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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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डायरी : जुलाई की एक रात

कहानी

 

डायरी : जुलाई की एक रात

दुष्यंत


लेखकीय डिस्कलेमरः यह एक सच्ची कहानी है, इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं वास्तविक हैं... और इसका संबंध दुनिया के किसी भी इलाके के, किसी भी व्यक्ति से हो सकता है. यह मात्र संयोग नहीं हो सकता और संयोग भी क्या, यह तो प्रकटतया दुर्योग है. अस्तु, लेखक की यह आकांक्षा और शुभकामना है कि ये कथा अब सिर्फ कथा ही रहे, किसी के जीवन में घटित ना हो.

a-july-night


अपनी छाती पर एक बड़ा सा पत्थर महसूस किया. और जैसे नींद खुल गई, खुद को पसीने से तर पाया.
लगभग आधी रात का वक्त. जुलाई महीने की शुरुआत है. दिन में बारिश हुई थी, इसीलिए शायद आज रात थोड़ी गर्म है. शायद कूलर का पानी खत्म हो गया. बिस्तर से उठकर खड़ा हुआ. टेबल से टकराते-बचते लाइट जलाई. खिड़की के कूलर तक पहुंचा. पहले घड़ी देखी, सवा बजा था. पता चला कूलर तो पानी से भरा हुआ है. कब सो गया था, पता ही नहीं चला. कूलर तो ऑन ही नहीं किया था.
बालकनी से गली में झांका. गली सुनसान थी. सब बिल्डिंगों में अंधेरा था. एक बिल्डिंग के रसोई जैसे लगते हुए हिस्से में रोशनी दिखी. सामने की बिल्डिंग की कॉमन सीढिय़ों में एक लट्टू जल रहा है.
इतना चुप भी यह शहर हो सकता है क्या? मेरे सवाल का जवाब देने वाला कोई नहीं था.
...तभी हाईवे से आती ट्रक की भूं-भूं सुनाई दी. गर्मी की रात में भी इतनी दूर आती है आवाज.
प्यास भी लगी थी. किचन में जाकर देखा तो वाटर कैम्फर खाली था. आज भरना भूल गया था. टंकी के पानी की टैब से गिलास भरकर पी लिया और उसे दुबारा भरकर अपने बिस्तर के पास रख लिया.
नींद आ ही नहीं रही है. कूलर चला लिया...पंखे को पांच पर कर दिया. टी-शर्ट उतार दी. नीचे बरमूडे में ही था. गर्मी थी...शायद दिमाग में भी या दिमाग में ही थी. बालकनी में चेयर खिसका ली- इजी चेयर.... दिमाग घूमने लगा...उठा और उठकर बिस्तर के पास रखे स्टील के गिलास को मुंह में उड़ेल लिया. कुछ पानी बनियान पर भी गिर गया...गिर जाने दिया...या पता ही नहीं चला. मेरा अपने ही हाथ पर नियंत्रण कहां था.

दोस्त का छोटा भाई राजू अंदर सोया हुआ है...दिनभर भटक के लौटा था. मल्टीनैशनल बैक की मार्केटिंग जॉब का सच मेरे सामने लूटा हुआ था. ज्यादा थकान के कारण वो आज खाना खाते ही सो गया था.
सोचा कोई किताब देख लूं...किताब उठाई तो अक्षर गोल-गोल घूमने लगे...बंद करके टेबल पर रख दी...वापिस इजी चेयर के पास आया और उसे पकडक़े हुआ, गली में देखने लगा.

सामने का क्लिनिक आज बड़ा दिखाई दे रहा है...जैसे सिर्फ साइन बोर्ड का साइज 50 गुना जूम कर दिया गया है.
सभी पड़ोसी मर गए हैं या सामूहिक रूप से कहीं चले गए हैं...कोई दिखता ही नहीं है...सब लोग मुर्दा से सो रहे हैं...
मेरे फ्लैट के अंदर की लाइट चुभ रही थी, बालकनी से कमरे में दाखिल होकर स्विच बोर्ड पर हाथ मारकर लाइट ऑफ कर दी और वापिस बालकनी में बैठ गया.

होश गुम सा था.
याद पर कुछ वाक्यों का कब्जा था-

‘ये जरूरी था क्या?’
‘ब्रेक मांगा था, ब्रेकअप नहीं’
‘हर बात को अदरवाइज क्यों ले रही है वो?’
‘कुछ भी बोलो-असर उल्टा ही होता है क्यों?’
‘इसने चुप रहने नहीं दिया और बोला तो बात उल्टी पड़ी.’

इजी चेयर चुभने लगी...गर्मी लगने लगी...उठा और कपड़े सुखाने के तार को हाथ से पकड़ लिया. इसे गर्दन पर लपेट लूं तो!
उठकर बिस्तर पर आया और आधा सा लेट गया...मच्छर खाने लगे. उठकर बालकनी का दरवाजा बंद किया...ऑल आउट चेक किया. उसे खत्म हुए कई दिन हो गए हैं, दिन में होश नहीं रहेगा...तो रात में मच्छर काटेंगे ही.

लेट जाता हूं, खेस ओढ़ लेता हूं. वॉल क्लॉक की टिकटिक से डर लगता है. उठ कर उसका सेल निकालकर रख देता हूं. अब वो शोर भी नहीं है. ये और भी ज्यादा डरावना है...
टॉयलेट का नल टपकता है...डेढ़-दो मिनट में एक बार- टप-टप.
उठा तो देखा- टैप खराब है, ठीक ही नहीं करवाई. इसका अब कोई इलाज नहीं है...इतनी रात गए तो.

बाथरूम से मेरे पिछले बर्थडे पर उसकी गिफ्ट की हुई कढ़ाईदार ब्लू डेनिम की शर्ट झांक रही थी. बाथरूम का दरवाजा भेड़ दिया और वापिस आकर घड़ी का सैल वापिस डाल दिया कि उसकी टिकटिक से टप-टप दब जाए. अंदाजे से उसमें पंद्रह मिनट का अंतर कर देता हूं.

सिर कभी नीचे तो कभी गली में झांकता है...फिर से इजी चेयर पर बैठ जाता हूं... बालकनी में पांव पसारकर...एक चेहरे के कई रंग अब धुंधले से ही आंखों के सामने थे...सब मिलकर एक मटमैला चेहरा बना रहे थे...एक कोलाज जैसा... मासूमियत... बेचारगी... प्रेक्टिकलनेस... नफरत... बेइंतहा प्रेम... गुस्सा... अकड़... स्वाभिमान के रंगों से सजा कोलाज...और मैं रुंआसा-सा था....
आंखें एक ही रंग देखना चाहती हैं...या एक-दो रंग...रंग में घुले कई रंग नहीं...परतें भी नहीं...एक उधड़े तो दूसरी सामने आ जाए....
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