डायरी : जुलाई की एक रात
कहानी
डायरी : जुलाई की एक रात
दुष्यंत
लेखकीय डिस्कलेमरः यह एक सच्ची कहानी है, इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं वास्तविक हैं... और इसका
संबंध दुनिया के किसी भी इलाके के, किसी भी व्यक्ति से हो सकता है. यह मात्र संयोग
नहीं हो सकता और संयोग भी क्या, यह तो प्रकटतया दुर्योग है. अस्तु, लेखक की यह
आकांक्षा और शुभकामना है कि ये कथा अब सिर्फ कथा ही रहे, किसी के जीवन में घटित ना
हो.
अपनी छाती पर एक बड़ा सा पत्थर महसूस किया. और जैसे नींद खुल गई, खुद को पसीने से
तर पाया.
लगभग आधी रात का वक्त. जुलाई महीने की शुरुआत है. दिन में बारिश हुई थी, इसीलिए
शायद आज रात थोड़ी गर्म है. शायद कूलर का पानी खत्म हो गया. बिस्तर से उठकर खड़ा
हुआ. टेबल से टकराते-बचते लाइट जलाई. खिड़की के कूलर तक पहुंचा. पहले घड़ी देखी, सवा
बजा था. पता चला कूलर तो पानी से भरा हुआ है. कब सो गया था, पता ही नहीं चला. कूलर
तो ऑन ही नहीं किया था.
बालकनी से गली में झांका. गली सुनसान थी. सब बिल्डिंगों में अंधेरा था. एक बिल्डिंग
के रसोई जैसे लगते हुए हिस्से में रोशनी दिखी. सामने की बिल्डिंग की कॉमन सीढिय़ों
में एक लट्टू जल रहा है.
इतना चुप भी यह शहर हो सकता है क्या? मेरे सवाल का जवाब देने वाला कोई नहीं था.
...तभी हाईवे से आती ट्रक की भूं-भूं सुनाई दी. गर्मी की रात में भी इतनी दूर आती
है आवाज.
प्यास भी लगी थी. किचन में जाकर देखा तो वाटर कैम्फर खाली था. आज भरना भूल गया था.
टंकी के पानी की टैब से गिलास भरकर पी लिया और उसे दुबारा भरकर अपने बिस्तर के पास
रख लिया.
नींद आ ही नहीं रही है. कूलर चला लिया...पंखे को पांच पर कर दिया. टी-शर्ट उतार दी.
नीचे बरमूडे में ही था. गर्मी थी...शायद दिमाग में भी या दिमाग में ही थी. बालकनी
में चेयर खिसका ली- इजी चेयर.... दिमाग घूमने लगा...उठा और उठकर बिस्तर के पास रखे
स्टील के गिलास को मुंह में उड़ेल लिया. कुछ पानी बनियान पर भी गिर गया...गिर जाने
दिया...या पता ही नहीं चला. मेरा अपने ही हाथ पर नियंत्रण कहां था.
दोस्त का छोटा भाई राजू अंदर सोया हुआ है...दिनभर भटक के लौटा था. मल्टीनैशनल बैक
की मार्केटिंग जॉब का सच मेरे सामने लूटा हुआ था. ज्यादा थकान के कारण वो आज खाना
खाते ही सो गया था.
सोचा कोई किताब देख लूं...किताब उठाई तो अक्षर गोल-गोल घूमने लगे...बंद करके टेबल
पर रख दी...वापिस इजी चेयर के पास आया और उसे पकडक़े हुआ, गली में देखने लगा.
सामने का क्लिनिक आज बड़ा दिखाई दे रहा है...जैसे सिर्फ साइन बोर्ड का साइज 50 गुना
जूम कर दिया गया है.
सभी पड़ोसी मर गए हैं या सामूहिक रूप से कहीं चले गए हैं...कोई दिखता ही नहीं है...सब
लोग मुर्दा से सो रहे हैं...
मेरे फ्लैट के अंदर की लाइट चुभ रही थी, बालकनी से कमरे में दाखिल होकर स्विच बोर्ड
पर हाथ मारकर लाइट ऑफ कर दी और वापिस बालकनी में बैठ गया.
होश गुम सा था.
याद पर कुछ वाक्यों का कब्जा था-
‘ये जरूरी था क्या?’
‘ब्रेक मांगा था, ब्रेकअप नहीं’
‘हर बात को अदरवाइज क्यों ले रही है वो?’
