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उधार के आन्दोलन से इन्कलाब
बहस
उधार के आन्दोलन से इन्कलाब
समर
ख़ुमैनी को वापस ला कर
मुल्लाओं के हवाले कर देना, लगता है हम बुद्धिजीवियों और इंकलाबियों का कुल जमा काम
इतना ही था.
-अबुल हसन बानी सद्र, इस्लामिक क्रान्ति के बाद ईरान के पहले
'निर्वाचित' (फिर 'निर्वासित') राष्ट्रपति.
1 फरवरी 1979 के उस खुश्क दिन तेहरान एअरपोर्ट पर उतरते हुए बानी सद्र दोहरी खुशी
से लबालब थे. न केवल वह बरसों बाद अपने 'वतन' लौट रहे थे, बल्कि इस वापसी में उनके
साथ ईरान की बर्बर पहलवी शाह तानाशाही को उखाड़ फेंकने वाले 'आंदोलन' के एक
महत्वपूर्ण नेता होने का गौरव भी शामिल था. यह और बात है कि यह खुशी देर तक नहीं
टिकी.
आलम यह था कि एअरपोर्ट से लेकर शहर तक उमड़ती 50 लाख से ज्यादा की भीड़ भी उनको
उत्साह नहीं दिला पा रही थी. वह बदलाव का जूनून देख पा रहे थे, पर इस बदलाव को लाने
वालों की सफ़ेद और काली इस्लामिक पगड़ियां उन्हें और साफ़-साफ़ नजर आ रही थी. उन्होंने
जीवन भर एक वामपक्षीय लोकतान्त्रिक (भारतीय अर्थों में नहीं, वरन यूरोप और ख़ास तौर
पर फ्रांस में प्रचलित 'सेंटर-लेफ्ट' वाले अर्थों में) राजनीति की थी. ईरान की
तानाशाही के खिलाफ आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 'वैधता' (लेजिटिमेसी) और
समर्थन दोनों दिलाने में इस राजनीति की बड़ी भूमिका थी. इस राजनीति ने घरेलू स्तर पर
भी एक साझा संघर्ष खड़ा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी, एक ऐसा संघर्ष जहाँ
कम्युनिस्ट क्रांतिकारी, उदार लोकतंत्रवादी और इस्लामिक क्रान्ति समर्थक कंधे से
कंधे मिला कर लड़ रहे थे कि 'बदलाव' का सपना हकीकत में तब्दील कर सकें.
उस आंदोलन में, उसके समर्थन में भी एक अतिरेक था. उस अतिरेक में कुछ लोगों ने अपनी
आंखें बंद कर लीं थीं, हवाओं में साफ़ नजर आते संकेत पढ़ने से इनकार कर दिया था. वह
'जनता' के साथ थे, यह जाने बिना कि जनता कौन है, कहां है और किसके साथ है.
उन्होंने जनता की "नुमाइंदगी" का दावा कर रहे (ध्यान दें नुमाइंदगी नहीं, सिर्फ
दावा) कर रहे मुल्लाओं को 'जनता' मान लिया था. उसके परिणाम भी सामने आये, वह भी
बहुत जल्दी. सत्ता पर धीरे-धीरे इस 'जनता' का कब्जा हो गया और बावजूद इस तथ्य के कि
बानी सद्र इस्लामिक क्रान्ति के बाद राष्ट्रपति पद के लिए 1980 में हुए पहले चुनाव
न सिर्फ जीते, बल्कि 76 प्रतिशत वोटों के साथ जीते थे. 1981 में उन्हें पदच्युत कर
दिया गया. इसके पहले कि आप यह सोचें कि यह एक व्यक्ति का पराभव था, यह जानना शायद
बेहतर होगा कि इसी के साथ ईरान में 'इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी' को छोड़ कर प्रमुख
विरोधी पार्टयों पीपुल्स मुजाहिदीन, फदाइन खल्क़ और तुदेह सहित सभी पार्टियों को
'गैरकानूनी' घोषित कर उनके नेताओं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. उम्मीद है
कि उसके बाद का ईरान का इतिहास, उसकी इस्लामिक क्रान्ति का इतिहास हम तमाम लोग
जानते ही होंगे. यह भी कि इस इतिहास में उस क्रांति के बाद किसी किस्म के विरोध की
कोई जगह नहीं बची, न किसी किस्म के लोकतंत्रवादियों (उदार या सामाजिक) के लिए न
कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के लिए. यह भी कि उसके बाद का इतिहास ईरान में लोकतंत्र
की पुनर्स्थापना के लिए लड़ रहे लाखों लोगों की शहादत का इतिहास है.
यह इतिहास सिर्फ ईरान का इतिहास नहीं है. आप चाहें तो ईराक की बाथिस्ट क्रान्ति को
याद कर सकते हैं. यह भी कि उसमें कितने लोकतंत्रवादी और वामपंथी साथियों को जान
गंवानी पडी. याद तो खैर इंडोनेशिया को भी किया जा सकता है. कहीं गलती से भी लगने
लगे कि बात सिर्फ इस्लामिक देशों की हो रही है, तो बेहतर होगा इंडोचाइना (याद हो कि
न याद हो, 60-70 के दशक तक उस पूरे इलाके को कहा यही जाता था) का इतिहास याद करना.
और उससे भी ऊपर नाजीवाद और फासीवाद का उभार याद करना.
यह दोनों आंदोलन बहुमत के आंदोलन नहीं थे. इन दोनों आंदोलनों का इतिहास दुश्मन
गढ़ने, उसे नेस्तनाबूद करने और फिर नया दुश्मन गढ़ने का इतिहास है. (याद करें पेस्टर
मार्टिन निमोलर की वह कविता- पहले वह यहूदियों के लिए आए, मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था...) यह भी कि अलग-अलग वक्त में इटली और जर्मनी की वाम से
लेकर लोकतांत्रिक तक, तमाम राजनैतिक पार्टियां इन अल्पमत वाले दलों को समर्थन देती
रही थीं. तब भी बहाना यही था- जनता के साथ, जन संघर्षों के साथ खड़े होने का. तब भी
झूठ यही था, जनता के प्रभु वर्ग के एक छोटे-से हिस्से को "जनता" बना देने का.
आप देखना चाहें तो बहुत साफ़ देख सकते हैं कि इन तमाम आंदोलनों (आप उन्हें आंदोलन कह
सकें तो) में समाज का सबसे धनी हिस्सा हमेशा इनके साथ था. इनके प्रतिपक्ष होने के
समय भी, इनके धीरे-धीरे जनता की आवाज हड़प "जनता" बनते जाने के दौर में भी और फिर
इनके सत्ता पर कब्जा करने में सफल होते समय भी. आप ध्यान दीजिये, चाहे नाजी जर्मनी
हो, फासीवादी इटली या इस्लामी ईरान, इन तीनों प्रतिक्रान्तियों के साथ इन मुल्कों
के पूंजीपति, कार्पोरेट और इनके मध्यवर्ग का सबसे धनी हिस्सा पूरी ताकत से खड़ा था.
फिर शायद यह भी दिखेगा कि यह मध्यवर्ग 'राष्ट्र का मध्यवर्ग' नहीं था, बल्कि केवल
और केवल राष्ट्र के बहुमत वाले धर्म का मध्यवर्ग था. यह सभी प्रतिक्रान्तियां
इतिहास की तार्किकता का नकार थीं, हैं. और अब सबसे जरूरी बात, कि ये सारे
प्रतिक्रियावादी आंदोलन अपने-अपने मसीहा के साथ आए थे.
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ये तब आये थे, जब जनता का एक बड़ा हिस्सा अलग-अलग वजहों से परेशान था और इन्होंने
अपने मसीहाओं के सहारे यह यकीन दिला दिया था कि इनके वाले हिस्से की परेशानी 'सबसे
बड़ी' और 'असली वाली' परेशानी है. इससे भी ऊपर, इन सारी प्रतिक्रान्तियों के मसीहा
राजनीति से और लोकतंत्र से नफ़रत करते थे और इनका पहला हमला लोकतंत्र के सबसे जरूरी
प्रतीकचिन्हों पर ही होता था.
दुखद पर सच है कि ऐसे हर हमले में हमारे कुछ साथी अपनी तमाम सदिच्छाओं और ईमानदारी
के बावजूद इन मसीहाओं के समर्थन में नारे लगाते हुए, उन्हें वैधता देते हुए मिलते
हैं. वे भूल जाते हैं कि विश्वास और स्वतःस्फूर्तता की राजनीति दक्षिणपंथ का विशेष
गुण है, जिसके सहारे वह तमाम मतभेदों और प्रतिरोधों से निपटता रहा है. वह आंदोलन,
क्रान्ति, जनता, नेतृत्व आदि बुनियादी शब्दों की समझदारी भूल उसी दक्षिणपंथी
व्यवस्था के ध्वजवाहक होने की भूमिका में आ जाते हैं, जिसका वह कम से कम कथन के
स्तर पर हमेशा विरोध करते रहे हैं. वे भूल जाते हैं कि आंदोलन अपना नेता खुद पैदा
करता है, नेता या मसीहा आंदोलन पैदा नहीं करते. उन्हें याद नहीं रहता कि चाहे गांधी
हों या लेनिन, मार्टिन लूथर किंग हो या नेल्सन मंडेला, ये सभी प्रतिरोध की एक लम्बी
परम्परा में सक्रिय भागीदारी निभा कर तपते हैं, निकलते हैं और यह भी कि इनमें से हर
एक 'नेता' के साथ लोकतांत्रिक ढंग से उपजा हुआ नेतृत्व होता है. फिर चाहे गांधी के
साथ नेहरू हों या उनके बरक्स भगत सिंह, फिर चाहे लेनिन के साथ त्रॉत्स्की हों, या
माओ के बरअक्स च्यांग काई शेक. ये सारे लोग संघर्षों की तपिश से पैदा हुए लोग हैं.
या फिर, हमारे ही दौर की छाती पर गड़े इरोम शर्मिला नाम के दर्द को देखिए. इरोम किसी
आंदोलन को पैदा करने वाली नेता नहीं हैं. वे मणिपुर में भारतीय राज्य के दमन के
खिलाफ चल रहे जनसंघर्षों की पैदाइश हैं, उसकी तपिश में चमकता एक शांत, पर
क्रांतिकारी नेतृत्व हैं. हद तो तब होती है जब 'क्रांतिकारी' इतिहास वाले
बुद्धिजीवी अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों की तुलना इरोम
शर्मिला के आंदोलन से करते हुए इरोम शर्मिला के आंदोलन को भी सिविल सोसाइटी का
आंदोलन बताने की हास्यास्पद कोशिश करते हैं.
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इस आंदोलन के चारणों को यह भी बताना होगा कि उनकी 'जनता' की परिभाषा क्या है? |
इरोम शर्मिला का आंदोलन सिविल सोसाइटी का आंदोलन न है, न हो सकता है. यह उस आंदोलन
का एक हिस्सा है, जिसमें मणिपुर की मांओं को असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने
निर्वस्त्र प्रदर्शन करना पड़ा था. यह उस आंदोलन का हिस्सा है, जिसने अपने गुस्से
की परिणति में मणिपुर विधानसभा को जला कर ख़ाक कर दिया था. यह वह आंदोलन है, जिसकी
कीमत संजीत, रुबीना और मनोरमा जैसे इसी देश के हज़ारों नागरिकों को अपनी जान गंवा के
चुकानी पडी है. जरा बताइए कि सिविल सोसाइटी यानी 'नागरिक समाज' की भारी भागीदारी
वाले इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को ऐसी कौन-सी कुर्बानियां देनी पडी़ हैं,
राज्यसत्ता का कौन-सा दमन झेलना पड़ा है. इरोम पर सांस भी न लेने वाली यही
राज्यसत्ता है, जो अन्ना हजारे का अनशन शुरू होने के पहले ही बिछ-बिछ जाना शुरू कर
देती है. देखना चाहें तो साफ़-साफ़ दीखता है कि राज्यसत्ता के साथ अन्ना के नेतृत्व
वाला 'भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन' खड़ा है, इससे असहमत लोग नहीं.
इरोम के आंदोलन के बरअक्स अन्ना के आंदोलन पर नजर डालिए, आपको साफ़ नजर आएगा की यह
आंदोलन 'जनता' ने नहीं, "नेता" ने पैदा किया है. वरना क्या वजह हो सकती है कि अन्ना
हजारे को छोड़ इस आंदोलन के बाकी सभी "नेता" इसी शहर में कुछ महीने पहले आयोजित बाबा
रामदेव के नेतृत्व वाले स्वाभिमान मंच की रैली में एक साथ आये थे और फिर भी मीडिया
ने उनका नोटिस लेने से लगभग इनकार कर दिया था? क्या वजह है कि इसी मीडिया ने इसी
शहर में तीन लाख मजदूरों की रैली की नकारात्मक रिपोर्टिंग के सिवा कुछ नहीं किया
था? क्या कारण है कि अन्ना से लगायत इस आंदोलन के सामाजिक न्याय विरोधी इतिहास वाले
श्रीश्री रविशंकर और विश्व हिन्दू परिषद् की धर्म संसदों में जाने वाले बाबा रामदेव
के इतिहास पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जेहाद की मुद्रा अपनाए दिख रहे मीडिया ने जबान
खोलना भी गवारा नहीं समझा? आंदोलन के समर्थन में उन्माद की हद तक जाकर इससे असहमत
लोगों को राज्य सत्ता का साथी बता रहे लोगों को इन तमाम मुद्दों पर अपनी राय साफ़
करनी चाहिए, करनी होगी.
मसला सिर्फ इस आंदोलन के हिंदूवादी, ब्राह्मणवादी चरित्र का नहीं है. इस आंदोलन के
चारणों को यह भी बताना होगा कि उनकी 'जनता' की परिभाषा क्या है? इस आंदोलन को साइबर
स्पेस में एक बड़ा भूचाल लाकर मध्यवर्गीय रणबांकुरों को इसके समर्थन में खड़ा करने
वाले समूह 'इण्डिया अगेंस्ट करप्शन' का एक और सच है इसका खांटी ब्राह्मणवादी
चरित्र. यह तथ्य जान कर भी इससे इनकार करने वाले इस आंदोलन के लोकतांत्रिक (?),
मार्क्सवादी (?) बुद्धिजीवियों को क्या यह खबर भी है कि
http://antireservation.com/ नाम की साईट खोलने पर कौन-सी साईट खुलती है?
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उन्होंने यह तथ्य भी जांचा है कि अन्ना आंदोलन के अलम्बरदार 'इण्डिया अगेंस्ट
करप्शन' की साईट और आरक्षण विरोधी एंटी-रिसर्वेशन डॉट कॉम का यूआरएल और पता ही
नहीं, बल्कि इनका मालिकाना और रजिस्ट्रेशन का पता भी एक ही है. क्या इस तथ्य से इस
आंदोलन के मूल चरित्र का कुछ अहसास होता है?
या फिर, सवाल दूसरा बनेगा कि क्या अन्ना के साथ वाले
'मार्क्सवादी'/लोकतंत्रवादी/बहुलतावादी या जाने क्या क्या-क्या वादी समर्थक आरक्षण
के, सामाजिक न्याय के भी खिलाफ हैं? या फिर वह मानते हैं कि इस देश की 'आरक्षण
विरोधी' आबादी ही देश की असली जनता है? और अगर वह यह मानते ही हैं तो उन्हें इस देश
की आरक्षण समर्थक और विरोधी जनता की संख्या के आंकड़े भी ठीक-ठीक पता होंगे. यही वह
जगह भी है, जहां से इस आंदोलन के सिविल सोसाइटी यानी 'नागरिक समाज' वाले नेतृत्व
में दलित, पिछड़े और अन्य तमाम वंचित शोषित तबकों की अनुपस्थिति और उस अनुपस्थिति पर
इसके 'प्रगतिशील बुद्धिजीवी' समर्थकों की चुप्पी बहुत कुछ साफ़ कर देती है. वह
चुप्पी जो तब भी नहीं टूटी, जब इस आंदोलन के नेतृत्वकारी सिविल सोसायटी की जातिवादी
सोच अरविन्द केजरीवाल के उस बयान से साफ़-साफ़ बरस पड़ी कि अगर ड्राफ्टिंग कमेटी में
कोई दलित सदस्य चाहिए तो सरकार अपने किसी मंत्री को 'दलित मंत्री' से बदल ले, वह
अपने खेमे वालों में किसी दलित को शामिल नहीं करेंगे. कथित साफ-सुथरे चेहरे वाले
संतोष हेगड़े ने भी यही कहा।
यहीं से इस आंदोलन के एक और महत्त्पूर्ण पहलू को समझने का रास्ता भी खुलता है कि यह
आंदोलन अपने शुरुआती दौर में जनलोकपाल बिल के इनके ड्राफ्ट पर किसी समझौते को तैयार
क्यों नहीं था. बावजूद इस सवाल के कि ड्राफ्ट जनलोकपाल बिल कार्पोरेटों और एनजीओ को
अपने दायरे से बाहर रख रहा था, उनकी जांच को तैयार नहीं था. क्या इस बात के तार इस
तथ्य से कहीं से जुड़ते हैं कि यह पूरा आंदोलन कॉर्पोरेटों की फंडिंग से चल रहा था
और क्या यही कारण है कि जनलोकपाल बिल कॉर्पोरेटों की जांच को तैयार नहीं है? अब फिर
से एक पुरानी बात पर लौटिए कि इस आंदोलन के पहले इतना भारी कॉरपोरेट समर्थन केवल एक
आंदोलन को मिला है- ओबीसी आरक्षण विरोधी आंदोलन को. और उस आंदोलन के नेतृत्व वाले
तमाम लोग इस आंदोलन के नेताओं और संगठकों की भूमिका में मौजूद हैं. सवाल बनता है कि
इन सारे सवालों, तथ्यों को नजरअंदाज कर इस आंदोलन का समर्थन कर रहे प्रगतिशील
बुद्धिजीवियों की मंशा क्या है, उनका एजेंडा क्या है? यह भी कि उनकी प्रतिबद्धता
किस तरफ है?
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यह सामाजिक न्याय की लड़ाई में हारी गई जमीन को वापस पाने का मनुवादी युद्धघोष है. |
अंतर्विरोध के इस समय में अगर इन बुद्धिजीवियों की प्रतिबद्धता जनता के प्रति होती
तो शायद उन्हें साफ़ दिखता कि यह आंदोलन सिर्फ राजनीति और नौकरशाही को निशाना बना
रहा है. आंदोलन वाले जानें या न जानें, 'प्रगतिशील बुद्धिजीवी' तो जानते ही होंगे
कि भले ही बहुत थोड़ी संख्या में सही, यही दो जगहें हैं जहां दलित/पिछड़ी शोषित
आबादी आ पाई है. इन दोनों जगहों को निशाने पर लेते हुए भी कार्पोरेटों को छोड़ देना
(जहां आपको एक भी दलित शायद कहीं नहीं मिलेगा), फिर से, कुछ तो इशारे करता है. यह
सवर्ण/आभिजात्य वर्ग की फिर से हुंकार है, यह सामाजिक न्याय की लड़ाई में हारी गई
जमीन को वापस पाने का मनुवादी युद्धघोष है. आप देख नहीं पा रहे या देखना नहीं
चाहते? यह भी कि इस युद्ध में अंतिम विजय सुनिश्चित करने के लिए जनलोकपाल बिल
लोकतंत्र के मूल आधार शक्ति विभाजन तक के खिलाफ जाकर सारी शक्ति जनलोकपाल के हाथ
में थमा देना चाहता है.
अन्ना से असहमतों को सत्ता पक्ष के साथ खड़ा बताते हुए ये बुद्धिजीवी क्या खुद से एक
बार भी यह सवाल पूछते हैं कि जनलोकपाल बिल लोकपाल को विधायिका, कार्यपालिका और
न्यायपालिका की शक्ति एक साथ देकर सारी जवाबदेहियों, सारे उत्तरदायित्वों से मुक्त
एक संस्था क्यों खड़ी करना चाहता है? लोकतंत्र की जरा-सी भी समझ वाले को इससे डरना
चाहिए, बशर्ते वह उत्पीड़क वर्ग के साथ न खड़े हों, बशर्ते उन्हें जनता के बहुमत के
सिवा किसी से डर नहीं लगता हो और इसीलिए वह लोकतांत्रिक बहुमत से बच निकलने का
रास्ता न खोज रहे हों.
ऐसे तमाम बुद्धिजीवियों की प्रतिबद्धता की कलई तब और भी ज्यादा खुलने लगती है, जब
हम देखते हैं कि उनका तमाम जोर आंदोलन के बचाव के लिए भावनात्मक तर्क गढ़ने,
साझीदारियां खड़ी करने और आंदोलन से असहमत लोगों की इतिहास-दृष्टि पर सवाल उठाने पर
ही रहता है. उसमें भी वह सुविधाजनक दुश्मन ढूंढ़ने लगते हैं, जैसे कि इस आंदोलन की
जनसंघर्षों में सारी उम्र लगा देने वाले आनंदस्वरूप वर्मा, केएन पणिक्क्र, पी
साईनाथ, हिमांशु कुमार, शबनम हाशमी जैसे साथियों/कॉमरेडों की आलोचना को अनसुना कर
प्रताप भानु मेहता जैसे एकाध बुद्धिजीवी को चुन लेना और उसके तर्कों पर हमला करना.
वैसे वह तब भी यह भूल जाते हैं कि अभी कल तक प्रताप भानु मेहता 'सिविल सोसायटी'
उर्फ़ नागरिक समाज के बड़े समर्थकों/सिद्धांतकारों में थे. वहां भी इनका ध्यान कुछ
जुमले (मसलन इस मामले में 'ब्लैकमेल') चुन कर उसके बहाने आंदोलन की वैचारिकी को
लेकर उठ रहे असहज सवालों को ख़ारिज करने में ही लगा रहता है.
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यहां 'ब्लैकमेल' के सवाल को ही लें, यह मुद्दा हवाओं से नहीं, वरना बाबा साहेब
आंबेडकर के एक प्रसिद्द कथन 'अराजकता के व्याकरण' से उठाया गया है. यह भाषण देते
हुए बाबा साहब साफ़ समझ रहे थे कि सत्ता को, सरकार को ब्लैकमेल करने की ताकत केवल और
केवल प्रभु वर्ग में सामंत वर्ग में है और इसीलिए इस हथियार का फायदा वही उठा
पाएगे. (फिर से देखें, केसीआर चंद्रशेखर राव के अनशन को सरकार 11 दिन में सुन लेती
है, अन्ना को 4 दिन में और इरोम शर्मीला को ग्यारहवें साल में भी नहीं). और भी
देखें, सरकार जिन आंदोलनों से 'ब्लैकमेल' होती है, वह सदैव उच्च वर्ग/जातियों के ही
होते हैं, उनमे कभी शोषित वंचित तबकों की भागीदारी नहीं होती. पर यह 'प्रगतिशील'
बुद्धिजीवी आलोचना के इस पहलू का जवाब नहीं देते, इससे नहीं टकराते. वह सवाल को
आस्था का सवाल बनाते हैं, सपनों का सवाल बनाते हैं और फिर उन सपनो से असहमत लोगों
को दुश्मन बना खारिज कर देने की कोशिश करते हैं.
दिक्कत यह है कि ऐसी कोशिशें उनके विचाराधारात्मक विचलन को साफ़ कर देती हैं. हीगेल,
मार्क्स, मिल और ग्राम्शी आदि के हवाले से नागरिक समाज की शास्त्रीय परिभाषाओं का
'सिर्फ' जिक्र करते हुए जब वे 'विश्व बैंक' की परिभाषाओं की तंग गलियों से निकल
भागते हैं, बिना यह बताए कि मार्क्स और हीगेल दोनों 'सिविल सोसायटी' को उस दौर के
उत्पादन संबंधों में सत्ता के साथ खड़े वर्ग के बतौर चिन्हित करते हैं (मार्क्स के
मुताबिक़ तो हीगेल के यहां 'सिविल सोसायटी' मार्केट मेकेनिज्म से ज्यादा कुछ नहीं
है) तो संदेह होना स्वाभाविक है. यह संदेह तब और बढ़ता है, जब वह इससे भी आगे जाकर
ग्राम्शी द्वारा सिविल सोसायटी को स्टेट (या सत्ता) के भीतरी सुरक्षा उपाय (स्टेट
के बाहरी दीवारों के अन्दर की सुरक्षा नहरें और किले) बताये जाने का जिक्र भी नहीं
करते हुए इसी सिविल सोसायटी को 'अंगीकार' करने की जरूरत पर बल देने लगते हैं. यह तो
खैर कल्पना से भी परे है कि वह सिविल सोसायटी के वर्त्तमान अर्थ को देने वाले जॉर्ज
कोनराड की बात करेंगे, जिनके पर्चे का नाम ही ‘एंटीपोलिटिक्स’ था.
खैर, बेहतर होगा कि वे जानें कि सारी दुनिया में सिविल सोसायटी का चरित्र एक जैसा
है, एक ही जैसे लोगों से मिल कर बना है. आभिजात्य, सेवा क्षेत्रों में काम करने
वाला, अंग्रेजीदां (कुछ देशों में फ्रेंच और कुछ में स्पेनिश भाषा वाले भी)
मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग का हिस्सा. दिलचस्प यह है कि यह राय रॉबर्ट पुटनैम जैसे
सिविल सोसायटी समर्थक सोशल कैपिटल के सिद्धांतकार की भी, और बूरद्यो जैसे समाजवादी
चिन्तक/विचारक की भी. कुल जमा मतलब यह कि सिविल सोसायटी का एक वैश्विक चरित्र है और
ग्राम्शी उसकी ठीक-ठीक पहचान करने में बिल्कुल सफल रहे हैं और जब 'प्रगतिशील
बुद्धिजीवी' ऐसी सिविल सोसायटी को अंगीकार करने की जरूरत पर बल देने लगें तो बहुत
कुछ साफ़-साफ़ दिखने लगता है.
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उधार की जनता के दम पर इन्कलाब नहीं होते, न उधार के तर्कों पर बहसें जीती जाती हैं. |
अन्ना समर्थक इन प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की तर्कपद्धति बहुत कुछ उन आलोचनाओं जैसी
है, जिसे 'वाम कवच' के अंदर रह कर उत्तर आधुनिक 'चिंतकों' ने राज्य सत्ता के
'प्रभुत्त्व' और शक्तियों की आलोचना की आड़ में 'आधुनिकता' और 'वैज्ञानिक
तार्किकता' तक को खारिज करने के लिए इस्तेमाल किया था. अपनी किताब प्रोफेट्स लुकिंग
बैकवार्ड (2003) में मीरा नन्दा ऐसे बुद्धिजीवियों की ठीक-ठीक पहचान करने में सफल
रही थीं, जब उन्होंने लोकतंत्र, आधुनिकता और वैज्ञानिकता का वाम खेमे का-सा दिखने
वाले विरोध का धार्मिक कट्टरपंथों (बहुवचन उन्हीं का है) के प्रसार से रिश्ता
दिखाया था.
अन्ना हजारे के मंच पर विहिप के साधुओं को देखिए, भारतमाता की 'संघी' तस्वीर और
नक्शा देखिए, मंच पर आरक्षण विरोधी धर्मगुरुओं और मंच परे "यूथ फॉर इक्वालिटी" को
"एंटी रिजर्वेशन डॉट कॉम" से "इण्डिया अगेंस्ट करप्शन" में बदलते हुए देखिए, यह
तर्क आपको और बेहतर समझ आएगा. जो समझ नहीं आएगा वह यह, कि ऐसे आंदोलन के समर्थन में
कल तक प्रगतिशील/लोकतांत्रिक खेमे के अलंबरदार रहे लोग क्यों खड़े हैं.
दुनिया का सारा इतिहास स्वतंत्रता की चेतना के बढ़ते जाने का इतिहास है, कहते हुए
हीगेल ने भी शायद ही कभी सोचा होगा कि बीसवीं सदी के कुछ वक्त का इतिहास पीछे भी
जाएगा. इतना पीछे कि माइकल फूको जैसे कुछ दार्शनिक 'राज्यसत्ता के राक्षस' को
ठीक-ठीक समझते हुए भी 'ईरानी क्रान्ति' को आदर्श और 'सबसे बेहतर' बताएंगे, (यह
भूलते हुए, 'या कि यह ही समझते हुए' कि धर्मसत्ता पर आधारित राज्यसत्ता किसी भी दिन
धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता से ज्यादा खतरनाक होगी, कम नहीं.) यह सब कुछ जानते समझते
हुए भी हम किसी को इतिहास से सबक लेने पर मजबूर नहीं कर सकते. उनको तो ख़ास तौर पर
नहीं, जो अपनी वैयक्तिक/सामाजिक असफलताओं की ग्रंथि से पैदा हुई आत्मग्लानि को
'क्षणिक क्रांतियों' में भागीदारी से धोना चाहते हैं.
आखिर में बस यह कि, उधार की जनता के दम पर इन्कलाब नहीं होते, न उधार के तर्कों पर
बहसें जीती जाती हैं. और जो यह कोशिश करते हैं, वे बानी सद्र की गति को प्राप्त
होते हैं.
28.04.2011, 00.17 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | नरेंद्र तोमर [nakutom@yahoo.com] गाजियाबाद,उप्र - 2011-06-05 13:21:16 | | | |
सुधासेन जी ऐसा लगता है कि बामपंथियों पर जबरदस्ती कीचड उछालने के जोश में आप सामान्य ऐतिहासिक तथ्यों को या जानबूझकर अनदेखा कर रही हैं अथवा उनसे वाकिफ नहीं है। बहरहाल आपकी जानकारी के लिए मैं बहुत संक्षेप में आपका ध्यान भारत के पिछले लगभग 65 साल के इतिहास के कुछ तथ्यों का ओर खींचना चाहूंगा: भारत की आजादी के बाद से ही कम्युनिस्टों और सोवियत संघ का अंध विरोध करने के लिए आरएसएस और संघ परिवार का राजनीतिक मुखौटा,जनसंघ अमरीका जैसे घोर साम्राज्यवादी ताकत के हाथों खेलता रहा हैं। दरअसल दुनिया भर में सांप्रदायिक और विश्व साम्राज्यवादी ताकतों के बीच गहरा रिश्ता रहा हैं,जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नव-स्वाधीन देशों के जनतांत्रिक और साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों को तोडने का काम करता रहा है। प्रगतिशील और जनपक्षधर आंदोलनों का विरोध और पूर्व राजा महाराजाओं की हिमायत करते हुए जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी जैसे राजनीतिक दल 20 वीं सदी के सातवें दशक के लगभग मध्य तक बेशर्मी के साथ साम्राज्यवादी अमरीका के हित साधक बने रहे है। इसके विपरीत बामपंथियों ने सदा ही साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ जम कर लडाई लडी है। | | | | | | | | nand [nand.kashyap@yahoo.com] bilaspur - 2011-05-29 04:34:06 | | | |
आलेख गहन विश्लेषण के साथ है. इस सिस्टम में अन्ना के जैसे आन्दोलन प्रायोजित होते ही रहेंगे और अजय जैसों को यही समग्र क्रांति लगेगा. वाम को गाली देने का बहाना चाहिए, बस, उनकी वाणी खुल जाती है. उन्हें सत्ताधारियों द्वारा देश और समाज को गिरवी रख साम्राज्यवाद की गुलामी को मजबूर करना नहीं दीखता. | | | | | | | | अरविंद [] - 2011-05-11 12:25:33 | | | |
अजय जी, मार्क्सवादी होने की घोषणा करना जरूरी नहीं होता। दशा तो यह है कि बहुत सारे लोग प्रगतिशीलता का चोला ओढ़ कर अपना निज निबाहना ही सबसे परम धरम समझते हैं। चलिए, मैं आपके हिंदूवादी होने की घोषणा नहीं करूंगा, किया भी नहीं है। वह तो पता नहीं, आपके भीतर कहां से यह भय समा गया। बहरहाल, थरथराने की जरूरत अभी मुझे महसूस नहीं हो रही।
वाम दलों की भूमिका और भारतीय राजनीति को इतने उथले नजरिए से देखने पर हैरानी नहीं है। आपके मुताबिक, जब ये \"सोनिया माता का पल्लू थामे बैठे थे, इन्हें महंगाई और मजदूरों की पिटाई से कोई वास्ता नहीं था।\" साहब, रविवार डॉट कॉम पर अपनी बात कह रहे हैं। पहले चेक तो कर लेते कि \"सोनिया माता का पल्लू थामे बैठे\" होते हुए भी यूपीए-एक में इनकी भूमिका क्या थी। महंगाई के मसले पर कौन लगातार चिल्लाता रहा या मजदूरों की पिटाई के मसले पर केवल किस पक्ष का विरोध सामने आ रहा था। वे कौन-से कारण थे कि लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि मुख्य विपक्षी दल के रूप में भाजपा के होने के बावजूद विपक्ष के रूप में वाम ही दिखाई देता है। भाजपा को लकवा क्यों मार गया है? जरा विदेश नीतियों से लेकर निवेश के मसले पर इनकी क्या भूमिका रही, या दूसरे जनपक्षीय नीतियों के मसले पर सरकार को समर्थन देने के बावजूद और उदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रश्नों पर इसने कौन-सी भूमिका निभाई, कैसे नाक में दम कर दिया था कि कांग्रेस को उससे मुक्ति एक जरूरत लगने लगी, उसे एक बार याद कर लेते तो यह नौबत न आती। बाकी वाम दलों के धरने और प्रदर्शनों और नीतिगत विरोध और उसका विकल्प पेश करने की \"आदत\" को भी याद रखने की जरूरत नहीं। जहां दुराग्रह हावी होते हैं, वहां कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं। यह सिर्फ आपकी जरूरत नहीं, इस देश के दोनों पक्षों को वाम से मुक्ति की जरूरत लग रही है, ताकि खुला खेल फर्रूखाबादी निर्बाध तरीके से चलाया जा सके। परमाणु मसले पर समर्थन मुद्दे पर समर्थन वापस लेकर आज भी वाम वहीं खड़ा है, जिसे विकीलीक्स ने जरा ज्यादा साफ किया है कि उस दौरान क्या और कैसे खेल खेले गए थे। फूकुशिमा के बाद भी कुछ समझ में आ रहा है या नहीं सर? खैर, परमाणु मसले पर बाहर होने के बाद से यह साफ दिख रहा है और अब बंगाल का किला ढहने के बाद यह रास्ता शायद संपूर्ण मुक्ति मिल जाएगी। अब आप यह जरूर कहेंगे कि बंगाल से क्यों गए। आपके यह कहने पर हैरानी नहीं होगी।
बहरहाल, मीडिया की मेहरबानी किस पर कितनी और किस रूप में रही है, यह समझने के लिए आपको बहुत मेहनत नहीं करनी होगी, जरा कोशिश तो कीजिए सर जी...। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं होगी। मैंने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हूं कि जंतर-मंतर पर दो हजार की भीड़ मीडिया के लिए जनसैलाब हो जाता है और तेईस फरवरी की रैली में आए तीन लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ उसके लिए शहर की परेशानी का सबब होती है। ऐसा क्यों है राजा जी...? तेईस फरवरी की रैली का भी मुद्दा तो भ्रष्टाचार और महंगाई ही था।
वाम का पूरा पक्ष कभी परजीवी नहीं रहा, बल्कि इनके भरोसे जीने वाले पक्ष भले रहे। भारतीय राजनीति में व्यावहारिकता के तकाजे क्या होते हैं, उसे राजनीतिक नजरिए से देखने की जरूरत होती है बाबू साहब...।
रही बात नवीन जिंदल की, तो आप अपनी सीमा में उसका उल्लेख कर रहे हैं। लगभग पूरा हरियाणा उस खापवादी जिंदल के कब्जे में है। नवीन जिंदल जब सालबनी में इस्पात कारखाना लगाने जाता है तो वह अपराधी है, सही है। लेकिन ये तो बताया नहीं आपने कि वही जिंदल जब आपके आंदोलन को पच्चीस लाख रुपए (घोषित) देता है तो धर्मात्मा कैसे हो जाता है? डी-बियर्स के बारे में जो आप सोचते हैं, उससे मैं भी सहमत हूं। लेकिन उसी के समानधर्मा कारपोरेट जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को अपना जोरदार समर्थन देते हैं तो क्या यह आपको अजीब नहीं लगता? 2-जी का उल्लेख आ चुका है। पौने दो लाख में से कितने राजा या कनिमोझी की जेब में गए होंगे? बाकी के तो कारपोरेटों ने ही खाया न सर...। निशाने पर केवल नेता और नौकरशाह क्यों?
नवउदारवादी नीतियों के मसले पर भ्रम ने वाम को पर्याप्त घाव दिए हैं जिसके साथ तालमेल बनाने में शायद उसे लंबा वक्त लगेगा। आप बताइए जरा अगर नवउदारवादी नीतियों का विरोध करने के चक्कर में एक ही देश के किसी खास इलाके में सारे उद्योग-धंधों को उजाड़ दिया जाए या लगने ही न दिया जाए, तो तस्वीर कैसी होगी। खेती और सरकारी नौकरियां कितनों का पेट भर रही हैं, इसे बताने के लिए क्या किसी सीबीआई की रपट चाहिए हमें? वाम के लिए तो अच्छा यह है कि जरा-सा इधर-उधर हुए नहीं कि पचास सवाल सामने हाजिर हो जाते हैं। इससे निपटना भी उसे ही है। लेकिन इस बहाने बाकी दो पक्षों को जिस तरह सवालों से परे मानने की कोशिश हो रही है, उसे समझना क्या इतना मुश्किल है साहब जी। असहजता पैदा करने वाले प्रश्न कई बार त्रिशूल की तरह दिखने लगते हैं। बहरहाल, वाम की बेइमानियों को लोग अगर माफ नहीं करते, तो यही सबसे बड़ी उपलब्धि है। बाकी के चरित्र को बेईमान कहना भी लोगों को अब जरूरी नहीं लगता...। निश्चिंत रहिए। बस थोड़े दिनों की बात है, इस देश से वाम की विदाई के बाद \"सुंदर\" और \"स्वच्छ\" पर्यावरण में सांस लेने का मौका मिलेगा। एक तरफ कांग्रेस, दूसरी तरफ भाजपा- दोनों की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक नीतियां एक...! कोई शक? | | | | | | | | Ajay kumar Kashyap [ajaykumarkashyap@gmail.com] Kanpur - 2011-05-07 12:47:41 | | | |
अरविंद जी, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप खुद को या समर को मार्क्सवादी और मुझे हिंदूवादी घोषित करने की उत्तेजना में इतनी थरथराहट से क्यों भर गये हैं. आपने जो सवाल खड़े किये हैं, उनके जवाब आपको भी पता हैं. हिंदुत्ववादी व्यवस्था की चूलें हिला देने वाले शब्द और उनकी जयजयकार करने वाले आज कहां हैं, यह आपको भी पता है. इनकी धजा उठाकर दौड़ने वाले करात और येचुरी की पार्टियां आज तक भारतीय सत्ता में परजीवी की तरह रही हैं. याद करें, पिछली बार जब ये सोनिया माता का पल्लू थामे बैठे थे. इन्हें महंगाई और मजदूरों की पीटाई से कोई वास्ता नहीं था. उसके लिये गीदड़भभकी भी इन वाम पार्टियों ने नहीं दी लेकिन परमाणु मुद्दे पर रो-धो कर पल्लू छोड़ दिया. लेकिन जिस मुद्दे को उठा कर आपने सरकार से समर्थन वापस लिया था, उस मुद्दे का क्या किया ? देश में उस मुद्दे को लेकर माहौल बनाने की एक भी कोशिश की आपने ? एक रैली, एक धरना, एक बड़ा प्रदर्शन ? नहीं, क्योंकि आपको लगता था कि अंगुली कटा कर आप शहीद हो जाएंगे.
आप जिस मीडिया को कोस रहे हैं, उसी मीडिया के भरोसे छपने वाली विज्ञप्तियों के आक्सीजन पर देश के कई हिस्सों में आपकी पार्टी घर के उस बुजुर्ग की तरह कम से कम सांस ले पा रही है, जिसका मरना तय है. आपकी वामपंथी पार्टी पिछले कई सालों से केवल विज्ञप्तियां ही तो जारी करती आई है.
नवीन जिंदल से पैसे लेने वालों में प्रकाश करात भी शामिल हैं और फारवर्ड ब्लाक भी. आपको शायद पता होगा कि आपके भाई-बंधु कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को पिछले साल जो सम्मान मिला था, उसका प्रायोजक लुटेरा डी-बियर्स कंपनी था, जिसने अफ्रीका से लेकर तीसरी दुनिया के हर देश में नंगा नाच मचा रखा है. तो भैया राजा, थोड़ा आंखें खोलिये.
96 लोगों की कराह का पता तो सिंगुर में भी समझ में आता है और दूसरी जगहों में भी. छत्तीसगढ़ में आपके भाई-बंधु टाटा के खिलाफ हंगामा मचाए हुए हैं और बंगाल में आप उसे गोद में बैठा कर रखे थे. दोहरी बातें, दोहरा चरित्र वाम का इतिहास रहा है और ये हिंदूत्ववादी पार्टियां तो आपलोगों के करम से ही पैदा हुई हैं अरविंद जी. दिल पर हाथ रख कर सोचिएगा तो ये बात समझ में आ जाएगी. संकट ये है कि संघियों की देखा-देखी आप लोग भी त्रिशुल ले कर दौड़ने में विश्वास करने लगे हैं. | | | | | | | | prabhat [drprab@gmail.com] Varanasi - 2011-05-03 15:02:45 | | | |
पूरी तरह सहमत हूँ इस लेख से मै..........
सच ही कहा है किसी ने..........
सभी लोग बराबर हैं
सभी लोग स्वतंत्र हैं
सभी लोग हैं न्याय के हक़दार
सभी लोग इस धरती के हिस्सेदार हैं
बाकी लोग अपने घर जाएं | | | | | | | | pramod yadav [pramod.yadav27@ymail.com] indore - 2011-05-03 06:38:38 | | | |
एक सटीक ,सार्थक,और यथार्थ का बोध करनेवाला उत्कृष्ट विश्लेषण है.पर क्या करें, हमारे देश में ऊँगली कटा कर शहीदों में नाम लिखने की परम्परा का बड़े शिद्दत से निर्वहन हो रहा हे.गांधी के ज़माने से ही भगत सिंह को उपेक्षित किया जा रहा है.और जहां तक मार्क्स और अन्य बुद्धिजीवियों की बात की जाये तो उनके विचारों की प्रासंगिकता हमारी वसुदेव कुटुम्बकम की परम्परा में देखने को मिल जाएगी.निजी स्वार्थी तत्वों के द्वारा वामपंथियो के खिलाफ सदैव ही भ्रामक प्रचार किया जाता रहा है.और रही वामपंथियो के द्वारा किये जाने वाले आन्दोलनो की बात तो उनके आन्दोलन स्वयं सिद्ध हैं .किन्हीं नागनाथ एवं सांपनाथ की विचारधाराओं से प्रेरित लोगों के प्रमाण की उन्हें आवश्यकता नहीं है.जो लोग वामपंथियो को नहीं समझा पा रहे हैं, उन्हें इन पंक्तियों से समझने में आसानी होगी. सबसे आगे हम हैं पाँव दुखाने में,और सबसे पीछे हम हैं पाँव पूजने में. सबसे नीचे हम है नींव उठाने में, सबसे ऊपर हम हैं व्योम झुकाने में. | | | | | | | | sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi Himachal Pradesh - 2011-05-03 05:53:16 | | | |
में आपसे पूर्णतः सहमत हूँ. मैं लेखक के द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण से पूरी इत्तेफाक रखता हूँ. क्योंकि मैं यह मानता हूँ कि जनता ही क्रन्तिकारी होती है. वो अपना नेता हालत के मुताबिक चुन लेती है. तथाकथित सिविल सोसायटी में तो कई कांग्रेस जैसी संस्था हैं, जो बदलाव के बजाये सुधार पर जोर देती हैं. अन्ना हजारे की सिविल सोसाइटी भी यही काम करेगी. यही इसकी ऐतिहासिक भूमिका होगी. अन्ना हजारे के आन्दोलन से जनता को अपनी अगली कार्रवाई के रास्ते वैसे ही खुलते दिखेंगे जैसे महात्मा गाँधी को हम से अलग तथा भगतसिंह को महात्मा गाँधी से अलग रास्ता अपनाना पड़ा था. लेकिन एक बात सच है कि जनता द्वारा लाये गए बदलाव चिरस्थायी होते हैं क्योंकि उसमें जनता की भागीदारी होती है और जो बदलाव नेताओं द्वारा लाया जाता है, उसमें हमारी आज़ादी की तरह जनविमुख राजनीति फैल जाती है. | | | | | | | | अरविंद [] - 2011-05-02 11:35:23 | | | |
मेरी टिप्पणी में नीचे से दूसरे पैरे को कृपया इस तरह पढ़ा जाए...
और इस तरह और इसीलिए आपको यह समझ नहीं आएगा कि यह भी एक आंदोलन ही था, जिसमें आए लोग ही असल में भ्रष्टाचार के शिकार हैं, जंतर-मंतर पर अपनी मर्सिडीज में ड्योड्रेंट में नहा कर मार्केटिंग करने या महज तफरीह (तहरीर चौक से कितना मिलता-जुलता शब्द-समूह है तफरीह चौक...!!!) करने आए वे चिकने-चुपड़े और साफ-सुथरे चेहरे नहीं, जिनके लिए क्रांति का प्रतीक मशाल अब बदल कर मोमबत्ती हो गया है। यह क्रांति का आधुनिक रूपक है जो विद्रोह को शोक में तब्दील कर रहा है। यह भी याद रखिएगा कि यही चिकने-चुपड़े और साफ-सुथरे चेहरे दरअसल पिछले दो दशक के \"उदारवादी आंदोलन\" से उपजे भ्रष्टाचार के असली उपभोक्ता हैं और जिन्हें भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा फायदा मिला है, रास्ता चाहे जो हो। | | | | | | | | sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi Himachal Pradesh - 2011-05-02 07:53:16 | | | |
मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूं. | | | | | | | | अरविंद [] दिल्ली - 2011-05-02 07:36:59 | | | |
बंधु अजय कुमार कश्यप, अपने वामपंथी होने की इतनी खुली घोषणा के बावजूद समर आपको अपने वामपंथी खोल में -छिपे हुए- लग रहे हैं तो यह आपकी त्रासदी है। पहले क्रमिक तरीके से सोचना-समझना तो शुरू कर लीजिए! जनता की पीड़ा समझने में इस देश की साठ साल की आजाद सरकारों ने क्या किया है, इससे तो आपको कोई मतलब होगा नहीं। यह समझने में बहुत दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि आपलोग मार्क्स, हीगल या एंगल जैसे शब्दों से आतंकित क्यों होते हैं। हिंदुत्ववादी व्यवस्था की चूलें हिला देने वाले किसी भी शब्द या विचार से आप जैसे लोग आतंकित होगे ही, क्योंकि इससे कुछ सामाजिक सत्ताओं की सत्ता की कुर्सी उलट जा सकती है या उस पर किसी और का कब्जा हो सकता है। बहरहाल, भ्रष्टाचार के विरोध में ताजा आंदोलन ने देश की किस जनता के बीच विश्वास दिलाया है, यह आप भी बहुत भली प्रकार समझ रहे होंगे।
आपने ठीक कहा है कि पहली बार (दरअसल, पिछले डेढ़-दो दशक में) \\\"निराश लोगों\\\" को लगा कि अब भी दूसरी दुनिया के लिए लड़ाई संभव है। दरअसल, पिछले लगभग पांच सालों में समूचे देश में व्यवस्थावादी ताकतों ने जिस तरह फिर से अपनी सत्ता-वापसी की राहों के \\\"रोड़ों\\\" को साफ किया है, उसमें आपकी यह उम्मीद अचरज नहीं पैदा करती। वरना पिछड़े-दलित तबकों में जैसा आलोड़न पैदा हुआ था, अगर उसके नेता उस आलोड़न के प्रति बेईमान नहीं निकले होते तो आज और आगे देश और समाज की तस्वीर वही नहीं रहती, जिसे \\\"यूथ फॉर इक्वैलिटी\\\" बनाए रखना चाहती है।
आपको अपने इस सवाल का जवाब शायद मिल गया होगा कि इस देश में वामपंथियों ने कितने आंदोलन खड़े किए हैं। आप तो जानते ही होंगे कि आपके भ्रष्टाचार विरोधी ताजा आंदोलन की \\\"कामयाबी\\\" के लिए आपकी मीडिया ने आपको क्यों और किस तरह का तोहफा दिया है! तो यह भी समझने आता होगा कि तेईस फरवरी को वामपंथी दलों के आह्वान पर दिल्ली में तीन लाख लोग जमा होते हैं और आपके मीडिया के लिए खबर यह होती है कि इन लोगों ने दिल्ली वालों का जीना हराम कर दिया है। यह नहीं कि उस आंदोलन का भी मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार और महंगाई का विरोध ही था। वे तीन लाख मैले-कुचैले लोग फेसबुक या मोबाइल संदेशों से नहीं बुलाए गए थे जनाब और न उनके चेहरे इतने चिकने-चुपड़े थे कि उनको आपके भाई-बंधु अपने टीवी चैनलों पर चमकने लायक समझते।
\\\"भाई-बंधु\\\" का मतलब समझ रहे हैं न...! तो असली मतलब यही है कि भ्रष्टाचार विरोधी जंतर-मंतरी आंदोलन दरअसल, \\\"भाई-बंधुओं\\\" का आंदोलन है और अब उसे समझने के बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं रह गई है ये नरेंद्र मोदी से लेकर खाप समर्थक कॉरपोरेटर नवीन जिंदल तक किसके \\\"भाई-बंधु\\\" हैं।
और इस तरह और इसीलिए आपको यह समझ नहीं आएगा कि यह भी एक आंदोलन ही था, जिसमें आए लोग ही असल में भ्रष्टाचार के शिकार हैं, जंतर-मंतर पर अपनी मर्सिडीज में ड्योड्रेंट में नहाकर मार्केटिंग करने या महज तफरीह (तहरीर चौक से कितना मिलता-जुलता शब्द-समूह है तफरीह चौक...!!!) करने आए वे चिकने-चुपड़े और साफ-सुथरे चेहरे नहीं, जो पिछले दो दशक के \\\"उदारवादी आंदोलन\\\" से उपजे भ्रष्टाचार के असली उपभोक्ता हैं और जिन्हें भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा फायदा मिला है।
समर ने अपने लेख में उसी को विश्लेषित करने की कोशिश की है। मुश्किल यह है कि छियानवे लोगों के सिर पर बैठे चार लोगों का हांक लगाना ही दुनिया को दिखाई पड़ सकता है, क्योंकि जो दिखता है, वही बिकता है। इसी सुर में नीचे के छियानवे लोगों का चिल्लाना भी गुम हो जाता है और मान लिया जाता है कि चिल्लाहटों में भी हांक लगाने की आवाज आ रही है। और इस तरह चार लोगों का आंदोलन देश भर का आंदोलन हो जाता है। | | | | | | | | Ajay kumar Kashyap [ajaykumarkashyap@gmail.com] Kanpur - 2011-04-30 16:22:42 | | | |
समर जी, आप अपने वामपंथी खोल में छुपे हुये हैं, इसलिये जनता की पीड़ा समझने के बजाये मार्क्स, हेगल और एंगल के शब्द से आतंकित करने की कोशिश कर रहे हैं. आप इस बात को समझने की कोशिश क्यों नहीं करना चाहते कि अंततः अन्ना हजारे के अनशन ने पहले बार देश की जनता को ये विश्वास दिलाया है कि हां, अब भी एक दूसरी दुनिया संभव है. पहली बार निराश लोगों को लगा कि हां, लड़ाई अब भी संभव है. आखिर हमारे वामपंथी मित्र पिछलग्गू बनने के अलावा कितने आंदोलन इस देश में खड़ा कर पाये हैं? देश भर में मजदूरों की दुर्गति हो गई, लेकिन कॉमरेड केवल आदर्श और दर्शन झाड़ते रहे. | | | | | | | | Arun [] Fbd - 2011-04-29 09:00:44 | | | |
आपने अन्ना आन्दोलन के मूल चरित्र को सही व्याख्यायित किया है. अन्ना के मुखौटे के पीछे छिपे स्वर्ण,हिन्दू,मर्दवादी,इलीट,आरक्षण,दलित,अल्पसंख्यक,स्त्री विरोधी चेहरे को आसानी से पहचाना जा सकता है. बिलकुल सही कहा है- ...यह सामाजिक न्याय की लड़ाई में हारी गई जमीन को वापस पाने का मनुवादी युद्धघोष है.
| | | | | | | | umashankar singh [uma.change@gmail.com] delhi - 2011-04-28 20:24:53 | | | |
अन्ना के जो समर्थक भावुकतावष मूर्खतावश या मीडिया के छलावे में आके उनके साथ हो गया है, उन्हें चेताने के लिए समर का यह एक लेख ही काफी है। हां! यदि उन्होंने सोच समझ कर अपना पक्ष ही सत्ता के परोक्ष साथ का चुना है तो उन्हें कौन बदल सकता है। तर्क, इतिहास, अनुभव, उदाहरण सबसे लैसे और समृद्ध इस लेख के बाद अन्ना और उनके नाटक को समझने के लिए और किसी औजार की जरूरत नहीं है। वैसे भी अन्ना के उन बुद्धिजीवी समर्थकों से संवाद की कितनी गुंजाइश रह जाती है जब वे बात और तर्क जवाब देने के लिए करते हैं आगे बढ़ने के लिए नहीं। | | | | | | | | दीपक् [deepakrajim@gmail.com] आबूधाबी - 2011-04-28 17:43:25 | | | |
आप से ना ही पूरी तरह से सहमत हुआ जा सकता है ना ही पूरी तरह से असहमत ...सहमत इस बात से कि अन्ना के आँदोलन में मनुवादी चरित्र है और असहमत इस बात से कि सिर्फ दलित कि भागीदारी कि वकालत उनकी हालत को नही बदल देगी ....ईरान की क्राँति से लेकर अन्ना तक आपने जो उदाहरण दिये कि कैसे क्राँतिया गर्त हो गयीं वैसे अनेको उदाहरण हैं जो कि बताते हैं कि कैसे मायावती से लेकर अनेक दलित सत्ता तक पहुँचे मगर दलितों की हालत नही बदली ,कैसे वामपँथी बँगाल में राज करते रहे मगर वहां गरीबी और अराजकता के सिवा कुछ नही ..दर-असल लेफ्ट की यह हाइपोथीसीस तो सही है कि समाज मे पूंजी का वितरण कैसे हो..मगर उसके पास इसका जवाब नही दिखता कि पूंजी पैदा कैसे हो ? आपने बड़ी अच्छी बात कही कि उधार के तर्को से बहस नही जीते जाते मगर आपको अँबेडकर दलित ही दिखते हैं शिक्षित भारतीय नहीं... यह उधारी बात है ... सच्चाई यह है कि लोकतँत्र मे शिक्षित और जागरुक ही अगवा होता है इसलिये तर्कगत फर्क शिक्षित होने और ना होने का है ना कि दलित होने और ना होने का ..दलित-ब्राहमण ,मार्क्स-प्रगतिवाद ये सब उधार बातें हैं ...ऐन वक्त प्रश्न है कि कैसे पूंजीवाद और मार्क्सवाद को मिलाकर एक नया किमीया बनाया जाये ना कि पुँजीवाद ,गाँधीवाद वगैरह का एकतरफा विरोध किया जाये !
चीन को ही देख लें, पूंजीवाद की हवा को वो खुद ही नही सम्हाल पा रहा है .पूरी दुनिया इसकी चपेट मे है इसलिये यह आधा-अधुरा भारत तो इससे लड़ ही नही पायेगा अलबत्ता इसका देशकाल और परिस्थिति के अनुसार सही उपयोग जरुर कर सकता है ! | | | | | | | | Amit Srivastava [] Lucknow - 2011-04-28 15:27:51 | | | |
इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है. कुछ दिन में लोकपाल भी दूसरी सरकारी एजेंसियों जैसा ही हो जायेगा.
अच्छी बात बस इतनी है कि अन्ना जी ने काफी लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. इनमें से ज़्यादातर गलत हो सकते हैं लेकिन नीयत बुरी नहीं है. यह दुश्मन नहीं हैं, इनसे लड़ने की नहीं, इन्हें समझाने की ज़रुरत है. | | | | | | | | ईश्वर दोस्त [] गोवा - 2011-04-28 12:05:28 | | | |
साथी समर, लेख का तेवर पसंद आया और भाषा भी। तर्क उधार की जगह नकद और मौलिक हैं। अभी यात्रा पर निकल रहा हूं। दो तीन दिन बाद संवादरत होउंगा। | | | | | | | | Sudha Sen [sudha.sen@gmail.com] Manila, Philippines - 2011-04-28 10:57:35 | | | |
आपने बहुत गंभीरता से यह लेख लिखा है लेकिन तमाम विश्लेषणों के बाद भी आप यह बताने में असफल रहे हैं कि आखिर समस्या का समाधान क्या है? क्या सीपीएम, सीपीआई या माओवादी पार्टियों को ही इस देश का ठेका दे दिया जाये ? इन पार्टियों ने आखिर इतने सालों में क्या कुछ किया ? सिवाय ऐतिहासिक गलतियों के ? इतिहास तीसरी आंख होती है, बुलडोजर नहीं और इरान के जिन उदाहरणों से आपने अपने तर्कों को सिद्ध करने की कोशिश की है, वे पुराने और एक हद तक अप्रासंगिक तर्क हैं. सांप्रदायिकता का हौव्वा बता कर आप जैसे वामपंथी चिंतकों ने ही अमरीका और अमरीका जैसे साम्राज्यवादियों को बढ़ाने का काम किया. अपने पूरे लेख को पढ़ कर जवाब दें कि भारत के संदर्भ में सांप्रदायिकता बड़ा खतरा है या साम्राज्यवाद ? | | | | | | | | sanjay prajapati [sanjaymanav2010@gmail.com] new delhi - 2011-04-28 05:15:27 | | | |
उधार की जनता के दम पर इन्कलाब नहीं होते, न उधार के तर्कों पर बहसें जीती जाती हैं. और जो यह कोशिश करते हैं, वे बानी सद्र की गति को प्राप्त होते हैं....ये पंक्तियां एकदम सटिक हैं. बहुत अच्छा लिखा है आपने. | | | | | | |
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