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विकास की आंधी में जशपुर के आदिवासी

मुद्दा

 

विकास की आंधी में जशपुर के आदिवासी

सुनील शर्मा जशपुर से लौटकर


जशपुर में ईब नदी के किनारे बसे आदिवासी जानते हैं कि अबकी बार इनका सामना चारे की तलाश में भटकते मतवाले हाथियों से नहीं बल्कि औद्योगिक विकास की एक ऐसी अंधी बयार से है जो उन्हें, उनकी संस्कृति और उनका अस्तित्व भी चौपट कर सकता है. गुल्लु में बनने वाले हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट से बिजली कब पैदा होगी यह तो नहीं मालूम लेकिन आदिवासियों के जीवन में अभी से अंधेरा छाने लगा है. छत्तीसगढ़ हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्राइवेट लिमिटेड ने इन्हें जमीन अधिग्रहण का नोटिस क्या भेजा, जैसे इनके रातों की नींद ही लूट ली.

जशपुर के आदिवासी


"ऊपर गुल्लु, मतलुंगा, अलोरी डूबेगा तो क्या हम बचेंगे साहब, हम भी डूबेंगे और खेती-बाड़ी की जमीन भी. हमें तो मुआवजा तो दूर नोटिस देना भी जरूरी नहीं समझा गया, हमारी जमीन ली भी जा रही है और कहा भी नहीं जा रहा है कि तुम लोगों की जमीन ले रहे हैं, जैसे यह कोई निर्जन जगह हो, जहां कोई घर नहीं हो, कोई आदमी नहीं हो."

ओरकेला के पटेल (गाँव के मुखिया) भौंचक्के हैं कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है. असल में छत्तीसगढ़ हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्राइवेट लिमिटेड इलाके में बांध बना रही है और कंपनी का दावा है कि इससे केवल 4 गांव प्रभावित होंगे. लेकिन इस बेशर्म झूठ की हकीकत ये है कि कंपनी जो बांध बना रही है, उसमें बांध प्रवाह के दोनों छोर के चार गांवों को तो डूब का इलाका मान रही है और इन गांवों के कुल 38 परिवारों को मुआवजा भी दे रही है लेकिन इन चार गांवों के बीच के गांव, जो अनिवार्य रुप से डूबेंगे, उन गांव के लोगों को मुआवजा कौन कहे, कंपनी ने आज तक नोटिस तक नहीं दी है.

ओरकेला के पटेल पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन वह अपने खिलाफ हो रहे अन्याय को अच्छी तरह समझते हैं और किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं छोडऩा चाहते. वह कहते हैं- “यह कहां का न्याय है? खेती-बाड़ी की जमीन पानी में डूब जायेगी तो हम खायेंगे क्या? घर डूबेगा तो रहेंगे कहां ? क्या इसकी चिंता सरकार को है. उसे तो बस आदिवासियों की जमीन चाहिये. पर चिंता मत करिये न सांप मरेगा और न लाठी टूटेगी, न हम जमीन खाली करेंगे और न पावर प्लांट बनने देंगे.’’

पटेल की तरह ही नीचे गुल्लु, मतलुंगा और अलोरी के आदिवासी भी अपनी जमीन किसी भी कीमत पर नहीं देना चाहते. उनका कहना है कि वे यहां से कहीं नहीं जायेंगे, भले ही ईब नदी उन्हें डूबा ही क्यों न दे.

जशुपरनगर से सन्ना रोड पर बाई ओर दुर्गम इलाके में ईब नदी के किनारे बसे ये गांव मनोरा तहसील में आते हैं. इनमें ज्यादातर उरांव जनजाति के लोग रहते हैं, जबकि कुछ कोरवा मांझी परिवार भी इन गांवों में कई पीढिय़ों से रहते आ रहे हैं. इस पूरे इलाके में आदिवासी सघनता से बसे हुए है. जिले में मनोरा ही एकमात्र ऐसी तहसील है, जहाँ अन्य तहसीलों की अपेक्षा सबसे अधिक 79.60 प्रतिशत आदिवासी रहते हैं.

इलाके में रहने वाले इन आदिवासियों के लिये इलाके का जंगल ही इनकी अपनी दुनिया है. जंगल पर इनकी निर्भरता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि नमक, साबून और तेल के अलावा किसी भी खाद्य सामग्री के लिये इन्हें बाजार का मुंह नहीं देखना पड़ता. गांव के एक बुजुर्ग अपनी भाषा में बताते हैं-“हमारी उत्पत्ति और पालन में दो ही तत्वों का महत्व है, पहला प्रकृति और दूसरा पितर.”

लेकिन इन दोनों पर अब खतरा मंडरा रहा है. हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्लांट बनने के बाद इनके जीवन में एक ऐसा बदलाव आयेगा जो इनके प्रकृति और पितर के संबंधों को पूरी तरह खत्म कर देगा. गुल्लु के पास ईब नदी को बांध कर विद्युत उत्पादन करने वाली योजना कामयाब हुई तो छत्तीसगढ़ के सरप्लस बिजली उत्पादन में 24 मेगावाट का इजाफा हो जायेगा लेकिन इसकी कीमत आदिवासी किस तरह चुकायेंगे इसका अंदाजा कोई नहीं लगाना चाहता.

गुल्लु में प्रस्तावित 24 मेगावाट क्षमता के हाइड्रोइलेक्टिक पावर प्लांट के मूर्त रूप लेने से गुल्लु से लेकर सन्ना तक करीब 30 किमी नदी के किनारे बसे गांव और जमीन हमेशा के लिये डूब जायेंगे. ईब के पानी में आदिवासियों के घरों के साथ ही उनकी खेती-बाड़ी की जमीन और उनकी संस्कृति भी जलमग्न हो जायेगी. नदी के दूसरी ओर का बादलखोल अभयारण भी इस डूब से प्रभावित होगा.

हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्लांट के लिये वैसे तो चार गांव की जमीन लेने की बात कहीं जा रही है. पर वास्तव में इसके लिये तकरीबन 381 वर्ग किमी जमीन अधिग्रहित होगी. इसमें 3.299 हेक्टेयर शासकीय, 24.867 हेक्टेयर निजी और 5.105 हेक्टेयर वन भूमि शामिल है. 131 करोड़ की लागत वाले इस पावर प्लांट के बनने से इस इलाके के 22 गांवों में रहने वाले 1476 परिवारों के 9471 आदिवासी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे. संरक्षित वन के भीतर रहने वाले दुर्लभ जीव-जंतु बिजली बनाने के इस उपक्रम की भेंट चढ़ेंगे वह अलग.

आमतौर पर शांत रहने वाले इन गांवों में कंपनी, जनप्रतिनिधि और सरकार के खिलाफ उठ रही विरोधी आवाजों को साफ तौर पर सुना जा सकता है. पेशा एक्ट, वन अधिकार अधिनियम, पांचवीं अनुसूची का पालन तो यहां नहीं हो रहा है पर आदिवासियों पर उनकी जमीन देने दबाव जरूर डाला जा रहा है.

जमीन अधिग्रहण के लिये अलोरी, डूमरटोली, गुल्लु और झरगांव के 38 ग्रामीणों को कंपनी ने नोटिस भिजवायी. आदिवासी शांतिपूर्ण ढंग से अपना जीवन बिता रहे थे लेकिन कंपनी से मिले नोटिस ने उनके रातों की नींद और दिन का चैन छिन लिया. वह दिन भी करीब आ गया जब ग्राम सभा की बैठक होनी थी. इस दिन के बाद उनके जीवन में एक ऐसा बदलाव आया जिसने उनके भीतर डर, आक्रोश, विरोध और घृणा को जन्म दिया. 26 मार्च 2007 को ग्राम डूमरटोली में विशेष ग्राम सभा आयोजित हुई जिसका विषय था छत्तीसगढ़ हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्राइवेट लिमिटेड के लिये आदिवासियों की जमीन का भू-अर्जन. इसके लिये पहले से ही अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित करने के साथ ही गांव में इसकी जानकारी दे दी गई थी.

यह एक ऐसी ग्राम सभा थी, जिसके खत्म होते ही इस पूरे इलाके की शांति छिन गई. दोपहर बारह बजे शुरू हुई इस ग्राम सभा में कलेक्टर, एसडीएम, जिला पंचायत अध्यक्ष, जनपद पंचायत अध्यक्ष, सरपंच और सचिव सहित डेढ़ दर्जन अधिकारी मौजूद थे ग्राम सभा की शुरूवात एसडीएम ने की. उन्होंने औपचारिकतावश पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों, ग्रामसभा में पेशा एक्ट की भूमिका के बारे में बताया. पर बकौल ग्रामीण-साहब के जानकारी देने का अंदाज और इस्तेमाल किये गये वाक्य काफी मशीनी थे, जिसे समझना अनपढ़ आदिवासियों के लिये असंभव था. ग्राम सभा के आयोजन के संदर्भ पर कलेक्टर ने प्रकाश डाला.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Vikas Chaubey [newscg@gmail.com] Bilaspur - 2011-12-23 14:27:28

 
  यह रिपोर्ट उल्लेखनीय है. आपको बहुत बधाई कि आपने इस विस्तार से पूरे मुद्दे को उठाया. 
   
 

nand kumar [nand.kashyap@yahoo.com] bilaspur - 2011-08-15 04:27:51

 
  ये रिपोर्ट मानवीय संवेदनाओं को जागृत करेगी और आपके साथ लोग जुड़ेंगे. लेख बहुत अच्छा लगा. 
   
 

Deepak singh [deepak.singhbgh@gmail.com] bagicha (jashpur) - 2011-07-03 07:21:13

 
  बिल्कुल सही कह रहे हैं आप. सरकार का रव्वैया तो हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और जैसा है. 
   
 

sri pradeep [pradeeptsharma@rediffmail.com] BILASPUR - 2011-05-25 14:54:30

 
  बहुत बढ़िया सुनील ,
मस्तपैकी रिपोर्ट आहे
 
   
 

kamlesh sharma [kamlesh.varisth@gmail.com] bilaspur - 2011-05-24 16:44:31

 
  अमीर धरती को गरीब बनाने का काम हो रहा है.  
   
 

durwesh [vichar2000@gmail.com] bhopal - 2011-05-24 09:08:46

 
  यह सच है कि किसान और आदिवासियों का जीवन जल,जंगल और जमीन के बिना मुश्किल है. प्रदेश मे उर्जा संक्ट को दूर करने के लिये थर्मल, हाइड्रो और न्यूकिलियर पावर प्लांट के कई प्रस्ताव पास हो चुके है. हम बहुत कुछ कर सकते हैं अगर हम इनके साथ हो जाये तो यह अकेले और कमजोर नही रहेगे. अगर हम अब भी नींद से नही जागे तो इन्हें बरबाद होने से कोई नही रोक पायेगा. और अगर ये बरबाद हो गये तो आप भी आबाद केसे रहा पाओगे क्योंकि आज इनकी तो कल आप की बारी है. 
   
 

guru saran lal [gurusaranlal@gmail.com] bilaspur - 2011-05-09 15:27:12

 
  बहुत ही अच्छी सामग्री है. ये असल में आदिवासियों और औद्योगिकरण की लड़ाई है. आपने लिखा है-...सीधी सी बात लोगों की समझ में क्यों नहीं आती कि आदिवासियों का जीवन जल,जंगल और जमीन के बिना मुश्किल है. उनका विस्थापन उचित नहीं है. ये सामुदायिक जीवन जीते हैं, आदिवासियों की संस्कृति वहीं फल-फूल सकती है जहां वे मूलत: निवास करते हैं.’’ वाकई क्या जमीन और जंगल के बिना ये आदिवासी जिंदा रह पाएंगे ? 
   
 

ram bahadur singh [gopi@g11.com] delhi - 2011-05-08 19:15:13

 
  सर, क्या आपको लगता है कि हम कुछ कर सकते हैं ? अगर हां, तो कृपया हमें बतायें. 
   
 

ABDUL ASLAM [aslametvnewskorba@rediffmail.com] KORBA - 2011-05-07 15:58:56

 
  सुनील जी, आपकी लेखनी का मैं हमेशा से कायल रहा हूं. जशपुर की रिपोर्ट वास्तव में छत्तीसगढ़ की असली तस्वीर दिखाता है, जहां विकास के नाम पर आदिवासी सरकार के निशाने पर है. आखिर ऐसे विकास का क्या लाभ, जहां लोगों को अपनी ज़मीन से ही हटना पड़े. हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट के लिये सरकार अगर उन्हें उनकी ज़मीन से बेदखल करती है तो वे आखिर क्या करें ? जब सारे कानून सत्ता के पक्ष में हों तो वे हिंसक होंगे ही. इससे बचना जरुरी है. एक अच्छी रिपोर्ट के लिये फिर से बधाई. 
   
 

Satyaprakash [satyapandey4@gmail.com] India - 2011-04-28 13:16:18

 
  अच्छी रिपोर्टिंग. कांक्रिट के जंगलों में संस्कृति और सभ्यता दोनों दफन हो जायेगी. 
   
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