राजनीति का अंकगणित
बहस
राजनीति का अंकगणित
विनोद
रिंगानिया गुवाहाटी से
सीधे मूल सवाल पर आते हैं कि असम गण परिषद क्यों हारी? क्या उसे कांग्रेस ने हराया.
अगप के हारने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन यह पूछा जाए कि उसे किसने हराया तो हमें
लगता है कि उसे कांग्रेस ने नहीं एयूडीएफ ने हराया है. जिस तरह प्रफुल्ल कुमार महंत
के अगप में वापस आने के बाद से बदरुद्दीन अजमल से उनकी नजदीकियां बढ़ने लगीं, उससे
यह डर लग रहा था कि मौलाना साहब कहीं अगप की रही-सही सीटों को भी साफ न कर दें.
यह हर कोई जानता है कि राजनीति के अंकगणित में एक और एक दो नहीं होते. इससे पहले
अगप ने एक बार भाजपा के साथ एक साथ चुनाव लड़ा था और उसकी सीटें पहले की तुलना में
कम हो गई. इससे उसे लगा कि भाजपा के साथ मित्रता करने के कारण मुस्लिम वोटर उससे
नाराज हो गया है. इसलिए भाजपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने से परहेज रखा गया और
भाजपा और एयूडीएफ दोनों के साथ गुप्त वार्ताओं के सत्र चलते रहे. अगप नेता मन में
खुश होते रहे कि इस बार हिंदूवादी और मुसलमान दोनों वोटरों का समर्थन हासिल हो
जाएगा. लेकिन जैसा कि हमने कहा कि राजनीति में एक और एक दो नहीं होते.
आइए इस बार के चुनावी नतीजों से हम कुछ पाठ सीखें, जो आगे से ऐसे किसी विश्लेषण में
काम के साबित हो सकते हैं –
1. चुनाव में एक बड़ी सोच सामने चाहिए. लाख यह कहा जाता हो कि चुनाव जोड़-तोड़ की
विद्या है लेकिन पूरे राज्य के स्तर पर आपको जीत हासिल करनी है तो एक स्पष्ट बड़ी
सोच सामने होनी होगी. यह सोच इतनी स्पष्ट होनी होगी कि आप एक शब्द या वाक्य में इसे
व्यक्त कर सकें. कांग्रेस इसे सुशासन का आश्वासन देकर व्यक्त करती है.
एयूडीएफ की सोच साफ है कि अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा. बीपीएफ यही बात बोड़ो
समुदाय के संदर्भ में कहती है. भाजपा इसे हिंदुत्ववादी सोच के रूप में प्रकट करती
है. लेकिन आज के दिन अगप के पास कोई ऐसी सोच नहीं है जिसे यह एक ही वाक्य में कह
सके. पूछने पर यह कांग्रेस का विकल्प देने, कांग्रेस के कथित कुशासन, कांग्रेस के
भ्रष्टाचार की बात कह सकती है. लेकिन आप का अस्तित्व किस बड़े सपने को साकार करने
के लिए है यह पूछे जाने पर शायद अगप नेताओं के जेहन में अपने व्यक्तिगत सपने (बड़ा
घर, मुंबई में फ्लैट, मंत्री पद) ही आते हों, जनता से जुड़े ऐसे सपनों की बात इन
दिनों कभी नहीं सुनी.
दस साल पहले तक अगप के पास यह सोच थी. इसे क्षेत्रीयतावाद कहा जाता है. अगप अपने
आपको असमिया हितों की रक्षक कहकर परिचय देती थी. असमिया भाषा का सवाल हो, या असमिया
युवकों को नौकरियां देने की बात हो, या गैर-असमिया समुदायों को ललकारने की
प्रतियोगिता हो – अगप इसमें आगे रहती थी और यह आभास देती थी कि वही असमिया हितों की
सबसे बड़ी पैरोकार है. इन दस सालों में परिवर्तन यह आया है कि क्षेत्रीयतावाद एक
विचारधारा के रूप में पूरी तरह गया है. क्षेत्रीयतावादी पार्टियां एक दशक पहले तक
केन्द्र सरकार पर मुख्य आरोप यह लगाती थी कि वह उनके राज्य को पूरा धन मुहैया नहीं
करा रही. आज के दिन धन कोई समस्या नहीं रही. इसलिए क्षेत्रीयतावाद का यह मुख्य नारा
ही कुंद हो गया. इस बीच इन लोगों ने नए नारे ढूंढ़े नहीं और अगप के पास बड़ी सोच के
नाम पर यही रह गया कि वह कांग्रेस का विकल्प है.
2. जब आप जनता को कोई बात समझाना चाहते हैं तो इसके लिए आपके शब्द जितना कारगर हैं
उतने ही कारगर आपकी भाव-भंगिमा और आचरण है. आचरण से हम यह कहना चाहते हैं कि आप
किसके साथ उठते-बैठते हैं, किसके साथ चुनाव पूर्व या चुनाव पश्चात मित्रता की बातें
करते हैं. अगप ने चुनाव पूर्व भाजपा के कोई समझौता नहीं किया. लेकिन ऐसा भी कोई
स्पष्ट संकेत नहीं दिया कि वह भाजपा से दूर है.
दूसरी ओर, मौलाना बदरुद्दीन अजमल के साथ भी कोई चुनाव पूर्व गठजोड़ नहीं हुआ लेकिन
उनके साथ प्रफुल्ल कुमार महंत का मेलजोल कुछ ज्यादा ही देखा गया. इससे लोगों में
अगप की उस छवि का ह्रास हुआ जो इसने एक ऐसी पार्टी के रूप में बनाई थी जो असम की
आबादी में मुसलमानों/बांग्लादेशियों के बढ़ते प्रतिशत से चिंतित है. लोगों को लगा
कि बांग्लादेशियों को राज्य से निकालना अब अगप की प्राथमिकता न रहकर बदरुद्दीन
जैसों की मदद से सत्ता में आना पहली प्राथमिकता हो गई है. इससे तो लाख गुना अच्छे
पत्ते तरुण गोगोई ने खेले जो बदरुद्दीन अजमल के साथ अंत तक अछूत जैसा व्यवहार करते
रहे.
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