‘कुछ भी बोलो-असर उल्टा ही होता है क्यों?’
‘इसने चुप रहने नहीं दिया और बोला तो बात उल्टी पड़ी.’
इजी चेयर चुभने लगी...गर्मी लगने लगी...उठा और कपड़े सुखाने के तार को हाथ से पकड़
लिया. इसे गर्दन पर लपेट लूं तो!
उठकर बिस्तर पर आया और आधा सा लेट गया...मच्छर खाने लगे. उठकर बालकनी का दरवाजा बंद
किया...ऑल आउट चेक किया. उसे खत्म हुए कई दिन हो गए हैं, दिन में होश नहीं रहेगा...तो
रात में मच्छर काटेंगे ही.
लेट जाता हूं, खेस ओढ़ लेता हूं. वॉल क्लॉक की टिकटिक से डर लगता है. उठ कर उसका
सेल निकालकर रख देता हूं. अब वो शोर भी नहीं है. ये और भी ज्यादा डरावना है...
टॉयलेट का नल टपकता है...डेढ़-दो मिनट में एक बार- टप-टप.
उठा तो देखा- टैप खराब है, ठीक ही नहीं करवाई. इसका अब कोई इलाज नहीं है...इतनी रात
गए तो.
बाथरूम से मेरे पिछले बर्थडे पर उसकी गिफ्ट की हुई कढ़ाईदार ब्लू डेनिम की शर्ट
झांक रही थी. बाथरूम का दरवाजा भेड़ दिया और वापिस आकर घड़ी का सैल वापिस डाल दिया
कि उसकी टिकटिक से टप-टप दब जाए. अंदाजे से उसमें पंद्रह मिनट का अंतर कर देता हूं.
सिर कभी नीचे तो कभी गली में झांकता है...फिर से इजी चेयर पर बैठ जाता हूं... बालकनी
में पांव पसारकर...एक चेहरे के कई रंग अब धुंधले से ही आंखों के सामने थे...सब
मिलकर एक मटमैला चेहरा बना रहे थे...एक कोलाज जैसा... मासूमियत... बेचारगी...
प्रेक्टिकलनेस... नफरत... बेइंतहा प्रेम... गुस्सा... अकड़... स्वाभिमान के रंगों
से सजा कोलाज...और मैं रुंआसा-सा था....
आंखें एक ही रंग देखना चाहती हैं...या एक-दो रंग...रंग में घुले कई रंग नहीं...परतें
भी नहीं...एक उधड़े तो दूसरी सामने आ जाए....
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मैं मासूम नहीं... मनहूस भी नहीं... इन सारी इंसानी कमजोरियों से युक्त एक साधारण-सा
युवा हूं... कुछ कुंठा... कुछ गुस्सा... बहुत-सा प्रेम... बहुत-से सपने और कुल
मिलाकर लगभग शून्य-सा एक निम्न-मध्यमवर्गीय युवा....
इसी सोच के बादल से भीग जाता हूं, ये गर्मी का पसीना था शायद जो घुलमिल गया था....
टेबल पर चार दिन के अखबार एक पुलिंदा बनकर पड़े हैं. रबड़ बैंड में लिपटे हैं तो
कुछ वैसे ही हॉकर के हुनर-से... दुनिया की कोई खबर नहीं है मुझे... अपनी तो है क्या?
ये अखबार क्यों छापते हैं लोग...जब चार दिन यूं बिना अखबार रह सकता हूं तो क्या
दुनिया और जिंदगी चल नहीं सकती...इनके बगैर. ...अब इस क्षण मर जाऊं तो मेरी खबर भी
इनके किसी पन्ने पर होगी. ऐसे ही पहुंचेगी उस तक भी. सब तक. शायद इसीलिए जरूरी होता
हो!
अपने बिस्तर पर लौटता हूं, सिरहाने से नहीं, दीवार से पीठ लगाता हूं...
आंखें बंद करता हूं...
मेरे कानों में गूंजता है-
‘अब कहने-सुनने को कुछ नहीं रह गया है’
‘अब हमें फिर-से अजनबी हो जाना चाहिए इस दुनिया की भीड़ में... इतने अजनबी कि दिख
जाएं तो पहचानें नहीं.’
थोड़ी देर में उठता हूं...
लाइट ऑन करके टाइम देखता हूं...
चार बजकर सैंतीस मिनट...
