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रमन सरकार के 'हीरो' बिनायक सेन
बहस
रमन सरकार के 'हीरो' बिनायक सेन
दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में जनसुरक्षा अधिनियम के तहत आजीवन कारावास से दंडित और फिलहाल जमानत पर
रिहा बिनायक सेन अब शायद ही सींखचों के पीछे नजर आए. रायपुर की अदालत द्वारा
राजद्रोह के आरोप में दी गई सजा के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील दायर की है.
उनकी अपील पर सुनवाई के बाद फैसला आने में कितना वक्त लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता.
संभव है वर्ष, दो वर्ष या इससे भी अधिक. यदि निचली अदालत की सजा बहाल हुई तो जाहिर
है मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा. यानी मानकर चलें अदालती कार्रवाई मुकम्मिल होने
और फैसले तक पहुंचने में खासा वक्त निकल जाएगा.
विनायक सेन को जमानत भी सुप्रीम कोर्ट से मिली हुई है. जमानत की अपील पर सुनवाई के
दौरान सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है कि उनके खिलाफ राजद्रोह का
आरोप नहीं बनना. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के परिप्रेक्ष्य में बिलासपुर
हाईकोर्ट को अब अपना निर्णय बहुत सोच समझकर देना होगा. क्योंकि इसी कोर्ट ने 11
फरवरी 2011 को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. अब डा. बिनायक सेन के पक्ष में
अदालत में पैरवी करने वालों के तरकश में अमोघ अस्त्र आ गया है, जिसके आधार पर वे
हाईकोर्ट से ही बिनायक सेन को बचा ले जा सकते हैं. यदि ऐसा हुआ, जिसकी पर्याप्त
संभावना है तो यह राज्य सरकार के लिए किसी आघात से कम नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट से
जमानत मिलने एवं विपरीत टिप्पणी से वैसे भी उसके होश फाख्ता हैं. राष्ट्रीय एवं
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी विश्वासनीयता पर चोट पहुंची है.
'विश्वसनीयता' छत्तीसगढ़ सरकार का वेद वाक्य है. राज्य निर्माण के 10 वर्ष पूर्ण होने
पर सन् 2010 में इस 'विश्वसनीयता' का खूब प्रचार-प्रसार हुआ था. कथित रुप से गरीबों
के हितों एवं सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करने वाली रमन सरकार को लगता है कि वह
जनता के बहुत करीब है इसलिए विश्वसनीय भी. उसकी इस आत्म-मुग्धता के बारे में और कुछ
न कहते हुए यह बताना ही पर्याप्त है कि नक्सली समस्या, कानून-व्यवस्था का सवाल एवं
बिनायक सेन प्रकरण से उसकी कार्यप्रणाली एवं 'विश्वसनीयता' पर ही सवालिया निशान लग
गया है. सरकार के लिए यह चिंता की बात है. अब यह उस पर है कि 'विश्वसनीयता' को कायम
रखने के लिए वह क्या उपाय करती है. चूंकि बिनायक सेन को सुप्रीम कोर्ट से जमानत
मिलने एवं कोर्ट की टिप्पणी के बाद कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कह चुके है कि दशकों
से चले आ रहे जनसुरक्षा कानून को बदलने की जरुरत है और अब इस पर राष्ट्रीय बहस की
आवश्यकता भी बताई जा रही है तो इसकी आड़ में छत्तीसगढ़ सरकार चाहे तो अपना चेहरा बचा
सकती है.
यह देखना निश्चय ही दिलचस्पी से खाली नहीं होगा कि बिनायक सेन का मामला कानूनी
दांव-पेंचों के बीच अंतत: किस तरह की शक्ल अख्तियार करेगा. फिलहाल उन्हें लेकर
चर्चाओं का बाजार काफी गर्म है. विशेषकर हाल ही में उन्हें योजना आयोग की स्वास्थ्य
संबंधी सलाहकार समिति में नामजद करने के बाद चर्चाओं ने और जोर पकड़ा है.
नक्सलियों के साथ संबंध रखने एवं उनके शहरी मित्र के रुप में डा. बिनायक सेन के
खिलाफ राज्य की पुलिस ने जब जनसुरक्षा अधिनियम की धारा 124 ए के तहत 14 मई 2007 को
गिरफ्तार किया तो सरकार को तनिक भी इल्म नहीं था कि उन्होंने बर्रे के छत्ते को छेड़
दिया है. उसे यह भी उम्मीद नहीं थी कि इस मामले की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक
चर्चा होगी तथा देश-दुनिया के सारे मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं प्रखर बुध्दिजीवी
बिनायक सेन के पक्ष में खड़े नजर आएंगे. इनके सम्मिलित एवं आलोचनात्मक नाद से राज्य
सरकार को नक्सली हिंसा एवं मानवाधिकार हनन के मामले में बिलावजह कटघरे में खड़ा रहना
पड़ेगा.
यदि राज्य सरकार ने बिनायक सेन के विरुद्ध इतनी गंभीर कार्रवाई करने के पूर्व
परिणामों पर विचार किया होता तो जाहिर है कि सरकार की न तो किरकिरी होती और न ही
बिनायक सेन हीरो बनते. छत्तीसगढ़ में बिनायक सेन भले ही तीन दशकों से कार्य कर रहे
हों, यह भी मान लेते हैं और जैसा कि प्रचारित भी किया गया है, चिकित्सक के रुप में
उन्होंने छत्तीसगढ़ के दूर-दराज में रहने वाले गरीब आदिवासियों के स्वास्थ्य का अच्छा
ख्याल रखा, यह भी ठीक है कि एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रुप में नक्सली हिंसा का
उन्होंने कभी समर्थन नहीं किया.
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उन्होंने सलवा जुडूम की कथित हिंसा में निहत्थे
नागरिकों की हत्या की भी घोर भर्त्सना की और नक्सल समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के
लिए बातचीत को ही एक मात्र उपाय बताया लेकिन इन सबके बावजूद बिनायक सेन की सक्रियता
एवं लोकप्रियता छत्तीसगढ़ के एक बहुत छोटे से भूभाग तक सीमित रही.
वे मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं लोक चिकित्सक के रुप में प्रख्यात श्रमिक नेता
शंकरगुहा नियोगी के सहयोगी जरुर रहे तथा दल्ली राजहरा में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा
के शहीदी हॉस्पीटल के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन इसके बावजूद वे
राज्य में वैसी पहचान नहीं बना सके जैसे शंकर गुहा नियोगी की मरणोंपरांत भी बनी हुई
है.
गुहा नियोगी छत्तीसगढ़ के मजदूरों के मसीहा माने जाते हैं. उनकी शहादत के बाद राज्य
में कोई ऐसा गुहा नियोगी पैदा नहीं हुआ जो उन्हें स्थानापन्न कर सकें या उनके काम
को उसी रफ्तार से आगे बढ़ा सकें. यद्यपि गुहा नियोगी एवं बिनायक सेन के बीच कोई
तुलना नहीं की जा सकती. यह उचित भी नहीं है किंतु, इससे दो राय नहीं कि जैसा मजबूत
प्रचार तंत्र एवं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संपर्क बिनायक सेन का है, वह शंकर गुहा
नियोगी का नहीं था और न ही कभी उन्होंने इसकी जरुरत समझी. उन्होंने पीयूसीएल से भी
एक निश्चित दूरी बनाए रखी.
नियोगी मजदूर आंदोलनों में कई बार गिरफ्तार हुए, पुलिस हिंसा में श्रमिकों की मौत
के मामलों में पुलिस ने उन्हें जेल में भी डाला किंतु इसके बावजूद वे कभी
अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय नहीं बने और न ही उनकी गिरफ्तारी के विरोध में
जनसंगठनों ने पुलिस व शासन पर वांछित दबाव बनाया. हालांकि उनके पूंजीवादी हिंसा के
शिकार होने के बाद प्रदेश एवं देश को अहसास हुआ कि उसने क्या खोया. एक ऐसा व्यक्ति
जो यदि जिंदा रहता तो देश में मजदूर आंदोलन को नई दिशा एवं असीमित ऊर्जा मिलती.
बहरहाल वे नियोगी थे और अब पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं समाजसेवी के रुप
में बिनायक सेन सामने हैं जिनकी सरलता, सादगी, बुध्दिमत्ता एवं समाज कल्याण की
भावना पर शक नहीं किया जा सकता. लेकिन यह भी सच है कि बिनायक सेन की अंतरराष्ट्रीय
हैसियत का शायद कभी खुलासा नहीं होता, यदि वे छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा जनसुरक्षा
कानून के तहत गिरफ्तार न हुए होते और अदालत से आजीवन कारावास की सजा न पाए होते. इस
सजा ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दे दी है. जबकि इसी कानून के तहत राज्यों की
जेलों में बंद अनेक मानवाधिकार कार्यकर्ता गुमनामी के अंधेरे में हैं और अपने
मुकदमे के फैसले का इंतजार कर रहे हैं.
बहरहाल बिनायक सेन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है. उन्हें लेकर बहुत सारे
सवाल मस्तिष्क में कौंधते हैं. पहला सवाल है- क्या उन्होंने छत्तीसगढ़ के आदिवासी
क्षेत्रों में सचमुच इतनी जबरदस्त जनसेवा की है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इसका
कायल है और इसीलिए उनकी गिरफ्तारी पर व्यापक प्रतिक्रियाएं हुईं? और तो और सन् 2008
के प्रारंभ में आधा दर्जन से अधिक नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने उनकी गिरफ्तारी का
विरोध करते हुए उनकी रिहाई की मांग की. यदि एक न्यूज एजेंसी की यह खबर प्रायोजित
नहीं थी तो निश्चय ही नोबेल पुरस्कार विजेताओं का बिनायक सेन की रिहाई की मांग करना
मायने रखता है.
यकीनन इस घटना से बिनायक सेन की अंतरराष्ट्रीय स्थिति का भी एहसास होता है. और जब
24 दिसंबर 2010 को रायपुर सेशन कोर्ट ने पेश दस्तावेजों के आधार पर उन्हें राजद्रोह
का दोषी पाया तथा आजीवन कैद की सजा सुनाई तो जाहिर है देश-दुनिया में इसकी तीव्र
प्रतिक्रिया होनी ही थी. प्रतिक्रिया स्वरुप 12 फरवरी 2011 को अमरीका, ब्रिटेन और
कनाडा के 55 गैर सरकारी समूहों के शीर्ष संगठन ने तो बाकायदा अभियान छेड़ दिया. ''द
फ्री बिनायक सेन कोलिशन'' ने बयान जारी किया. न्यूयार्क, सेन फ्रांसिस्को, वाशिंगटन
तथा लंदन में भारतीय वाणियिक दूतावासों के समक्ष प्रदर्शन किए गए. कनाडा के वेंकवूर
में मानवाधिकारवादियों ने रैली निकाली. एम्सटर्डम, डलास, ह्यूस्टन और लॉस एंजिलिस
में बिनायक सेन की रिहाई की मांग को लेकर जनता को जागरुक करने का कार्यक्रम भी
चलाया गया. सिएटल और आस्टिन में बिनायक सेन समर्थकों ने मोमबत्ती रैली निकाली.
छत्तीसगढ़ सरकार की कथित मानवाधिकार हनन कार्रवाइयों को उजागर करने की दिशा में काम
करने वाले जाने-माने भारतीय इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने बोस्टन के हार्वर्ड चौराहे
पर एक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया. ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सोशल
जस्टिस सेंटर के एशले जरबाता ने नाइजर डेल्टा के मानवाधिकार कार्यकर्ता केन सराओ
विवा, पर्यावरण कार्यकर्ता बेट्टी तथा विनायक सेन के बीच समानता बताते हुए कहा कि
ये लोग भूमि और मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ कड़ी प्रतिद्धता के प्रतीक हैं.
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चिली के तानाशाह जनरल पिनोशे के शासन काल में तीन साल तक जेल में बंद रहे सेर्गियो
रियोस ने बोस्टन में कहा था कि सेन दुनिया भर के लाखों लोगों के प्रेरणास्त्रोत
हैं. फ्री बिनायक सेन अभियान दुनिया भर में जनजातीय और हाशिए पर डाले गए लोगों के
संघर्ष को सामने लाने के लिए भी कार्य कर रहा है.
यह तो हुई बिनायक सेन को राजद्रोह का दोषी ठहराने एवं उम्रकैद की सजा मिलने के बाद
की विश्वव्यापी प्रतिक्रियाएं. सेशन कोर्ट द्वारा दी गई सजा के खिलाफ बिनायक सेन की
ओर से बिलासपुर हाईकोर्ट में 6 जनवरी 2011 को दायर जमानत याचिका पर 24 एवं 25 जनवरी
को सुनवाई के दौरान यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी से स्पष्ट था कि बिनायक सेन
के समर्थन में विश्व की तमाम मानवाधिकार संस्थाएं एकजुट हैं. क्या ऐसा समर्थन
मानवाधिकार के लिए संघर्ष कर रहे किसी अन्य भारतीय व्यक्ति को हासिल है? हालांकि
नक्सली समर्थक होने एवं उनके साथ सहानुभूति रखने के आरोप में अनेक लोग अभी भी जेलों
में बंद है. ये वे लोग हैं जो सच्चे अर्थों में मानवदावादी हैं और एक वैचारिक लड़ाई
लड़ रहे हैं.
दरअसल यह प्रचार तंत्र एवं संपर्क का कमाल है. बिनायक सेन ने अपने चारों ओर एक ऐसा
आभा मंडल विकसित कर लिया है, जिसकी चमक आंखों को चौंधिया देने वाली है. ऐसा अद्भुत
आभामंडल महज चंद वर्षों में बन गया. यदि जनसुरक्षा कानून के तहत उनकी गिरफ्तारी न
हुई होती तो क्या वे विश्वव्यापी चर्चा का विषय बनते? गौर करने लायक बात यह भी है
कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी गिरफ्तारी के बाद हासिल हुए. विश्व स्वास्थ्य
एवं मानवाधिकार के लिए उन्हें 2008 में जोनाथन मान पुरस्कार देने की घोषणा हुई.
बिनायक सेन जेल में बंद थे. पुरस्कार की घोषणा के तुरंत बाद 22 नोबल पुरस्कार
विजेताओं में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एवं छत्तीसगढ़ सरकार को पत्र लिखकर अपील की
कि यह पुरस्कार लेने के लिए बिनायक सेन को अमरीका यात्रा की मंजूरी दी जानी चाहिए.
यह अलग बात है केंद्र सरकार ने यह अपील ठुकरा दी.
अभी हाल ही में उन्हें दक्षिण कोरिया के प्रतिष्ठित क्वांगझू पुरस्कार देने का ऐलान
हुआ. 21 अप्रैल 2011 को राजधानी सिओल में एशिया में मानवाधिकार, शांति, लोकतंत्र और
न्याय के क्षेत्र अप्रतिम कार्य करने वाले 32 श्रेष्ठ नामांकितों में से उन्हें
चुना गया था. अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की यह श्रृंखला संभव है और भी आगे बढ़े. यह
अलग बात है देशी पुरस्कारों की सूची लंबी नहीं है. छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के महासचिव
डा. बिनायक सेन को सन् 2004 में जीवन भर गरीब ग्रामीणों की सेवा के लिए पॉल हैरिसन
पुरस्कार दिया गया. प्रतिवर्ष यह पुरस्कार क्रिश्चयन मेडिकल कालेज वेल्लौर देता है.
बिनायक सेन इसी कालेज के छात्र रहे हैं. इसके पूर्व दिसंबर 2007 में इंडियन अकादमी
ऑफ सोशल साइंस ने उन्हें सर्वाधिक महत्वपूर्ण विज्ञानविद मानते हुए आर-आर. कीथन
स्वर्ण पदक प्रदान किया था. अकादमी का यह पुरस्कार छत्तीसगढ़ की गरीब जनता एवं उनके
उन्नयन के लिए डा. बिनायक सेन के द्वारा किए गए कार्यों के सम्मान स्वरुप था.
निश्चय ही ये सारे राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार एवं सम्मान उन्हें विशिष्टता
प्रदान करते है. कहा जा सकता है कि पुरस्कारों के चयन में कोई पक्षपात नहीं हुआ
लेकिन क्या इस संशय को खत्म किया जा सकता है कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी एवं
निष्पक्ष होती हैं?
मानवाधिकारवादियों एवं उनके संगठनों का नेटवर्क बेहद मजबूत एवं विशाल है. नेटवर्क
का ही कमाल है कि डा. बिनायक सेन के गिरफ्तार होते ही विश्व स्तर पर सक्रियता देखी
जा रही है और उनके पक्ष में विश्व समुदाय खड़ा हो गया है.
डा. बिनायक सेन की ख्याति, उनके राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संबंध तथा एक चिकित्सक के
रुप में की गई सेवाओं के बीच क्या कोई संगति बैठती है? क्या सचमुच उन्होंने ऐसा कुछ
किया है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी जन-जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आया है? क्या
मुख्यत: दुर्ग एवं बस्तर जिले के जिन क्षेत्रों में उन्होंने काम किया है, वहां के
आदिवासियों की जीवन शैली बदली है? क्या वे नागरिक अधिकारों का महत्व समझने लगे हैं?
क्या उनमें स्वास्थ्य संबंधी जागरुकता आयी है? यदि इन सवालों का जवाब राज्य सरकार
से पूछा जाए तो वह दो टूक शब्दों में कहेगी कि कोई फर्क नहीं पड़ा है. बिनायक सेन ने
ऐसा कोई बड़ा काम नहीं किया है कि उन्हें याद रखा जाए.
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स्वयं मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह कहते हैं कि कोई भी बिनायक सेन के कामकाज की पड़ताल
कर सकता है. वे योजना आयोग की कमेटी में बिनायक सेन की नामजदगी से खफा हैं.
उन्होंने तल्ख शब्दों में कहा है कि जनसुरक्षा कानून के अंतर्गत राजद्रोह के दोषी
को केंद्र सरकार की शीर्षथ संस्था अपनी स्वास्थ्य सलाहकार समिति में कैसे मनोनीत कर
सकती है? मुख्यमंत्री की नाराजगी का आलम यह है कि उन्होंने योजना आयोग की बैठकों के
बहिष्कार का निर्णय लिया है. उन्होंने अपने निर्णय से प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर
अवगत कराया है.
यद्यपि डा. बिनायक सेन को योजना आयोग की जिस कमेटी में लिया गया है, वह सलाहकार के
रुप में है. उसकी सिफारिशों को स्वीकार करने की बाध्यता नहीं है. फिर भी इस कमेटी
का अपना महत्व है क्योंकि जनस्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण एवं लगभग दुलर्क्षित सवाल पर
उसे सुझाव देने होंगे.
1 नवंबर 2000 को नया राज्य बनने के बाद प्रथम कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अजीत
जोगी ने भी राज्य सरकार की लोक स्वास्थ्य कमेटी में बिनायक सेन को सदस्य के रुप में
मनोनीत किया था लेकिन तब सेन किसी अदालत के कटघरे में नहीं थे, हालांकि उन्हें
माओवाद समर्थक जरुर माना जाता था. इसीलिए तब उनके चयन पर कोई हो-हल्ला नहीं हुआ
किन्तु अब परिस्थिति बदली हुई हैं. डा. बिनायक सेन राष्ट्रद्रोह के आरोपी हैं तथा
केंद्र में है कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार. यह सवाल सहज उठता है कि योजना आयोग
ने उन्हें सम्मान देकर क्या जताने की कोशिश की है? क्या यह नैतिक मापदंडों एवं
मूल्यों के अनुरुप हैं? क्या नक्सल गतिविधियों में संलिप्त एवं किसी राज्य के
न्यायालय द्वारा देशद्रोही करार दिए जाने के बाद योजना आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्था
में ऐसे व्यक्ति को नामजद किया जा सकता है, इस प्रत्याशा में कि हाईकोर्ट एवं
सुप्रीम कोर्ट का रास्ता खुला हुआ है.
यह भी सवाल है कि क्या यह राजनीतिक नियुक्ति है और उस भाजपा सरकार के लिए चुनौती भी
जो छत्तीसगढ़ में आठ वर्षों से राज कर रही है? क्या इससे नक्सल मोर्चे पर केंद्र व
राज्य की संयुक्त मुहिम प्रभावित होगी जो अब तक सकारात्मक तरीके से आगे बढ़ रही थी?
या क्या केंद्र सरकार ने बिनायक सेन को योजना आयोग में नामजद करके अंतरराष्ट्रीय
साख बचाने एवं मानवाधिकारवादियों को संतुष्ट करने की कोशिश की है? ऐसे और भी सवाल
हैं जिसका उत्तर आना शेष है. एक बात स्पष्ट है कि बिनायक सेन के मामले में केंद्र
उदार प्रतीत होता है और संभव है सुप्रीम कोर्ट की तरह वह भी यह राय कायम कर ले कि
सेन के खिलाफ राजद्रोह का मामला आधारहीन है.
यह आश्चर्यजनक है कि इस ताजा घटनाक्रम को लेकर स्थानीय मीडिया में कोई विशेष हलचल
नहीं है जबकि यह अच्छी खासी बहस का मुद्दा है. विलाप केवल राज्य सरकार एवं सत्तारुढ़
भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं और जैसा कि स्वाभाविक है, मानवाधिकारवादी एवं
माओवाद के शहरी समर्थक खुश हैं हालांकि उनकी प्रसन्नता छपे शब्दों के जरिए व्यक्त
नहीं हुई है.
छत्तीसगढ़ सरकार और राज्य की पुलिस शायद अब महसूस कर रही हो कि बिनायक सेन के मामले
में उसने बेकार की जल्दबाजी दिखाई और अविवेकपूर्ण ढंग से काम किया. उनके खिलाफ
जनसुरक्षा जैसे कड़े कानून के तहत कार्रवाई आवश्यकता नहीं थी. नक्सलियों का संदेश
वाहक होना तथा पत्रों के आदान-प्रदान का आधार इतना मजबूत नहीं था कि इस धारा के तहत
उनकी गिरफ्तारी की जाती. रही सही कसर न्यायिक फैसले से पूरी हो गई. यदि उन्हें
आजीवन कारावास जैसी सख्त सजा नहीं मिलती तो संभव था मामला इतना तूल नहीं पकड़ता.
लेकिन इससे बिनायक सेन को जितना फायदा मिला है, वह बेमिसाल है. इसे उनकी खुशनसीबी
कहें और छत्तीसगढ़ सरकार की बदनसीबी, तो गलत नहीं होगा.
