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लादेन के अनदेखे तथ्य

बाईलाइन

 

लादेन के अनदेखे तथ्य

एम जे अकबर


एक तीर से दो शिकार को आमतौर पर इस तथ्य के बावजूद बहुत वाहवाही मिलती है कि दूसरा शिकार तो महज संयोग था. शिकार में जो उपयोगी है, वह अन्य परिस्थितियों में कम भाग्यशाली हो सकता है.

लादेन

लंबे समय से खोजे जा रहे ओसामा बिन लादेन के अंत के लिए गए चार अमरीकी हेलीकॉप्टरों ने अपना प्राथमिक उद्देश्य पा लिया. दुनिया अब उनके दूसरे शिकार की बर्बादी के आसपास विचरने में व्यस्त है. इस प्रक्रिया में उन्होंने पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली संस्थान, उसकी सेना को भी पंगु बना दिया है, ऐसी सेना, जिसे अक्सर उसके समर्थकों द्वारा राष्ट्रीय स्थायित्व और एकीकरण के लिए अनिवार्य बताया जाता था. बहानों और झूठे दावों का दौर खत्म हो चुका है.

ओसामा की हत्या कुछ हद तक ‘संयुक्त अभियान’ का नतीजा था, इस गप्प का छद्म आवरण बहुत पतला था, जो थोड़ी सी सार्वजनिक तहकीकात में ही तार-तार हो रहा है. चार मई को पाकिस्तान के सूचना मंत्री फिरदौस आशिक अवान ने वहां की संसद में स्वीकार किया कि अमरीकी हेलीकॉप्टरों द्वारा ‘मैप ऑफ द अर्थ’ फ्लाइंग तकनीक का प्रयोग करने के कारण उनका पता नहीं लगाया जा सका. कड़वा तथ्य है : अमरीका के सामने पाक सेना पुंसत्वहीन है.

सिर्फ पुरुषत्वहीन ही बंदर घुड़की का सहारा लेते हैं. पाकिस्तानी सेना ने बड़े आडंबरपूर्ण ढंग से अमरीका को पाक संप्रभुता का दुबारा उल्लंघन करने पर ‘भयानक नतीजे’ भुगतने की ‘चेतावनी’ दी. अमरीका अफसोस में नहीं, तिरस्कार में गुर्राया और उसने शुक्रवार को दत्ता खेल क्षेत्र में निशाने साधने के लिए ड्रोन भेज दिए. इस हमले में 12 लोग मारे गए, जिन्हें, जाहिर है, ‘आतंकवादी’ बताया गया. सैन्य कार्रवाइयों के लिए वाशिंगटन, इस्लामाबाद की अनुमति नहीं तलाशता.

कम जाहिर तथ्य है, फिर भी तथ्य तो है : पाकिस्तान के सैन्य प्रमुखों, जिन्होंने अयूब खान के रक्षा मंत्री बनने के क्षण से रक्षा नीति को नियंत्रित किया है, वे राष्ट्रीय सेना को किराए के टट्टुओं की फौज में बदल चुके हैं. जो बजवइयों को भुगतान करते हैं, वही धुन भी तय करते हैं.

ब्रिटिश राज ने देसी रियासतों के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप में नव-उपनिवेशन को प्रखर बनाया और आकार दिया था. सार यह कि नव-उपनिवेशवाद शर्तों के साथ मिली स्वतंत्रता का अनुदान है, जिसके साथ आप कवायद नहीं कर सकते. यह सुरक्षा तंत्र के आदान-प्रदान का रूप है, जिसमें ऊंची सत्ता मित्रपक्ष की सलामती की गारंटी देती है, जबकि मित्रपक्ष उस क्षेत्र में ऊंची सत्ता के हितों की रक्षा करता है. इसलिए जब पाकिस्तानी सेना को वैकल्पिक नीति की जरूरत महसूस होती है, जो वाशिंगटन द्वारा अस्वीकार्य हो सकती है, तो उस पर दोमुंही बातों और कपट के लिए दबाव होता है.

जब आईएसआई को परिसंपत्तियों के इस्तेमाल की जरूरत होती है और जब इसकी जरूरतें अमरीकी हितों को खटकती हैं, तो इसे दूरी बनानी पड़ती है और खंडन-मंडन करना पड़ता है. इससे उन संस्थानों के साथ इसके रिश्तों को समझा जा सकता है, जिन्हें इसने या तो पैदा किया है या पाला-पोसा है.

परवेज मुशर्रफ अनोखे बुजुर्ग हैं, जिनका सबसे असरदार हथियार हमेशा उनके स्वर यंत्र में सुरक्षित रहा है. उन्हें बताया जा रहा है कि कैसे सेना से महज कुछ कदमों की दूरी पर ओसामा शानो-शौकत से रह रहा था. यह वाजिब भी है, क्योंकि ओसामा ने एबटाबाद को अपना घर तब बनाया, जब मुशर्रफ राष्ट्रपति थे. आर्मी के अटॉर्नी होने के नाते, हालांकि मुशर्रफ नाउम्मीद हैं, वे सोचते हैं कि एक सुविधाजनक याददाश्त के साथ आवाज ऊंची करना तर्क को मजबूत करता है.

देशभक्ति के नाम पर सेना ने एक तरह से बाकी पाकिस्तान से अपनी स्वतंत्रता ही घोषित कर दी है. नतीजे हर कोई देख सकता है.

अनदेखा किए जाने के लिए एक कहानी बहुत ज्यादा मूल्यहीन है. अफगानिस्तान के पूर्व गुप्तचर प्रमुख ए. सालेह याद करते हैं कि जब चार साल पहले उन्होंने मुशर्रफ को बताया कि ओसामा एबटाबाद में या उसके आसपास छुपा है, तो मुशर्रफ फट पड़े थे, ‘क्या मैं बनाना रिपब्लिक का राष्ट्रपति हूं?’

यह प्रश्न शब्दाडंबरपूर्ण है. मुशर्रफ सरीखे तानाशाहों ने मोहम्मद अली जिन्ना के पाकिस्तान को बनाना रिपब्लिक में तब्दील कर दिया है. मैं कई बार हैरान होता हूं कि पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष भारतीय सेनानायकों के दंश से ज्यादा तिलमिलाते हैं या अफगानों के तिरस्कार से. पिछले बुधवार को काबुल के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता जनरल जाहिर अजीमी ने सार्वजनिक तौर पर आश्चर्य व्यक्त किया : ‘अगर पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी अपनी राष्ट्रीय अकादमी से 10 या 100 मीटर दूर स्थित घर के बारे में नहीं जानती, जहां पिछले छह साल से दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी रह रहा था, तो फिर यह देश अपने रणनीतिक हथियारों की देखरेख कैसे कर सकता है?’ सिर्फ काबुल ही नहीं, समूचा पाकिस्तान एक यथोचित जवाब के इंतजार में है.

पाकिस्तानी सेना की अधोगति आर्थिक भ्रष्टाचार का परिणाम नहीं है. यह तो कहानी का एक छोटा हिस्सा है. यह खुद को नष्ट करने वाली है, क्योंकि इसमें जवाबदेही का नितांत अभाव है. यह जो भी करना चाहती है, उस पर सरकार की कोई शाखा या संसद, कोई भी सवाल नहीं उठा सकता. देशभक्ति के नाम पर सेना ने एक तरह से बाकी पाकिस्तान से अपनी स्वतंत्रता ही घोषित कर दी है. नतीजे हर कोई देख सकता है. सीमाओं पर अभेद दीवार बनने की बजाय पाकिस्तानी सेना रुई का झिरझिरा गट्ठा बन गई है.

आप रुई में लिपटकर सिर्फ आराम से सो सकते हैं, लेकिन किसी देश के निगहबानों को अपनी आंखें खुली रखने की जरूरत होती है.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

08.05.2011, 00.49 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Deepak Verma [] Ranchi - 2011-05-08 15:42:36

 
  Have you seen the survey by university of Cambridge ?

A majority of respondents also challenge Western depictions of a now weakened al Qaeda. 86% expect the violence from extremist groups to remain constant or increase in Pakistan following recent events in Abbottabad and 82% predict similar outcomes for Afghanistan. Over half think that the celebrations in the US following the announcement of the death of Osama Bin Laden will incite further violence against the US. These attitudes point to a potential new challenge for Western policy-makers, namely that Bin laden might become more useful to groups such as al Qaeda now that he’s dead. His star had been arguably waning in rhetorical terms across the Islamic world for the last half decade, as pan-Arabic calls for democracy followed the Sunni rejection of al Qaeda in Iraq and the fragmentation of the Afghan insurgency into ever more parochial factions. As regional experts such as Ed Hussain now warn us, bin Laden’s death may rehabilitate his status as the mythological archenemy of Washington, and even promote him to a new kind martyred icon, despite US efforts to hide his body and prevent the emergence of a ‘Laden shrine’.

This is not to say that Pakistanis are fixated on the issue of militant extremism. Survey results equally show that if the preoccupation of Western governments in Pakistan is counter-terrorism, then the single largest preoccupation of Pakistani people themselves is the problem of corruption. When asked what the main priorities of the Pakistani government should be, eliminating corruption came a clear top of the list, followed by education and literacy, economic growth and employment. Only then, in fifth place out of eight, came reducing terrorism, followed by political stability, healthcare and improving relations with India. By a similar token, when asked what democratic values they would most like to see improve in Pakistan, respondents ranked a transparent judicial system top of the list, followed by equal rights.

Interestingly for the bigger picture, this emphasis on ‘equal rights’ fails to translate into support for gender equality or women’s rights. Reactions to the now infamous decision of the Pakistani Supreme Court to acquit five men originally accused of raping Mukhtar Mai were closely divided, with 36% in support of the verdict, while 23% were neutral and 25% disagreed. These numbers underscore an important caveat with broader implications, as Western policy-makers pledge to guide the Muslim world towards a more liberal, pro-Western form of modernity. Even if politicians succeed in fostering a peaceful modern state of Pakistan —or Egypt or Tunisia or Libya – the growing empowerment of peoples across the Arab-Islamic world also means the expansion of certain principles and values that are inimical to the traditional motifs of Western liberal society, from social codes of shame and honour to intrinsic tendencies towards gender inequality and a closer relationship between church and state.
 
   
 

काजल कुमार [kajalkumar@comic.com] दिल्ली - 2011-05-08 10:17:22

 
  पाकियों के बारे में कोई क्या कहे :) 
   
 

shyam bihari shyamal [shyambiharishyamal1865@hotmail.com] Varanasi ( up ) INDIA - 2011-05-08 05:33:05

 
  बहुत जीवंत टिप्पणी। सचमुच दृष्टि-विस्तार करने वाली। साफ-साफ बात करने के लिए माननीय श्री एमजे अकबर और यह हमें उपलब्ध कराने के लिए आपको बधाई। 
   
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