नींद तो नहीं थी...बेहोशी होगी...जो आ गई थी... अंदर के कमरे में देखा तो राजू सो
रहा था...मुझे मालूम है कि पिछले तीन दिन से जब भी रात में उसकी नींद खुलती है, मुझे
संभालने जरूर आता है, अगर उस वक्त जाग रहा होउं तो कहता है- ‘ भाई साहब, ठीक हो?
टेंशन मत लो. सो जाओ.’
कल तो वह डरते हुए आया, मैं नीमबेहोशी में था, या पता नहीं सोया हुआ था, मुझे हाथ
लगाकर संभाला और बोला था-
‘मैंने बुरा सपना देखा कि आपने आत्महत्या कर ली है.’
‘पागल है क्या? मैं ठीक हूं, तू जाकर सो जा’
याद करते हुए सोचा कि मैं ही पागल हूं वो नहीं. मैं लगभग हंसा. ठहाका लगाने का मन
हुआ. खुद को रोक लिया.
वहां से आते हुए यूरिनल जाने की इच्छा हुई... बस खड़ा रहके आया...वहम था,खाली हरारत
थी.
...फिर बालकनी तक आया... तीन-चार घरों में बत्तियां जल गई, रसोइयों में महिलाएं दिख
रही थीं...मैंने सोचा मैं तीन दिन से बिना कुछ खाये जिंदा हूं, फिर किचन क्यों होती
है घरों में...
एक गंजे पतले-से बूढ़े बाबा ताजा नहाए-से जोर-जोर से राम-राम करते हुए हाथ में लोटा
लिए दाएं हाथ की दूसरी गली में मंदिर की ओर मुंह किए तेज कदम चल रहे थे...
मैं भी अपने फ्लैट से निकला तो...
मेरी बिल्डिंग में मेरे फ्लोर के तीनों फ्लैट पर मुर्दा खामोशी थी. सीढिय़ां उतरकर
पहले नीचे गया... अपनी बिल्डिंग के पार्किंग स्पेस को पार कर गली में खडा हो गया.
गली में कोई नहीं था, मेरी बिल्डिंग से तीसरी बिल्डिंग के बाहर बिजली के खंभे पर एक
स्ट्रीट ट्यूबलाइट जल रही थी, गली में एक ही लट्टू, एक ही स्ट्रीट ट्यूबलाइट और गली
में अकेला मैं, अकेला मानुषजात. मुझे इस अकेलेपन में डर लगने लगा. तो वापिस अपनी
बिल्डिंग की ओर मुड गया. पहली मंजिल पर अपने फ्लैट को भूलते हुए सीधे चौथी मंजिल पर
छत पर चला गया.
वहां पानी की टंकियों की भरने की आवाजें आ रही थीं, वो भी मुझे चुभ रही थीं... ऊपर
से देखने पर शहर अब भी उंघ रहा था...
कान बज रहे थे-
‘इनफ इज इनफ...’
‘बस अब हम साथ नहीं चल सकते...’
इसी शहर में सवा दशक गुजारा है मैंने... कहने-सुनने को कोई नहीं है... ये कमाई है
मेरी.... हालांकि हर जगह -कॉफी हाउस, मॉल, मल्टीप्लेक्सेज, बुकशॉप, कहीं भी, ‘हैलो’
और ‘नमस्ते’... ‘क्या हाल है’ कहने वाले लोग मिल जाते हैं...
तभी एक चेहरे ने ‘हैलो’ कहा...
यह चेहरा उसी का था, जिसने चार दिन पहले मेरी जिंदगी से जाने की घोषणा कर दी है...
मैंने उससे पूछा- 'कैसी हो?'
उधर से कोई जवाब नहीं आया-
आना ही नहीं था.
चेहरा और मटमैला हो गया था.
मंदिर में आरती शुरू हो गई... पिछले पांच साल से इसी धुन से होती है... हर भजन की
एक ही धुन लगती है... कभी कोई अंतर महसूस नहीं होता... आज भी...
उजाला-सा हो रहा है...
गली में लोगों की आवाजाही बढ़ गई थी...
मैं डर गया... छत से सीढिय़ों की ओर कांपते हुए भागा...
भागते हुए ही सीढिय़ों से उतरा और अपने फ्लैट में घुसते हुए बिस्तर में घुसकर तुरंत
खेस को मुंह पर डालकर दो दीवारों के बीच में कोने की ओर मुंह कर लिया... ये दुनिया
का आखिरी कोना है शायद....
मैं अपने दड़बे में सुरक्षित हूं...
05.05.2011, 16.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित