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कांग्रेस का दिग्विजय विचार

बात पते की

 

कांग्रेस का दिग्विजय विचार

कनक तिवारी


कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह इन दिनों बहुत मुखर और प्रखर हैं. ऐसा लगता है कि संगठन के केन्द्रीय नेतृत्व में उनके अतिरिक्त अब कोई नेता सक्रिय ही नहीं है. दिग्विजय आजमगढ़ में अल्पसंख्यकों के मुकदमों के सिलसिले में न्याय युद्ध करने का चोला ओढ़ लेते हैं. संघ परिवार को अभियुक्त बनाने के लिए वे शहीद इंस्पेक्टर शहीद हेमन्त करकरे से अपनी निकटता और वार्तालाप छिपाते नहीं हैं. ‘भगवा आतंकवाद’ जैसा रंगीन शब्द गढ़कर वे उस पर तिरंगे झंडे की वरीयता को चस्पा करना चाहते हैं. संघ परिवार के सदस्यों पर मानहानि का मुकदमा करने में भी उन्हें गुरेज नहीं है. दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों और वकीलों की धमकी से वे नहीं डरने का ऐलान करते हैं.

दिग्विजय सिंह


कांग्रेस में दिग्विजय सिंह राहुल गांधी के भविष्य के प्रस्तोता की तरह प्रस्तुत हो गए हैं. कांग्रेस के दफ्तर में उनके पास ही सबसे ज्यादा भीड़ होती है. उनके ठहाके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को अट्टहास की बर्छी की तरह लगते हैं. मध्यप्रदेश की राजनीति में अपने गुरु अर्जुनसिंह सहित शुक्ल बंधुओं, मोतीलाल वोरा, माधवराव सिंधिया और कमलनाथ वगैरह से दिग्विजय को कभी खौफ नहीं हुआ. उन्होंने आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी लगातार पैठ बनाए रखी.

उद्योगपतियों और पूंजीपतियों पर दिग्विजय की मेहरबानी बहुतों को पता नहीं होगी. उन पर भ्रष्टाचार के मुकदमे भी कायम हैं. सुविधानुसार वे अपने छोटे भाई को भाजपा में आयात निर्यात करते रहते हैं. राघोगढ़ के मध्यभारत के इलाके में नेतृत्व अब तक उनके सामंतवादी परिवार के पास ही है. उनके लिए लोकतंत्र का यही सच्चा अर्थ है.

हाल की राजनीति में दिग्विजय सिंह की जन लोकपाल अधिनियम का प्रारूप बनाने वाली समिति के सिविल सोसायटी के पांच सदस्यों से बदमजगी दिखी है. अन्ना हजारे, शांति भूषण, प्रशांत भूषण और संतोष हेगड़े पर उनके तरह-तरह के अस्त्र चल चुके हैं. आगे अरविन्द केजरीवाल का ही श्रेय होगा कि कांग्रेस का यह नया महाबली उन्हें भी अपनी वाचाल कांख में दबाकर ले उड़ेगा. अच्छा हुआ स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी और मेधा पाटकर जैसे लोग प्रारूप समिति में नहीं आए. स्वामी रामदेव की खोज खबर तो दिग्विजय सिंह पहले से ही ले चुके हैं.

एक चतुर शिकारी की तरह कांग्रेस के सबसे चपल और वाचाल नेता ने बूढ़े वकील शांति भूषण पर यकबयक शाब्दिक हमला कर दिया. मीडिया के चहेते दिग्विजय का तीर सही निशाने पर बैठा. दिग्विजय जानते थे और शांति भूषण भूल गए थे कि वकील गवाहों से तो अच्छी जिरह कर सकता है, लेकिन जब उससे प्रतिपरीक्षण किया जाए तो वह मुल्जिम बयान की तरह बोलने लगता है.

शांति भूषण पर फिलहाल कुल जमा तीन आरोप हैं (1) इलाहाबाद में जो भूमि और मकान उन्होंने खरीदा है, उसमें स्टांप शुल्क लागू नियम के विपरीत कम दिया गया है. (2) एक विवादास्पद और बहुल संस्करण की सीडी में शांति भूषण को भारतीय राजनीति के बहुचर्चित नेता अमर सिंह के साथ बैठकर उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश का नाम लेकर काम करा देने जैसी पेशकश सव्यय कराने का कथित उल्लेख है. (3) उत्तरप्रदेश के नोएडा में शांति भूषण और उनके वकील बेटे जयंत भूषण को मायावती सरकार से सरकारी योजना के तहत बहुत सस्ती दरों पर फॉर्म हाउस के लिए भूखंड मिला है.

अभी यह निश्चित नहीं है कि कांग्रेस के सबसे चपल धनुर्धर के तरकश में और भी तीर होंगे या नहीं. स्टांप शुल्क की कमी अधिनियम के तहत एक तकनीकी मामला है. ऐसे तकनीकी कर अपवंचन को दिग्विजय की भाषा में चोरी नहीं कहा जा सकता. मुनासिब स्टांप शुल्क नहीं देने वाले के बराबर नहीं लेने वाले का भी उत्तरदायित्व बनता है. यह मामला इसलिए बहुत तूल देने लायक नहीं है. अधिकतम इस मामले की सक्षम अधिकारियों द्वारा जांच की जानी चाहिए-ऐसी मांग मुनासिब लग सकती थी.

विवादास्पद सीडी में निजी प्रयोगशाला की राय है कि उसमें छेड़छाड़ की गई है और सरकारी प्रयोगशाला के अनुसार नहीं. जब तक इस प्रकरण का निराकरण वैज्ञानिक और कानूनी आधारों पर नहीं हो जाता, तब तक शांति भूषण को प्रारूप समिति से अलग रखने की दिग्विजय की मांग नैतिक जरूर हो सकती है, यदि भारत की विधायिकाओं से उन सभी सदस्यों के इस्तीफे लिए जाएं जिन पर अपराध करने के आरोप हैं लेकिन प्रकरण लंबित हैं. क्रांति तो होनी चाहिए लेकिन पड़ोसी के घर से-ऐसा दिग्विजय सिंह का अव्यक्त संदेश है.

यदि सीडी असल सिद्ध हो जाए तो शांति भूषण के दंडित होने की भी संभावना होगी. लेकिन केवल सरकारी प्रयोगशाला की रिपोर्ट के आधार पर हड़बड़ी में निष्कर्ष पर पहुंचना भी उचित नहीं होगा क्योंकि दिल्ली और केन्द्र में कांग्रेस की ही तो सरकारें हैं.

नोएडा का भूखंड प्रकरण निस्संदेह गंभीर है. यह सही है कि शांति भूषण परिवार ने विवेकाधीन कोटे के तहत आवेदन नहीं किया था. यह भी उतना सही है कि उन्हें मालूम था कि भूखंड उन्हें बिना किसी सार्वजनिक प्रक्रिया के सरकार द्वारा दे दिए गए हैं. इस वकील परिवार ने अदालतों में सैकड़ों ऐसे मुकदमे लड़े होंगे, जिनमें उन्होंने खुद कहा होगा कि सरकारी संपत्तियां बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के आवंटित नहीं होनी चाहिए.

शांति भूषण का यह तर्क खारिज कर देने लायक है कि उन्हें प्रक्रिया के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई थी. भूखंड आवंटित होने की सूचना मिलने पर उन्होंने अग्रिम राशि क्यों जमा की? उन्हें बिना किसी जांच या जानकारी के भूखंड तो चाहिए था. उनका यह तर्क भी बेमानी है कि यदि कोई अन्य व्यक्ति आपत्ति करे तो वे ऐतराज नहीं करेंगे, भले ही आवंटन निरस्त हो जाए. लेकिन खुद होकर ऐतराज नहीं करेंगे. एक अरबपति वकील परिवार के लिए भूमि का इतना मोह वांछनीय नहीं है. यदि ऐसा दिग्विजय कहते हैं तो गलत क्या है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi Himachal Pradesh - 2011-04-27 02:15:54

 
  इस तरह के वैचारिक संघर्ष से लोकतंत्र में असहमति को मान मिलेगा और प्रतिरोध के हथियार के तौर पर हिंसा को नाकारा जायेगा. इस से राजनीतिक भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लग सकता है जो आपस में गाली गलौज पर उतर आतें हैं. भ्रष्ट नेताओं के चिकने चेहरों के पीछे की कालिख जगजाहिर करके ही राजनीतिक भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है. कनक तिवारी को जनपक्षीय पत्रिकारिता के लिए साधुवाद. 
   
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