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 रमन राज का मरतो फांदा

मुद्दा

 

रमन राज का मरतो फांदा

प्रशान्त दुबे  कोंडागांव, बस्तर से लौटकर


हालांकि चर्चा तो रोजगार गारंटी पर केन्द्रित थी पर धीरे-धीरे यह चर्चा कुछ अलग दिशा में मुड़ गई, जब यह पूछा गया कि गांव में रोजगार गारंटी आने से क्या हुआ ?

बानू

लोगों ने अप्रत्याशित रूप से कहा कि कुछ भी नहीं! यह मेरे लिये चौंकाने वाला जवाब था. मनमोहन सिंह कंपनी और रमन राज की कलई खोलने वाला यह कथन इतनी आसानी से कह दिया गया.

लेकिन गांव में काम तो हुआ है, यह पूछने पर उन्होंने कहा कि डेढ़-डेढ़ साल तक तो मजदूरी ही नहीं मिलती, तो क्या करें ? जिज्ञासा और बढ़ी कि फसल है नहीं, काम है नहीं, तो लोग करते क्या हैं?

अंदर की और धंसी आंखों वाला एक नवयुवक बोला- “बाहर जाते हैं साहब, काम की तलाश में.”

“बाहर यानी कहां?”

“तिरचनगढ़ यानी तमिलनाडु या फिर कर्नाटक.” यह कहकर वह चुप हो गया और मेरे मन में सवाल जन्मने लगे- “तो क्या वहां ज्यादा पैसा मिलता है?”

यह सुनकर तो वह आग-बबूला हो गया. यहीं से चर्चा रोजगार गारंटी योजना को छोड़कर बानू की ओर मुड़ गई. बानू यानी छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में कोंडागांव ब्लॉक की खजगांव पंचायत के बालासार गांव के भारत ओझा का बेटा. यही कोई 7-8 महीने पहले काम की तलाश में भटकते हुये पास के ही गांव मुनगापदर के सीताराम से उनकी मुलाकात हो गई. सीताराम ने उनसे कहा कि बोरगाड़ी में काम करने पर 5000 रूपये प्रतिमाह मिलेगा. काम करोगे! बानू ने ‘हां’ कह दी. उसने कहा कि गांव के ही और लड़के तैयार कर लो. बोरगाड़ी यानि टयूबवेल खोदने की मशीन.

बानू और उसके दोस्तों ने रातों-रात तैयार किये 10 और लड़के. यानी 11 की टीम तैयारी हुई. सीताराम को संदेश भेजा गया. सीताराम भी दो दिन बाद ही सभी को लेकर चल दिया. तमिलनाडु की ओर.

तमिलनाडु में काम क्या होगा, पैसे कितने मिलेंगे, रहना कहां होगा, खाना-खुराक अलग से होगी या इसी पैसे में शामिल होगा? ऐसे कई सवाल बानू ने सीताराम से पूछे लेकिन सीताराम ने किसी भी सवाल का संतुष्टिदायक जवाब नहीं दिया.

दो दिन की यात्रा के बाद पहुंचे तमिलनाडु. बानू कहते हैं- “सीताराम ने यहां से हम सबको अलग-अलग जगह भिजाना शुरू किया तो हमें शंका हुई, उसने कहा कि सभी को एक साथ काम नहीं मिलता है.”

बानू के अनुसार “मुझे तिरचनगढ़ में एक बोरगाड़ी मालिक के पास भिजाया गया. यहां से मैं बोरगाड़ी में सवार हो गया. दो-तीन दिन तो अच्छा लगा, लेकिन उसके बाद 15 दिन बाद ही मैंने पहली बार पैसे मांगे तो मेरी पिटाई शुरू कर दी. ठेकेदार के लोगों ने खूब मारा. वहां हमारे पास काम होता था नल का गड्ढ़ा खोदना, मालिक और खुद का खाना बनाना और थोड़ी देर ही सोना. इसके बाद हमने सीताराम से बात करने की बहुत कोशिश की लेकिन उससे बात नहीं हुई. गाड़ी मालिक बस यही कहता था कि दे दिये पैसे सीताराम को, उसी से लेना.”

बानू लगभग 4 माह वहां रहे, लेकिन उन्हें एक बार भी पैसा नहीं मिला.

बानू बताते हैं- “काम करते-करते इस दौरान मैं तिरचनगढ़ से कर्नाटक, कर्नाटक से महाराष्ट्र और वहां से मध्यप्रदेश के इंदौर आया. इंदौर का नाम पहले सुना था. तो मैंने यहां से भागने की सोची. नलकूप खुदने पर जो लोग खुशी से कुछ देते थे, उसी पैसे को मैंने जोड़ा था. लोगों से पूछा, बताया कि भोपाल से रायपुर के लिये सीधी गाड़ी मिलेगी. भोपाल आने पर आधे पैसे खत्म हो गये. ना खाना था, ना पूरा किराया आदि. फिर भोपाल आने पर 6 दिन मैंने स्टेशन के बाहर की होटल पर बर्तन मांजने का काम किया. 6 दिन में 300 रूपये कमाये और वहां से फिर रायपुर आया और फिर रायपुर से कोंडागांव.”

यदि पैसे नहीं दे रहे थे, तो पहले क्यूं नहीं भागे ? इस सवाल के जवाब में बानू कहते हैं- “बांधकर रखते थे साहब! कई बार पांव में कड़ी ड़ाल देते थे. फिर ना तो हम वहां की भाषा जानते थे और न ही उनका खान-पान. उनके आदमी भी रहते हैं यहां-वहां भागते भी तो कहां जाते. उनके आदमी पकड़ कर वापिस ले आते हैं. इसलिये तो फिर इंदौर आने पर मैं भागा.”
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Bhujit Doshi [bhujitdoshi@gmail.com] Raipur - 2011-05-22 14:29:03

 
  छत्तीसगढ़ पूरा का पूरा दीमक का एक घर है.... बानू की बात और राघवेन्द्र साहू, राज गोस्वामी और शुक्ल जी की प्रतिक्रिया पढ़ कर छत्तीसगढ़ के हालत को अच्छी तरह समझा जा सकता है. दिसम्बर 2003 के बाद कांग्रेस की भूमिका इस के लिए जिम्मेदार है. न कांग्रेस इतनी कमज़ोर होती ना खाखी निक्कर वाले प्रदेश का ये हाल कर पाते. 
   
 

raghwendra sahu [raghwendrasahu@igmail.com] durg - 2011-05-18 16:47:24

 
  वाकई में दुर्भाग्यजनक है कि छत्तीसगढ़ के लोगों के पास ही काम नहीं है. इसके लिए सीधे सरकार जिम्मेदार है. क्योंकि बाहर के प्रदेशों से लोग आकर काम करते हैं और स्थानीय लोगों का हक़ मारा जाता है. सरकार के नुमाइंदे ये तर्क देते हैं कि यहाँ के लोग काम नहीं करना चाहते. जबकि जान बूझकरप यहाँ के लोगों की अनदेखी सिर्फ सरकार और प्रशासन की लापरवाही के कारण ही होती है. रही बात रमण सरकार की तो वाकई में यहाँ की मीडिया वो काम नहीं कर रही जो करना चाहिए केवल सरकार के पी आर ओ की तरह ही काम कर रही है. 
   
 

keshav sharma [kaish.142@rediffmail.com] Raipur(c.g) - 2011-05-16 06:22:39

 
  मनमोहन और रमन राज एक जैसे ही है.आम जनता बदतर हालत की तरफ है. करप्शन चरम पर है. नौकरशाह मनमानी कर रहे हैं. सरकार संवेदनशील नहीं है.प्रशासन जबाबदेह नही रह गया.खैरातों की योजना चल रही है. ऐसे में रमन राज में भ्रष्टाचार तो होना ही था. 
   
 

vineet chauhan [] bilaspur - 2011-05-13 06:02:31

 
  very good news thanks bhai. 
   
 

Raj Goswami [goswami.raj@rediffmail.com] Bilaspur - 2011-05-12 06:57:34

 
  छत्तीसगढ़ दीमक का घर है बाहर से तो कई मंजिला दिखता है,लेकिन अंदर से खोखला है.
नरेगा में सबसे अधिक भ्रष्टाचार छत्तीसगढ़ में.....
रमन सरकार का मरतो फांदा ज्यादा भयानक,जिसके कारण ,गांव वालों को परदेस का मरतो फांदा स्वीकार......
अस्सी फीसदी गांव के नवयुवकों के साथ कमोबेश यही कुचक्र की स्थिति है.
 
   
 

अरुण कान्त शुक्ला [shukla.arunkant@gmail.com] रायपुर - 2011-05-10 18:48:19

 
  ऐसी घटनाएं प्रदेश में द्शकों से होती आ रही हैं | दुर्भाग्य है कि इनके खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई नहीं है | मजदूर संगठनों से लेकर राजनैतिक दलों तक सब अपने अपने स्वार्थों में मस्त हैं | पहले यह ग्रामीण क्षेत्रों में था , पलायन अब आदिवासियों तक पहुँच गया है | नरेगा में देश में सबसे अधिक भ्रष्टाचार छत्तीसगढ़ में है | राजनीतिक और जनविरोध के अभाव में रमण सबसे अधिक भ्रष्ट व्यवस्था को बनाए रखकर भी सबसे अधिक सुखी मुख्यमंत्री हैं | दो रुपये किलो चावल उनके लिये भ्रष्टाचार करने के लायसेंस के सामान है | 
   
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