़ार हर समय रहता है. हर खटका उन्हें अपना खटका जान
पड़ता है.
दरवाजा पीटते-पीटते चमन को झपकी आ गई. कुछ देर बाद उसने आंखें खोली. एक लात जोर से
किवाड़ों में मारी और गिर गया. मालती तेजी से आई और बिना देखे दरवाजा खोल कर चली गई.
चमन घर के अंदर आया. बच्चे बेहोशी की नींद सो रहे थे.‘‘इतनी देर में दरवाजा खोलती
है’’ कहता लड़खडाता चमन मालती के कमरे में घुसा और पलंग में टकराकर पलंग पर गिर पड़ा.
दरवाजा खुला रह गया था, जिससे बह-बहकर अंधेरा बाहर जा रहा था. बाहर रात और गाढ़ी हो
गई थी और सड़कें सुनसान.
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सुबह जब चमन की नींद खुली, मुन्नी जोर-जोर से रो रही थी. साढ़े नौ बज गये थे. वह
हड़बड़ाकर उठा. आधा-अधूरा तैयार होकर चलने को हुआ. मालती ने थाली उसके सामने रख दी.
थाली में चार रोटी और आलू की सब्जी थी. उसने अविश्वास से मालती को देखा. मालती की
पीठ उसकी ओर थी. जल्दी-जल्दी खाना खाकर वह घर से निकल पड़ा. मालती दरवाजे तक आई.
उसने चमन की ओर देखा. चमन की पीठ उसकी ओर थी. मुन्नी के रोने की आवाज़ सड़क पर चमन
के साथ-साथ चल रही थी. चमन को दफ़्तर के दरवाजों के खुलने की आवाज़ आ रही थी.
चमन दफ़्तर पहुंचा तो विश्वास नहीं हुआ. अभी दफ़्तर खुला नहीं था. आज वह पहली बार
दफ़्तर खुलने से पहले पहुंचा था. उसने सिगरेट जलाई और उस सड़क को देखा, जिससे कमलेश
दफ़्तर आता है.
आज कमलेश दफ़्तर नहीं आया. लंच के समय चमन जब बाहर निकला तो लोगों का ध्यान गया कि
चमन अंदर ही था. कमलेश के बिना चमन दिखाई नहीं देता था. वह अनमना-सा चाय की गुमटी
पर चला गया. चार बजे वह अपनी कुर्सी से उठकर बाहर चल दिया. दफ़्तर बंद होने से एक
घंटा पहले चमन का जाना सबको एक साथ दिख गया. सबने पहले एक दूसरे को देखा और फिर
साहब के चेम्बर को देखने लगे.
बाहर कहां जायें? चमन को समझ में नहीं आ रहा था. वह बहुत देर तक यूं ही चलता रहा.
चमन ने रूककर दाहिने ओर देखा. सड़क के उस पार पुराना तालाब था. वह घाट की सीढ़ियों पर
बैठ गया. घाट के नीचे की सीढ़ी पर एक स्त्री कपड़े धो रही थी. कपड़े पछीटने की आवाज़
थी. तालाब का पानी इतना गंदा था कि उसमें कोई अक्स नहीं था. जिसकी भी परछाई उसमें
गिरती, डूब जाती. सीढ़ी पर बैठा सिगरेट पीता चमन अपनी परछाई के बिना बैठा था. तालाब
में एक भैंस अपनी परछाई के साथ डूबी थी. किनारे पर कुछ सुअर आपस में लड़ते‘-झगड़ते
एक-दूसरे की परछाई की तरह दिख रहे थे.
चमन की सिगरेट खत्म हो गई थी. तालाब के ऊपर अंधेरा घिर आया था. शहर की बत्तियां जल
गई थी. चमन घाट से उठा और घर की ओर चल दिया. रास्ते में उसने डबलरोटी के पैकेट और
कुछ समोसे खरीदे. आज चमन का घर किसी भी दिशा में था. घर से किसी रोने- चिल्लाने की
आवाज़ नहीं आ रही थी. चमन ने बच्चों को खाने के लिए समोसे दिये तो वे खुश हो गये.
उन्हें भूख लगी थी. मालती नहीं दिखाई दी तो चमन ने सत्तू से पूछा. सत्तू ने बताया-
मम्मी सो रही है.
दीपू ने गांव से आई दादी की चिट्ठी चमन को दी. चमन ने चिट्ठी पढ़ी, पानी पिया और
बाहर निकल गया. देर रात गये जब चमन घर लौटा तो दीपू दरवाजा खोले सामने ही कुर्सी पर
बैठा ऊंघता मिला. आहट होते ही वह जाग गया.
चमन ने लड़खड़ाते-लड़खड़ाते संभलकर पूछा- “तुम अभी तक जाग रहे हो? ”
दीपू ने कहा- “मम्मी को तेज बुखार है.”
“अच्छा. तभी घर शांत है” कहता हुआ, चमन चौकी पर सो गया. दीपू ने दरवाजा बंद कर
लिया.
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सुबह चमन मेडीकल स्टोर से बुखार की दवा ले आया और साथ में एक पैकेट दूध और थोड़े से
फल. उसने दीपू के हाथों मालती को दवा खिला दी. मालती ने कराह कर कहा -‘‘सिर फटा जा
रहा है.’’ चमन सिर दर्द की दवा भी ले आया. दवा खा कर मालती खुद को कोसने लगी और
बार-बार मरने की इच्छा व्यक्त करने लगी. चमन ने पलट कर कुछ इस तरह मालती की ओर देखा
कि मालती भड़क उठी. उसने दूध का गिलास दीवार पर दे मारा और जोर-जोर से रोने लगी. चमन
बाहर निकल गया. बच्चों ने एक-दूसरे को देखा और चुपचाप दूसरे कमरे में चले गये.
चमन दफ़्तर तक गया लेकिन अंदर नहीं गया. न जाने क्या सोचता हुआ लौट आया. कभी-कभी
चमन को विश्वास नहीं होता कि यह जो सामने बिल्डिंग है, यही उसका दफ़्तर है और वह
यहां नौकरी करता है. उसका एक घर भी है, जहां वह लौटता है. उसकी पत्नी है, बच्चे
हैं. बहुत जोर देने पर उसकी स्मृति उसका साथ देती तब वह या तो दफ़्तर जाने लगता या
घर को लौटने लगता या बार-बार घर से बाहर जाकर बार-बार घर में लौटने लगता.
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एक दिन उसने अपने बच्चों को गिना था. उनके नाम पूछे थे. कौन किस
कक्षा में पढ़ता है, यह भी जाना था. जब उनसे उनके मां-बाप के नाम पूछे तो बच्चे खूब
हंसे. बच्चों के साथ-साथ वह भी हंसा.
सुबह जागने पर चमन ने दीपू से मम्मी का हाल पूछा. दीपू ने कहा “ ठीक है, बुखार कुछ
कम हुआ है. ”
चमन थैला लेकर बाजार चला गया, बाजार से वह बच्चों के लिए खाना ले आया और मालती के
लिए दूध बिस्कुट. जब चमन मालती के कमरे में गया तो उसको देखकर मालती ने आंखें मूंद
लीं. चमन ने माथे पर हाथ रखा, बुखार नहीं था. उसने दीपू को दवा की एक खुराक दूध के
साथ देने को कहा और दफ़्तर चला गया.
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चमन को अपने पीछे-पीछे मालती के कराहने की आवाज़ आती हुई सुनाई दी. वह जल्दी-जल्दी
चलने लगा. साहब ने उसे बहुत फटकारा. वह सफेद पड़ गया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया.
उसने पैंट की दोनों जेबें टटोली, उनमें सिगरेट नहीं थी. सामने देखा तो अपनी सिगरेट
से सिगरेट सुलगाता कमलेश खड़ा था. कमलेश ने सिगरेट सुलगा कर चमन को दे दी.
लंच के समय कमलेश और चमन बाहर निकले. कमलेश ने पूछा- “कल दफ़्तर क्यों नहीं आये
थे?”
चमन ने कहा-“मालती को बुखार हो गया था. वैसे उसके बीमार होने या स्वस्थ होने से
क्या फर्क पड़ता है. बस यूं ही मन नहीं हुआ था. घर से तो दफ़्तर के लिये ही निकला
था.”
‘‘अब उनका बुखार कैसा है ?’’
‘‘ठीक है. समय से दवा खा लेगी तो ठीक हो जायेगी लेकिन उसके ठीक होने का पता नहीं
चलेगा. खैर. छोड़ो इन बातों को.” चमन ने चाय वाले को दो चाय लाने का संकेत दिया और
वहीं कमलेश के साथ पुलिया पर बैठ गया.
चमन चाय पीते-पीते सड़क पर आ जा रहे लोगों को देखता रहा. चाय पीकर कमलेश ने कहा-
‘चलो’ तो चमन की तंद्रा टूटी. उसने हाथ के गिलास को देखा. वह खाली था. दफ़्तर बंद
हो रहा था. कमलेश और चमन सड़क पर चल रहे थे. आज कमलेश का मन चमन से बातें करने का
था. लेकिन उसने कोई बात नहीं की. बस चुपचाप चलता रहा. आज दोनों के मन की दिशा एक
थी. चलते-चलते दोनों का ध्यान एक साथ गया. चमन का घर आ गया था.
चमन ने कहा, ‘‘अरे. यह तो मेरा घर आ गया.’’
कमलेश ने कहा, ‘‘हां मैं चलता हूं.’’
कमलेश लौटने लगा तो चमन ने झिझकते हुए कहा ‘‘चलो कुछ समय घर पर बैठ लो, बच्चों को
अच्छा लगेगा.”
चमन के घर का दरवाजा खुला था. घर से मुन्नी के रोने की आवाज़ आ रही थी. मुन्नी चौकी
पर अकेले लेटी थी और उसने टट्टी कर ली थी. उसके ऊपर मक्खियां भिन-भिना रहीं थी.
दूसरे बच्चे घर पर नहीं थे. मालती अपने कमरे में थी. यह देखकर चमन को बड़ी शर्म
महसूस हुई. उसने चादर सहित मुन्नी को उठाया और बाथरूम में ले गया.
कमलेश अंदर जाने के लिए उठा और फिर न जाने क्या सोचकर बैठ गया. अंदर से चमन और
मालती के झगड़ने की आवाजें जोर-जोर से आ रही थी. कुछ देर कमलेश बैठा-बैठा सोचता रहा
और फिर उठकर चुपचाप चल दिया. जाते-जाते कमलेश ने देखा, चमन के पड़ोसी उसे अजीब-सी
नजरों से घूर रहे हैं. वह सिर नीचा करके तेज-तेज चलने लगा.
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सुबह दीपू ने कहा- “पापा आज मेरा जन्मदिन है.”
चमन एकदम से चौका. उसने हिसाब लगाया तो दीपू पूरे ग्यारह वर्ष का हो गया था और कल
से बारहवें में लग जायेगा. उसने दीपू को सौ रूपये कुछ मिठाई वगैरह खरीदने के लिए
दिये. दीपू के साथ-साथ सत्तू भी खुश हो गया. चमन की शादी को चौदह वर्ष हो गये थे और
नौकरी को सोलह वर्ष. चमन ने अपनी उम्र का हिसाब लगाया तो वह चालीस वर्ष थी.
रिटायर्ड होने में अभी अट्ठारह वर्ष थे. रिटायर्ड होने के समय दीपू उन्तीस-तीस वर्ष
का हो जायेगा और उस समय मुन्नी अट्ठारह उन्नीस की. इस पूरी सोच में उसके अंदर मालती
की उम्र का ख्याल नहीं आया कि रिटायरमेंट के समय मालती कितने वर्ष की होगी. यह
जानने के लिये मालती की वर्तमान उम्र का पता होना जरूरी था, जो न चमन को पता था और
न ही मालती को. चमन के चेहरे पर तनाव और पीड़ा थी,
कमलेश ने पूछा-‘‘क्या बात है ? आज तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है.”
जब चमन कुछ नहीं बोला तो कमलेश उसका हाथ पकड़कर उसे बाहर ले गया. बाहर पहुंचते ही
चमन गुस्से से एकदम बोला- ‘‘देखना, एक ना एक दिन मैं उस औरत का खून कर दूंगा. न
जाने कैसे बच्चों का मुंह देखकर रूक जाता हूं.’’
“क्या हुआ? इस तरह गुस्सा करने से क्या होगा.’’ कमलेश ने उसे शांत करते हुए पुलिया
पर बैठाया.
बैठते ही चमन ने कहना शुरू किया ‘‘मैं कहां तक सहूं ! हर बात की हद होती है. एक माह
पहले धन्नू को बुखार आया था. उसे इंजेक्शन लगे थे. उसके इंजेक्शन धीरे-धीरे पक गये,
घाव हो गये. कल डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने मुझे बहुत डांटा. उसके नितम्ब का एक
तिहाई हिस्सा काट कर अलग करना पड़ा. कैसी मां है? अपने जाये बच्चों को भी नहीं
देखती.’’
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कमलेश ने चमन के चेहरे की ओर देखा. कहते-कहते चमन का चेहरा झुक गया
था. कमलेश ने भी अपना चेहरा झुका लिया और वे चुपचाप बहुत देर तक बैठे रहे. बहुत देर
बाद दफ़्तर बंद हो गया. सभी सहकर्मी चले गये थे. इसके बाद भी वे यूं ही बैठे रहे.
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रविवार का दिन था. सूरज बहुत ऊपर चढ़ गया था. कमलेश जागा तो उसे अजीब-अजीब-सा लग रहा
था. उसका मन उठने को नहीं हुआ. उसने आंखें बंद कर लीं. उसके मन में विचित्र-विचित्र
ख्याल आ-जा रहे थे. हर ख्याल जाते-जाते डरावना और भयावह हो जाता था.
