ये रास्ते हैं लूट के
बात निकलेगी तो...
ये रास्ते हैं लूट के
रघु ठाकुर
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा बुलाई गई प्रदेश
जनपद पंचायतों के अध्यक्षों की बैठक में कुछ दिलचस्प मांगें सामने आईं, जिस पर बहुत
देर तक जनपद पंचायत अध्यक्षों ने हंगामा किया. उन्होंने अपनी 13 सूत्रीय मांगों के
साथ सरकार पर दबाव डाला कि ये सभी मांगें तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर ली जायें.
अब जरा इनमें से कुछ मांगों पर गौर करें- (1) उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष एवं
विधायकों के समान अधिकार और सुविधायें दी जाये. (2) जनपद पंचायत अध्यक्षों को
वित्तीय वर्ष में 60 लाख रूपया विवेकाधीन राशि दी जायें. (3) 1994 जैसे अधिकार तथा
वित्तीय अधिकार जनपद अध्यक्षों को दिये जाये. (4) जनपद अध्यक्षों को प्रतिमाह
25000, उपाध्यक्षों को 20000 और सदस्यों को 10000 रूपया मासिक वेतन दिया जाये. (5)
अध्यक्षों को मुख्य कार्यपालन अधिकारी की सीआर बुक का अधिकार हो. (6) वाहनों पर
लाल-पीली बत्ती लगाने का अधिकार हो (7) अध्यक्षों के लिये निज सहायक की व्यवस्था की
जाये.
इसमें कोई संदेह नहीं कि स्व0 राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में पंचायतों को
अधिकार देने वाला तथा निर्धारित अवधि में चुनाव कराने हेतु संविधान संशोधन पारित
हुआ था. जिसके माध्यम से राज्य सरकारों को पंचायतों यानी स्थानीय निकायों के चुनाव
कराना अनिवार्य किया गया था तथा इन्हें टालने पर केन्द्र सरकार राज्यों को दी जाने
वाली अनुदान की राशि को रोक सकती है.
कई राज्यों को अनिच्छा के बावजूद केन्द्र के इसी अधिकार के प्रयोग के दबाव में ही
चुनाव कराना पड़ा अन्यथा इस संविधान संशोधन के पहले 10-15 वर्षो तक यह अमूमन ये
संस्थायें भंग रहती थी. 1994 में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में पंचायतों
को अधिकार देने का महत्वपूर्ण निर्णय हुआ था तथा पंचायती राजप्रणाली के माध्यम से
पंचायतों, जनपद पंचायतों एवं जिला पंचायतों को अनेकों तरह के अधिकार दिये गये थे
बल्कि कुछ विभागों के तत्संबंधी बजट भी जिला पंचायतों के बजट में शामिल कर दिये गये
थे. जिला पंचायतों के अध्यक्षों को तथा जनपद अध्यक्षों के विश्रामगृहों आदि में
ठहरने संबंधी पात्रता के भी नियम बनाये गये. निःसंदेह स्थानीय संस्थाओं का
सशक्तिकरण दिग्विजय सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम था. हालांकि इसका प्रयोग पूर्ण
विचार कर किया गया, ऐसा प्रतीत नहीं होता. क्योंकि कई विषयों पर राज्य शासन व जिला
पंचायतों या जनपद पंचायतों के बीच अधिकारों के परस्पर हस्तक्षेप की संभावनाएं बनी
थीं. तथा जिला पंचायतों के सीईओ एवं जनपद पंचायतों के सीईओ के स्थानांतरणों व
प्रशासनिक नकेल राज्य शासन के ही पास थी जिसका इस्तेमाल कर वे अपना नियंत्रण बखूबी
रख पाते थे.
चूंकि जिला पंचायतों से लेकर जनपद पंचायतों तक के लिए वित्तपोषण की व्यवस्था
मुख्यतः राज्य शासन के हाथ थी तथा केन्द्रीय अनुदान भी राज्यों के माध्यम से ही
पहुंचता था अतः आर्थिक व प्रशासनिक अधिकारों के दबाव की मनःस्थिति पंचायतों की थी.
मणिशंकर अय्यर ने केन्द्रीय पंचायत मंत्री रहते हुए पंचायतों को सशक्त बनाने के लिए
अच्छे कार्य किये थे तथा उन्हें केन्द्रीय अनुदान की कुछ राशि सीधे पहुंचाने की
व्यवस्था नियमों में की थी. इसके भी अच्छे परिणाम सामने आये तथा विभिन्न स्तरीय
पंचायतें यद्यपि पूर्णतः नहीं परन्तु कुछ-कुछ अपने सहारे पर खड़ी हो सकीं. यद्यपि यह
भी तथ्य है कि पंचायती राज विकेन्द्रीकृत प्रशासनिक प्रणाली का यह ढांचा न तो
महात्मा गांधी के अनुरूप था और न ही स्व. डॉ. राममनोहर लोहिया के चैखम्भा राज्य के
अनुकूल.
महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज्य एक बड़ी आदर्श कल्पना थी जिसमें ग्राम अपने आप में
पूर्ण स्वतंत्र इकाई होगी. स्व. राममनोहर लोहिया ने चैखम्भा राज्य की कल्पना कर
शासन के अधिकारों को चार खम्भों के मकान में बदलने का विचार किया था जिसमें रक्षा,
विदेश नीति, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार जैसे बड़े प्रश्न केन्द्र सरकार के पास राज्य
स्तरीय विषय राज्य सरकार के पास तथा शेष सभी विषय जिला एवं पंचायतों के पास होगें.
परन्तु जिस प्रकार वह लागू हुआ तथा जो मनःस्थिति मतदाताओं और जनप्रतिनिधियों की
रही, उसमें एक अच्छे प्रयोग की शुरूआत दुखांत कथानक में बदल गयी तथा विकेन्द्रीकृत
प्रशासन की कल्पना विकेन्द्रीकृत भ्रष्टाचार की कहानी में बदल गयी.
भारतीय राजनीति एवं हमारे ग्रामीण समाज की जो परिवारवाद, सामंतवाद, बेईमानी पक्षपात
जातिवाद जैसी बीमारियां हैं, वे भारतीय लोकतंत्र की भी कमजोरियां बन गई हैं और
पिछले दिनों पंचायती राज लागू करने के जो प्रयास सरकारों ने किए, उनमें भी ये
विकृतियां फैल गई.
आज पंचायतों के चुनाव भी खूब महंगे होने लगे हैं. एक जिला पंचायत के अध्यक्ष ने
मुझे बहुत शान से जिला पंचायत का चुनाव जीतने के लिए 3 करोड़ रूपये खर्च करने की बात
बताई. यानी मतदाताओं को लाखों रूपये देकर खरीदा गया और अब तो स्थिति इतनी बदतर है
कि बड़े-बड़े सरकारी दलों के तथाकथित प्रत्याशियों को अपनी ही पार्टी के वोट लेने के
लिए पैसा देना होता है.
1992-93 में जब पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल बिहार में जनता दल के
राज्यसभा के प्रत्याशी के तौर पर नामजद हुए और नामांकन करने पटना पहुंचे तब उस समय
बिहार के मुख्यमंत्री लालूप्रसाद ने उन्हें बताया कि जनता दल के विधायकों को भी
कितने-कितने रूपये देना होगा. इतना ही नहीं उन्होंने अपने दल के विधायकों को श्री
गुजराल को राज्य सभा का टिकट देने का तर्क समझाते हुए कहा कि गूजर समाज के हैं और
पिछड़े वर्ग में आते हैं. यद्यपि यह बातें तथ्यपरक नहीं हैं.
रूपयों की यह बीमारी नगरपालिकाओं और नगर-निगमों, जिला पंचायतों से लेकर जनपद पंचायत
और अब ग्राम पंचायतों तक फैल चुकी हैं. जनपद पंचायतों के अध्यक्षों की मांगों का
विश्लेषण करना होगा और उनकी तार्कितता और परिस्थितियो का भी विवेचना करनी होगी.
1960 के दशक के बाद से सांसद और विधायकों की समाजसेवा की भावना बदल चुकी है. जिस
संविधान सभा ने भारत का संविधान बनाया, उनके सदस्य लोग जो बड़े-बड़े नाम वाले लोग थे
जिसमें ऐसे वकील भी थे जिनकी उस जमाने में लाखों रूपयों की प्रतिमाह की आमदनी हुआ
करती थी, परन्तु जब वे संविधान सभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होकर दिल्ली
पहुंचे तब उन्होंने वेस्टर्न कोर्ट (सरकारी मकान) के कक्ष में ही अपना निवास बनाया.
मेरी जानकारी में ऐसा उदाहरण नहीं है, जहां संविधान सभा का कोई सदस्य अपने परिवार व
बीबी बच्चों को लेकर दिल्ली रहने गया हो क्योंकि वे यह मानते थे कि उनकी दिल्ली
यात्रा और दिल्ली रहना अस्थायी निवास है. जिसके लिए किसी मकान की अन्य सुविधा की
आवश्यकता नहीं है.
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संविधान लागू होने के बाद भी 50 के दशक में लगभग ऐसी ही स्थिति रही. 60 और 60 के
दशक के बाद निर्वाचित सांसदों की मनोवृतियों में फर्क आना शुरू हुआ तथा वेस्टर्न
कोर्ट और इस्टर्न कोर्ट के एक-एक कमरे के निवास से निकलकर नार्थ एवेन्यु और साउथ
एवेन्यु और विट्ठलभाई पटेल भवन के दो-दो कमरों वाले फ्लेटों में सांसदों ने जाना
शुरू कर दिया और अब स्थिति यह है कि एक-एक सांसद को परस्पर जुड़े हुए दो-दो फ्लेट्स
दिए जा रहे हैं. जिसमें एक में वे और उनका परिवार रहेगा और दूसरे में उनके समर्थक
रहेंगे.
60 के दशक से सांसदों ने अपनी सुविधाओं को बढ़ाने पर ध्यान देना शुरू किया और 70 के
बाद तो लूट की होड़ मच गई. अब सांसदों के लिए फ्लेट्स के साथ-साथ चतुर्थ श्रेणी
कर्मचारियों के अतिरिक्त सिक्योरिटी गार्ड भी हैं. गाड़ी खड़ी करने के लिए गैरेज भी
है. वेतन बढ़कर 1,00,000 रूपये तक पहुंच गया है. देश-विदेश के लिए 1 लाख टेलीफोन काल
प्रति वर्ष मुफ्त है. हजारो यूनिट बिजली मुफ्त मिलती है. क्षेत्र का भत्ता, निजी
सहायक का भत्ता, यात्रा भत्ता, क्षेत्र का दौरा करने के लिए सरकारी गाड़ी और उसके
लिए मुफ्त ईंधन, मूल निवास स्थान तक के लिए सड़क का निर्माण आदि कितनी ही सुविधायें
प्राप्त हो चुकी हैं. इसके अलावा रेल के दो प्रथम श्रेणी के एक सहयोगी के लिए एसी
द्वितीय श्रेणी और एक स्लीपर क्लास की आरक्षित यात्रा निःशुल्क कर दी गई है. यानी
अब यात्रा सांसद की नहीं होती है बल्कि सांसद के अमले की होती है. सांसद पति-पत्नी
को भी हवाई यात्रा मुफ्त दी गई है. इतना ही नहीं, उनके संसदीय क्षेत्र के जिला
मुख्यालयों में और कही-कही राजधानी के मुख्यालयों में भी मुफ्त सरकारी निवास दिया
गया है.
आजकल एक नया चलन सांसदों और पूर्व सांसदों को सस्ते दरों पर मंहगे इलाकों यानी पाश
इलाकों में सरकार बना कर मकान बेच रही है. जिन मकानों को वे 10-15 लाख में खरीदते
हैं और वह भी सस्ते ब्याज की आसान किश्तों पर, उन मकानों के एक-एक हिस्से को किराये
पर उठाकर वे साल में औसतन 4-5 लाख रूपये केवल किराया कमाते हैं. कई ने अपने ऐसे
आवंटित मकानों को खुले बाजारों में करोड़ों रूपये में बेच दिया है. सुविधाओं की यह
होड़ और लिप्सा बढ़ती चली जा रही है.
1976 में पहली बार श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने पूर्व सांसदों की पेंशन देने
की बात कही थी, जो अब विस्तारित हो कर कर परिवार पेंशन का रूप ले चुकी है तथा जिसकी
राशि निरंतर बढ़ती चली जा रही है. सांसदों को निःशुल्क चिकित्सा की व्यवस्था है और
वह देश-विदेश कहीं भी मिल जाती है. पूर्व सांसदों को भी वही सुविधा है. माननीय
विधायक आज भी इस होड़ से कैसे बच सकते हैं और लगभग सांसदों के समान ही सुविधायें
विधायकों और पूर्व विधायकों को भी मिलने लगी है.
छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्य में पूर्व विधायकों को भी पत्नी सहित हवाई यात्रा की
सुविधा प्रदान की गई है. जैसा कि कभी-कभी अखबारों में चर्चा आती है कि चांद पर भी
दुनिया बसाने की तैयारी है. ऐसे में अगर कुछ बात बनी तो मुझे लगता है कि भारत के
माननीय पूर्व सांसदों और विधायकों को भी सरकारें चांद पर फ्लैट का प्लाट और वहां
जाने-आने की निःशुल्क सुविधा अवश्य उपलब्ध करायेंगी.
सरकारी खजाने के लूट की इसी होड़ में अब जिला पंचायतों के अध्यक्षों और नगरपालिकाओं
के अध्यक्षों, नगर-निगमों के महापौर और पार्षदों को वेतन, टेलीफोन आदि की भी
सुविधाएं दी गई है. जिला पंचायतों के अध्यक्षों को निजी सहायक, टेलीफोन, मकान तथा
कार व दफ्तर आदि की सुविधायें दी गई हैं. ये सुविधायें महापौरों और नगरपालिकाओं के
अध्यक्षों को भी है. इसलिए जब विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, महापौर और नगरपालिकाओं
के अध्यक्ष सुविधाओं की लूट में लगे है तब भला जनपद अध्यक्ष कैसे पीछे रहें. इसी
तर्ज पर वे भी सुविधायें मांग रहे हैं.
बात फिर से भोपाल की. भोपाल में जनपद पंचायतों के अध्यक्षों के सरकारी सम्मेलन में
जो हंगामा हुआ और मुख्यमंत्री और पंचायत मंत्री के समक्ष सुविधाओं की मांग को लेकर
जो मुठभेड़ हुई, उसके लिए जनपद अध्यक्षों से ज्यादा जबावदारी हिन्दुस्तान के सांसदों
और विधायकों की है और सरकार की है. अगर हिन्दुस्तान के सांसदों, विधायकों, पीएम,
सीएम और मंत्रियों ने ज्यादा से ज्यादा खजाने के लूट की परम्परायें नहीं डाली होतीं
तो उनका नैतिक अधिकार होता और जनपद पंचायतों के पदाधिकारी ऐसी मांगों की हिम्मत भी
नहीं करते परन्तु ‘मेरी चोरी माफ और तुम्हारी चोरी अपराध’ यह दोमुखी सिद्धांत नहीं
चल सकता.
आजकल सरपंच साहब भी ऐसी ही सुविधाओं की मांग की तलाश में हैं. कुछ सरपंचों ने
पंचायतों के सचिवों की तरफ से असहयोग की शिकायत भी सरकार से की परन्तु उन सरपंच
साहवान को भी सोचना होगा कि ऐसी परिस्थितियों के लिए क्या वे स्वतः जिम्मेदार नहीं–
1. पिछले दिनों इन्हीं सरपंचों ने पंचायत सचिवों को स्थायी करने करने के लिए भोपाल
में प्रदर्शन किया था. स्थायित्व सुरक्षा का भाव लाता है, वहीं यह आज के दौर में
अकर्मण्यता, स्वार्थपरता और उत्तरदायित्वहीनता भी लाता है.
2. बहुत-सी पंचायतों में सरपंचों ने अपनी ही पसंद के, जात-बिरादरी के और रिश्तेदारी
के पढे़ लिखे लड़कों को सचिव बना लिया है. इसका परिणाम है कि एक चुनाव के बाद जब
सरपंच बदल जाता है वे जिनकी निष्ठा पुराने सरपंच के प्रति व्यक्तिगत होती है,
असहयोग शुरू कर देते है. अगर ताकतवर जाति का सरपंच हो अथवा आरक्षित जाति का सरपंच
हो तो पंचायत सचिव को खुलकर खेलने का मौका मिल जाता है. तब सरपंच न बोल सकता है और
न शिकायत कर सकता है, केवल अंगूठा सरपंच बन जाता है क्योंकि आखिर उसे उसी गांव में
ही रहना है. जाहिर है, ताकतवर लोगों से टकराव मोल लेकर उसका दैनिंदन जीवन कितना
कठिन हो जायेगा, इसका अहसास उसको होता है.
आज भी समय है कि त्याग की शुरूआत ऊपर से हो. समाज सेवा कोई नौकरी नहीं है और इसलिए
वेतन और पेंशन की परम्परायें बंद की जायें. सांसदों और विधायकों के लिए उनके
कार्यकाल के दौरान काम की आवश्यक सुविधायें और मानदेय सरकार दे. अगर सांसद और
विधायक, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री यह सुविधायें छोड़ेंगे तो फिर नीचे के लोगों के
लिए उन्हें कहना भी नहीं पड़ेगा.
पंचायत सचिव, जनपद और जिला पंचायत के सीईओ और अधिकारियों और कर्मचारियों के ऊपर
अनुशासनात्मक कार्यवाही का अधिकार निर्वाचित प्रतिनिधि को दिया जाना चाहिए और उनकी
गोपनीय रपट लिखने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए, भले ही उसकी अपील को सुनने का
अधिकार प्रशासन और शासन के उच्च अधिकारियों को हो. बहरहाल, मध्यप्रदेश के
मुख्यमंत्री किस राह चलेंगे, इसको लेकर कोई संशय नहीं है लेकिन क्या इस गंदी परंपरा को बदलने की शुरुवात कहीं से होगी ?
13.05.2011, 10.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित