पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

चीनी कम, ज़िंदगी ज़्यादा

बच्चों को मौत की बीमारी

भारत के माओवादी भी चुनाव लड़ें

शिकार की तलाश

नेग में मिली हरियाली

निशाने पर मीडिया

क्रूर समाज में एक मानवीय चेहरा

फिर बाढ़ उत्सव !

ओ मैक्लुस्कीगंज !

भारत के माओवादी भी चुनाव लड़ें

चीनी कम, ज़िंदगी ज़्यादा

बच्चों को मौत की बीमारी

गोरखालैंड में स्वशासन

होरो साहब को जानते हैं आप ?

यहां दरवाजे बंद हैं

मेरे न रहने पर

महमूद दरवेश

इला कुमार

मेरे उस्ताद मेहदी हसन

 
 पहला पन्ना > राज्य > असमPrint | Send to Friend 

Save and share article:
Delicious
Reddit
Stumbleupon
Newsvine
असम में फिर बाढ़ उत्सव

फिर बाढ़ उत्सव !

 

दिनकर कुमार

गुवाहाटी से
 

 

असम एक बार फिर बाढ़ में डूबा हुआ है.

 

लेकिन बरसात के इस मौसम में असम में कुछ लोग हैं, जिनके लिए यह बाढ़ उत्सव की तरह है. जो इस बाढ़ में डूब नहीं रहे, उबर रहे हैं. हर साल बाढ़ के नाम पर करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा होता है और जब तक इनका हिसाब-किताब और जांच हो तब तक फिर से बाढ़ का सिलसिला शुरु हो जाता है. इसलिए हर साल कुछ लोग इस बाढ़ की प्रतीक्षा करते रहते हैं, उत्सव की तरह !

बाढ़ के पानी में राज्य का विधानसभा भवन भी इस तरह डूबा रहा.


पिछले 60 वर्षों से असम में हर साल बाढ़ का तांडव होता रहा है. 1950 में हुए भयंकर भूकंप की वजह से ब्रह्मपुत्र एवं उसकी सहायक नदियों के स्वरुप में परिवर्तन आ गया और उसके बाद हर साल बाढ़ तबाही मचाने लगी.

इस तबाही की रोकथाम के लिए सरकार की तरफ से इतने सालों में करोड़ों रुपए खर्च किए गए मगर आज तक एक भी बांध पूरी तरह नहीं बनाया जा सका, न ही तटबंधों का निर्माण हो पाया. राजनेताओं के लिए बाढ़ एक वार्षिक उत्सव की तरह है, जिसके नाम पर केंद्र से मिलने वाली राशि की बंदरबांट होती रही है लेकिन असमवासियों को बाढ़ की विभीषका से आज तक छुटकारा नहीं मिल पाया है.

प्यास लगी, अब कुआं खोदो

मीडिया में आने वाली खबरों पर विश्वास किया जाए तो हर साल बरसात की शुरुवात के बाद जल संसाधन विभाग बांधों की मरम्मत का काम शुरु करता है और जाहिर है, बरसात का पानी इस तरह की कोशिशों को असफल कर देता है.

इस वर्ष उत्तर असम के लखीमपुर, धेमाजी और सोनितपुर जिले में बाढ़ ने भयंकर तबाही मचायी है. पांच सौ से अधिक गांवों में बाढ़ आने की वजह से कम से कम 5 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. अब तक कई लोगों को यह बाढ़ निगल चुकी है. इसके अलावा दस हजार हेक्टेयर कृषि भूमि की फसल तबाह हो चुकी है. काफी तादाद में मवेशियों की मौत हो चुकी है. 52 नंबर राष्ट्रीय उच्च मार्ग टूट जाने के कारण लखीमपुर और धेमाजी जिले का सड़क संपर्क देश के दूसरे हिस्सों से खत्म हो चुका है.

 

तिब्बत से निकलने वाला ब्रह्मपुत्र भारत में 918 किलोमीटर का सफर तय करता है और भारत की इस सबसे लंबी नदी का विस्तार असम में 720 किलोमीटर तक है. कई स्थानों पर 10-10 किलोमीटर तक चौड़े पाट वाली इस नदी

 
रंगा नदी, डिक्रांग नदी, पायो नदी, काकै नदी, शिंगरा नदी, दोरयांग नदी, पिसला नदी आदि में आई बाढ़ की वजह से लखीमपुर जिले में व्यापक तबाही हुई है. लगभग 40 वर्षों के बाद रंगानदी में आई बाढ़ की वजह से लखीमपुर नगर का एक हिस्सा डूबा रहा.

डिक्रांग नदी में आई बाढ़ की वजह से बिहपुरिया नगर डूब गया. अरुणाचल प्रदेश में नीपको की तरफ से रंगानदी पर पनबिजली संयंत्र का निर्माण किया जा रहा है. इस वर्ष निपको ने अतिरिक्त पानी छोड़ दिया, जिसके चलते असम में विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गईं. राष्ट्रीय पन बिजली परियोजनाओं ने असम में बाढ़ के संकट को और अधिक गंभीर बनाया है. माना जा रहा है कि निर्माणाधीन नीपको के एक तथा एनएचपीस के दो बांधों से पानी छोड़े जाने के कारण ही लखीमपुर का अधिकांश हिस्सा बाढ़ की भेंट चढ़ा.

मौजां ही मौजां

‘चीन का आंसू’ कहलाने वाली वांग्हो नदी चीन की मुस्कान में बदल गई है और दूसरी ओर असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां हर साल तबाही मचा रही हैं. ऊपरी असम की तरह निचले असम में भी बाढ़ से व्यापक तबाही हुई है. पड़ोसी देश भूटान ने अपनी कुरीशो नदी का अतिरिक्त पानी असम में छोड़ दिया है, जिसकी वजह से निचले असम के सैकड़ों गांवों में बाढ़ का पानी घुस आया है. आशंका जाहिर की जा रही है कि आने वाले दिनों में बाढ़ का संकट और भी गंभीर हो सकता है.

बांधों को मजबूती के साथ तैयार नहीं करने, टूटे हुए बांधों की समय पर मरम्मत नहीं करने और बाढ़ से निपटने की पूर्व तैयारी नहीं करने की वजह से बाढ़ की विभीषिका और अधिक बढ़ जाती है. धेमाजी जिले के मातमरा बांध के टूटे हुए हिस्से से आई बाढ़ की वजह से दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली के डूबने का खतरा पैदा हो गया है. धेमाजी जिले के सौ से भी अधिक गांव बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

एक गैर सरकारी संस्था की मानें तो हर साल बाढ़ के बाद असम में हजारों लोग बेघर हो जाते हैं. यही कारण है कि राजधानी गुवाहाटी के आसपास बाढ़ के बाद भिखारियों की संख्या बढ़ जाती है.


असम के विभिन्न जन संगठन असम की बाढ़ समस्या को राष्ट्रीय समस्या घोषित करने की मांग केंद्र से करते रहे हैं लेकिन केंद्र ने इस समस्या की तरफ गौर करने की जरुरत नहीं समझी. हर साल बाढ़ जहां लाखों लोगों का जीवन बदतर बना जाती है, वहीं कुछ लोगों के लिए बाढ़ कमाई करने का सुनहरा अवसर बनकर आती है.

असम के जल संसाधन विभाग में वर्षा के दिनों में उत्सव जैसा माहौल नजर आने लगता है. इस विभाग में मंत्री से लेकर कर्मचारी तक के चेहरे पर रौनक दिखाई देने लगती है. बाढ़ नियंत्रक विभाग में भी ऐसा ही मंजर दिखाई देता है. बाढ़ से लोगों को राहत दिलाने की जगह ये दोनों ही विभाग सरकारी धन की बंदरबांट में ज्यादा दिलचस्पी लेते हुए दिखाई देते हैं.

भीख मांगने वाले बढ़े

लखीमपुर जिले में बाढ़ पीड़ितों के लिए सौ राहत शिविर बनाए गए हैं और बेघर हुए लोगों के बीच राहत सामग्री का वितरण भी किया जा रहा है. मगर बाढ़ पीड़ितों की तादाद को देखते हुए राहत सामग्री अपर्याप्त बताई जा रही है. दस लोगों के बीच एक किलो चिउड़ा बांटने की खबर आ रही है. इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में दवाओं की आपूर्ति भी नहीं की गई है.

एक गैर सरकारी संस्था सामाजिक परिवर्तन और पर्यावरण सुरक्षा संगठन की मानें तो हर साल बाढ़ के बाद असम में हजारों लोग बेघर हो जाते हैं. यही कारण है कि राजधानी गुवाहाटी के आसपास बाढ़ के बाद भिखारियों की संख्या बढ़ जाती है. संगठन के सत्तार चौधरी के अनुसार- “ हमारे सर्वेक्षण में यह बात उभर कर सामने आई कि इन भिखारियों में आधे से अधिक लोग बाढ़ के कारण बेघर हुए हैं. हालांकि इनमें से अधिकांश लोग अपना जीवन यापन तो कर पाते हैं लेकिन अपनी पुरानी स्थिति में लौट पाना किसी के बस का नहीं होता. ”

राज्य के कई जन संगठनों ने राज्य के जल संसाधन विभाग में जारी भ्रष्टाचार की जांच सीबीआई से करवाने की मांग की है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और अगप (पी) के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत ने भी केंद्र सरकार से अनुरोध किया है कि वह जल संसाधन विभाग के घोटालों की निष्पक्ष जांच सीबीआई से करवाए.

बाढ़ नियंत्रण के मद में हर साल केंद्र की तरफ से करोड़ों रुपए आवंटित होते हैं. इसके बावजूद बाढ़ की तबाही जारी रहती है. सवाल पैदा होता है कि केंद्र की तरफ से आवंटित धन कहां चला जाता है ?

बाढ़ नियंत्रण के लिए 1982 में बनाया गया ब्रह्मपुत्र बोर्ड भी धन के अभाव में अब एक सफेद हाथी बन चुका है. बोर्ड ने अपने मास्टर प्लान के तहत 50 हजार करोड़ रुपए जरुरत बताई थी लेकिन आज तक वह रकम उपलब्ध नहीं हो सकी है. असम में बाढ़ की समस्या को हल करने के लिए विश्व बैंक या अन्य किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने आज तक दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

दुनिया के विकसित देशों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सहायता से बाढ़ को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है मगर असम में शासक वर्ग अपने आपको असहाय बताता रहा है और बाढ़ को ऐसी प्राकृतिक आपदा के रुप में प्रचारित करता रहा है, जिसे किसी भी सूरत में नियंत्रित नहीं किया जा सकता.

जाहिर है, मामला पानी में डूबने और उतराने का है और जो उतरा रहे हैं, उनकी दिलचस्पी कम से कम इस बाढ़ को नियंत्रित करने में नहीं है.

 

21.07.2008, 16.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल (केवल English में लिखें)
  ई-मेल अन्य विजिटर्स को भी दिखाई दे ।
  ई-मेल अन्य विजिटर्स को ना दिखाई दे ।
  नाम (English अथवा हिन्दी)
  स्थान
  प्रतिक्रिया
   

 

  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2008 Vikalp, INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in