उसने खिड़की से बाहर मकानों को देखा और फिर उनमें रह रहे लोगों के जीवन के बारे में
सोचने लगा. किसी एक के जीवन की तरह-तरह से कल्पना करते करते जब वह थक गया तो घबराकर
पलंग से उठ गया. नहा-धोकर उसने खाना खाया और ख्यालों से बचने के लिए किताब पढ़ने
लगा. दो-चार पेज पढ़ने के बाद वह किताब से ऊब गया. दुबारा उसका पढ़ने का मन नहीं हुआ.
एकाएक उसे चमन के बेटे धन्नू की याद आ गई. उसका मन धन्नू को देखने का हुआ.
वह चमन के घर की दिशा में चल दिया. कमलेश चमन के दरवाजे के बाहर ठिठक गया. अंदर से
पीटने, रोने की आवाजें आ रही थी. मालती के रोने और गाली बकने की आवाज़ घर की
दीवारों में सुराख करके पड़ोसियों के घरों में घुस रही थी. कमलेश को घबराहट होने
लगी. वह पलटा और तेज-तेज चलने लगा.
सड़क पार करते समय उसकी हड़बड़ाहट डरा देने वाली थी. वह एक कार से टकराते-टकराते किसी
तरह दूसरी कार से बचा. पलट कर उसने पीछे देखा तो चमन का घर उसे घूर रहा था. वह लगभग
दौड़ने लगा. वह इन सबसे ओझल हो जाना चाहता था. जल्दी-जल्दी इतनी दूर पहुंचना चाहता
था कि जहां से मालती के रोने की आवाज़ न सुनाई दे. विचित्र बात थी. वह लगातार चल
रहा था लेकिन चमन का घर ओझल नहीं हो रहा था और न ही मालती के रोने की आवाज़ डूब रही
थी.
चलते-चलते वह एकदम से मुड़ा और दाहिने ओर की पहाड़ी की सड़क पर तेज-तेज चलने लगा. वह
पहाड़ी के उस पार जल्दी पहुंचना चाहता था. पहाड़ी के उस पार पहुंचते ही चमन का घर ओझल
हो जायेगा और वहां मालती के रोने की आवाज़ नहीं सुनाई देगी. पहाड़ी के उस पार
पहुंचते ही उसे राहत मिली.
जल्दी- जल्दी चढ़ाई चढ़ने से उसकी सांस फूल रही थी. वह सड़क किनारे के पेड़ के नीचे खड़ा
होकर सुस्ताने लगा. सड़क किनारे कुछ ही दूरी पर एक ह्यूम पाईप पड़ा था. उसी के पास एक
पागल औरत खड़ी थी. उसके बदन पर नाम मात्र के लिए जगह-जगह से फटा एक साया भर था. उसके
खुले बाल हवा में उड़ रहे थे. उसकी देह धूल से लिपटी थी. उसकी स्थिर बड़ी काली-सफेद
आंखें भय पैदा कर रही थी.
कमलेश का ध्यान जब उसके पेट की ओर गया तो वह अवाक रह गया, उसके पेट में बच्चा था.
वह गर्भवती थी. कमलेश का पूरा खून निचुड़-सा गया. उसे विश्वास नहीं था कि कोई आदमी
पागल औरत के साथ बलात्कार कर सकता है? क्या होगा उस बच्चे का, कैसे यह औरत बच्चे को
जन्म देगी. किस तरह बड़ा होगा वह बच्चा इस धरती पर ? किसका होगा वह बच्चा? मेरा या
सबका?
एकाएक उस पागल औरत ने कमलेश को देखा तो वह कमलेश की ओर दौड़ी. अपनी ओर पागल औरत को
दौड़ता देख कमलेश डर गया. वह एकदम से भागा. कमलेश को भागता देख वह जोर से चिल्लाई- “
भागता कहां है हरामी, रूक मैं आती हूं.” और फिर पागल औरत हंसती, चिल्लाती दौड़ी आ
रही थी.
दौड़ते-दौड़ते कमलेश का बुरा हाल हो गया. वह बहुत आगे निकल गया था. उसका घर पीछे छूट
गया था. उसने रूक कर पीछे देखा तो उसके घर के सामने पागल औरत खड़ी थी और वह खड़ा था.
उसके बाल हवा में उड़ रहे थे और उसका साया न जाने कहां निकल कर गिर गया था.
उसने कमलेश को देखा तो फिर चिल्लाई, “ रूक हरामी, मैं आ रही हूं.”
कमलेश ने औरत को अपने पास आते देखा तो फिर बदहवास भागने लगा. कमलेश को भागते देख
पागल औरत उसके घर से बहुत पीछे छूट गई थी. वहीं चमन ने अपने घर से हाथ बाहर निकाला.
कमलेश ने उसकी ओर सिगरेट बढ़ा दी.
15.04.2011, 00.23 (GMT+05:30) पर प्रकाशित