विपिन चौधरी की दो कवितायें
साहित्य
विपिन चौधरी की दो कवितायें
लोकतंत्र का मान रखते हुये
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लाल रत्नाकर |
कंबल से एक आँख बाहर निकाल कर हम बाशिदों ने
इन सफेद पाजामाधारी मदारियों के जमघट का तमाशा खूब देखा
सावधानी से छोटे-छोटे कदमो से ये नट उछल-कूद का अद्भुद तमाशा दिखाते
इनके मजेदार तमाशे का लुत्फ उठा कर घर की राह पकड़ते
यह सिलसिला पूरे पाँच साल तक चलता
इसी बीच कुछ कमाल के जादूगरों से हमारा साक्षात्कार हुआ
बचपन में पढ़े मुहावरों को सिद्ध होने का गुर हमने इन्हीं से सिखा
इन जादूगरों को टेढी ऊँगली से घी निकलना आता था
पलक झपकते ही मेज़ के नीचे से अदला-बदली करना, इनके बाएँ हाथ का खेल था
पल भर में ये लोग आँखे फेरना जानते थे
इनकी झोली में ढेरों रंग थे
हर बार नऐ रंग की चमड़ी ओढे हुऐ मिलते ये जादूगर
भीतर से लीपा-पोती कर पाक-साफ हो बाहर खुले आँगन में निकल आते
चेहरा आम- आदमी का चस्पा कर
खास बनने की फिराक में लगे रहते
आँखों के काम
कानों से करने की कोशिश करते
झुठ को सच की चाशनी में डुबा कर चहकते
आज़ादी को धोते, बिछाते, निचोड़ कर उसके चारों कोनों को दाँतों में दबा
ऊँची तान ले सो जाते
हम उनके जगने का इंतज़ार करते भारी आँखों से ताकते
एक टाँग पर खड़े रहते
धीरे-धीरे फिर हम इनके राजदार हो चले
और न चाहते हूए भी कसूरवार बन गये
इस बीच हमारे कई यार- दोस्त इनकी बनाई योज़नायें के तले ढहे, दबे, और कुचले गये
इधर हम अपने हिडिम्बा प्रयासों में ही उलझे रहे
आखिरी सल्तनत की कसम खाते हुऐ हमने यह स्वीकार किया
कि हमें भी लालच इसी लाल कुर्सी का था
पर यह सब हमने लोकतंत्र का मान रखते हुए किया
हमें गुनाहगार हरगिज़ न समझा जाए.
साबूत इंसान बनने की प्रक्रिया से गुज़रते हुये
इंसानी खोल से बाहर भटकते हम
साँप की तरह मौसम-बेमौसम अपनी केंचुली उतार देते हैं
कभी मेमने की तरह हल्की आहट से डरते, दुबकते भाग खड़े होते हैं
तो कभी शेर की तरह माँद में घुस कर अपने दांतों और नाखूनों को तेज करने में जुट जाते
हैं
चुस्त अवसरों पर हमेशा कुते की तरह दुम हिलाई है हमने
लंगूर की तरह एक मौके से दुसरे मौके पर लपकने की पुरानी आदत रही है हमारी
कोयल की तरह अपनी जिम्मेवारी दूसरों के मत्थे मढ़ना हमें खूब आता है
उल्लू जैसी हमारी आँखें हर किसी पर गड़ी रहती है
जरा से तारीफ़ से और झूठी शान से हमारी गरदन जिराफ की तरह ऊँची हो जाती
शाही की तरह अपनी चमडी पर नुकीली कीलें लिये लम्बी सैर के लिये निकल जाते है हम
सियार की तरह मक्कारी का मकड़जाल बुनने में हमारा वक्त कटता है
पल में नष्ट होने वाली चीज़ों के पीछे गिलहरी की तरह लपकने वाली प्रजाति है हमारी
प्रकृति ने हर कदम पर हमें खुब मांजा
आज भी हम प्रशिक्षण के दौर में हैं
अभी भी हमें लुहार की तरह ठोकना,
कुम्हार की तरह गढना पडता है
नदी के किनारे हमारा लालन पालन हुआ
और हम नाशुक्रे उसी नदी को ओक लगा कर पी गए
हमारी प्यास लोमडी की तरह बेहद लम्बी थी
निर्जीव चीज़ें भी हमें लगातार माँज़ती रही
पर जानवरों के जो तौर-तरीके हमसें चिपके हुये है
उन्हें पूरी तरह साफ होने में अभी देर है
विकास के क्रम में हमसे जो चीज़ें नहीं छुट पायी हैं
उनकी स्पष्ट छाप हमारे सपाट मस्तक पर सहज ही देखी जा सकती है
ये चिन्ह जब हमारे साथ नहीं रहेंगे
तब शायद हम
साबूत इंसान बनने के क्रम में कुछ और आगे बढ़ सकेंगे.
21.05.2011, 16.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित