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सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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लाल्टू की छः कवितायें

साहित्य

 

लाल्टू की छः कवितायें


वहां से गुज़रते हुए

वहां से गुज़रते हुए

लाल्टू की कविता

देखा है बच्चों को सड़क पर खेलते हुए
कितनी बार खीझ कर उनकी माँओं से कहा है- ए बच्चे को साइड करो
एक्सिडेंट हो जाएगा
लौट कर रातों को
सपनों में अक्सर चौंक जाता हूँ
डरता हूँ कहीं बच्चे को कुछ हो न गया हो
मेरी घड़ी की सुई दुःखों के चक्र में घूमती है
इन दिनों तेजी से दौड़ रही है सुई
पता नहीं चलता हत्याओं बलात्कारों के बीच
कुछ और भी बचा या नहीं
मैं मंटो और घटक की तरह
खुद को जला नहीं पाता
इसलिए बनता ही रहता हूँ
बार बार नंगी औरत सड़क बीच
बार बार सरहदों को फाड़ता
मैं चीख नहीं पाता रो नहीं पाता

जिसको ख़त लिखता हूँ, उसके पढ़ने के पहले पहुंचा हुआ ख़त खुद दुबारा पढ़ लेता हूँ
न ख़त को पता है, न उसको कि ख़त दुबारा पढ़ा जा रहा है
दुबारा पढ़ते हुए लिख रहा हूँ जहाँ सुई खड़ी है
मेरे चारों ओर है शोर छोटे बड़े इन्कलाबों का
मैं ख़त पढ़ रहा हूँ ख़त लिख रहा हूँ ।


पेटीशन

आज भी
एक और दरखास्त सरकार से है
माई बाप लोगों को मत मारो
लोग बादल नहीं हैं
उनको पीटने से आँसू नहीं
खून बरसता है
सुनो यह अहसास न तो
कोई सुंदर गान है
न व्याकरण का खेल
यह भारतीय लोकतंत्र का सच है
इस पर कोई कैसे लिखे

दरखास्त पर साइन करता हूँ
चिदंबरम मोहनमन जैसे सुंदर नामों
को संबोधित गद्य में नीचे
मेरा नाम भी समा जाता है
सुबह सुबह अँधेरे का अहसास ढोते
बढ़ता हूँ और डाक की तरफ
आदमी की चीख के अलावा और भी
कथाएँ हैं
कुछ दफ्तरी कुछ प्राणगीत।
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

राजीव [rajeevrjnu@gmail.com] हैदराबाद - 2011-05-05 16:56:44

 
  भीड़ से अलग. लाल्टू की कवितायेँ एक साथ कई अर्थों को संबोधित होती हैं, इसी कारण कभी किसी को अच्छे से समझ में आती हैं तो कभी किसी को कम और किसी को बिल्कुल नहीं. लाल्टू शिल्प के प्रति बहुत गंभीर कवि हैं लेकिन ऐसा करते हुए वो कभी कंटेंट के साथ समझौता नहीं करते. 
   
 

Dharmendra Pare [pare_dharmendra@yahoo.com] Harda M.P. - 2011-05-04 18:58:11

 
  लाल्‍टू भाई की कविताऍं मन की तहों में पसर जाने वाली हैं । उनकी और कविताओं की तुलना में ज्‍यादा बोधगम्‍य हैं । बधाई ।  
   
 

गिरिधर राव [agiridhar.rao@gmail.com] - 2011-05-04 18:40:07

 
  कुछ समझ आया, कुछ नहीं, पर बहुत अच्छी लगीं ये कवितायेँ -- ख़ासकर वो आख़री, \"आदत है\". शुक्रिया! 
   
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