तेरी गलती-मेरी गलती
बाईलाइन
तेरी गलती-मेरी गलती
एम जे अकबर
कोई व्यक्ति सबसे ज्यादा उदार कब होता है? निश्चित तौर पर तब, जब वह स्वयं को क्षमा
करना चाहता है.
गृहमंत्री पी. चिदंबरम को उदारता की अतिरिक्त आपूर्ति की दरकार है. उन्होंने यह
अभियोग लगाते हुए कि पाकिस्तान इन वांछित आतंकवादियों को शरण दे रहा है, 50 नामों
की जो ‘स्टार लिस्ट’ इस्लामाबाद को भेजी थी, वह टाइम्स ऑफ इंडिया की प्रभावशाली
रिपोर्टिंग के कारण उल्टे चिदंबरम के मुंह पर ही आ पड़ी. इस सूची में से एक व्यक्ति
जब पेशी की तारीखों में कोर्ट नहीं जाता, तो पुणे में जरी बेच रहा होता है. दो अन्य
लोग तो गृह मंत्रालय के काफी करीब हैं, क्योंकि वे हैदराबाद पुलिस और मुंबई जेल की
मेहमाननवाजी में हैं. संयोग कहें या दुर्योग, एक चौथा व्यक्ति मर चुका है. और गृह
मंत्रालय की साख के साथ भारत में ही दफन है. गृहमंत्री ने बड़ी नजाकत से इसे
‘मानवीय भूल’ बताया और तुच्छ नागरिकों से अपने रोजाना के कामों में व्यस्त रहने को
कह दिया.
क्या गलती की गंभीरता को कम करने के लिए उसे ‘मानवीय’ कह देना पर्याप्त है? चिदंबरम
के अनुसार कौन-सी चीज किसी गलती को माफ न करने योग्य बनाती है? क्या यह ‘पाशविक’
भूल होनी चाहिए या कुछ असभ्यता के साथ ‘उप-मानवीय’ भूल? भूल मानवीय हो सकती है और
क्षमा दैवीय, लेकिन यह पावन सलाह बड़ी तुच्छ प्रतीत होती है, जब आप खुद को माफ कर
रहे हों. भारत के गृहमंत्री अपना अपराध स्वीकारें, ऐसी जवाबदेही कब आती है, या फिर
हमें मुंबई में आतंकी हमले जैसी किसी त्रासदी की जरूरत है (अमरीका में कोर्ट ट्रायल
के दौरान पेश किए गए सबूतों पर विश्वास किया जाए, तो मुंबई में आतंकी हमले की साजिश
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने रची थी)?
अपराध और दंड, या भूल और नतीजे को लेकर चिदंबरम अति लचीला रुख रखते हैं. साफ है कि
वे अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी टू्रमैन के प्रशंसक नहीं हैं, जिन्होंने अपनी मेज पर
सूत्रवाक्य लगा रखा था कि जवाबदेहियां यहां से परे नहीं जातीं. जब चिदंबरम के
कार्यालय के आसपास के इलाके में भी कहीं जवाबदेहियां नहीं हैं, तो वे जहां चाहें वहां
से परे जा सकती हैं. वैसे, एक एसपी, डीएसपी और कनिष्ठ अधिकारी को लपेटे में लिया गया
है. पहले दो लोगों का स्थानांतरण किया जा रहा है, ताकि वे सरकार के किसी और कोने
में जाकर ड्यूटी के दौरान सो सकें. कनिष्ठ अधिकारी को निलंबित किया गया है. विभिन्न
समयों पर चिदंबरम आईबी या मुंबई पुलिस पर दोषारोपण कर चुके हैं. यहां तक कि एक अलग
संदर्भ में प्रधानमंत्री पर भी दोष लगा चुके हैं.
चूंकि समकालीन गृह मंत्रालय में गलती साफ तौर पर वंशानुगत रोग बन चुकी है, इसलिए यह
बेहद मुश्किल है कि प्रशंसित सीबीआई इसके विषैले प्रभावों से अछूती रह सके. बहुत
साल पहले की बात है, जब बंगाल में माक्र्सवादी असरदार ताकत बने हुए थे, एक विदेशी
किराए का टट्टू निजी विमान लेकर देश के हवाई रक्षा तंत्र को धता बताते हुए राज्य से
होकर उड़ा और पुरुलिया जिले में हथियार टपकाए. बड़ी लंबी कहानी को संक्षिप्त करते
हैं. इसका पायलट किम डेवी डेनमार्क का नागरिक था. उसने एक साक्षात्कार में कहा कि
यह सब वाम मोर्चे की सरकार को गिराने के लिए दिल्ली की योजना थी. दिल्ली डेवी का
प्रत्यर्पण चाहती थी. जब सीबीआई इसकी पुष्टि के लिए संवैधानिक पीठ के सामने पहुंची,
तब उसके पास ऐसा गिरफ्तारी वारंट था, जिसकी तारीख निकल चुकी थी. यह ‘स्टार लिस्ट’
के पैमाने पर कोई गड़बड़झाला नहीं है, पर निश्चित तौर पर कार्यकुशलता का विज्ञापन
भी नहीं है. और जब भाजपा हंसी, जैसा कि किसी विपक्षी पार्टी को पूरा अधिकार है,
चिदंबरम ने भाजपा के प्रवक्ता पर ‘भारी नादानी’ का आरोप जड़ दिया. उन्होंने कहा कि
जो लोग डेनमार्क गए थे, उन्होंने उन्हें नहीं, कर्मचारी मामलों के मंत्रालय को
रिपोर्ट दी थी, जो प्रधानमंत्री के अंतर्गत आता है. दूसरे शब्दों में, प्रधानमंत्री
से इस्तीफे के लिए कहिए.
जब कैबिनेट मंत्री दावों की बजाय दोषारोपण के खेल में फिसल पड़ते हैं, बेड़ों में
चरमराहट शुरू हो चुकी होती है. आप यूपीए 1 की प्रभावशाली शृंखला और वर्तमान की
उलट-पुलट का विरोधाभास देखें, जिससे आपको चुनावी नतीजों का सूत्र मिल जाएगा. लगता
है कि कोई चीज विक्षिप्त ही रही है. राहुल गांधी के राजनीतिक सलाहकारों ने जब यूपी
में मायावती के खिलाफ राजनीतिक पारा गर्माना चाहा, वे सही-सही गिनती भी नहीं कर सके.
सहज बुद्धि ही कह देती कि उत्तेजित आंदोलनकारियों के आरोपों और वास्तविकता में कुछ
दूरी तो होती ही है, पर प्रचार की आकांक्षा इतनी तीव्र थी कि किसी ने भी जरा भी
जांच-पड़ताल की जहमत तक नहीं उठाई. नतीजा : जो चीज मायावती को प्रभावशाली जवाब हो
सकती थी, वह अंतर्विरोधों से भरभरा गई.
असल मुद्दा पुलिस या नेताओं द्वारा की गईं भूलें नहीं हैं, बल्कि वे संदर्भ हैं,
जिनमें ये भूलें हुईं. जब गृह मंत्रालय पाक प्रायोजित आतंकवाद जैसे भारत के
केंद्रीय हित से जुड़े विषय पर पाक को भेजने के लिए कोई सूची तैयार कर रहा हो, तो
किसी को भी यह उम्मीद रखने का अधिकार है कि पुलिस ऐसा व्यवहार नहीं करेगी, मानो वह
उनींदी दुपहरी में थाने में किसी टुच्चे चोर के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट लिख रही
हो. यह सूची गृह सचिव और गृहमंत्री के व्यक्तिगत क्लीयरेंस के बगैर पास ही नहीं हो
सकती थी. अगर ऐसा हुआ है, तो उनकी गलती दोहरी हो जाती है. यह इतना महत्वपूर्ण
दस्तावेज था, जिसे किसी और के हस्ताक्षर पर नहीं छोड़ा जा सकता.
डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार फिसल रही है. अगर हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो यह बिना अवरोध
टपकने लग जाएगी.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे,
हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
22.05.2011, 10.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित