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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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अन्ना के बहाने: रविवार विशेष
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

manoj kumar [manojkumar.1938@rediffmail.com] kazmabad goon (meerut ) - 2011-11-29 04:05:55

 
  अन्ना जी हम आप के साथ हैं, आप संघर्ष करें. अन्ना जी, आपका कार्य बहुत ही अच्छा है. मेरी नजर में गांधी जी के बाद आपका ही नंबर है.  
   
 

pankaj mourya [pmourya1988@gmail.com] khandwa mp - 2011-10-28 10:30:56

 
  अन्ना जी, आपका कार्य बहुत ही अच्छा है. मेरी नजर में गांधी जी के बाद आपका ही नंबर है. आप हमारी सरकार से बच कर रहना क्योंकि हमारी सरकार टीम अन्ना में फूट डालने की कोशिश कर रही है. 
   
 

sonu kumar saini [ashishsaini2011@hotmail.com] vill-habibpur sikri(muzaffar nagar)u.p - 2011-08-22 17:02:20

 
  अन्ना जी हम आप के साथ हैं, आप संघर्ष करें. यही शहीदों के लिये सच्चा नमन यही है. 
   
 

BALKRISHNA SINGH [bktomar@yahoo.com] DANWAR,ROHTAS,BIHAR-20/08/2011 - 2011-08-21 06:14:52

 
  आज़ाद भारत के प्रारंभिक काल से ही संसद में एक अनुभवहीन डाक्टर की भांति भ्रष्टाचार जैसे रोग के लिये अनेकों कानूनी इंजेक्शन लगाये गये, लेकिन भ्रष्टाचार जैसे रोग घटने के बजाय धरती से आसमान तक पहुंच गया. छोटे दफ्तरों से लेकर संसद कर पहुंच गया. इतनी ही नहीं, इसने हवा और पानी तक को नहीं छोड़ा. जबकि भ्रष्टाचार जैसे किसी भी रोग के लिये अन्ना हजारे जैसे अनुभवी डाक्टर का प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक जैसा इंजेक्शन ही इस पर लगाम लगा सकता है. यह तो तय है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अन्ना नहीं, हजारों, लाखों, करोड़ों अन्ना का जन्म हो चुका है. संसद में बैठकर राजा की तरह बोलना एक तरह की बेईमानी ही तो है.  
   
 

raghvendra singh [ni0522@rediffmail.com] lucknow - 2011-08-19 08:20:44

 
  क्या सच में हम किसी एक इंसान या एक संस्था को करप्शन के लिये जिम्मेवार ठहरा सकते हैं ? नहीं. जबकि हकीकत ये है कि हम खुद ही भ्रष्ट हैं. हम जानते हैं कि रिश्वत लेना-देना दोनों जुर्म है. बिना जनता को सुधारे, सरकार को नहीं सुधारा जा सकता है. ये अन्ना हजारे जैसे लोग क्या सच में भगवान हैं, जो लोगों के अंदर बसी इस भ्रष्टाचार नामक बुराई को साफ कर सकते हैं. कोई भी नहीं कर सकता है. ये काम असल में हमारी इच्छा पर निर्भर करता है. जनता भेड़चाल की तरह व्यवहार कर रही है, उसके पास खुद का कॉमन सेंस नहीं है. उसे नहीं पता कि भ्रष्टाचार के पीछे हम हैं या सरकार है. मीडिया, जो सच को दिखाने का ढ़ोंग करती है, वह कभी आदिवासियों के सच को क्यों नहीं दिखाती. जनता के टैक्स चोरी का सच क्यों नहीं दिखाती. आम जनता की बेटियों के मारे जाने का सच क्यों नहीं दिखाती, केवल उन्हीं बड़े लोगों का सच क्यों दिखाती है, जो हाईलाइट हैं, जिनमें ग्लैमर है? ... कुल जमा बात ये कि जो लोग अपना घर तो चला नहीं सकते, वे देश चलाने की बात कर रहे हैं. पहले हम खुद भ्रष्ट हैं कि नहीं, ये सवाल पूछें, फिर देश से भ्रष्टाचार मिटाने की बात करें. 
   
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