लाल्टू की छः कवितायें
साहित्य
लाल्टू की छः कवितायें
वहां
से गुज़रते हुए
वहां से गुज़रते हुए
देखा है बच्चों को सड़क पर खेलते हुए
कितनी बार खीझ कर उनकी माँओं से कहा है- ए बच्चे को साइड करो
एक्सिडेंट हो जाएगा
लौट कर रातों को
सपनों में अक्सर चौंक जाता हूँ
डरता हूँ कहीं बच्चे को कुछ हो न गया हो
मेरी घड़ी की सुई दुःखों के चक्र में घूमती है
इन दिनों तेजी से दौड़ रही है सुई
पता नहीं चलता हत्याओं बलात्कारों के बीच
कुछ और भी बचा या नहीं
मैं मंटो और घटक की तरह
खुद को जला नहीं पाता
इसलिए बनता ही रहता हूँ
बार बार नंगी औरत सड़क बीच
बार बार सरहदों को फाड़ता
मैं चीख नहीं पाता रो नहीं पाता
जिसको ख़त लिखता हूँ, उसके पढ़ने के पहले पहुंचा हुआ ख़त खुद दुबारा पढ़ लेता हूँ
न ख़त को पता है, न उसको कि ख़त दुबारा पढ़ा जा रहा है
दुबारा पढ़ते हुए लिख रहा हूँ जहाँ सुई खड़ी है
मेरे चारों ओर है शोर छोटे बड़े इन्कलाबों का
मैं ख़त पढ़ रहा हूँ ख़त लिख रहा हूँ ।
पेटीशन
आज भी
एक और दरखास्त सरकार से है
माई बाप लोगों को मत मारो
लोग बादल नहीं हैं
उनको पीटने से आँसू नहीं
खून बरसता है
सुनो यह अहसास न तो
कोई सुंदर गान है
न व्याकरण का खेल
यह भारतीय लोकतंत्र का सच है
इस पर कोई कैसे लिखे
दरखास्त पर साइन करता हूँ
चिदंबरम मोहनमन जैसे सुंदर नामों
को संबोधित गद्य में नीचे
मेरा नाम भी समा जाता है
सुबह सुबह अँधेरे का अहसास ढोते
बढ़ता हूँ और डाक की तरफ
आदमी की चीख के अलावा और भी
कथाएँ हैं
कुछ दफ्तरी कुछ प्राणगीत।
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अरे!
15 जुलाई तक मकान बन जाएगा
मेरी नज़रों में सितंबर अक्तूबर
का मैं हूँ
निचली मंज़िल के नए मकान में
मैं खिड़की से देख रहा हूँ
ऊपरी मंज़िल वाले इस मकान
में जून के मैं को
पंखा गर्म हवा के थपेड़े मार रहा है
खिड़की बंद हो या खुली
हवा की आवाज नहीं बदलेगी
गंदी झाड़ियों के पार
तपती ईंटों की दीवारें समवेत गाती रहेंगी
जून का मैं थोड़ी देर आराम करना चाहता हूँ
जग का पानी उत्तेजित अणुओं का धर्म जताता है
सितंबर अक्तूबर की मेरी प्यास
पानी के अणुओं को अपनाती है
स्नायु के झंकार जून के मैं के खयालों में
गुनगुनाते हैं
तपती धूप में काम कर रहे ओ आधे दर्जन हाथ!
ग़र्म ईंट उठा रहे हाथ
मेरी सितंबर अक्तूबर की ज़िंदगी के लिए तुम्हें धन्यवाद।
क्या सचमुच ये मजदूर देखते नहीं
मुझे दिखता है बंद खिड़की से
घुँघराले बालों वाला बच्चा
लू से खेल रहा है
खुली खिड़की से मेरी आवाज सुनो
अरे! बच्चे को धूप से हटा लो।
दृश्य
चार खूँटियों पर धातु का चौकोर बड़ा गमला।
गमला मिट्टी का। गमला प्लास्टिक का।
बहुत बड़ा नहीं, ज्यादा से ज्यादा छोटी बाल्टी।
गमला कहने पर चौकोर आकार की कल्पना नहीं।
चौकोर बड़ा गमला गमला इसलिए कि इसमें पौधे।
मिट्टी। मिट्टी में पौधे।
सदाबहार पौधे।
गमले की चौकोर दीवारें धातु की सपाट छड़ें।
कोनों में सीधा छड़। ऐंगल।
पौधों के पत्तों के बीच
बुज़ुर्ग अधगंजा आदमी जिसके सिर दाढ़ी के बाल सभी काले।
बालों में रंग डालने से दृश्य में अदृश्य उसकी बीबी प्रेमिकाएँ सभी हैं दृश्य।
गमला और पौधे के बीच से दिखती है सृष्टि, एक सृष्टि।
दूसरी और तीसरी दृश्य सृष्टि गमले की दिशा से विपरीत ओर हैं।
कई सृष्टियाँ गमले की दिशा में हैं, अदृश्य हैं।
किस सृष्टि में है गमला?
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मुस्कान और मुस्कान
ये रात दिन उड़ने वाली लड़कियाँ
महँगी मुस्कान ओढ़ती हैं
मुस्कान मुझे महँगी पड़ती है
मैं पैसे देकर खरीदता हूँ
उफ्! लड़कियों को कितनी महँगी पड़ती है मुस्कान
जो पैसों के लिए इसे ओढ़ती हैं
* *
इस वक्त प्रतीक्षा कक्ष में बैठी हैं
दो आपस में बात करती हैं
तीसरी चिंतामग्न है
बात करने वाली परिचारिकाओं की उँगलियाँ शून्य में
बातचीत की आकृतियाँ बनाती हैं
चिंतामग्न लड़की की उँगलियाँ चिंताओं को थामे हुए हैं
* *
साढ़े नौ बजने को है
चिंताएँ उठ कर चल पड़ी हैं
उँगलियों ने चिंताओं के बजाय और उँगलियों को थाम लिया है
मुस्कान और मुस्कान साथ चल पड़ी हैं।
आदत है
गोकि वह और दिनों से अलहदा नहीं
सुबह चाय की जद्दोजहद
सोमवार का दुःख जो बेटी की आँखों में
कार्नफ्लेक्स कि ब्रेड के बीच उसके बटनों की सरहद।
नौ बजे मुझे पढ़ाना है
यानी आठ बजे पढ़ना है
सेव की फाड़ियों जैसे अणु परमाणुओं
के अंदर का सागर गढ़ना है।
दस बजे चाय
बाद लगातार एक दिन भर का जीवन
जिसमें शामिल घर दफ्तर के टिकटिक बीतते
वही वही वही - वही रोज के हर क्षण।
सूनी आँखों से कीबोर्ड के बटन देखना
समझ न पाना किस अक्षर पर उँगली रखूँ
हर पल हर साँस हर पलक झपकते उसी को सोचते रहना
हर आवाज़ में उसकी आहट ढूँढना
इस सदी का वह उस सदी का वह
आधी रात बाद का वह
ठंड की सुबह का वह। उसका होना
उसके होने में मेरा होना
आदत है।
उसी के लिए इस ओर आया छोड़ मझधार
यहाँ नीले हरे हर रंग में अवसाद बसता है
वह कब है कब नहीं है
इसी हिसाब में बहते
महासागर पार कर जाना
आदत है।
04.05.2011, 19.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित