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बाबा और अन्ना के पीछे

मुद्दा

 

बाबा और अन्ना के पीछे

कनक तिवारी


अप्रैल में अन्ना हजारे और जून में बाबा रामदेव के अनशनों के कारण देश के जनजीवन और राजनीति में उथल पुथल से इन्कार नहीं किया जा सकता. अन्ना का अनशन जन आंदोलन की गंगा का यदि गोमुख समझा जाए और बाबा का अनशन गंगोत्री तो एक सांस्कृतिक समास गढ़कर जनता के तेवर को सम्मान देने से लोकतंत्र की नई दिशा तय की जा सकती है. दोनों सामाजिक नेताओं के अनशन और आंदोलन एक ही प्रकृति और दिशा के दीखने के बावजूद अलग अलग कई अर्थों में हैं. दोनों का टकराव सत्ता प्रतिष्ठान से है, बल्कि सभी राजनीतिक पार्टियों और नौकरशाही सहित परदे के पीछे से अपने हाथों में कमान रखने वाले उद्योगपतियों से भी. इसके बावजूद दोनों घटनाएं और उनके परिप्रेक्ष्य तथा परिणाम कई अर्थों में अलग अलग भी हैं.

बाबा रामदेव


अन्ना हजारे एक प्रदेश की सरहदों के भीतर रहकर जन आंदोलन करते रहे. उनमें महत्वाकांक्षाएं नहीं रहीं. महाराष्ट्र की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थितियां पूरे देश का आइना नहीं हैं. इसलिए भ्रष्टाचार से लड़ते अन्ना को कुछ अच्छी सफलताएं भी हासिल हुईं. आजादी की लड़ाई में बंगाल के बाद महाराष्ट्र ही सबसे पहले और सघन रूप में उठ खड़ा हुआ था. गुजरात ने एक गांधी पैदा करके पूरा नेतृत्व छीन लिया. उसी प्रदेश के सबसे ज्यादा कारोबारियों ने विदेशों में काला धन जमा कर रखा है. उत्तर भारत के रामदेव भ्रष्टाचार सहित अन्य मुद्दों पर संघर्ष करते हैं. देश यह भी जानता है कि बीमारू राज्यों में ही सबसे अधिक भ्रष्टाचार है और उसके खिलाफ लड़ने की संकल्पहीनता भी. दोनों जननेता अलग अलग परिस्थितियों, विचारों और समझ की उपज हैं.

अन्ना की सलाहकार मंडली के सदस्य शांतिभूषण, स्वामी अग्निवेश, संतोष हेगड़े, किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल और प्रशांतभूषण वगैरह जनता की निगाह में उन पर हावी है. बाबा रामदेव के साथ यह अच्छा है कि उनका कोई लेफ्टिनेन्ट लोकप्रिय या ख्यातनाम नहीं है. निर्णय लेने में बाबा का एकाधिकार है. अन्ना बुद्धिजीवी नहीं हैं. बाबा रामदेव उनसे कुछ ज्यादा ही पढ़े लिखे हैं. अन्ना की उम्र हो चली है और बाबा रामदेव अभी युवा हैं. अन्ना ने मुख्यत: वकीलों की सलाह पर एक सीमित मुद्दे का र्स्पश किया है कि एक कड़ा कानून सिविल सोसायटी के सदस्यों के साथ मिल बैठकर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाया जाए. वकील सलाहकारों ने इंदिरा गांधी को डुबाया था. वे मनमोहन सिंह को भी गुमराह करने से बाज नहीं आती. भाजपा को भी वकील-रोग लग गया है. बाबा भी कानूनी सलाह तो लेते हैं लेकिन उसे परदे के पीछे रखते हैं.

केन्द्र सरकार एक अद्भुत राजनीतिक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की राजनीतिक परिपक्वता से इंकार नहीं किया जा सकता. उन्होंने जिस तरह कांग्रेस की गाड़ी को पटरी पर चलाया और प्रधानमंत्री पद को ठुकराया-वह नायाब मिसाल है. प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह तो कांग्रेसी ही नहीं हैं. उनका फंडा है कि सरकार को मेनेजमेन्ट गुरुओं की सलाह से चलाओ. जो कद मोंटेक सिंह अहलूवालिया, सेम पिट्रोदा और आर्थिक सलाहकार मंडली का है, उसके सामने एकाध मंत्री को छोड़कर सभी बौने दिखाई पड़ते हैं. केवल प्रणव मुखर्जी हैं जो कांग्रेसी संस्कारों, कूटनीति और तिकड़मों के सबसे वरिष्ठ जानकार हैं. वाचाल, चपल और जहीन चिदंबरम भी कांग्रेस संस्कृति की ही उपज हैं. भले ही बीच में सीमित अंतराल के लिए पार्टी छोड़ दी हो. कांग्रेस के नए पांच सितारा चाणक्य कपिल सिब्बल और छोटे परदे के मुखर प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी जिरह ज्यादा करते हैं. मामलों के भविष्य को कम समझ पाते हैं.

अन्ना हजारे का अनशन जानबूझकर उस वक्त निर्धारित किया गया था जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे थे. कांग्रेस नेतृत्व झल्लाया तो जरूर था लेकिन किसी तरह उसने अन्ना के सलाहकारों स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल को कपिल सिब्बल के कार्यालय तक समझौता फार्मूला ढूंढ़ने के लिए बुलवा ही लिया. यह कदम आंदोलनकारियों के लिए अपमानजनक था लेकिन सिविल सोसायटी के सदस्यों को सरकारी तामझाम से बात करना सम्मानजनक लगा. सरकार को मालूम है कि अकेले निर्णयकर्ता बाबा रामदेव को किसी भी सूरत में मंत्रियों के दरबार में नहीं भेजा जा सकता. इसलिए प्रधानमंत्री ने प्रोटोकॉल के नियमों को तहस नहस कर इतिहास में पहली बार एक निजी व्यक्ति के सामने घुटने टेकते हुए अपने चार मंत्रियों प्रणव मुखर्जी, कपिल सिब्बल, सुबोधकांत सहाय और पवन बंसल के साथ सचिवों का अमला भी सीधे हवाई अड्डे भेजा.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

RAJENDRA KANPHADE [raajendra.kanphade@gmail.com] . Aheri, Gadchiroli (Maharashtra) - 2011-06-04 04:29:08

 
  The whole drama is being played as Eye Wash for diverting the attention of the people from the main issue and main culprit.
THE THIEF SHOUTS \"PAKDO! PAKADO!! TO SAVE HIMSELF AND ATTENTION IS DIVERTED FROM THE REAL/MAIN CULPRIT
 
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi - 2011-06-03 06:47:49

 
  मै सिर्फ इतना कहुँगा \"बाबा आगे बढो और यह काम खतम करो या इस काम के लिये खतम हो जाओ \" दोनो सुरते हाल मे देश का भला ही होगा !! 
   
 

नरेंद्र तोमर [nakutom@yahoo.com] वै‍शाली, गाजियाबाद - 2011-06-03 06:37:16

 
  जैसे जैसे मीडिया में प्रचार मिल रहा है और कंफयूज्ड सरकार घुटनों के बल बैठ मनाने में लगी है, बाबा रामदेव के तेवर चढते जा रहे है] उनकी फरमाइशों का दायरा फैलता जा रहा है, और अब वह व्यवस्था बदलने की बात करने लगे हैं। उनको आगे करके भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर पर्दे के पीछे से अपना गहरा राजनीतिक खेल खेलने वालों ने अब उनको यही सुझाया लगता है-व्यवस्था परिवर्तन अर्थात जेपी का पार्टी विहीन जनतंत्र-एक बेहद अस्पष्ट धारणा, जिसके नाम पर लोगो को अनंत काल तक छला जा सकता है।
देश के 125 करोड लोगों को एक तरफ कर अपने कुछ चेले चपाटों के साथ सात सितारा सुविधाओं के साथ तथाकथित सत्याग्रह के द्वारा दबाव बना कर वह किस प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, व्यवस्था चाहते हैं, यह स्पष्ट नहीं करते। पर यह बात उनके पीछे खडे लोगों, गोविंदाचार्यो की मौजूदगी से, आंदोलन की धर्मवादी प्रकृति और प्रचार से जाहिर हो जाती है।
दरअसल यह बेहद खतरनाक चाल है देश में जनतंत्र के स्थान पर अधिनायकवाद लादने का, और वो भी धार्मिक-बहुमतवादी। इसकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जमीन बहुत पहले से तैयार की जा रही थी।
यह सब हो रहा हो रहा पर ताज्जु।ब की बात तो वामपंथियों की चुप्पी है।
 
   
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