20.05.2011, 22.07 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Basudev Mahapatra [] Bhubaneswar - 2011-05-31 13:41:53 | | | |
An eye opener piece really. But the irony in India is that, instead of making people aware of the truth a section of media is always on mission to fool people by promoting its own agenda mostly based on falsehood and speculation. | | | | | | | | Rakesh Derhgawen [rakeshderhgawen@gmail.com] Raipur - 2011-05-24 18:26:57 | | | |
Vinayak Sen and his supporters must come forward to show what are his contribution as a physician in the tribal areas of Chhattisgarh. Else, Chahhtisgarh Government is not at all at fault to claim Sen is a non-cadre naxalite. Agreed that treason is too harsh an allegation, his crime is no less. | | | | | | | | mahesh sinha [] Raipur - 2011-05-23 13:29:42 | | | |
यह सारा खेल विदेशी ताकतों का है और देश की सरकार विनायक सेन को योजना आयोग का सलाहकार बनाकर इन ताकतों के हाथ में खेल रही है । क्या कभी इस देश की सुरक्षा अजेंसियों ने कभी इस बात की जांच करने का प्रयास किया है की एक बीहड़ में रहने वाले गुमनाम से व्यक्ति को इतना अन्तराष्ट्रिय समर्थन कैसे मिल रहा है । राष्ट्रिय मीडिया भी पूंजीवाद के दबाव में है । सूप्रीम कोर्ट का भी जमानत देते हुए इस तरह की टिप्पणी करना कितना सही है, जैसे की उसने अंतिम फैसला ही सुना दिया ? | | | | | | | | के. रवींद्र [k.ravindrasingh@yahoo.com] रायपुर - 2011-05-22 13:55:12 | | | |
दिवाकर भाई, सही है, कुछ सच चाह कर भी नहीं छुपता. | | | | | | | | Yogendra Thakur [yogdunia@yahoo.co.in] Jagdalpur (Bastar) - 2011-05-22 08:04:34 | | | |
विनायक सेन एक डॉक्टर हैं. लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं इसकी कोई गारंटी नहीं. आज ऐसे लोग बहुत मिल जायेंगे जिनके पास बहुत संस्था-संघटन के परिचय पत्र हैं. ऐसे लोग उन संस्था- संगठनो की आड़ में अपनी दुकानदारी चला रहे हैं. विनायक सेन भी उनमें शामिल होंगे. संस्था- संगठन विनायक सेन के बहाने खुद का बचाओ कर रहे हैं और सेंट्रल गवर्नमेंट अपनी किरकिरी बचाने उनका साथ दे रही है. | | | | | | | | Ashutosh Kumar [ashutoshkumar_2009@gmail.com] Noida - 2011-05-21 09:42:57 | | | |
बिनायक सेन ने न तो मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर बहुत काम किया है और ना ही चिकित्सक के तौर पर. उन्हें तो ऐसे लोगों ने हीरो बना दिया, जो पूंजीवादी शक्तियों के हाथों खेल रहे हैं. ऐसे लोगों को न तो छत्तीसगढ़ पता है और ना ही बिनायक सेन का काम. ये सियारों की तरह हुआ-हुआ करना जानते हैं. बिनायक सेन के समर्थकों को बताना चाहिये कि उन्होंने क्या-क्या काम किया है. स्पेसफिक काम बतायें. लास एंजेल्स के उस रिपोर्टर की तरह नहीं कि बिनायक सेन भारत में पिछले 20 सालों से सर्वाधिक लोकप्रिय चिकित्सक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. ऐसे चुटकुले सुनकर तो बिनायक सेन को भी हंसी आ जाती होगी. तो बात चुटकुले में न हो, बात तथ्यों के साथ हो. | | | | | | | | Raju Bhaiya [] New York - 2011-05-21 03:38:29 | | | |
He will be next Union Health Minister / Counselor... He got the fame nobody will stop him for Nobel Prize for Public Health work... | | | | | | | | sunil chipde [] bilaspur - 2011-05-21 03:27:21 | | | |
छत्तीसगढ़ सरकार की नाकामी से बिनायक सेन को फायदा ही मिला है, केंद्र जानती है कि नक्सल इलाको में चुनाव जीतना है तो .. किसी न किसी को सहलाना होगा, बिनायक को सदस्यता देकर ये सन्देश दिया गया है. यह केंद्र और राज्य सरकार दोनों को सोचना चाहिए कि क्यों किसी व्यक्ति विशेष को सरकारों के समकक्ष खड़ा कर रहे हैं. आपका लेख अच्छा लगा. वाकई दो गलत लोग आपस में लड़ें तो किसी एक को सही नहीं ठहराया जा सकता. | | | | | | |
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