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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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ये रास्ते हैं लूट के

बात निकलेगी तो...

 

ये रास्ते हैं लूट के

रघु ठाकुर


पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा बुलाई गई प्रदेश जनपद पंचायतों के अध्यक्षों की बैठक में कुछ दिलचस्प मांगें सामने आईं, जिस पर बहुत देर तक जनपद पंचायत अध्यक्षों ने हंगामा किया. उन्होंने अपनी 13 सूत्रीय मांगों के साथ सरकार पर दबाव डाला कि ये सभी मांगें तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर ली जायें.

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अब जरा इनमें से कुछ मांगों पर गौर करें- (1) उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष एवं विधायकों के समान अधिकार और सुविधायें दी जाये. (2) जनपद पंचायत अध्यक्षों को वित्तीय वर्ष में 60 लाख रूपया विवेकाधीन राशि दी जायें. (3) 1994 जैसे अधिकार तथा वित्तीय अधिकार जनपद अध्यक्षों को दिये जाये. (4) जनपद अध्यक्षों को प्रतिमाह 25000, उपाध्यक्षों को 20000 और सदस्यों को 10000 रूपया मासिक वेतन दिया जाये. (5) अध्यक्षों को मुख्य कार्यपालन अधिकारी की सीआर बुक का अधिकार हो. (6) वाहनों पर लाल-पीली बत्ती लगाने का अधिकार हो (7) अध्यक्षों के लिये निज सहायक की व्यवस्था की जाये.

इसमें कोई संदेह नहीं कि स्व0 राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में पंचायतों को अधिकार देने वाला तथा निर्धारित अवधि में चुनाव कराने हेतु संविधान संशोधन पारित हुआ था. जिसके माध्यम से राज्य सरकारों को पंचायतों यानी स्थानीय निकायों के चुनाव कराना अनिवार्य किया गया था तथा इन्हें टालने पर केन्द्र सरकार राज्यों को दी जाने वाली अनुदान की राशि को रोक सकती है.

कई राज्यों को अनिच्छा के बावजूद केन्द्र के इसी अधिकार के प्रयोग के दबाव में ही चुनाव कराना पड़ा अन्यथा इस संविधान संशोधन के पहले 10-15 वर्षो तक यह अमूमन ये संस्थायें भंग रहती थी. 1994 में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में पंचायतों को अधिकार देने का महत्वपूर्ण निर्णय हुआ था तथा पंचायती राजप्रणाली के माध्यम से पंचायतों, जनपद पंचायतों एवं जिला पंचायतों को अनेकों तरह के अधिकार दिये गये थे बल्कि कुछ विभागों के तत्संबंधी बजट भी जिला पंचायतों के बजट में शामिल कर दिये गये थे. जिला पंचायतों के अध्यक्षों को तथा जनपद अध्यक्षों के विश्रामगृहों आदि में ठहरने संबंधी पात्रता के भी नियम बनाये गये. निःसंदेह स्थानीय संस्थाओं का सशक्तिकरण दिग्विजय सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम था. हालांकि इसका प्रयोग पूर्ण विचार कर किया गया, ऐसा प्रतीत नहीं होता. क्योंकि कई विषयों पर राज्य शासन व जिला पंचायतों या जनपद पंचायतों के बीच अधिकारों के परस्पर हस्तक्षेप की संभावनाएं बनी थीं. तथा जिला पंचायतों के सीईओ एवं जनपद पंचायतों के सीईओ के स्थानांतरणों व प्रशासनिक नकेल राज्य शासन के ही पास थी जिसका इस्तेमाल कर वे अपना नियंत्रण बखूबी रख पाते थे.

चूंकि जिला पंचायतों से लेकर जनपद पंचायतों तक के लिए वित्तपोषण की व्यवस्था मुख्यतः राज्य शासन के हाथ थी तथा केन्द्रीय अनुदान भी राज्यों के माध्यम से ही पहुंचता था अतः आर्थिक व प्रशासनिक अधिकारों के दबाव की मनःस्थिति पंचायतों की थी. मणिशंकर अय्यर ने केन्द्रीय पंचायत मंत्री रहते हुए पंचायतों को सशक्त बनाने के लिए अच्छे कार्य किये थे तथा उन्हें केन्द्रीय अनुदान की कुछ राशि सीधे पहुंचाने की व्यवस्था नियमों में की थी. इसके भी अच्छे परिणाम सामने आये तथा विभिन्न स्तरीय पंचायतें यद्यपि पूर्णतः नहीं परन्तु कुछ-कुछ अपने सहारे पर खड़ी हो सकीं. यद्यपि यह भी तथ्य है कि पंचायती राज विकेन्द्रीकृत प्रशासनिक प्रणाली का यह ढांचा न तो महात्मा गांधी के अनुरूप था और न ही स्व. डॉ. राममनोहर लोहिया के चैखम्भा राज्य के अनुकूल.

महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज्य एक बड़ी आदर्श कल्पना थी जिसमें ग्राम अपने आप में पूर्ण स्वतंत्र इकाई होगी. स्व. राममनोहर लोहिया ने चैखम्भा राज्य की कल्पना कर शासन के अधिकारों को चार खम्भों के मकान में बदलने का विचार किया था जिसमें रक्षा, विदेश नीति, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार जैसे बड़े प्रश्न केन्द्र सरकार के पास राज्य स्तरीय विषय राज्य सरकार के पास तथा शेष सभी विषय जिला एवं पंचायतों के पास होगें. परन्तु जिस प्रकार वह लागू हुआ तथा जो मनःस्थिति मतदाताओं और जनप्रतिनिधियों की रही, उसमें एक अच्छे प्रयोग की शुरूआत दुखांत कथानक में बदल गयी तथा विकेन्द्रीकृत प्रशासन की कल्पना विकेन्द्रीकृत भ्रष्टाचार की कहानी में बदल गयी.

भारतीय राजनीति एवं हमारे ग्रामीण समाज की जो परिवारवाद, सामंतवाद, बेईमानी पक्षपात जातिवाद जैसी बीमारियां हैं, वे भारतीय लोकतंत्र की भी कमजोरियां बन गई हैं और पिछले दिनों पंचायती राज लागू करने के जो प्रयास सरकारों ने किए, उनमें भी ये विकृतियां फैल गई.

आज पंचायतों के चुनाव भी खूब महंगे होने लगे हैं. एक जिला पंचायत के अध्यक्ष ने मुझे बहुत शान से जिला पंचायत का चुनाव जीतने के लिए 3 करोड़ रूपये खर्च करने की बात बताई. यानी मतदाताओं को लाखों रूपये देकर खरीदा गया और अब तो स्थिति इतनी बदतर है कि बड़े-बड़े सरकारी दलों के तथाकथित प्रत्याशियों को अपनी ही पार्टी के वोट लेने के लिए पैसा देना होता है.

1992-93 में जब पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल बिहार में जनता दल के राज्यसभा के प्रत्याशी के तौर पर नामजद हुए और नामांकन करने पटना पहुंचे तब उस समय बिहार के मुख्यमंत्री लालूप्रसाद ने उन्हें बताया कि जनता दल के विधायकों को भी कितने-कितने रूपये देना होगा. इतना ही नहीं उन्होंने अपने दल के विधायकों को श्री गुजराल को राज्य सभा का टिकट देने का तर्क समझाते हुए कहा कि गूजर समाज के हैं और पिछड़े वर्ग में आते हैं. यद्यपि यह बातें तथ्यपरक नहीं हैं.

रूपयों की यह बीमारी नगरपालिकाओं और नगर-निगमों, जिला पंचायतों से लेकर जनपद पंचायत और अब ग्राम पंचायतों तक फैल चुकी हैं. जनपद पंचायतों के अध्यक्षों की मांगों का विश्लेषण करना होगा और उनकी तार्कितता और परिस्थितियो का भी विवेचना करनी होगी. 1960 के दशक के बाद से सांसद और विधायकों की समाजसेवा की भावना बदल चुकी है. जिस संविधान सभा ने भारत का संविधान बनाया, उनके सदस्य लोग जो बड़े-बड़े नाम वाले लोग थे जिसमें ऐसे वकील भी थे जिनकी उस जमाने में लाखों रूपयों की प्रतिमाह की आमदनी हुआ करती थी, परन्तु जब वे संविधान सभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होकर दिल्ली पहुंचे तब उन्होंने वेस्टर्न कोर्ट (सरकारी मकान) के कक्ष में ही अपना निवास बनाया. मेरी जानकारी में ऐसा उदाहरण नहीं है, जहां संविधान सभा का कोई सदस्य अपने परिवार व बीबी बच्चों को लेकर दिल्ली रहने गया हो क्योंकि वे यह मानते थे कि उनकी दिल्ली यात्रा और दिल्ली रहना अस्थायी निवास है. जिसके लिए किसी मकान की अन्य सुविधा की आवश्यकता नहीं है.
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