मध्य वर्ग का असली विद्रोह
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मध्य वर्ग का असली विद्रोह
एम जे
अकबर
क्रांतियां अपनी ही संतानों को निगल जाने के लिए विख्यात हैं. इस भोजन सूची में कोई
बहुत ज्यादा रहस्य नहीं है. ऊर्जा, प्रबल लालसा और अव्यवस्था, जो व्यापक क्रांति के
लिए अनिवार्य है, वह स्थायित्व के लिए अभिशाप है. जब सुस्त राजा लुढ़क चुके होते
हैं, नई व्यवस्था को वैसी ही स्थिरता चाहिए, जैसी उसके द्वारा हटाई गई पुरानी
व्यवस्था में थी. सर्वविदित है कि लेनिन इस बात को लेकर हैरान होते थे कि क्या
गोलीबारी करने वाले दस्तों के बगैर क्रांति संभव थी. स्वयंसिद्ध उत्तर था, ‘नहीं.’
लेकिन दस्तों की बंदूकों की पहुंच उन कॉमरेड्स तक विस्तारित हो चुकी है, जिनकी
रूमानियत अव्यवस्था के लिए वैसे ही संकट है, जैसे वे अवशेष जो एक राजतंत्र की
पुनस्र्थापना का ख्वाब देखते हैं.
लोकतंत्र का तर्कशास्त्र जरा अलग है. प्रगति, क्रांति की जगह ले रही है. लेकिन वहां
ऐसे क्षण आते हैं, जब बदलाव में निहित टकराव कोई कम नाटकीय नहीं होते. हमने ऐसा ही
एक टकराव भ्रष्टाचार के खिलाफ विद्रोह में अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान देखा.
डॉ. मनमोहन सिंह अगर पिता नहीं, तो व्यापक तौर पर 1991 और 1992 की आर्थिक क्रांति
के चाचा तो माने ही जाते हैं, जिसने नए भारत की बुनियाद रखी. उनकी सरकार पर फिलहाल
अपनी ही क्रांति की संतानों का शिकंजा है- 20 से 30 की उम्र के वे युवक-युवतियां,
जो इस बात को लेकर व्याकुल हैं कि उनका सुधरा हुआ भारत अभी भी पुराने भारत की
बीमारियां झेल रहा है, सबसे ज्यादा असंगत ढंग से भ्रष्टाचार का मारक कैंसर.
समकालीन युवावर्ग ने एक हिलोर उपलब्ध कराई थी, जिसने भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय
आर्थिक नेतृत्व का दरवाजा खोला. और वे चाहते हैं कि इस विकास के लाभ का उपयोग देश
के वंचित वर्ग के उद्धार में हो और वे जिस मध्य वर्ग से आते हैं, उसकी मजबूती के
लिए. इसकी बजाय वे देख रहे हैं कि देश की दौलत पिरामिड के शिखर पर बिंदु जैसे छोटे
समूह द्वारा चूसी जा रही है, जिस पर पूंजीपतियों और नेताओं के गठबंधन का कब्जा है.
वे इस विचार से गुस्से में हैं कि राष्ट्रीय प्रतीक एक मुटाई हुई जोंक बन चुका है.
युवा अधीर हो सकते हैं. यह उनकी आदर्श अवस्था है. लेकिन वे अनावश्यक रूप से असहिष्णु
नहीं हैं. उनके नजरिए में थोड़ी कसर के लिए गुंजाइश है. किसी भी मामले में लोकतंत्र
एक प्यारा शांत किस्म का चौपाया है और युवा इसके द्वारा उपलब्ध कराई गई आरामदेह
सवारी का आनंद लेते हैं. यह चौपाया हर पांच साल या ऐसे ही कुछ बरसों में एक बार आग
उगलने वाले ड्रैगन में बदल जाता है. इस चुनावी प्रज्वलन में नीरोगकारी शक्तियां,
पोषण और सफाई होती है. ज्यादा महत्वपूर्ण बात है कि लोकतंत्र रोजाना की सच्चाई है.
