करिश्मों का प्रांतीयकरण
मुद्दा
करिश्मों का प्रांतीयकरण
कनक तिवारी
पांच राज्यों के चुनाव नतीजे भारतीय लोकतंत्र की विकसित होती संभावनाओं की एक नई
इबारत गढ़ गए हैं. तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और पुडुचेरी की जातीय, सामाजिक
और सांस्कृतिक चेतना में भले ही अंतर दीखता हो. भारतीय राजनीति के विश्वविद्यालयों
के रूप में मौजूदा चुनावों ने नए प्रतिमान गढ़े हैं. पश्चिम बंगाल लोकतांत्रिक
प्रक्रिया का असली कुरुक्षेत्र सिद्ध हुआ है.
संगठन और कार्यकर्ता आधारित एक मजबूत कम्युनिस्ट पार्टी नीत गठबंधन को समानांतर
संगठन द्वारा चुनौती देना तो संभव हो सकता था. मसलन संघ परिवार समर्थित भाजपा नीत
गठबंधन एक अच्छा वैचारिक विकल्प कहा जा सकता था. कांग्रेस नीत गठबंधन कभी भी संगठन
और कार्यकर्ता आधारित प्रयोजन भारतीय राजनीति में नहीं बना. कांग्रेस कार्यकर्ताओं
के बदले जनता का संगठन और आंदोलन रहा है. पंद्रह वर्ष पहले छिटककर ममता बनर्जी ने
कलकत्ता में हो रहे परेड मैदान के कांग्रेस अधिवेशन को ही चुनौती देकर विद्रोह का
झंडा थाम लिया था. ममता की समानांतर सभा में ज्यादा उत्साह और भविष्य दृष्टि को देख
पाना संभव था. तृणमूल कांग्रेस का जन्म मातृ संगठन के युयुत्सु तेवर का अगला पड़ाव
था. अन्यथा कांग्रेस संगठन सेवानिवृत्त सैनिकों का ढीला ढाला आश्रय स्थल बनकर रह गया
था.
ममता बनर्जी ने लोकतंत्र में संघर्ष और धैर्य के अद्भुत घालमेल का करिश्मा पैदा किया
है. व्यक्तिवाचक जुनून लंबे समय तक विरोधी के सिद्धांतों, नीतियों और कार्यक्रमों
को चुनौती दे- ऐसा विश्व के लोकतंत्रीय इतिहास में देखने को नहीं मिलता. अपने
राजनीतिक जेहाद के सिलसिले में ममता ने लोकतंत्रीय आचरण नहीं किया. इसीलिए तृणमूल
कांग्रेस में ममता के साथ लगभग बराबरी पर खड़े होकर नेताओं का कोई झुंड नहीं है.
यह आश्चर्य है कि वाम मोर्चे को अपनी लगातार गिरती लोकप्रियता का ग्राफ पढ़ने में
आंखों में जाला क्यों पड़ गया था. इसी बीच अंग्रेजों के ज़माने के बने शोषक भू अर्जन
अधिनियम को गरीब किसानों के खिलाफ तलवार की तरह इस्तेमाल करने में वाम मोर्चे को
कोई गुरेज नहीं हुआ. नंदीग्राम और सिंगूर इतिहास में नक्सलबाड़ी के समानांतर लेकिन
उसके बरक्स सदैव याद रखे जाएंगे.
ममता ने टाटा जैसे लौह उत्पादक बड़े उद्योगपति से मुहावरे की भाषा में लोहा लिया.
अर्थात टाटा को जनता के तेवर का लोहा मुकाबले में दिया. नंदीग्राम और सिंगूर में
टाटा के अतिरिक्त मलेशिया के सलीम समूह को चुनौती छोटे-छोटे मुसलमान किसानों के
पक्ष में दी गई. पश्चिम बंगाल में पहली बार मुसलमान मतों का ध्रुवीकरण हुआ. राइटर्स
बिल्डिंग में बैठे बुद्धदेव भट्टाचार्य अपना नाम तक सार्थक नहीं कर पाए.
स्वाधीनता आंदोलन के बाद देश में उससे कम और फीकी सही लेकिन आंधी जयप्रकाश नारायण
के नेतृत्व में आई तो थी. ममता की आंधी उससे और फीकी भले हो लेकिन उसने खुद को
तृणमूल कहते हुए वाम मोर्चे को तिनके की तरह उड़ा दिया. ममता का सयानापन इस बात में
रहा है कि तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता परिवर्तन करने की जिम्मेदारी का अहसास जनता को
सौंप दिया और प्रत्यक्ष तौर पर अपने लिए सहायक भूमिका चुन ली.
जब जनता आती है तो सिंहासन खाली करना पड़ता है. ऐसा ही करिश्मा विपरीत और अलग तरह की
परिस्थितियों में इंदिरा गांधी का भी था, जब उन्होंने मतदाताओं के गले यह बात उतार
दी थी “मैं कहती हूं गरीबी हटाओ. वे कहते हैं इंदिरा हटाओ.” जनता ने गरीबी हटाने का
समर्थन किया था. भले ही वह बाद में आज तक बढ़ती चली जा रही है.
भारतीय मतदाताओं को यह कड़वा सच भी समझना होगा कि ममता ने खुद को अच्छा प्रशासक
सिद्ध नहीं किया है. कोयला और लोहा अर्थव्यवस्था की बुनियाद हैं. ममता के नेतृत्व
में रेल मंत्रालय खराब हालत में ही है. ममता तुनकमिजाज, उत्साही, भावुक, क्रोधी और
संवेदनशील एक साथ हैं. उनके नेतृत्व पर एक अच्छी फिल्म भी बनाई जा सकती है. लेकिन
इक्कीसवीं सदी की राजनीति में जिस तरह की क्षमता पश्चिम बंगाल जैसे साक्षर प्रदेश
को देखने की उम्मीद है, उसे पूरा करना तृणमूल कांग्रेस के लिए कठिन तो होगा. विकल्प
में यह भी कहा जा सकता है कि ममता को सर्वोच्च नेतृत्व का अवसर ही कहां मिला था.
तृणमूल कांग्रेस ने भारतीय राजनीति में शिवाजी बनाम औरंगजेब शक्ल का युद्ध तो किया
है.
पश्चिम बंगाल में सकारात्मक वोट हुआ है लेकिन तमिलनाडु में नकारात्मक. छत्तीसगढ़ में
जोगी को नहीं चुनना था, इसलिए भाजपा सत्ता में आई थी, कोई अपने दमखम पर नहीं. 2 जी
स्पेक्ट्रम की सड़ांध और मवाद से तमिलनाडु के मतदाताओं के मन में इतना गहरा घाव हो
गया था कि द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन को ठीक ही लतियाया गया. जयललिता के अलावा कोई
विकल्प बचा ही नहीं था. अंगरेज़ी मुहावरे के अनुसार मतदाताओं ने कम खराब विकल्प को
चुन लिया.
ममता यदि एक विचारधारा को लगातार चुनौती देती रहेंगी तो जयललिता केवल करुणानिधि
परिवार से वैमनस्य निकालती रहेंगी. राष्ट्रीय राजनीति की तिकड़म में भी उनका कद
फिलहाल बढ़ता ही रहेगा. देश के प्रबंधकनुमा राजनीतिज्ञ जनता को चरित्रहीन समझते हैं.
उन्हें लगता है कि वह मुफ्त की बिजली, टेलीविजन, गाय, साइकिल, शराब, नोट और दो रुपए
किलो का चावल लेकर दाता को मत देती रहेगी. तमिलनाडु ने यह तिलिस्म तोड़ दिया है. इस
राक्षसी परिकल्पना की भागीदार कांग्रेस पार्टी भी बनी है. उम्मीद है, ऐसे प्रयोग
उत्तरप्रदेश जैसे इलाकों में अब नहीं किए जाएंगे.
नीतीश कुमार ने बिहार का दंगल जीतकर करिश्मा ही किया है. यही बात सादगी लेकिन दृ़ढ़ता
से तरुण गोगोई ने तिबारा हासिल की है. प्रणव मुखर्जी की तरह गोगोई कांग्रेस संस्कृति
के गिने चुने सिपहसालारों में हैं. यह दुर्भाग्य है कि कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक
संस्कृति को बर्खास्त कर मनमोहन सिंह जैसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर
नौकरशाहों, चाटुकारों, सामंतों वगैरह के हाथों में देश को सौंप दिया है जो जनता को
भेड़ के रेवड़ की तरह हकालने को राजनीति का कर्म समझते हैं. जिस पार्टी में मोंटेक
सिंह अहलूवालिया जैसे लोग पारंपरिक कांग्रेस नेताओं के मुकाबले तरजीह पाते हों, उसका
बेड़ा गर्क करने में जनता के सहयोग की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. आत्महत्या करने वाले
व्यक्ति की हत्या नहीं की जाती.
केरल में भी अच्युतानंदन की साफ सुथरी छवि के बावजूद कांग्रेस नीत गठबंधन को सरकार
बनाने का मौका किसी तरह मिला है. वहां भी लेकिन कांग्रेस संस्कृति की मिट्टी पलीद
हुई है. 72 विधायकों में केवल मुस्लिम लीग के 20 विधायक हैं. यदि ईसाइयों और
मुसलमानों ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया होता तो हिन्दू बहुल मतदाता आज भी वाम
मोर्चे के साथ खड़े क्यों दिखाई देते.
यही हाल पुडुचेरी जैसी छोटी सी रियासत में हुआ. राष्ट्रीय राजनीति का डंका बजाने के
बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री रंगा सामी ने अयोग्य करार दिए जाकर मुख्यमंत्री पद से
हटाए जाने के बावजूद मातृ संस्था को चूना तो लगा ही दिया. एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी
को ‘खुद डूबे तो डूबे जजमान को भी ले डूबे‘ की शक्ल में तमिलनाडु में आत्महत्या करना
अच्छा लगा.
पश्चिम बंगाल में ममता जैसी चपल वृत्ति की नेता का पिछलग्गू बनकर ही तो रहना होगा.
ममता के लिए बंगाल पहले है देश बाद में. इसीलिए तो उन्हें अपना एजेंडा सफल करने के
लिए अटल बिहारी वाजपेयी का नेतृत्व भी अच्छा लगा था. दूसरी अखिल भारतीय पार्टी भाजपा
सुदूर दक्षिण और पूर्व के राज्यों में नहीं के बराबर उपस्थित है. एक का नाम है
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस. दूसरे का नाम है भारतीय जनता पार्टी. मौजूदा चुनाव
परिणामों के साथ यदि उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, जम्मू कश्मीर, पंजाब, त्रिपुरा और राजशेखर
रेड्डी के बेटे और पत्नी के चुनाव परिणाम भी जोड़ लें तो राष्ट्रीय पार्टियों का क्या
भविष्य है? संविधान में भारत को राज्यों का संघ कहा गया है. वह तो मौजूदा
चुनाव ने दिखा ही दिया है.
16.05.2011, 07.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित