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विनायक सेनः अनसुलझे सवाल

मुद्दा

 

विनायक सेनः अनसुलझे सवाल

कनक तिवारी


चिकित्सक, मानव अधिकार कार्यकर्ता और पी. यू. सी. एल. के वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. विनायक सेन जेल से बाहर आ गये हैं. उन पर अन्य कथित अपराधों के अतिरिक्त राजद्रोह का आरोप भी लगाया गया था. कानून के जानकारों को पूरा भरोसा था कि विचारण न्यायालय ही उन्हें छोड़ देगा. फिर भरोसा हुआ कि अपील दायर करते ही उच्च न्यायालय में उन्हें दी गई आजन्म कारावास की सज़ा स्थगित हो जायेगी.

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दो बार भरोसा टूटने के बाद जनमत को फिर भरोसा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट कानून के समझदार विश्वविद्यालय के कुलपति की तरह आचरण करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने जनता और कानून का भरोसा कायम रखा.

इस मुकदमे का अभियुक्त एक ख्यातनाम व्यक्ति होने से वह मीडिया के केन्द्र में भी रहा. लेकिन चिन्ता यह है कि राजद्रोह का आरोप लादे दूसरे अभियुक्त जो साधन सम्पन्न नहीं हैं, सुप्रीम कोर्ट तक कब और कैसे पहुंचेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी राजद्रोह के कानून की मुश्कें बांध रखी थीं. फिर भी छत्तीसगढ़ की हठधर्मी पुलिसिया आदत है कि वह सुप्रीम कोर्ट की समझाइशों को इस तरह दरकिनार करती है मानो घर का कोई बूढ़ा कमाऊ पूत को शराब पीने के लिए बेकार ही मना कर रहा हो.

छत्तीसगढ़ प्रशासन के ज़ेहन में अब तक यह बात उतरी नहीं है कि विनायक सेन के खिलाफ जबरिया बनाये गये मुकदमे का दुर्घटनाग्रस्त हश्र होने की तार्किक सम्भावना है. सत्र न्यायालय भारतीय न्याय व्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण पायदान की तरह स्थापित किये गये हैं. उच्च न्यायालय तो एक अर्थ में सुप्रीम कोर्ट से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण संविधान न्यायालय है. वहां संवैधानिक मुद्दों के अतिरिक्त भी सब तरह के प्रकरण निपटाये जाते हैं. ऐसा खुद सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया है.

इस मामले को सरसरी तौर पर देखकर सुप्रीम कोर्ट ने लगभग कटाक्ष ही किया है कि राजद्रोह का मामला तो प्रथम दृष्टि में बनता ही नहीं है. उसी मामले का पूरा विचारण करने के बाद सत्र न्यायालय ने और फिर पहले मीन मेख निकालने के अधिकारी हाईकोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए नियत करने पर भी इतना नहीं समझा कि राजद्रोह की संसद-रचित सरहदें क्या हैं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कैसी मर्यादाएं हैं.

पुलिसिया आरोप पत्र के गैर समीक्षात्मक समर्थन को न्यायालयीन विवेक नहीं कहा जा सकता. संविधान की मशाल थामने वाले उच्च न्यायालय की प्रथम दृष्टि का विवेक ही यदि संशयग्रस्त हो तो उसे झिंझोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट को कुछ कड़ी हिदायतें भी आगे चलकर देनी होंेगी. यक्ष प्रश्न यह है कि गुलाम देश में अंगरेज रचित न्यायालयों की कानूनी समझ को लेकर कोई जवाबदेही क्यों नहीं होनी चाहिए. एक मुलजिम को आजन्म कारावास यदि सत्र न्यायालय दे. हाई कोर्ट उसे फांसी पर चढ़ाने का फरमान जारी करे. फिर सुप्रीम कोर्ट बाइज्जत छोड़ दे. कानून के झूले की पेंगें क्या इतनी उच्छृंखल, उन्मादपूर्ण और परस्पर विरोधाभासी हो सकती हैं.

न्यायिक प्रशासन के प्राथमिक स्तर पर लोक अभियोजक का महत्व अंगरेजों ने ही निर्धारित किया था. प्रिवी कौंसिल से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक यह तयशुदा सिद्धांत है कि लोक अभियोजक अर्थात सरकारी वकील सरकार का मुलाजिम नहीं होता. उसे साहसपूर्वक किसी मामले की पुलिसिया कमजोरी को उजागर करना चाहिए. विनायक सेन के प्रकरण में प्रचलित प्रणाली के तहत लोक अभियोजक की टिप्पणी या तो गलत होगी अथवा उस पर विचार नहीं किया गया होगा.

सर्वोच्च प्रशासन को यह देखने की परंपरा विकसित करनी होगी कि लोक अभियोजक और सिफारिशी सरकारी वकील में फर्क किया जाये. सत्तारूढ़ पार्टी के अर्धशिक्षित नेताओं की सिफारिश पर यदि निजी वकील लोक अभियोजक नियुक्त होंगे तो उस पर भी सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण न्याय निर्णयों में कई तरह की समझाइशी हिदायतें पहले ही दर्ज हो चुकी हैं.

विनायक सेन का मामला किसी नामालूम इंसान को सींखचों में बंद करने का नहीं था. जाहिर है संबंधित नस्तियां राज्य पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी को औपचारिक या अनौपचारिक ढंग से दिखाई गई होंगी. औपचारिक इसलिए कि अन्वेषण अधिकारी के काम में वरिष्ठ अधिकारियों को तो क्या न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप करने का कोई प्रावधान नहीं है. अनौपचारिक इसलिए कि राज्य पुलिस के कर्ताधर्ता से कान फुंकवाए बिना थानेदार की निष्पक्ष जांच करने की हैसियत ही कहां होती है. ऐसे विशिष्ट प्रकरणों में सुप्रीम कोर्ट के सार्थक फैसलों के चलते संपूर्ण पुलिस प्रशासन की जवाबदेही को लेकर राज्य क्या विदेहराज की भूमिका ही अदा करता रहेगा अथवा उसे मनुष्य की आजादी और गरिमा को लेकर चिंताएं भी होनी चाहिए. अभियोजन के कच्चेपन बल्कि साजिशी होने का ठीकरा अकेले थानेदार पर क्यों फोड़ा जाना चाहिए?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Yashendra [ryprasad108@gmail.com] Patna - 2011-05-06 07:35:27

 
  विनायक सेन का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में क्यों उठा यह आश्चर्य की बात है.
उनके मुद्दे पर बहस करने और निर्णय करने के लिए उनलोगों की एक कंगारू कोर्ट बनानी चाहिए जो लोग उनके परिवार से हैं जिनके सर को धड़ से अलग कर दिया नक्सलियों ने.
सिर्फ इन्ही लोगों की कंगारू कोर्ट को बिनायक सेन पर फैसला सुनाने का हक़ है.
यह मामला भारत की सामान्य न्यायपालिका का है ही नहीं.
 
   
 

bhagatsingh [] raipur - 2011-04-30 02:12:24

 
  बिलकुल ठीक कहा है कि यही अदालतें प्रोफेसर गिलानी को संसद हमले मामले में फांसी की सजा देती हैं और उससे उच्चतम न्यायालय उन्हें रिहा कर देता है. छत्तीसगढ़ प्रदेश में गृहमंत्री की आवाज न डीजीपी सुनते हैं और न सीएम. सीएम तो बकायदा ननकीराम कंवर को ऐसे बयान देने पर उत्साहित करते हैं, जिससे वो नाकामयाब औऱ अज्ञानी सिद्ध हो सके. यही उन्होंने रामविचार नेताम के साथ किया. जब बृजमोहन अग्रवाल गृहमंत्री बने तो अलग तरह के हालात थे. अब एक तरह से सारे आदिवासी नेताओं को नाकाबिल सिद्ध करने की कोशिश हो रही है.
रही बात कि बिनायक संपन्न हैं इसलिये उनके साथ इतने लोग आये और उनकी पैरवी इस स्तर पर की जा सकी, ये पूरी तरह सत्य नहीं हैं.शायद सबको पता है कि उनके समर्थन या उनकी पैरवी के लिये खर्च उनके परिवार ने नहीं किया बल्कि देश के हजारों मानवाधिकार के लिये चिंतित कार्यकर्ताओ ने किया है. यहाँ तक कि रामजेठमलानी जैसे एडवोकेट ने भी बिना फी लिये यह मुकदमा लड़ा हैं.ये ठीक है कि छत्तीसगढ़ की जेलों में हजारों बिनायक सड़ रहे हैं, उनके लिए भी लड़ाई लड़नी चाहिये. बिनायक को हीरो उनके काम ने नहीं बल्कि ओ.पी. राठौर जैसे दम्भी डीजीपी और रमन सिंह जैसे आरएसएस के नमस्ते सदा वत्सले के कार्यकर्त्ता की मेहरबानी से हुआ हैं. जो काम बिनायक ने किया या जो करना चाहते हैं, ऐसे काम भी प्रदेश में बहुत से लोग कर रहे हैं. पुलिस और रमन सिंह सिर्फ प्रदेश में एक माहौल बनाना चाहते थे जिससे शांति और मानवाधिकार के लिए काम करने वाले लोग डर कर काम बंद कर दें और इसमें वे सफल भी हुए हैं. लेकिन अब जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें देशद्रोह के अपराध से मुक्त कर दिया है तो लोगो में हिम्मत आई हैं.और फिर से हालत बेहतर बने हैं.
अब ओपी राठौर की तरह ही वर्तमान डीजीपी भी यही कह रहे हैं कि हिंसक माओवादी और उनसे सहानुभूति रखने वाले लोगों में कोई फर्क नहीं है और तो और उन्होंने यह भी कहा कि बिनायक पर राजद्रोह का मामला बनता हैं.जब ऐसे अधिकारी और ऐसे उनका मुख्यमंत्री हो तो प्रदेश में न नक्सलवाद रुकेगा और न शांति के प्रयास रुकेंगे,मुझे तो लगता है कि जो पुरस्कार बिनायक को मिल रहे हैं उसके असली हकदार तो ये पुलिस वाले हैं.
कनक जी, आपको बहुत-बहुत बधाई. आपके लेख की हम और हमारे जैसे हजारों लोग प्रतीक्षा करते रहते हैं.
 
   
 

दीपक् [deepakrajim@gmail.com] आबुधाबी - 2011-04-29 06:41:46

 
  पूरा प्रकरण नेपथ्य में बैठे संवैधानिक और प्रशासनिक ओहदेदारों के कलाकारों की भूमिका पर पुनर्विचार की मांग करता है...- विनायक सेन मुद्दे के मार्फत उठाया गया यह एक बडा सवाल है जो कि आपकी कलम- दवात से निकला है! 
   
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