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कारपोरेट का हथियार क्रिकेट

बात पते की

 

कारपोरेट का हथियार क्रिकेट

रघु ठाकुर


पिछले कुछ महीने ऐसे गुजरे हैं, जब देश क्रिकेट के बुखार में लंबे समय तक तपता रहा. 2 अप्रैल को भारतीय क्रिकेट टीम का जीतना निःसंदेह एक सुखद घटना है तथा देश के क्रिकेट खिलाड़ियों की एकता व क्षमता का प्रमाण है. समूचे देश ने उन्हें साधुवाद भी दिया है. परन्तु उसके बाद लगातार मीडिया में आने वाली खबरें और उसको मिलने वाली जगह से लगने लगा है कि क्रिकेट केवल खेल भर नहीं है, खेल से इतर भी कुछ खेल चल रहा है.

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वैसे भी क्रिकेट अपने अतीत से एक सामंती खेल रहा है, जिसे पूरा दिन, पूरा माह और पूरे वर्ष खेला जाता है. यह एक व्यवसायिक उद्यम जैसा बन गया है. दरअसल खेल किसे माना जाये? इसकी क्या कसौटियाँ हों ? मेरी राय में खेल की गुणात्मक परिभाषा निम्न प्रकार हो सकती है-1.शारीरिक शक्ति,क्षमता और व्यायाम 2.कौशल 3.सहयोग (टीम स्प्रिंट) 4. आक्रमक व सुरक्षात्मक रणनीति और 5.चुस्त तन व दुरूस्त मन

खेल दरअसल कुछ घंटों का भी हो सकता है, जिसे जीवन के अन्य कार्यों के साथ खेलकर उपरोक्त गुण विकसित भी किये जा सकते हैं तथा इन गुणों की परीक्षा भी हो सकती है परन्तु क्रिकेट कुछ घंटो या कुछ समय का नहीं वरन् एक पूर्णकालिक कार्य है, जिसे खेलने वालों-खिलाने वालों- देखने वालों के पास एक मात्र कार्य केवल यही होगा ? क्या भारत जैसे देश में जहाँ 84 करोड़ लोग 20/- रूपये रोज से कम पर जिन्दा हैं, यह पूर्णकालिकता संभव है ?

दरअसल क्रिकेट, गोल्फ आदि खेल ब्रिटिश सामन्तों के खेल थे. जो दूसरों के श्रम के शोषण से अमीर थे तथा जिन्हें अपना समय काटने को या शरीर हिलाने को, क्रिकेट/गोल्फ जैसे पूर्णकालिक खेल की जरूरत थी. परन्तु कालान्तर में जब ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हो गया तब ब्रिटेन की भागीदारी व यूरोप की भागीदारी क्रमशः घटती गयी तथा क्रिकेट को अफ्रीकी देशों और एशियाई देशों की ओर सरका दिया गया, जिसे खेल कर व जीत कर या हार कर हम गौरवान्वित भी होते हैं या दुखी भी.

डाक्टर राममनोहर लोहिया ने क्रिकेट के इस पहलू के संबंध में एक पत्र गार्डियन मेन्चेस्टर के संपादक को लिखा था और कहा था कि भारत जैसा देश इसे नहीं खेल सकता.

क्रिकेट भारत का खेल नहीं है परन्तु क्रिकेट के नशे ने समूची गरीब दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. ऐसी स्थिति में क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति वाला देश है लेकिन वह न तो क्रिकेट का बादशाह है और न ही बादशाह बनना चाहता है. दरअसल अब क्रिकेट की मालकियत सामन्तवाद के हाथ से निकलकर उद्योग जगत के हाथ पहुँच गयी है तथा देश व दुनिया के उद्योग जगत ने अपने सबसे बड़े अस्त्र मीडिया के माध्यम से क्रिकेट को ऐसे नशे में बदल दिया है, जिससे बच पाना अब भारत व एशिया के गरीब मुल्को को संभव नहीं दिखता.

क्या यह आश्चर्यजनक सत्य नहीं है कि भारत-पाक-श्रीलंका दुनिया के प्रति व्यक्ति औसत आय के संदर्भ में अति गरीब निर्धन देशों में से हैं या ऐसी ही स्थिति अफ्रीकी व लातिन अमरीकी देशों की भी है. परन्तु यही देश क्रिकेट में अग्रणी हैं. दरअसल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व उद्योग जगत के इसके पीछे जो चुनिंदा लक्ष्य हैं, उसके तहत वे क्रिकेट को मुखौटे के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. इस मुखौटे के पीछे के खेल को गौर से देखें, उसके कई पहलू सामने निकल कर आते हैं-

1. अपने उत्पाद को बेचने के लिए आकर्षक माडल तैयार करना. अक्सर क्रिकेट के खिलाड़ी बाद में कम्पनियों के उत्पादों को बेचने के विज्ञापनें में नजर आते हैं. पहले फिल्मी सितारे इस माडलिंग के लिये ज्यादा आकर्षक माने जाते थे पर अब प्रचार तंत्र ने क्रिकेट खिलाड़ियों को इतनी लोकप्रियता दे दी है कि वे राजनीति,फिल्म सभी के अदाकारों से बड़े नायक हो गए हैं. यही कारण है कि भारत के जीतने के बाद सदी के तथाकथित महानायक अमिताभ बच्चन सड़को पर बेपहरा होकर निकल पड़ते हैं और नाचते है. कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी भी सलवार कुर्ती पहनकर एसपीजी को छोड़कर लोगों में जाकर थिरकना शुरू कर देती हैं. प्रचार माध्यमों से पैदा की गई इस भयंकर आकर्षण की आँधी में इन पुराने प्रचलित चेहरों को भी अपना स्थान खोजना पड़ रहा है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

देवेश तिवारी [deveshrisk@gmail.com] बिलासपुर - 2011-05-01 19:05:56

 
  बहुत साधा हुआ लेख .. आज क्रिकेट के इस जूनून के बीच इस पर कुछ विरोध या कहें तो सच्चाई लिखने के पहले पाठकों की प्रतिक्रिया सोचकर जी घबराता है. आपकी हिम्मत को सलाम और इस पोस्ट के लिए रविवार को बधाई कि आपने उन्माद के विरोध में सच्चाई लगाने की हिम्मत दिखाई ... 
   
 

sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi Himachal Pradesh - 2011-05-01 16:34:39

 
  क्रिकेट को आज का युवा वर्ग धर्म मानता है और सचिन को भगवान. कारपोरेट सेक्टर इस नए धरम का मसीहा है और मीडिया इसका पुरोहित. यह सब मिलकर देश की नई पीढ़ी को अफीम नहीं बल्कि मलानाक्रीम चटा रहे हैं और मेरे देश के नेता उच्चार रहे हैं-तमसो मा ज्योतिर्गमय 
   
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