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कहानी | वाश्विता एक नाम | इला कुमार

कहानी

वाश्विता एक नाम

 

इला कुमार

 

 

‘‘कभी-कभी इच्छा होती है कपड़े बदलने के साथ-साथ शरीर भी बदल डालूँ.’’


‘‘क्या...’’


स्वयंभू की दृष्टि वाश्विता के चेहरे पर घूमकर वापस लौट आई वहाँ अनमनेपन की परत के पीछे उसका अपना ठंडा ऊहापोह कुहरे की नाई लिपटा पड़ा था.

 

रेलिंग की सतह पर दोनों हथेलियाँ टिकाकर खड़ी वाश्विता की मुद्रा में न कोई प्रश्न था न उत्तर की प्रतीक्षा. सामने नीम के तने पर मजबूत पकड़ जमा-जमाकर फैली मनीप्लांट की लतर की दिशा में पसरी निगाहों में छिपी उलझन की लकीर सीधी नीम के खुरदरे तने तक फैली हुई थी. सोच में डूबी उस मुद्रा के पीछे शायद उसके स्वयं के स्वप्न थे. मानों बहुत से स्वप्नों के बीच उनकी सत्यता असत्यता को तौलती हुई वह खड़ी थी. लाल फर्श की पारदर्शिता पर हल्के आसमानी रंग की पोशाक में मूर्तिवत खड़ी वाश्विता की गर्दन की खम में वही राजरानियों वाला सौंदर्य था, सुराहीदार कंधों पर टिकी ऐश्विर्यित मुस्कान से ढ़ंकी लंबोत्तरी गोलाई.

स्वयंभू ने सोचा कि वह वाश्विता के करीब जाए, थोड़ा आगे बढ़कर दाहिने कंधे के नीचे बाँह और पीठ पर अपनी दाहिनी हथेली को नरमी से टिका दे और तब शायद उलझनें स्वयं वहाँ से तिरोहित हो जाएँगीं. झाड़ियों के बीच छिप-छिपकर चुनमुन करती चिड़ियाओं के पास चली जाएँगी.

उसने गोलाई में कटी गुड़हल की झाड़ी को देखा, वहाँ पत्तों की ओट पूरी गोलाई में फैली हुई थी, अंदर के गोलक में डालियाँ एक दूसरे में उलझी हुई, उसके अंदर शायद चिड़ियों के घोंसले थे. उस गोल झाड़ी के अंदर से हमेशा चिड़ियों की चुनमुनाहट की आवाज़ आती.

‘‘कल शाम ही ड्रेसिंगरुम में कपड़े बदलते समय यह बात में उगी.’’

‘‘क्या फायदा? फिर से गर्भगृह, फिर बचपन.’’

स्वयंभू ने सोचा कि वह आगे कहे कि फिर एक बार कई वर्ष प्रबुद्ध होने के इंतजार में बीत जाएँगे. इतने सालों में जो इतनी मेहनत से यह सारा कुछ सीखा समेटा गया है पुरानी अड़चनों को परे हटाकर मंजिल की ओर चले गए रास्ते पर आगे और आगे बढ़ने की चेष्टा के बीच समृद्ध वर्ष बिताए गए हैं, वह सारा कुछ फिर से मुट्टी से रेत की नाई फिसल जाएगा. क्या पता फिर से कायाकल्पित जीव वह सब पुराना समेट पाने में सक्षम हो पाए या नहीं.

‘‘हूँ, मेरे मन में भी यही बात आई थी.’’

वाश्विता की अनमनी आवाज़ बरामदे के रेलिंग के पार चली गई. मोटे लकड़ी के डंडों से बनी रैलिंग सफेद पेंट से पुती हुई जड़ भाव में स्थित थी. लकड़ी के लंबे टुकड़ों के पार पूरा बगीचा पसरा पड़ा था. एक, दो, तीन, चार- यहाँ सामने रेलिंग के पूरे 16 डंडे ऊर्ध्व खड़े थे. बीच में बर्फी की शक्ल के काठ के टुकड़े सीधे खड़े डंडों को ऊपर से अपने अंदर समेटते हुए. पूरे बरामदे को घेरने वाले उभरी हुई सतह वाले मोटे डंडे सरीखे लकड़ी के लंबे टुकड़े रेलिंग की ऊपरी सतह को सिरजते हुए लंबाई में बरामदे को घेरे हुए खड़े थे.

उदग्र खड़े 12 टुकड़ों को जोड़कर बनी हुई रेलिंग की एक यूनिट थी. बरामदे को घेरती हुई यहाँ से वहाँ तक फैली हुई, पूरी संरचना के बीच ऐसे चौबीस यूनिट उपस्थित थे. एक लंबा बरामदा था वह.

वाश्विता ने लम्बे बरामदे को एक बार उसकी पूर्णता में पूरा देखा. वहाँ हमेशा की तरह फर्श की लाल पारदर्शिता पसरी पड़ी थी. वहाँ हर समय चिकनी पारदर्शिता को काटते हुए यहाँ-वहाँ रक्खे गए गमलों के पौधों का चिकना हरापन सुबह से शाम तक वहाँ की शाँति फिजा में दमकता रहता.

मांसटेरा की गोलाकार पत्तियों की सतह कमल की तर्ज पर अपने अंडाकार बनावट को छोड़ मानों गोलाई की ओर मुड़ना चाहती. हरे डंठलनुमा तने से एक-एक करके पत्ते निकलते. पहले वे लपेटे गए गोल मुलायम डंडे जैसे दिखते फिर शनैः शनैः एक-एक पत्ति खुलनी शुरु होती. नर्म हरेपन की छाँह में डूबी चिकनी सतह.

वाश्विता ने सभी गमलों को एक साथ देखा, वहाँ पौधों की अपनी दुनियाँ थी, उनका समाज था. छोटे-मोटे, ठिंगने, लंबे. बरामदे के मध्य में गोलाकार फर्श पर बेंत की कुर्सियों के तिरछे झुकाव बेत की गोलाईयों में डूबे हुए. धूप थोड़ी तिरछी होकर छत के मुड़े कोनों से अंदर झाँककर चुपचाप कुर्सियों की पीठ पर पसर गई थी. वहाँ पोर्टिको के खंभे से लेकर बेंत की कुर्सियों तक स्वर्ण रश्मियाँ अगले घंटों में अपना साम्राज्य फैलाने वाली थीं.

उन स्वर्ण रश्मियों के संग एक-एक जूही के पत्तों से एक-एक सूर्य किरण टकराएगी. कुछ किरणें तो सीधी निकल जाएगी, कुछेक परावर्तित हो इधर-उधर फैल जाएंगी और जूही की लतरों से घिरे मेहराब की ऊपरी गोलाई को बिना छुए हुए धूप का एक गुच्छा सीधा बरामदे की फर्श पर जा लोटेगा. फर्श की सीमेंटी सतह अंतिम किरण के रहने तक प्रकाशित रहेगी, फिर वहाँ एक कच्चा धुंधलका घिर आएगा.

‘‘मैं अंदर जा रहा हूँ.’’

स्वयंभू की आवाज़ गोल मेहराब के पीछे कुनमुना कर छिप गई, वाश्विता ने ड्राईगरुम के दरवाजे से अंदर जाती हुई उसकी आकृति को देखा.

वह स्वयं के आर्गन बजाने का समय था. उसकी एकमात्र बची-खुची हॉबी जिसे उसने एहतियात से संभाल समेट कर रक्खा था.

पिछले बरामदे में खुलने वाले अंदर के गोल कमरे में आर्गन लंबे स्टैंड पर रक्खा रहा करता, छुट्टियों के दिन ढलती शाम के पहले वाले घंटे में स्वयंभू के अंदर एक तलब जाग उठती. एक अनदेखी हवा की तह लहर की शक्ल में उसके बालों के सिरे को छूती, सभी बालों की जड़ें एक साथ सिमसिमा उठती. झुरझुरी की तह बाहों के बालों से लेकर समूची त्वचा पर सरसरा उठती, उसका पूरा ज़िस्म अलग किस्म की लालसा तले लरज उठता, वह जहाँ कहीं भी बैठा होता, बस उठ खड़ा होता.
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