यह बगैर भय के जीवन है. आधुनिक भारत की इस जरूरत के मामले में कोई समझौता नहीं किया
जा सकता.
हमने आर्थिक प्रगति या स्थायित्व के नाम पर एक वीभत्स स्थानीय अभिजात वर्ग के सामने
अपनी आजादी का समर्पण कर देने के लिए अंग्रेजों से स्वतंत्रता नहीं छीनी थी. कुछ
पर्यवेक्षकों को यह भ्रमित करने वाला लगता है और यहां तक विरोधाभासी भी, लेकिन उनका
निराशावाद स्वामी-सेवक सिंड्रोम को प्रतिबिंबित करता है, जिसने उपनिवेशीय यूरोप के
उत्पादन तंत्रों को बनाए रखा था. भारत की आर्थिक तरक्की के लिए कामगारों की गुलामी
या मध्य वर्ग के मौन की जरूरत नहीं है.
बहरहाल, युवा बदलाव के प्रति अभिभूत हैं. अज्ञात या कम जाने-पहचाने को लेकर जोखिम
उठाने की उनकी प्रबल इच्छा बहुत ऊंची है. यह कोई दुर्घटना नहीं है कि राजीव गांधी
द्वारा 18 साल के युवाओं को मताधिकार देने के बाद से डॉ. मनमोहन सिंह अकेले
प्रधानमंत्री हैं, जो अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद दुबारा निर्वाचित हुए हैं.
डॉ. सिंह ने यह उपलब्धि हासिल की, क्योंकि उन्होंने निरंतर आर्थिक उपलब्धियों का
वादा कर युवावर्ग को जीत लिया था. सिंह उनके किंग थे.
पुन:निर्वाचित होने के एक साल के भीतर ही यह साम्राज्य घिस गया. युवाओं में कड़वाहट
इतनी तीखी है, क्योंकि डॉ. सिंह का वादा भी उतना ही ऊंचा था. वे उनकी प्रेरणा के
प्रतीक थे, क्योंकि वे ईमानदार थे और उनमें कुछ भी नहीं छुपा था. युवाओं ने तब तक
उनका यह तर्क स्वीकार किया कि गठबंधन की राजनीति में कभी-कभार समझौतों की दरकार भी
होती है, जब तक कि उन्होंने इस समझौते का विस्तार और वजन नहीं जान लिया था.
हम जिस बात के गवाह बन रहे हैं, वह भारतीय मध्य वर्ग का पहला असली विद्रोह है. उनकी
ताकत को सिर्फ संख्याओं से ही मत आंकिए, हालांकि वे संख्याएं भी छोटी-मोटी नहीं
हैं. वे राष्ट्रीय संवाद पर नियंत्रण रखते हैं और वे एजेंडा तय करते हैं. बंगाल में
उनकी निराशा भ्रष्टाचार के कारण नहीं हो सकती, क्योंकि वाम के साथ यह समस्या नहीं
है. लेकिन रोजगार के अवसरों में एक लंबी छलांग के बगैर व्यक्तिगत ईमानदारी
अपर्याप्त है.
कोलकाता में वाम जब सत्ता में आया, उसके 15 साल बाद जन्मा व्यक्ति अब मतदाता है. हम
उससे कितने धीरज की अपेक्षा कर सकते हैं? बहरहाल, यह दर्ज किया जाना भी अहम है कि
बंगाल में ममता बनर्जी के प्रतिनिधित्व वाली विकल्प की मांग तीव्र होगी, क्योंकि
उम्मीदें भी बहुत विशाल हैं.
दिल्ली हो या कोलकाता, परिवर्तन की संतानें अपनी मांगों को सुनिश्चित कर रही हैं और
वे ऐसा असरदार स्पष्टता के साथ कर रही हैं. यदि वे भूखे छोड़ दिए गए, तो वे
ताकतवरों को चट कर जाएंगे.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
17.04.2011, 05.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित