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भूख की खेती की नीति

मुद्दा | भारतीय खेती का संकटकाल

 

भूख की खेती की नीति

सचिन कुमार जैन


जिस वक्त पूरा देश क्रिकेट विश्वकप के सेमीफाईनल और फाइनल मैचों की खुमारी में गिर-गिर पड़ रहा था, देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, नेता, मंत्री, अफसरान भी उसके नशे से सराबोर थे, मीडिया में (जिसे अब जन विरोधी और दृष्टिहीन मान लेना चाहिये) क्रिकेट का नशा बिखरा हुआ था; ठीक उन्हीं चार दिनों के दौरान भारत की सरकार ने समग्र प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति- सर्कुलर 1-2011 जारी की. इस सर्कुलर में कृषि के क्षेत्र को लगभग पूरी तरह से 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिये खोल दिया गया.

खेती

अब कोई भी विदेशी कम्पनी बीज, पौधों, फूलों, हार्टीकल्चर, फ्लोरीकल्चर, सब्जियों, चाय और मशरूम आदि के उत्पादन और विकास में सीधे दखल दे सकती है. पशुपालन, मछली पालन भी अब इसमें शामिल है. सरकार उन्हें आयात-निर्यात शुल्कों और अन्य करो में रियायत भी देगी.

वे भारत की बची-खुची कृषि संपदा यानी बीज और उत्पादन तकनीकों के साथ पूरा खिलवाड़ कर सकेंगे. इस नीति के बिना ही सवा दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. अब यह दर बढ़ जायेगी क्योंकि अब नारियल, चाय, मशरूम, फल, फूल पैदा करने वालों के साथ-साथ पशुपालन और मछलीपालन करने वाले लोगों को उन बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी, जिनके पास आर्थिक संसाधन तो हैं ही, सरकार का नीतिगत संरक्षण भी है.

भारत में किसानों और उत्पादों को लगभग प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहे हैं. यहां चार दशकों से कृषि उपज मण्डी की व्यवस्था काम करती रही है पर पिछले 10 वर्षों में भारत में आईटीसी और कारगिल सरीखी कम्पनियों ने मण्डियों के समानान्तर अपनी व्यवस्था खड़ी कर दी गई है और वे भारी मात्रा में किसानों से सीधी खरीदी कर रही हैं. मोंटेक सिंह अहलूवालिया सरीखे अर्थशास्त्री मानते हैं कि इससे किसानों को बेहतर व्यवस्था और बेहतर दाम मिल रहे हैं. ये वे विचारक हैं, जो यह मानते हैं कि यदि सरकारी ढांचा ठीक से काम न करे तो उसमें समानान्तर निजी ढांचा खड़ा कर दो. पर सरकारी ढांचा ठीक मत करो.

मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में 4 अप्रैल को एक किसान की कृषि उपज मण्डी में मृत्यु हो गई. वह 8 दिन से अपनी फसल बिकने का इंतजार कर रहा था पर बारदाना (बोरे) नहीं होने के कारण अनाज नहीं बिका और तनाव इतना बढ़ा कि उसकी जान चली गई.

आज मण्डी में कृषि उत्पाद बेचने के बाद किसानों को 8 से 10 दिन तक भुगतान नहीं होता है इसलिये वे दूसरा विकल्प खोजते हैं. सवाल यह है कि क्या उनके लिये प्रभावी भुगतान की व्यवस्था खड़ी नहीं की जा सकती है. मण्डी में उत्पाद बेचने के लिए मण्डी अब किसानों से 6 तरह के दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, इससे उनका मन उचट रहा है. सवाल यह है कि क्या व्यवस्था को जटिल बनाना जरूरी है ?

जाहिर है, इसका जवाब हां में है. अगर ऐसा नहीं होगा तो किसानों को कुचलते हुये निजी कंपनियों के लिये रास्ते कैसे खुलेंगे? इन्हीं तरीकों से मण्डी व्यवस्था को कमजोर किया गया है और निजी कम्पनियों के लिये माहौल बनाया गया है.

आज मध्यप्रदेश में तीन कम्पनियों ने 30 प्रतिशत बाजार पर कब्जा जमा लिया है और अब सरकार धीरे-धीरे मण्डी व्यवस्था को खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है. आईटीसी या कारगिल किसानों को थोड़ा सम्मान इसलिये देती है क्योंकि उन्हें पता है कि किसानों के पास कृषि उपज मण्डी का विकल्प मौजूद है. जैसे ही यह विकल्प खत्म होगा या अप्रभावी होगा; वैसे ही इन कम्पनियों के काटने वाले दांत नजर आने शुरू हो जायेंगे.

हमने अपनी सरकार से यह सवाल कभी क्यों नहीं पूछा कि आखिर खेती में विदेशी निवेश की जरूरत क्यों है! सरकार ने पिछले 10 वर्षों में कर्ज़ और बीमा आधारित ऐसी तकनीकें अपनाई हैं, जिनसे किसान कंपनियों का बंधुआ बन गया है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Rajinder Kaushal Canada [ dr,rk.solan@gmail.com] house no.4649 North view Court burnaby bc canada - 2011-09-04 06:35:31

 
  I read your article about farming and condition of farmers which is very touching and useful I am here these days and enjoying the country environment with my son and his family and will return to India in December 2011 and will talk to you. your mediation remains useful. 
   
 

Radha [radhavin2006@gmail.com] delhi - 2011-05-05 09:44:40

 
  बहुत ही अच्छा लेख है, सरकार प्राईवेट कंपनियों की गुलाम हो गई है. 
   
 

dr.rajesh kapoor [dr.rk.solan@gmail.com] - 2011-04-24 15:02:15

 
  मर्मस्पर्शी आलेख. साधुवाद. 
   
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